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हरिदासखसंस्कतग्रन्थघषालासमाख्य-
कारीसंस्छतसीरीजपुस्तकमाखायाः
२९
स्तोज्नवि भागे(१) प्रथमं पुष्पम् ।
+ श्रीरोौ वन्द ५
8. सप्त-पाडि &
श्रीरिव-
-महिम्न-स्तोत्रम्। . `
्ीमद्गन्धरवराजपुष्दन्ताचाभ्यषलकमरगीतम्
हरिहिरपक्षीय-मधुसूदनीटीकासमलड्कुतम्
51, कुन ।
िपाट्युपपद-पण्डित श्रीनारायणपति शम्भ-
क~~ विरचित- - ` य
सैस्ङृतटीका १ सस्छतपयानुवाद २ माषाटीका ३
भाषाप्यानुवाद् ४ भाषाविम्ब ५
पश्चतत--
पञ्चम॒दख्याख्यया व्याख्यया सम्वल्तम्
तथा राक्तिमहिम्नस्तोत्रसाहितम् ।
. काशीस्थ-
खेठ श्रीहरि दासगुक्षपुच्रेण
क, 2 ।
१।खब तर्छृतसीरीज-काशीसंस्छृतसीशेजाचनेकपुस्तकमाठ प्रकाशकेन
सेठ जयकृष्णदासयुप्तमहाशयेन स्वकीये ‹ वियाविखस यन्त्राख्ये मुद्रितम् ।
#4
. इर तरह के संस्कृत श्रन्थ तथा भाषा भाष्य पुस्तकों के मिख्ने का पता--
जयकृष्णदास-हरिदासगुप्तः `
.; व्योंखम्बासस्कृलसीराज आफेख,
व्रैश्रावसर भेष, गापारमदारख्न
१1 बनारस सिरी ।
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“कपू रगौरं करुणावतार, संसारखारं मुजगेन्द्रहारम् ।
सदावसन्तं हदयारविन्डे, भवं भवानीसहितं नमामि" । १८।
( शिक षुराण )
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चहु आर जटा अटक लटक फनि सेक फनी फहरावतु है ।
“रसखान {क ह) तवै चितदै र तिनके =
न जद चितवे चितहं तिनके दुख दुन्द् भजावत् है,
गजखाट कपालके ठि से हे
के माल विसाट से गा बज्ञावत आवतु है ॥९॥
“गुरू पितु मातु मेस भवानी . &
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‹“विदवनाथ । |
मम नाथं !!
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त्रि्ुवन ` माहेमा विदित वुद्यारी!”।
ड दे अनाथ नाथ!
आपकी मटहिम्नस्ततिकी येसब रीकायं केवलं अपनी
| बुद्धि ओर वाणी के शुद्ध करनेकी इच्छा से छिखी , गई है-अत-
एव एक मार यदी निवेदन है कि आपने जव महिम्नस्तो्रको
& अपनाया दै तों इन टीकाओकोभी दया करके अपना खीजिपः 9:
एः क्योकि
^“जो बार्क कह तोतरि बाता
खदित होदि खनि युरु पितु माता ।” (ठु° रा०)
वस ओर मैं क्या कः सकतो हं ।
आपका परमापम्-
नारायणपतिश्च्स्मा |
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5 धयः कवि ओरं कोव्यके विषयकी क्छ चचां छिखी जाती है
` परइ मदिम्नस्तोचके रचयिता श्रीमत्पुष्पदन्ताचा।च्यं गन्धर्चराज हें
जिनका पताः खगाना हम सव नरदेदी खोगो के लिये , बडाही
कठिन है षिरमी जो कछ: कथा वाता उपरज्ध हो सकी है वहः
उनके चत्तान्त “ुष्पदन्तो-इन्तः, मे छिखदीगदई हे जो इस न्थ केः
साथ प्रकारित भी करदी जाती हे। 1 9 लः 3
श्री महादेवके इस मदिम्नसतोचका वार्तविक नाम ८८ धूनरि-
स्तोत्र” हे जेखा कि इसीमे कहा दै (शूजं>ः .स्तोजमेतत्"-{ ३४ )
पर धके आदिमे “मदिम्नः"” पद्का प्रयोग _होनेसे रोकमे महिम्न.
स्तोचदी नाम भचकित दै-क्योकि सामवेदक तख्वकार -शाखाकी
«केनोपनिषद्ः-भी अध्याय ओर परथमः मन्न के आदिमे ‹ नोऽ
षदे पडनेहीसरे तवका रोपनिषद्के प्रय्याय ( बदरे ) मे “केनोवनिः
वड्” परसिद्ध दै-इसी ध्रकारसे ““श्यामारदस्य” की स्वरूपरः वत्तिमी'
आदि म कपूर शब्दं पड्जानेदीसे “कचरूरस्वति” कदी जातौ ह ।
किसी किसी चुर्ुतकके आदिमे श्रीपुष्पदन्त उवाचः” यह् पद्भी-
पाया जाता टै, यह वाक्य “शोवागमः किवा (शवरहस्य? क) हेः
क्योकि उक्त ग्रंथोमे पिरे कविकी कुछ कथाका वर्णनं करे कः
प्राचीनता सिद्ध है । इस र्तोजके वत्तीसदी ३२ शोक “ श्रीपुष्पदन्त. `
खुखप_जनिगंत” ( ४० ) हें इनके आगे फकटस्त॒ति वारे श्खोक पत्यै
उक्त शेवागम अथवा शिवरहस्यके दैँ-- क्योकि उन श्लोको ४
कुछ उट फेर अथवा न्यूनता अतिरिक्ता ( कमी बेशी ) ६:
जाती हे, पर आजकल खञं ही मदहिम्नस्तोजके श्छोकोकयी संख्या
चाखीखंदी ४० मानी जाती है, अत एव इस व्र॑थतेमी उदी चालीस
श्खोको पर '“पश्चञुखी टीका” अर्थात् संरकृतरीका १ संरफ़तं द्रः
च्छः
२ भ्रूमिका ।
को पच टीकायें इसी इच्छसे लिखी गई है कि संसृत अथवा
भाषाके प्रेमी रोगोको कुक आनन्द भातत होवे ओर अपनीभी बुद्धि
ओर वाणी पवित्र दोसके लेखा कि इसीमं कदा दे
“मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः । |
पुनामी त्यर्थे ऽसिम न्पुरमथन ! बुद्धि व्यवसिता” (३)॥
` इन संस्कतं ओर भाषा टीकार्ओंमं मूक शछोकोके जो पदं उह्- |
धृत किये गये है :वे कोठे (-मदिश्नः ) रक्वे गये हैँ ओर जदा
कटी कोई एदं ऊपरसे खुगाना पडा. वहां खडाकोष्ठ [ _ । क~
गाया गयाः है उक्त चाखीख शोकरोसे भिन्न आर ओर भी जो स्फुट
श्छोक मि हैँ वे मी ` पद्याचुवादेके खाय. इसी छेखके अन्तमं रगा
दिये गये हैँ । 5 नि निः कणा.
< -इस स्तोचको भेव सम्प्रदायके छोग तो श्रुतिके ` समानही मानते
है बरन वेदाध्ययनकी परिपाटीके. अनुसार, राच्चिमं इसकाभी .पांठ
नहीं करते पर अन्य खोगोमे मी इसका ऊ कम आद्र नहीं होता |
मेरे पूवर पुरुष पण्डित. रामानन्द ज्रिपाठीजीने अपने ^विराडविवरणः
|
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खचवाद् २ भाषाटीका २ भाषापद्याचुचाद ४ तथा भाषाविम्ब ५ नाम |
|
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नामक्ंथमे जो कि संवत् १७ १३ वेक्रममे बनाथाः इस ` मदिम्नस्तो-
रके-“असित गिरिसमं, स्यात् ( ३२.) श्टोकको सप्रति करके छि-
खाहे। | तिन पी ^}. ;
, . इस स्तोजकी कविता अथवा रचनाशेटीकी उत्तमता- इतनेदीमे ,
समञ्च खेना | चाहिपः कि इसी, स्तोत्र के कत्ता पुष्पदन्ताचाय्यने वर +
खचि अथवा. कात्यायन होकर बडेसे बडे अनेक श्रन्थ . बनाये चरन
महर्षि पाणिनिके . रचित व्याकरण शास्रके सूत्नौकी न्यूनताभी अ-
पना वार्तिक बनाकर मेटादिया पर जैसा आदर ईस वत्तीस ३२
श्छोकके स्तोच्रसे उनको प्राप्त हुआ. चह अरोकिकही नहीं वरन
भन्य ग्रन्थोसे अरभ्यही बनारहा वास्तवमे यह उदह्ीका कथन बहुत ।
टीकं प्रतीव दोता ३ कि-- | | ; |
५रिथराया स्त्वदुभक्ते स्िपुरहर ! विस्परूजित मिदम्?" (११)
इसरतोतरके-“किमीहः किङ्कायः००८५) इत्यादिरेखो को देखकर कोई |
कोई इसे वौद्ध अथवा चार्वाक इत्यादिके समयका मानना चाहते ट, |
परन्तु उन लोगोक) स्मरण ` स्लनाः चाहिए कि शाक्यमुनि के पटिटे- ‹
|
|
च, ।
हीसे नास्तिक मत प्रचित था चैदिक मत आरितिर्क्तका था आरः
उसके विरोधी रोगी नार्तिक थे उ्णी खोगोके मतावलम्बी दैत्य
राश्चसादिके साथी बहुतेरे अनाय्यं श्खेच्छ इत्यादि इष फिर उद्धीमें
चार्वाकभी वाह पस्त्य मतकां पचारक आ ओर चार्वाक्र दशंनका
कत्ता बना-जोहो पर इन प्रमाणोसे इस-“'अनोपस्यं मनोहारि (३२)
स्तोका समय नहीं निर्णीत हदोसकता, अत एव इस विषय मे मा-
धाप्ची करना व्यथंदीसा जान पड़ता है इसखियि यद भारं केवलः
पाठकोके विचार पर निभंर कर दिया जाता दे, आशा है कि वे खो-
गभी यदि निरंतर उद्योग करते र्देगेतो कभी न कभी यह चरि
(कसर ) पूरी पड जावेगी ।
इस छोटेसे स्तो पर अनेक टीकाये' यथा समय बनचुकी दहं
पर वे सव अव पायः अलभ्य सी दोगई ह फिर्भी कडक टीकां प्रच-
लित है इन मे ३२ श्टोकौ परं पण्डितकोमरखरामजोकी खबोधिनी-
रीका है जोकि साधारण एवं संक्षि होने पस्मी मूखाथं को भरकट
करदेती दै-उसीके अन्तका यह शटोक प्राचीन रीकाओंकामभी पता
बतलाता दै-
(“काराणां सुखबोधाय, नाना रीका जचुसारतः ।
` इयं कोमटरामेण, छता रीका खबोधिनी ॥
`ओर दुसरी रीका ““अद्धैतखिद्धि? नामक ॒वेदान्तविषयक भ॑थके
रचयिता तथा “शारीरक सूः णवं “गीताः?-इत्यादिके भाष्यकार
काशीवासनिरत यतिवर “मशु खूदन सरस््रती? जीकी शिवविष्ण्व-
थक व्याख्या “मथुसखूदनी रीकाःः के नामसरे परसिद्ध हे इसमे ३ श
श्खोको पर हरपश्च ओर हरिपश्चकी दुहरी रीका छिखी गई है । यह
रीका बहत उत्तम ओर विडत्तापूणं होने से विद्धान् खोगौके देखने
ग्य है-अतः यदी रीका इसग्रंथ मे मूर श्छोको के वाद रक्खी
` गई है-इस के भी आदिका इरोक अन्य रीकाओं की सुचना दे-
ता है-यथा--
विश्ञेश्वरं गुरु नत्वा, मदहि्नाख्यस्तुतेरयम् 1
चूठ्व।चाय्यं ऊतव्याख्या-सङ्प्रहः क्रियते मया ॥
परन्तु स्वामीमदाराजने अन्त मे अपनीरीका को शीकान्तर मे
रेजाते वारौ को मनाक्र दिया है-- भै? 1
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८.२.
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ट ्रूमिका ।
यथा-“टीकान्तरं कश्चन मन्दधी रितः,
सारं समुद्धुत्य करोति चे तदा ॥ | ८ 8
` शिवस्य विष्णो द्विजगोखुपवंणा- ¦
मपि द्विषद्धाव मसौ प्रपद्यते ॥ ५ 1" (*)
` . अस्तु मद्तामाज्ञा अशोचनीया तो दोतीदही है परन्तु विचार-
णीय विषय यह् है कि स्वयं तो-““पूढ्वाचा्य॑कृतव्याख्या-सय्रहः? कि~ `
या जावे ओर दूसरोको वहुत बड़ा शपथ दिया जावे यह कैसी बात
है-2 सम्भव दै कि किसी दूसरे प्रन्थमं इस टीका के सारका समु-
द्धार करनेके छिये फेसे. उश्चकोरिके विद्वानने रोककिया हो क्योकि
“भामिनीविलास के अन्तमे पण्डितराज जगन्नाथजीने मी इसी `
भावको प्रकर किया हे यथा-
^ दुचत्ता जारजन्मानो, हरिष्यन्ती ति शङ्कया ।
मदीय-पद्यरत्नानां, मञ्जूषेषा मया कता ॥* |
` जो हो नवीनरीक्राकारको तो छषखमारकर गुरुर्थानापन्न परा-
चीन टीकाकारोका अनुसरण अवश्यही करना पड़ता है-इससे इस
पंचसुखीरीकान्तगंत भाषा ठीकामै कीं कीं स्वामीजीकी सूक्तिर्यो-
का सहारा लिया गया है ओर “यी साख्यं" (७) परतो विशेषरू-
पसे अनुवाद करना पड़ा है इखके लिये में उनकी पवित्र आत्मासे
क्षमाप्रार्थी हं । क्योकि इस साहस से भाषाभाषियोकोमी उसका ,
रसास्वादन मिखसकेगा । तीसरे टीकाकार ब्रह्मानन्द सरस्वतीज्ी- `
त
हे उहोने किखा दै कि. ं
“यद्यपि विततव्याख्या, मधुसूदनप्रश्रतिभिः पुराकारि । „8
तथापि बाखदिताय, संचिता साऽधुना मया क्रियते ॥ ९ ॥ `
ओर फिर समासि पर यह छिखते है |
“मरहिन्नाख्य स्तवनस्य, टीकेयं सुमनोरमा । रः ।
ब्रह्मानन्देन संक्षिप्ताऽकारि तुव्यन्तु सज्ञनाः ।"
इन सव उपथ्युंक्त टीकाकाौके टेखौसे यह वात अली मांतिसे `
स्पदे किये सव दीकायं अनेक पुरातन दीकाओं को देखभोटकरः
ठिखी गई है, इनसे सिन्न कोई एक शिवरामी टीकाभी वनी
दै . जिसमं एक अथं शिवपक्षमे ओर दूसरा रामपश्षमं
(*) प्त पयकं। क्षेपक होनाभीं सम्भव हे ।
अामिका । >
खूगाया गया है पर वद टीका सुभे नही मिङी-दनःखव खंस्छतं रीः
काओं के अतिरिक्त हिन्दी भौषा मे मी इसकी अनेक रीका गदः
ओर पद्यकी वनी एवं बहुतेरी पमी चुकी हैँ केवर दिन्दीही नहीं
चरन भारतवषं भरके प्रत्येक प्रान्तकी अवान्तर भाषाओं मे भी
(९) इस रुतोत्र पर अनेक रीका रिप्पणियां चिखी गई ह ओरवे
सव प्रायः उन सव प्रान्तो मे सादर प्रचलित है-कारण यही दहै कि
यह ययपि श्री महादेवजीका स्तो है पर पत्येक सम्प्रदाय अथवा `
सबी मतावलम्विर्योके कामका दै इसीसे इस दशके प्रत्येक घान्तों
मे मदहिम्नका बड़ा प्रचार दै-एक यह वात भी इस की पाचीनता-
का विशेष दयोतक है । |
इस स्तोके अन्त मं यदपि एक श्टोक दरिणी छन्द एवं दो पद्य
_ माखिनी छन्दके ह, पर इसमे मुख्यतः शिखरिणी छन्ददीकौ प्रधान.
ता दे-सम्भवहै कि शिखरिणी-छन्दका प्रयोग पिरे पदि इसी.
स्तोजमे इञो, क्योकि इसी रस्तोज्रकी देखादेखी ओर भी अनेकः
मदिम्नस्तोजोका निर्माण हुआ दै जिनमे यदी शिखरिणी छन्द पाया-
जाता रै-शिवमदहिम्न १ विष्णुमटिभ्न २ गणेशमदिम्न ३ राममहिस्न
8 एवं कालिका महिम्न ५ इत्यादि सवी शिखरिणी ऊन्दके र॑ंगमे
` पगे है इसीसे कोई कोई इस छन्दको “महिम्न छन्द” भी कदा करते
दै-बात यह है कि जव कोई अनूडाग्रंथ वन जाता है तो उसका अचु-
करण करने वारे अवश्यदी खड़े दोजाते है, जेसे श्रीमढ्भगवद्गीता-
के जोड़ ( आधार ) पर-ईश्वरगीता ओर व्यासगीता, कूमपुराणमं,
अगस्त्यगीता तथा सद्रगीता, वाराहपुराणमे, शिवगीता, पद्मपुराण
मे रामगीता अध्यात्मरामायणे ओर कपिरगीता, अष्टावक्रगी-
ता-षएटवं अवधूतगीता आदि अनेक गीतायें उदय होगे योही रावण-
छत शिवतां डवके देखादेखी मेरे पू वंजपण्ड़ति रामानन्दत्निपाटीजीका
रुद्रतांडव तथा छष्णतांडव ओर काटीतांडकव -आदि बनते गये
ओर महाकवि काछिदासजीके ^ मेघदूत 2 काव्य वनने पर
^“ चंसद्रूत ` « कोकिखदूत ”› आदिकाव्योका प्रादुभाव होगया उसी
परकारसे इस महिम्नस्तोजनेभी अनेक खुकवियोसे अनेक देवी-
(१) खनके कान्यक्व्ज भकाङायन्त्रालयमे एक उदं ओ(र हिन्दौीकी्टीका ° ६९४२ वै*
की छपी सुद्ध छन्नाजीकमेकाण्डीते मि्छी हे । ।
४
धष भ्रुमिका ।
देवतोके मदिम्नस्तोत्र बनवांडाङे वातभौी' टीकही दै-महिमाका गा-
या जानाही सवं प्रसिद्ध है, ओर यह स्तो्रभी -पेसे वैसे जन सा
धारणकां नहीं ` वरनं एक गन्धवंराजाचाय्यं क्षा ` रचाहै-प्तिर अवतक
` सङ्खीतविद्याके रसिक रोग प्रायः इस. स्तोचको गाते तथा वीणा
श्रीतार ( वीन-सितार ) आदि वाजो वज्ञाते हँ सम्भव है कि
दसी स्तोत्रने महिमांगानेकी प्रथा ( चा ) खाई हो तो कोई आ-
श्चयं नहीं है इसीसे पुंसतककीं सहायता त्यागकर एकोत्र-चित्त `हो
बस स्तोत्रके कण्ठर्थदी पाठ करनेका उट्टेख किया गया `है-येथ
` “कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन 1 . ‡
` सखप्रीणितो भवति भूतपति म॑देशः (४०) ` |
_ श्रीमदादेवजीकौ जिन कथार्ओको पुराणोके कक अध्यायो मे
वणन किया गया है उनको इस स्तोके एक एक श्लोकों जिस उन्त-
` मता के साथ दर्शाया है उसे सडदय विनभक्तजनदी समच सकते
है-अर्त इसस्तोजके थलोकौकी अकारादि. चीमे जहां जाकी कथायं
मिक तः हे वे पुराणादिकी ` सूचनाके साथ छगादी गई है आशा
दै कि कदाचित् कोई उनकाभी मिलान करेगा तो विशेष आनन्द
प्राप्त दोसकेगा-- ` ¦ ` .. | (ह
इस मदटिम्नस्तोज्नके अन्तम तीन शोक अर्थात् ४१।४२ । ४३.
भी लगादिये गये हँ क्योक ध्रायः उनम किसी किसीका को$ कोई
पाठभी करते ह ओर तदिभन्न. अन्यभी तीन श्छोक हे जो कि साज
वाद छिखदिये जाते हँ-- [3 |
यथा-इ्येषा वाङ्मयी पूजा, श्रीमण्छङ्करपादयोः । |
अपिता तेन देवेशः ( मे देवः ) पीयतां मे सदाशिवः ॥ `
| | (परमेश्वरः ) ४१
चाचामय पूजा यदी, अरपो सिव पदे माहि । |
श्रीपरमेश्वर (पारवती पति) याहिते, मो पै नित दरखादि ॥ ४१॥
तवं त्वं न जानामि, कीदरशोऽसि महेश्वर !
याद्रशोऽसि महदेव ! तादृशाय नमो नमः ॥ ४२॥ `
जानो तमयो तच्च नहि, कस हौ गिरिजानाथ ! `
्ञेसो हौ तेसो नमो, महादेव धरि माथ ॥ ४२॥
भूमिक्ा। , 9
पककांटं दविकारं.वोा, जरिकारं यः पठे ज्नरः ।
सर्वपापविनिसंक्तः, शिवरोके महीयते ॥ ४३ ॥
एकवार दुइवेर इदि, पट् त्रिका नर जोय ।
सबदि पापते छ्टिके, सिवपुर पूजित दोय ॥ ४२ ॥
शिवर्दस्यमे इस महिम्नके सर्वोत्तम चत्तीसबे ( असित गिरिस-
मं २२ ) श्खोकके स्थान पर निम्न छिखितश्छोको को छिखा हे पर
इसका श्चेपक दोना माननाही पडेगा क्योकि स्कन्दपुरागीय शिवर-
हस्यम तो २७।२८ श्टोकोके मध्यमे ये दों श्छोक देखपडते हैँ ओर
विचार करने पर असंगत ओर सवथा अप्रासङ्ककि जान पडते है
क्योकि २६वंसे-ठकेकर २स्वें श्टोकतक यद्यपि पद्य प्रथक् हैँ पर क-
लछापककी भांति चारोहीके संघरित करने पर अष्टमूत्ति-मन्जोका
उद्धार प्रकार टीकामं दिखाया गया दे, तदयसार इन दोनोश्खोको
का मध्यमे घुसजाना वेसादी अचुचित. ज्ञातदोता दै जेसे हर-गोरीके
वाताखापमे दमारे कविपुष्पदन्ताचायंजीका पवेश दुआ था (१) अ-
स्तुजोहो पर ष्टोको को तो श्रवणगोचर करना आवश्यक दे क्यों
फि शिव स्त॒ति,दै-- `.
सतां वत्मं त्यक्ता श्रतिसमधिगम्यं सहयं, `
घणा मप्युन्म्रूल्य स्वजनविषयस्नेदगुणिताम् ।
द्विजः. कृत नपाद् पितर मथ राद्ध त्वयि विभो ! `.
, ~ «` मचुष्यत्बं सद्य स्रिदशपरिणामेन विजदो ॥ १९॥ ` -
वपुः पादुभावा दमित मिद्रं जन्मनि पुरा, `= `
पुरारे ! न क्वापि क्षणमपि भवन्तं प्रणतवान् । `
नम न्मुक्तः सम्प्रत्य ह मतचुगवाद् ( रग्रेप्य ) नतिमा-
नितीश ! क्षन्तव्यं तदिद् मपराधदय मपि॥२॥
दनकाभी पद्याचुवाद् ठेखीजिए-
तजिके पथ सजन साधु नके
जिरि वेद् पुरान भरो बतलखावत ।
करि दरि दया सहजो अपनी,
निज रोग सनेह श्षनीं मन भावत ॥.
(१) देखिए ““पुष्यदन्तो -दन्तं” प्र इय, 1
1 या च वः कि (शिं न नन ^
८ भूमिका ।
द्विज कोड पिता पद पंकज कारि ।
विभो शिव शंकर ! तोदि रिद्चावत ।
तरते तयु माचुषके बदरे `
सडरदेद रुद्यो मदिमा ससुञ्चावत ॥ १ ॥
वपु धारनते अतुमानत दँ
नदि पूरव जन्मदहि कोह्न प्रनास् ।
त्रिपुरान्तक ! मे तमको कवं
सब सोचि फिरों मनी मन ठाम् ॥
नमते अव मुक्त विदेद् भयो
करिहौ नहि आज्ुते फेरि प्रनामू ।
अपराध हमार छमो यह दोय,
करो विनती जगदीस ! निकाम ॥ २॥
इस दसरे शएलोककेा अलङ्कारविषयक परसिद्ध “कुबर्यानन्द्"”
नामक ग्रथम भी उदुध्रत किया देयो ही एक यद्य यहमीद्रष्टिगो-
ॐ चरः होता हे--
जातस्य जायमानस्य, गभस्थस्यं व देहिनः
माभूच्च तत्रे जन्म, यज शम्भु नं देवता ॥
जे जनमे वा हौहिगे, गभंमे रदै ,जौ) कोय ।
द देव जहं शिव नहीं, तहां जन्म नहि दोय ॥
- अच्छा अब मे पाटकोकी सेवामे “असितगिरिसमं (३२) का
भी कुछ अचुवाद समपंण कर देता हं आशा है इसका आस्वादनभी
स्यात् रुचिकर हो--
““असितगिरि समं स्या त्कजलटं सिन्धुपात्रे,
सुरतख्वरशाखा ठेखनी पच्च मुर्व्व ।
छिखति यदि गीत्वा शारदा सवंकाल,
तदपि तव गुणानो मीश ! पारं न याति (३२)
कल्लर कलजल -पवंतको करि,
सज सिधु वने मसिदानी
टेखनि कट्प तरूनकि डारिन,
पनन जहां पथिवीहि षखानी । |
भूमिका । | ९
खेकरिके इनको निसि वासर
तो गुन रेखन माहि सिरानी ।
पार न पादसकी जव सारद
ईश ! तवे अतिसे अकुखानी ॥ २२ ॥
अच्छा एक नमूना उदू दां छोर्गोकी जवांका है-
दवायत वने जवकिं सारां समुन्दरः
. वने रोशनाई बडे नीट-गिरकी 1
जिमी तख्त कागद छिखे शारदा नित्
नहीं खातमा दो त॒मारे गुनो का ॥ २२ ॥
अव आकर अंग्रजीदां विद्वानोकी भी वात बहुत चटी षटु
समद्ची जाती है जरासी इनकी मी वानगी देखनी चादहिप-
सी इकपार् इंक हो नीखगिरका,
वनै य्येन् कल्पटीके जब् बरंचका ।
करे राश्टिग शारदा हर मिनटमे
नहीं ( नाट् ) पड पवे तुमारे गुनोमे ॥ ३२॥ `
बंगखाभाषाकी हिन्दुपतिकाके वष १७ सख्या ४ से
4 ु उद्श्छुत-वङ्गाखुवाद्
हे ईश ! नीटाद्वि मसी, सिन्धु मसी पा;
कल्पतरु शाखा हय ठेखनीठि तच ।
पृथ्वी यदि पच्च हय, एई उपादान चय,
निये यदि सरस्वती सदा लिखे यान,
तथापिं तव शुणेर अन्त नहि पान ॥ ३२॥
यही यदि द्द खोज की जाय ता अनेक भाषाभाषियो की
सूक्तियां का संग्रह हो सकता दै परन्तु पाठक महोदयः का जी घवबड़-
वाय ४५ ठीक नहं इससे अब इस लेख की इति श्री कर देना आव-
श्यक रै । क,
९० भ्रूमेका ।
अन्त मे सविनय निवेदन है कि भूर व्चूक. दोना मनुष्य स्वभाव
सुकुभ विषय ह । अतः इस छोटे से स्तोजकी टीका आदिमेजो
कुछ चुरिया रह गई हँ उन्हं हमारे विज्ञ पाटकगणं खुधारनेकी दया
अवश्य ही दरसखावेंगे ओर इस भगवरस्तुति को घीका र्डड् रेडा
भी होने पर स्वादिष्ट ही समदने को ` नीति का अवटम्बन करगे ।
अतः भाव ओर भाषा की अशुद्धियो के शोधन का भारतो पाठको
दी के आधीन हे. पर अश्चरोका संशोधन शुद्धा शुद्ध पत्र दारा कर `
दिया गया है कृपया यथा स्थान पर देख लेने की प्राथना हे ।
किमधिकमधिकज्ञेषु-शम् ।
निवेदक-
श्रीकारी धाम् } | क्
2 मदिश्नस्तोच-गप्रेमियो का-
5 ` ~. किकर
रिष्ररानि ।. | र
क (= [$ ©
त्रिषाटि नारायणपति शमो ।
> `
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` विशेष--यह कि जवं शिव-शक्तिका संयोग नित्य है तो “शिव
मटिभ्न स्तोत्र के” साथ ““शक्तिमहिम्नः स्तोजका” संयोजित होना
उपयुक्त खमद् पड्ने से शिखरिणी .छन्द मे न हदोनेपर भी इख ब्रन्थ
का सहयोगी वा सदहपाटी रक्खा जाना आवश्यक हुआ हे ।
॥ श्रीदो बन्दे ॥ |
ह [9 ५ ~ <
जन्धवैराज श्रीधत्पुष्पदन्ताचप्येजी का _
बर त्तान्त ।
---=>< <==
श्री जगदीराकी लीला अपरपार हे, उसकी क्या इच्छां? इसे
वही जानता है दूसरेकी सया सामथ्यं है जो वतां सके, देखि
कभी पौर्चीय जनपदवासिय।का अभ्युदय होता हेतो सारा ससार
उन्दीकाः अनुकरण करने ठगता हं जसारके कहा भी है-ˆगतायु
गतिको खोकः ।' अस्तु जआजकर पाश्चात्य देराहदाक ददा सखुघस
है अतप्यं सवीकी इच्छा पाश्चात्य शतिर्योदी पर खाखायित होने
| खगर्त( है,- आज पएकदी वात का उदाहरण ( नम्रूना ) दिखखाना
ह, पाश्चाव्यरीति हे क प्रत्येक भ्रमे चाहे चह छोरा रों
। अथवा बड़ा हो पर च्रथकारका जीचन-चरित ओर कुछ समय
| इत्यादिकी भी चची अवदय छिख दी जाती है-वसलं इसी प्रथाके
अनुसार आजकल इस भारतवषमे मी वही चारु निकट पड़ी हे,
वास्तवमे यह राति प्ररसनीय हे। पर अङ्चनकी बात तो यह ही
जाती दे कि-पाश्यादय अ्रथकारखाग प्रायः अभीं दोसदखान्द्यांकेो
अन्तगत है अत एव उन खोगोंका इतिचनत्त सग्रह करने पवं काल.
| निर्णीत होनेमे विदोष प्रयाख नदीं .उठाना पड़ता । पर स दे शाके
धाचान कवियाका पुरातत्व अन्वेषण करनेमे बड़ी बड़ी कठिनाय
| का सामना करना पड़ता है । अन्य देशीय आधुनिक विद्धानं खों
जा इस देशक श्रथकारोका निणेयं करने खगत दै तो उनके विचारे
यहाके “आद् कवि सगवानं वास्मीकरि अथवा केदन्यासभी-
( हजरत ) इेखाके पूव खर्ट किंवा आठवी शतान्दीके बताये जाते
हे, ओर कांतक कटा जवि-थपौख्षय वेदभी तीन सहस्र वके
भोतरहा ठहराये जाते ह, तो कहिए इस ऊटपरांग प्रखापसे निणयं
हानातादुर रहाबसर्न अगाध सरयरूप। इदम गात छगाने पडते हं-
सच दे जब कि यहख्ृष्टे दी अभा पांच सहं व्षैके भतरकी
२ पुष्पदन्तो-दृन्त ।
समक्ष जाता हं तो इसके पहिटे-“आकलीदिद् तमोभूतं" |
भिन्न दुसरा क्या कहा जा सकता है १ जो हो, पर विचारकी दष्टिसे
देखा जावे तो जवसे इख देख पर ॥वद्रेरीय विधमीं यवन~म्ठेच्छा.
दिकोंके आक्रमण होने रुगे तवसे यहांके कितनी संस्कृत भाषाक्ते
अपृवे त्रथरल् खो गये अव उनका मिलना कटिनदी नहीं बरन
सवेथा च्रसंभव हो गया है, इसीसे निर्णय करनेके स्यि जितमीं
सामग्री ( मसाला ) की अचदेयकता पडती हे वह सव नदीं पाक्त
दो खकती; तो बतलादये कि समयका निणेयः कैसे किया जावे
क्याकिं आजम जिसका उद्टुख करना च'दता ह--बडुत दूने परं
भी कोई णेसा प्रमाण नदीं प्राप्त इभ जिखसे समयका ठक ठीक
निणय कर दिया जवि । अव जीवन चरितके विषयमं यह ~
दे क कथा सारेत्सागस्म जा कु पुष्पदृन्तका- वणन. पायां
जाता हे, वह उनके दखरे जन्म की कथा दै; जव कि वे चररखचकषे
नामस धरकिद्ध इप् थे, ओर उन्हीका उपनाम कात्यायनी पड़ा था,
असा क उक्तग्रथक्त द्वेताय तरगक्रा प्रथम इखाक दखनेसे स्पशं
ज्ञात होजातादहे। यथा-- । चा
ततः स मत्येवयुषा, पुम्पद्रतः परिश्र पन् । ; पि ं
| नास्न चरलाचः, किञ्च कात्यायन, इतिश्चुतः ॥ |
दस ₹इटाकम ८“मत्येवपुषा -कऋहनहास घुष्पदन्तका मच॒ष्य यानेसे
भिन्न अथात् गन्धन्वराज होना ध्रकट है--उपय्युक्त “कथा सरि.
त्सागरकं प्रारस्महामं क्थापोटठ नामक प्रथम लम्बकके आड
रगामं श्ीपुष्पदन्तकी कथा विस्तारः पूवैक वणित हे, उसी कथा
भागकर साष्वस्त रूपस अपन भ्रमो पाठ्कोके अवस्कनाथः उद्धुतः
करदेताद्र।
एकवार परपर रमणाय कखासं [शखर पर जगदम्बा पा्चतीः
जक्ष अग्रहवहा उन्हाका भान छुडनेके छिथ भगवानराकस्जीं
अनेक श्रकारके विचिच्च इतिदाख कदने ख्गे। -उन्त वेला नन्दी
नामक गण इस च्यिद्धार पर वेठायागसाथा क्रि कोह मीशभी
नहीं अने पव । इसी मे `
"परसादावत्तकः दास्मोः, पष्पद्न्ता गुणोत्तमः |
न्यषेधि च प्रवे्ोऽय; नन्दिना द्वारि तिष्ठता ॥ १॥ ४९ ॥
।
॥|
1
"ण ~~~ -- ~^ = ज्य
पुष्पदन्तो -दृन्त ।` ड
पुष्पदन्त नामक महादेवजीका पापान्न गण विना करणी दार
पर रोक टोकत देखकर अपने योगवल्से सीतर घुख गया । ओर
व्हा पर पट्च कर साता विद्याधराकी अद्भ्ुत कथा सुनता रहा,
तदन्तरं अपनी पल्ली जयासे जाकर कह दिया। उसके पेट वह
बात नहीं पच खक्री, उसने सव कथा अगवती पावेतीजीसे कह
नाद । फिर पावतीने शिवजी कहा कि ।जस कथाको आपने
गुप्त ख्पसर नाया थाउखेतो जया भी जानती दहै । इस पर भगः
घानने प्रणिधानं करके विचारा तो पुष्पदन्तका सव करतूत खोल-
कर कह खनाया, तच तो श्रीपा्तजीने क्रोध करके चुष्पदेन्तको
मचुष्य होनकः चाप दे दिया, पतिर उसके छिए साचरोध. पाथना
करने पर उसके परममित्र माट्यवानको भी चदी.चाप सिरु गया ।
तदनन्तर जयांके बहुत गिडगिडाकरर विनती करने पर आज्ञा मिरी
किं-विन्ध्याचछर पर खप्रतीक नामक यश्च काणभूति नामा पिशाच
हआ है, उससे देख जातिको स्मरण करक जव पुष्पदन्त सव कथा `
कदेगःई ' तो ` उसका ` रापोद्धार दोवेगा। ओर काणभूतिसे जव
माट्यवान खुमेगा तवं काणभूतिके मुक्त दोजाने पर श्स कथाको
टोकमं परसिद्ध करके मादयवानभी राप छट जावेगा । इस प्रकार
से शापोद्धार बताकर भगवतीके चुपदहोते दी वे दानो गण विज्ञुरीके
समान तुरतदी अन्तधन हो गये । |
अथ जातु याति कारे, गोरी पथच्छु शङ्करं सदया ।
देव ! मया तो शापो, प्रमथवरीं कुज अुवि जातो ॥ ६३ ॥
अवद्श्वं चन्द्रमाः, कोराम्बीत्यीरित या महानगरी ।
तस्या सर पुष्पदन्ता, वरखचनामा परिये ! जातः ॥ ६४ ॥
अन्यच्च माद्यवानःपि, नगरवरे खग्रतिदठितास्ये सः।
जातो गुणाञ्यनामा देवि ! तयोरेष चत्तान्तः.॥ ६५ ॥
` अथात्-दइसके अनन्तर कु काल बीतजाने पर जगदम्बा
पावेतीजीने दयासे आप्रैचित्त होकर श्रीमहदेवजीसे पूछा कि-रे `
देव ! मेरे शापित वे दोनो गणश्रषठ भूममंडर पर कहां उत्पन्न हुए १.
स पर भगवान चन्दरमोखिने कदा किं, है प्रिये! जो कौशाम्बी
नामकी सदहानगरी दै, उसखी्मे पुप्पदन्त बररुचि नामस्ते उत्पन्न
हुआ । आर माद्यवानभी सुप्रतिष्ठित नामक उत्तम नगरमे |
धैः पुह्पदन्तो-हन्त ।
~
गुणाल्य नामस उत्पन्न इुआ (हे) हे देवि! उन दोनोका यै
बरत्तान्त दे ।
475 ( प्रथम तरंग)
कारास्बी नगरम सामदत्त अथवा आदिल नामक बाह्यण-
चका पत्ना चर्ुद ताक गभस नतरखचका जन्म हु) उसका पिता
बहत चच पनहीमे खुरधामको सिधारगया, इससे माताने बडे कषस
उसका, पाखन पोषण क्रिया । एकवार ` वेतसपुरके निवासी :
देवस्वामीका पु इन्द्रदत्त ओर करम्भकका पुत्र व्य्राडा-दोर्नो भाई
उस्षके.घरः पर रातभर दिकनेकरे छ्यि अये । उसी रातम्रे खदंगकी `
ध्वनि खुनकर वररूचिने अपनीमातासे नारक देखने के छियि आज्ञा
मागा, आरु यहम का के म खोखञाने पर तुमको सव दिखादुंगा
इसपर इन्द्रदत्त आर व्याड दोनाही बड़ विस्मित हुए । तव वसुद्- `
तान कहा क, यह रृड्का एकश्रुतिधर दहे, अतपवं इसके विषय
म आप रग कुछ सन्देह न कर 1 फिर उन दो्नाने परीश्चा करने
केःिये प्रातिशाख्यका प।ड करिया चरखचिने उसे खुनादिया । तद्- `
नरेतर उन दानाके साथ जाकर अपने पिताके मिज नन्दनामक
नर्क्रा जाभनय दख, फर घरपर आकर अपनो साताके सामने
शकराय करदिखलाया । इसपर उन दानोको बड़ी प्रसन्नता ह,
कयाकि जव उन दानन विद्यके निमित्ततपस्या की थी तो मगवानः
स्वामेकातिक्रजान वरदान [कया था कि, पाटलिपुत्र (पटना) म
वव नात्र उपराधच्चयस ठुमखाग वद्या पराप्त करगे । रचकर-स्वामी
नामक बाह्यणके वषं ओर उपवषे नामक दो पुत्र थे। उनमें उषतो
दारेद्र ओर म्रुख थाः, पर उपवष घनी तथा पण्डित था। उसीकी
सरीके तिरस्कार करनेखे वषन विद्या प्राप करनेके हेतु बड़ा क.
ठोर तप किया, उलपर प्रसन्न होकर श्रीस्वामि कातिकजीन समस्त
विदया्ओंको ध्रकारित करके कटाकि जव तुम एकश्चुतिधरको षा
ना तब अपनो वद्याक्रा व्रकर करना इसास्षि जब इन्द्रदत्त ओर +
व्याड उसके घरपर गये ता वधक! भायाने कहाक) जबतक कोश
एकश्चातंधरः नहा आवगा तचा य अपना विद्याका प्रकार नर्ही
` चहृन्ेने जैषिनिमूत्र ओर बादरायण सूत्रोपर भाष्यवनाया है. भगवान् हकराचाथने अपने
भाव्यमें इनका उक्ठेख किया हे । ॑
क का दु जि क
पुष्पदन्तो-दन्त । ९५
करेगे । बहत दूदनेके अनन्तर बररुचिकां एकश्च तिधर पाकर उन
दोना के हषकी सीमा नदीं रदी । फिर उनरोगाने वसखदत्ताको खव
समाचार खुनाकर एवं कु धनभी देनके अनन्तर वररुचिको पटाने
के ख्यि मांगा । इसपर वसुदत्ताने कदाकि; जव यह रुडका उत्पन्न
हआ ता उस समय आकारावाणी इई थी कि, यह बारुक एकश्चुति
धर होगा, ओर वषसरे विया पाचेग, एवं व्याकरणशाख्रका आचाय
होगा, ओर सरे बही रुचेगा जो क चर ( अच्छा ) होगा-अतप््व
इसका नाम वररुचि पडगा-इसकेच््यि मै ती से सोचकरती ह कि
वह वषे उपाध्याय कहां दै ? पर आज तुमरोगोके सुखसे सव बात
जानकर मेरा परितोष होगया-सो यह त॒मलखोर्गोका भाई है
इसे अपने साथ छिवाजाओ इसमे कुच दानि नदीं है । इख प्रकार
ख वरखचिकी माताक्रा कथन सुनकर वे दोर्नोदी परमः अःल्टादित
हप पिर वरख्चिका यज्ञोपवीत संस्कार करके उसे वेद पट्नः
का अधिका वनाया । इसके पीडे वे तीनां जन वषे
उपाध्यायके ‹पास पहुचे, इन ` ती्नाको देखकर वह वबहुतर्हा
प्रसन्न हुआ समस्त वेद वेदांग उन सबको पट्ादिया-कर्याकि वरः
रुचि एकश्चुतिधर, व्याडि द्वि--श्रुतिधर ओर इन्द्रदत्त अि~श्चुति
घर था--
- ` “स ङूच्छत मया तज, द्धःश्रुत व्याडना तथा।
| जिःश्रुतञ्चेन्द्रदत्तेन, शुरुणोक्तमयगद्यत ॥ <० ॥
वर्षे उपाध्यायको पुरवासी रोग मूखेदी जानते थे पर एकएएकी
जब उसकी विच्ाका डंका बजनेखगा तो बाह्यणखोग बडदी आ-
श्चथसे देखक्रर प्रणाम करने लगे । ओर सारे (सथा) परनाके
रहने वाखे वहत प्रसन्न हुए, यहां तक किं, वहां के राजा नन्द्
नेभी वड़े आदरे साथ वषक्ो बहुता धन देकर उसका धर
भरदिया 1 त पक |
मः 94 ( द्वितीय तरंग )
- तदनन्तर उपवषेकी वेशी उदकोरशासे घररूचिका विवाह हुआ ।
जिसके पातिनत ओर शुद्ध चारिजं पर मुग्ध होकर राजा नन्दने
[
उसे अपनी धमकी भगिनी बनाई। फिर बके पाणिनि नामक
| > |
पकं मूख रिष्यने भीमहदिवजीसरेःवरः पाकर अपना एकः नया व्या
करण निर्माण किय, ओर जब वर रूष्िने उलसे दाखाथं किया तो
शिवजीने अपने इकारसे वर खाचका इन्द्रमत~वाखा व्याकरण भुटवा
दिया । तव फिरसे वरखचनें महादेवजीका तपोचुषछठान करके उन्हीसखे
नृतन व्याकरण सीखा # 1 आर पाणानकं व्याकरण (कीन्यूुनता)को |
(चात्ति बनाकर) पूराकया । इसकं पीक इन्द्रदत्त आर व्याडन
वषे उपाध्यायसे गुख्दषक्चिणा मागनेकी ` प्राथनाकी-तव उसने एक
करोड़ स्वणेः(युद्रा) मामा । तिस पर सञ्मति करके तीनंरी जनः
राजा नन्दको पास गुरुदक्षिणा दनेके किए धन मांगने गये श्न रोर्गोके
पट्चतहा राजका शचरीरान्त होगया । ॑
अनन्तरः इन्द्रदत्त योगब राजाके शसीरमे घुसगया 1 ओर.
दनद्रद् तके निर्जीव शारीरकीं रश्चाके खि व्याडि नियुक्त हुआ 1 वह्
षन्द्रदत्तका (खत) देह ठेकर एक. मन्दिरमि अगोर्तास्हया । इसी:
समयम चरखाचने उसके पास जाकर एक कराड स्वण (मुद्रा)
मांगा । इसपर चाकार (र) को जो उस राजा का महामन्जी था--
सन्द इञा, उलन आज्ञा ददा क जतनहो शव (ञ्युद्) नगरम होवें `
तुरत पूकवादेये जावे । ॥करः क्या था व्याडिके बहुत रोकने कने
परभा राजाक कमेचारेयाने इन्द्रदत्तका रार जलाकर राखःकर~;:
दिया । तत्पश्चात् वरखूचेको धन मिखः, तव व्याड़ति उसे ऊेकर
गुरू-दक्षिणा देने गया । ओर राजान जीते हए योगी ब्राह्मणको
फुकवाद्नेका द्ाष छगाकर दराकराखका रार (हग) कर वररूचि-
हाको अपना मन्ना बनाया । वहभी अपनी पतिप्राणा पत्नी उप-
कोडाके साथ पटना नगरम रहकर आनन्द् पूवक राजकाज करने
ठगा।
( चतुथ तरग )
दसके अनन्तर योगानन्दस्ते विरक्त होकर जव वररुचि वनवन `
प्िरने खाता शक्र्राखने चाणक्य नामक वड क्राधां ब्राह्यणद्ाय
नन्द्-यशका नाशकाय राजसिहासन चन्द्रगुप्तको दिखवाया । तथ
वही शिदजीका व्याकरण पाणिनीय कहलाता है--
“न॒त्तावसानं नटराजराजो, ननाद टङ्ां नवपञ्चवारम् ।
` उद्धुकामः.सनकादिकिद्धा, नेति पिवसूत्रजालम्॥ ”
।
पुष्पदन्ता-दन्त । ७
बरख्चि विन्ध्याचल पर जाय काणभरति नामक पिराचसेः मिल
खव कथा वर्णन करनेके उपरांत वद्रिकाश्चममे पर्हुचः योगानलसे
अपने रारीरको भस्मकरर परम दिव्य गतिको प्राप्त हआ ।
| ( पञ्चम तरेग)
यह तो वरराचि उपनाम कालत्यायनकी स्चिप्त कथा इडे पर इसके
पुवैदी गन्धव योनिम वह पुष्पदन्त नामे आथा उस जन्मकाभी घ
नततन्ति उक्त भ्रन्थक साततं तरङ्ग रस प्रकार नरपत हइ-
““श्रीगङ्गाज्ञाके तीरपर एक अग्रहार नामका स्थान हे । वहां पर
पक बहुश्रुत गोेन्ददत्त नामक. ब्राह्मण रहताथा, उसकी जीका
नाम अथिदत्ता था, उसीके उदरसे देवदत्तका जन्म हुआ था। एक
वार उसी देवद तको देखकर प्रतिषछठानपुरके राजाकीं कल्याने पिके
न्तस पुष्प गिराकर सङ्कत बततराया था-- |
“ततः समीपं तस्याश्च; ययावन्तः पुरा सः ॥ ` .
सा च चिक्षप न्तन; पुष्पमादाय त प्रति ॥ ६४॥
पर बह देवदत्त अपनी प्यारीक दांतस्रे गिराये हप फूलका स
केत नदीं समद्चस्तका, अत एव जव. वरद्ानक. प्रभावे वर धीम
दादेवजीका गण हा तो उखका नाम. पुष्पदन्त, पड़ा, ओर उख
की खहधानणीभी शीपावती देषाकी जया नामक् प्रतिहारी हदे ।
... + “भ्रियादन्तोज्ञ्तात्ुष्पात्सन्ञां न ज्ञातवान् यतः ध
, अतः स पुष्पद्न्त।ख्यः, सम्पन्नो गणसंसदि ॥१०६॥ ~ र ।
तद्धाय्यौ च प्रतीहारी, देव्या जाता जञयासिधा ।- .
इस कथाक अचल।कनसे यह वात स्पष्ट होजाती हे कि, पुष्प-
द्न्त गण हानकं पूवं जन्मम देवदत्त नामक बाह्मण था, पतिर गन्धर्ब
यान प्राप्त कर्क महादेवजीक्ता गणं हुओं । तदनन्तर शओ्रीपार्वतीजी-
के दरापसें फर मनुष्य हुभा तवं उखका नामं वरख्चि अथवा का-
र्यायन धलिद्ध हृ आथा। परं इस कथासे पुष्पदन्ताचार्थके समयका
कोई घमाण नहं मिलता, कयो यदं कौन वतासक्रता हेःकिं देव-
दत्त कव षुष्पदन्त हुआ ओर कितने समय तक श्रीभदद्देवजीका नः:
ण बन।रहा ‹ जोह्यो-पर उक्तं कथासे उक्ती पुष्पदन्तक्रा वररुचि अ
थवा कत्यायन होना प्रमाणित है, अत एव अच कुच थोडीसी पौराः
। + ^^
|
|
‹
|
।
८ 'चुष्पदन्ता-दन्त ।
णिक च्चाभी खन समश्चलेनी चादिष तच फिर वरयाचिके समय-
( जमाना ) की बात चृडीजवे-
- श्रीमन्मदाभारतके-र. वैपवै-४२्वं इखाकभ लिखाहे कि, भगव-
ती पावैतीञते भगवान् स्वाभि कार्तिकजीकी सवाक लिये इन्दी
युष्पदन्तजीको अजुचर नियुक्त किया था । यथा--
“उन्माद पृष्पदन्त्च, दाङ्धेकणे तथेव च ।
प्रददा बे्ियुत्राय, पावेता दुभदरोना ॥
सी भांति महाभारतम ओरभी अनेक स्थां पर पुष्पद्र्तका
नाम पाया जाता है, यथा--प० ७-अ० २००-दरो° ७० म-
. ५अ्णीं तवेटपुत्रञ्च, पुष्पदन्तश्च ञयस्वकः ।"°-इत्यादि ।
यहा स्कन्दमह्जुरप्णक् अन्तमत चतुथ कखखण्डम पुष्पद्-
न्तद्धेवरका उद्छेख हु दै इससे यह वात ओरभी स्पष्टे ।
लिङ्गपुराणोत्तराधेभागके २७ अ० म अभिषकवणेनके आच-
` रणदेवतोमें यो-कहा गया दे,
°“बुष्पदन्ता महानागो विपुखानन्द् कारकः ११३
शृङ्गो वशाः कमर विख्वश्चारुण एव च ।
प्रथमावरण प्राक्त द्वतायावरण शुणु ॥ १९१७ ॥'
कह] जाता हं कि पुष्पदृन्तक। समय बहुतदही पुराना है-क्याकि स्क-
न्दपुराण पसर प्राचीन त्रन्थ्मे उनके स्थापित महादेवका वणन
किया गया दहं-यथा, करीखण्ड अध्याय ९७वे म भगवान स्कन्द्-
दवज। महष अगस्त्यजासि कहते हं कि,-“तुमारे कुण्डके दक्षिण
प्रसिद्ध पुष्पदन्तेइवर हं, उनसे अधिकोण पर देवता ऋषि ओर
गणलखोगोके स्थापित अनेक लिङ्ग दै । पुष्पदन्तद्वरके दक्षिण परम.
सिद्धि देनेवाखा सिद्धीदवर छिग विराजमान ।-
°दक्चिणे तव कुण्डाच्च पुष्पदन्तदवरः परः ॥ २४६ ॥
तदधिदिरि देवबिगणटिङ्भाल्य नेकराः।
पुष्पद्न्ता दक्षिणतः, ।सद्धाशः परासाद्धद्ः ॥ २७७ ॥'
इन वाक्ष्यांसे यह भटी भाति विदत हाजाता है कि महाभारत
एवं पुराणां कं निमाण कारसे पूबदी पुष्पदन्ताचाय्यं प्राचीन प्रसि
ध दोचुक थ । कया{क इन वाक्यम उनक्रा नाम जस हगसि एर
खागया हे उस किचारपूबक दैखनस वक्षलाग स्वय अनुमान कर
पुष्पदन्तो -द्न्तः। ९
सकते द करि; यदि बह प्रसिद्ध न दो चुके दोते तो उनका पारेचय
दिखानेके छिपए, कुछ ओरभी- अश्चर अवदय बदादियरे जति । इस
स्थान पर इतना ओर श्री निवेदन करदेना उचित जानपडता हैः कि
उक्त पुष्पदन्तदवरका स्थान आजतक कारी,पुरीम अगस्तङकडा ओर
वज्ञाीटः के वाच पतलेस्सर ( पाताखेश्वर ) महार कदराता
हेः यही एक किवदन्ती खरीजाती है किः जब, पुष्पदतजी श्ा-
पम्रस्त ह्ुएथे तवी कारी धामभं आकर शिबलिङ्गकीं स्थापना कर-
के इस भरसिद्ध मदिम्नस्तो्नको उन्होने बनाया था, जो हो पर पा
त।डेदवरके पासे पक मन्दिरमे पुष्पदन्तदवर नामक। विराल शि-
घलिङ्क विद्यमान दै, ओर अ।जदिनभी बहुतरे महिम्नस्तोत्रके प्रेमी
खोग उक्त स्थान पर इख स्तोचसे खुद्राभिषक अथवा सहस्रपारादिः
कां अयुष्ठान करते कराते है आर स्कन्दपुराणमे तो अनेक स्थरा
पर चुष्पदृन्तका नामोटुख इ दी है पर प्रभासखण्डके१८०(अ०) मै
पुष्पद्न्तदवरलिज्गमादातम्यवर्णन द्रष्टज्य है--
य। तो श्रीमद्धागवतकेभी आखव स्कन्धक्रे एकीसवे अध्यायका
सत्रहवां शाक पुष्पद्न्तका नाम सुनाता द, पर वह पुष्पदन्त को
दुसरा हे कयांकि उस्म विष्णुके गणोभं नामोद्छेख किया गया
दै । यथा- | |
` “जयन्तः श्रुतदेवश्च चुष्परद्न्ता ऽथ सात्वतः |
॥ (ह मत्स्यपुराण अ०.२५३ के वास्तुधरकरणभरभौ बाह्यपूज्य
बत्ती सदेवोमें पुष्पदन्तका नाम आयाहे, यथा- .
“"दोवारिकोऽथ खुभ्रीवः पुष्पदन्तो जलाधिपः ॥ २६ ॥''
त्यादि ।
रहा अमरकोराके बतखाये हुए वायुकोणके दिग्गज्ञका नामभी तो
पुष्पद्न्तही प्रासद्ध हे जसाकि,प्रथम-काण्ड,देय-वगका ७ इखाक हे
"पुष्पदन्तः सवेमासः, सखुप्रताक्श्च दिजः.
खपे इन पुम्पद्न्ता से सुघ्चे कोई अ!वदयक नहीं है पर-“्ना
म जानि पे तुद्यहि न चीहा” केअचुसार चरित नायके नामरा-
रि दानक कारण यहापर खिखदेना अआचाचत नह्({ समञ्जाजायगा)।
कंद पक शकाकारोने पुष्पदन्तजीके विषयम यह उपाख्यानभीः-
लिखा है केः गन्धबेराज वाहु नामक एक राजाकी पुरुषासे
४:
१० पुष्पदन्तो -दन्त
प्रतिदिन उत्तमोचम फूल केकर आकारामागेसे उडजाया करता |
था । ( क्योकि मचुभगवानके आज्ञानुसार देव पूजनके निमित्त वि-
ना पूदी फर तोडलेनसे चोर नदीं दोती )
` --अस्तु, जव राजा पूजापर उन .सखुगन्धभरे बदियां फूटोको नीं
पाता तो मार्या पर बडा द्रुद्ध हाता था। अततां गत्वा बहुत प-
हरा चोका करने एरभो जव उन खवाक्रा पुष्पापहारकका पता नहीं
खगा तो केसी विज्ञके वतदेन पर उन खागोनं बगीचे भरके सव
मार्गो ( रवि ) पर रिवजीका नि्मीट्य केरादिया । बसर फिर
कयाथा गंधवेराजने तो इसका कुड विचार कियादी नही, उद्याना
धूम धूम कर पूट खोदढने ( चुनने ) रगे, जिससे कि श्रीराङ्करजका ,
चला हुञा फूरु ओर विट्व पज इत्यादि उनके पेरकं नाच पडता
रहा 1 फेर जव पूर टकर चख्नेको उद्यत हुपतो उसी रिवनि- ,
मास्यकं पद्-द चित करनेके कारण उनकी खेचरी शाक्तिजाती रदी ।
तव तो मायने विना प्रयाखदी उन्ह पकड़ कर सजाके सम्मुख
उपास्थत केया-राजाकी आज्ञा्सार वे बन्दी किये गये। तवेवे
कारागारम जानपर एकान्तम् प्रणिधानसं विचारकरने खगे तो अपने
स दुःखका कारण पकमाच्र शिव-निम।द्यके घनश्च को पाया । तव ,
उसी निमांस्य रंघनके अपराधसे मुक्त होनेकी इच्छसे श्रीमहादेव
स्वामाको महिम।का गान करने कगे, जिससे उनका समस्त कष्ठ
ओर दुःख हर हो गया।''
मरा समक्षम ता पुष्पपहार-दोाषके परिहासथेरी यह~-“वाक्यः
पुष्पोपहार'' निमाण किया गया, आर इसकी सख्या बकत्तीसदही र-
क्सखा गदं क्याक्र सुखम उतना ह्( गनताकं द्ात हति ह र कटम्
पहिननेको माखा जिस कठमाखा ( अथवा कठाभी ) कडाजाता दहे |
ह्द्राक्ष इत्यादिके बत्तीसही दानेकी वनार्य( जाती हे, ओर यदह स्तो- ¦
ज “श्रीपुष्पदन्त मुखपङजनेगतः' एव “कण्ठास्थित'? ह । अत एवं
सम्भवदहै कि दंत सख्यक व।क्यरूपी पुष्पके उपहार समपेण क
रनेहीसे गधवैराजने पुष्पदन्त-न।म ओर श्रीमहादेवञ।के “सक
ङगणवरिष्ठ" स्वको प्राक्त किया हो । अच्छा तो अवर इल चच |
को बिद्धान छागाोर्हाके विचार पर निभर करके छाड देता ह-क्या
कि अनुमान कुडने वाखे प्रतिभाशाी लोग स्वय जितना बिचार
।
।
पुष्पदन्तो-दन्त | ९१
गडनिनै समर्थं दोसकेगे, भका वे बाते मे श्चद्र बुद्धिम कंसे स-
भासकती द
अवदो एक बातें बरख्चिके विषयमं कददेना चाहता हू-क्या-
कि वद पुष्पदन्तके अवतार मान जाते हे ओर कथासारत्सागरक
अनुसार यह वात भटीाभांतिसे प्रमाणितभी हो चुक्रा हं।
मह।कवि काकिदासजीका बनाया इअ! ““ज्यातितिदाभरण
नामक भ्रंथ वहत भ्रचकित है-उसका यह छाक धायः बड़ा
प्रसिद्ध दं
८धन्वन्तीरेः क्षपणकामरसिद-राङ्क+वेताखुभट्ध घटकप्परकादासाः।
ख्यातो वराहमिहिर चपतःखभ।यां,रत्नानि वे वररूच नंवाचविक्रमस्य॥
दस पद्यसर यह् स्पष्ट सूचित होता दै कि महाराज वक्रमाद्-
व्यकी सभाके नच रत्नम वरखचः वतमान था। ओर एक जनश्च
तिभी मेने बहुत कडकपन्मे अपने पूञ्यपाद पित।जीके सुखसे
खनी थी-उसेभी उदृध्रत करदेना अनुकर जान पड़ता है ।
"एकवार कोई पक शिद्पकार ( कारगर ) महाराज वक्र
मादित्यके दरवारमं दो पुताछेयां बनाकर उपहार ( नजर , ठ्ञ
यावेदोनांदही रूप-रग ओर मापमे एक समान थो, दखनसर उन
दानाम कु 'भी सद नहीं प्रकट दाता था पर उस ट्पाका कथ
न था कि-एकका प्रूट्य (दाम) तो एक खाख रूपया हं, आर
दुलरीका मूल्य केवर दो कोडी है. इस पर दरवार भरम बडा का-
तूदर मचगया । स्वयं महाराजनेभी स्मित होकर इस मूट्य-भ-
देका कारण परा, तो . उसने यही उत्तर दिया किं आपके द्रवा-
रमे बड़ बड़ बुद्धिमान पव॑ विद्धान लोग बतेमान है-उन्दी खोर्गो-
से इस भदको परए तब सब कारण अ!पसरे आप ज्ञात दोजायगा 1 `
अस्तु राजाकी आन्ञाचुसार सवी छोग तकं करने खगे पर कुछ
भेद नही समद्यमे आया, अन्ततो गत्वा बहत दिन बीतने परभी-
जव कोई कारण नही बतासकातो एक दिन्नं विक्रमने खजखाकर
यह कटार आज्ञा देदी किं, यदि पक मासक भातर हमारे दरवारी-
पड़त खे।ग इसका यथाथ उत्तर नरी देषेगे तो उन सब रेोगोाको
पाणदंड दिया जविगा । फिर क्या था, अवधिके दिन पूजने तक
विचि पंडित छोग राज्य छोडकर रातमे भागजानेका प्रबध करन
९ब् पुष्थदन्तो-दन्त ।
खग, सी -गोखमे वररुचिभी थां | वह अपने साथियाका छोड
खाकर अक्रलाही जगलकौ ओर निकठ्भागा-पर - कुच हि दुर
जान पर रात्रके अधकार ओर हिस्चक वन्य पदुआ!कं भयस जागे
नहा. बद्सका, विचारा कि किसी चश्च पर चटढकरर चठ चठ राते
काटना चाहेए, सवरा हने पर किसी अओरका माभ धरटखेगे-अ-
स्तु वसाहा कयाभा-एक्र यड़भारी चश्गदके पेडपर चदवंठा । दै-
वात् उसी च्रृक्षफ नीच पक छगाटकी माद थी-उसक। सयारेने
गभ्वता थासा वे दोना शृगाङ ( दम्पती.) आपसम वात चीत
छरनं ठग-सयारनने अपने स्वाभा मचरष्यका मास लखन
क लिप अनुरोध किया, इसपर सियारने कहा कि कल्टी तञ्च मवु
ष्य क्या बराह्मण पताका पवित्र मांस यथेष्ट-रुपसरे भर पर खि.
छाद्गा । अपन पातको पेसी ररखकतोाड ` ट पतिक्ञा सुनकर स्या
रिन बड़ी प्रसन्न हु-भौर पूछने छगी किं, केष तुम पेखा उत्तमे
मास सुद चखासकागे { श्गाखने राज दर्वारका समस्त चरुत्तान्त
सविस्तर कस्ुनाया, तव उसकी सीने बडे आग्रहके साथ उन
इतार्याकं मूख्य-भेदका कारण पृछा । परिङेतो सियारने कहने
म इयर उधर केया-पर उसके हड करने पर यो कने कगाकि
<न द््न।मं केवल इतनाही अतर हैक एक पुतठीाके 'कानरमं यदि
कई वस्तु डला जावं तो वह उसके पेर्चमं पडी रहेगी, ओर दू
सराके कानकरां डाल हर् वस्तु तुरतहां उसके मुखके मागेस बाः
दर निकल पडगी-( असिप्राय यह कि जिसकिसीके पेट बते
ठहरसकर्त। है, वह तो खाख रुपयेका मनुष्य दै, ओर जो कोद ख
ननकं साथहो बकरने रुगता है वह दा कौडी का है ) निदान, इत- `
ना खुनतहा वररूच अपन हषका वेग नहीं सम्भार सकरा मारे प-
सन्नताके ठटाकरर हंसने गा, ओर तुरत पेडपरसे कूदकर नीचे
आ खडा हुआ-यह द् खकर लियारने कदा-
"देवा विचाय्ये वक्तव्य, रात्रानेव च नेव च।
पय्यटान्त सदा धूतो, वटे वरख्चि यथा ॥'"
अथात् यदि कोई गुप्त बात कहनी हो तो विच।र पृक दिनीम
हना चण, सातम कदापि कहना उचित नहा हे, केयोकि धूत
छग षराबर धूमाकरत हे, जसे धरगद् पर वरख्चि दुकाथा॥
=
॥
` ~ जा
पुष्पदन्ता-दन्त। १३
या, तच कया था-प्रातः कारे दरवारमं पडुच कर वररूचिने
उसकी पश्चा कर दिखखाई-जिसस सकी पडिताकां भाण कवचा ।
ओर राजान उस दिद्पकार एव वररूचको वहतं कु पुरस्कार
आर पारिताविक देकर सतुष तकया । -इस दाक्चामय कहानासर
प्व।हे ओर कृक्छ परमाण न मिक पर वरखाचका महाराज विक्रमके
कारम वतमान रहन। ओर पद्यु-पकषियोको भाषाक अभिज्ञ दाना
स्पष्टरीतिस ज्ञाता जाता हे, अजकट नवौनदोटटीवाचःकों तो
यह कथा गप्पही जान पडगी पर विचार करने पर प्राचीन विद्धा
नोंकी वद्य इदव्यादिकी भाषा समञ्चखेनकी निपुणता परसिद्ध थी,
यदि चेला न होता तो दान शास्नके अनेक भ्रथ-जनमे घायः पञ्यु-
पश्चियोर्दाके चाब्द किंवा चषा इत्यादिसखे हिता-हितका चच।र1के-
याजातादे, कैसे निमीण एकेये जाति? अओ।र उनकी बहते बात
केसे आज तक्र यथाथ रुपसखे मिख्जया करता हे ८
पाठक सरहोदयगण ! यह खव तो पुरानी गप्पं अथवा कथाय
आप छोगोंसे निवेदन करदी गई-,अव कतिपय अवौचीन विद्धानां
की जी सम्मतियां उद्धत करदेना आचदयक है, क्योकि इसी
महिस्नम कदा दै-
«“'पदेत्ववी चीने न पतति मनः कस्यन वचः?
श्रीकादीपुरेके धरतिष्छित अस्तमित वःबरू हरिश्चन्द्रजीने अपने
“"चरिलावटली-"नामक अन्थम-“मारस्न अर पुष्पदन्ताचाय्ये 1.
कीक देकर इख भप्रक।रसरे उदधेख क्य! हे-
"यह स्तो अव देखा असिद्ध है किं आषेकी भांति माना जातां
हं वर्च पुराणम भाक्हा २दइसक्रा माहात्स्य मता ह; पक
्रसङ्ध दे के जव पुष्पद्न्तने माहेस्न वनाक शदिवजीको सखनया तब
शिवजी वड प्रसन्न इः दइस्से पुष्पदन्तको गव इ कि मेने णेसी
अच्छी कविता किया कि दिवजी पसनन हो गए यद्ध बात शिवजीनें
जाना ओर अपने श्ज्ञीगणस कडा कि अद तो खोखा जव भ्ङ्धीने
मुह खोखा तो पुष्पदन्तने देखा के महिम्नके वत्तीसो छेक श्वज्ञी-
के वत्तीसों दांतमें ष्छखे हें इस्से यह.वात शिवजीने पगटः किया किं
ये शोक तुमने नदा बनापः हे वरच यह तो हमारी अनादि स्तुतिके
छोकः हे । यह ब।त प्रखिद्ध दै कि पुष्पदृन्त जव दापसे ब्राह्मण हुआ
१९४ पुष्पदृन्तो- दन्त ।
थ। तव यह स्तोत्र बनाया है ओर देखी ही अनेक आख्यायिका ६
अव वह पुष्पदन्त कौन हे ओर कव वह ब्राह्मण इजा इसका
विचार करते हे । ” ४4
इसके अनन्तर इस छेखमें भी कथासरित्सागरकी पूवाक्त कथा|
खक्षिप्त रुपसखरे छिखकरके फिर इस प्रकारसे अपना विचार घ्र.
कट किया है-- (म
८; = स ९ ॐ (~ प~ >
इस कथा के व्याख्यान स यह स्पष्ठहोता है कि वणन नै.
दके राज्य के समय काहैओर उस समय के देवता शिव ञ।र
स्कन्द थे ओर व्याकरणक! वड; प्रचार था कात्र कालप पेन्द
पाणिनीय इत्य।दि मत मे परस्पर बड़ा विरोध था सस्छत भरा
पल्ाच। ओर देख भाषा बहत परसिद्ध थीं परन्तु पांच अ।र भाष(-
भी प्रचित थीं, पारलिपुज् नया वसा था, प्रतिष्ठान पुर ओर
अयोध्या भी बहुत बसती, धूवैता फैक गई थी जर दिन्दुस्तान म
पदिचम देल बहुत भिरा हअ था इत्यादि । |
. . इस इदत्कथामं पेल ही गुणाङ्य कविके ओ! तीनो जन्म छि.
ख हें ओर उसका बृदत्कथाका पैशाची भाषा निमौण करना
उस्र छः खख व्रथ जल। देना ओर पक ठ।ख श्रथ नरवाहन दत्त.
फे चरित्रका राजा शातवाहनको। देना इत्यादि सविस्तर वणित हे ।
अव यह ब्रहत्कथा कव बनी हे ओर किसने बनाया हे इसङ्
विचारमे चित्त बहत दोलायित होता है क्योकि इसका कारु डाक
निर्णीत नदीं होता । नंदके समयकी भी नदी मान सकत क्योकि
श्सी बृहत्कथा विक्रमादिव्य उदयन पेचे प्राचीन नवीन अनेक
राजाओका वणेन है परन्तु इतना कह खकते है कि इसका सल
प्राचीन काठ सेपडाहै ओर उसके अनेक काटमे अनेक कवि
7
वदढाते गण हैँ क्योकि “कात्यायनाचचेः कृतिः तत् वुष्पदं तादिगिः”
इत्यादि पदमे आदि शब्द भिखतादहै। वा अनेक प्राचीन खनी
इई कथाओंका किसीने एकन करके आद्रके हेतु उसमे पुष्पदत
कानाम रखदिया होतो भी अआश्चये नदीं क्योकि कात्यायन
घररचिका होना खीर्ताव्दीयके १२० वषे पृवे छोग अनुमान कस्ते
दै ओर विक्रमक्रा कार पण्डितेन ५०० खीस्ताब्दके खगभग
निश्चय किया हे भौर देसा मानने प्रोफेसर गोलूडस्टकर श्यादि
भि नन ्न्कन्कन्कन््््न्न््ब्् न्व द क 2 १ कः कवि
र रर् कै कन
चुश्यदन्तो-द्न्तं। १५
इतिहास वेत्ताओका दो वररुचि मानने बाला मत भी स्पश खडित
होता है क्योकि चटत्कथामे जव 1वेक्रमका चरिचदहै तव उसी
विक्रमादित्यवाखे वररुचिका नाम कात्यायन सभव हे।
परन्तु हमारा कथन यह है करि सस्कत चदत्कथा गुणाख्यकी
बनाई ही नहीं ऋ््योकि उसमें स्पष्ट छिखा दै किं गुणाल्यने
सस्त वोखना छोड दियाथा शस्से पिराच भाषामं चहत्कथा
बनाया तो इस ददाम सम्भव हौ कि किसीने यह चहत्कथा बनाकर
बररुचि गुणाढ्य पुष्पदंत इत्यादिका नाम आद्र ओर प्रमाण पान-
केदेतु रख दिया हो।
अब जो दत्कथा मिखती है वह तीस हजार श्छोकमे रामदेव.
भटके घु सोमदेवभट्की बनाई्दै जो उसने कदमीरके राजा
सश्रामदेवकं पुज अनन्तदेवकी रानी सूयंवतीके चित्त चिनोदके हेतु
बनाई है ओर इसी अनन्तदेवके पुज कमरुदेव हर ओर कमख्देव
के पुत्र श्रीहषेदेव हष ।
करमीारके इन राजाओंकं नाम चिन्तको ओर भी सदायम डाक्ते
है क्योकि रत्नावली वाखा श्रीहषं कालिदासके पदिरेका है क्योकि
का!लखिदासने मारुविकाथिभिनच्रमे धावक कविका नाम प्राचान कावया
मे लिखा हे अव दस ददाम विरोधका पारहारयोद्टो खकता हे
कि जस विक्रमका चरि चहत्कश्ामे है वह् नवरत्न वाला वक्रम
नदीं कन्तु कोड पाचन विक्रम दे । ओर यदह चटत्कथा धावकके
ड जा कार पिरे कर्मीरमं सोमदेवन वनाद दहे कयाके इसमे
नन्द ओर विक्रमकीो भांति भोज कालिदास इत्यादिका नाम नहादहे
ओर नवरत्न वाखा बरसरूचि दुसरा था क्योकि उस कालम राजा
ओर कविर्याके वही नाम बारम्बार हाते थे इससे उहत्कथा सचत,
ओर खिस्तसनके पूवे बनी दे ओर गुणाढ्य ओर वररुचि ऊख इससे
भा पांहटखकः ह ।
परन्तु चदत्कथाके किसी ठकेखक्रा हम भ्रमाण नहीं करते क्याक
यह बडा असंगत भ्नन्थदै। जस्या अनन्त पडत को बनाई मुदा
राश्चस की पूव पीडकामिं नन्दका नाम सुधन्वा लिखा दै ओर इसमे
योगनंद है-उखमे जो बरख्चिके मजी दोनेका प्रसंग है वह इस
चीडिकाम करई भिकताही नरह ओर पाणिनी वषे, कात्यायन
९६ पुष्पदन्तो-दन्त ।
व्याडि, इन्द्रदत्त ओर अनेक उयाकरणके आचाय वृहत्कथाके मतसे
पक कारकं थे पर कुद्धमानाने इन सवक्रे काव्य .(काट)म
बडा मेद ठदराया है इससे इतिहास विषधर बृहत्कथा अ-
प्रमाणक ईह । ।
चृदत्कथाका वणेन ओर गुणाढ्य इत्यदि कवियोंका वर्णन
आय्योसक्तदराती बनाने वाठे गोवद्धन कविने किया है ओर गोवद्धन
कविका काव्य जयदेवजीक कासे निश्चित दोग! बगारी टेखक्कोने
जयदेवजीका खमय पन्द्रहवां रातक उहराया है पर इस निणयम
परम भ्रांत हए है क्योंकि जयदेवजीका कार पक सदस वेके पूवै
हे ओर इसमं प्रमाणके देत परथ्वीयाज रायसाम चंद कविका, जयदेव
जीका ओर गीतगोविन्द वगनही परमाण है 1 जयदेवजीने गोवद्धन
कविका वणन वतमान क्रियासे किया है इससे अनुमान होता दै कि
उस कापर गोवधंन कवि था वद्काखी कोगोमे कोई बारह शतकम ।
खक्मनसेनके कामे जयदेव जीको मानते है ओर उसके सर्मकारीन
गोवधंन इत्यादि कवियोको छकष्मनसेनकी सभाका पञ्चरत् मानते
ह यह वात भौ असंभव दै क्योकि पृथ्वीराज ग्यारहवं शतकम था |
ओर चन्दभी तमी था जयदेव चन्दके सैकड़ों वर्षं परहिङे निस्स-
ह हए हें क्योकि चन्दने प्राचीन कवियोकी गणनामे बड़ी भक्तिसे ¦
जयदेवजी का वणन किया है, हां यदि ठक्ष्मनसेन को पृथ्वीराजके
पहिखे मानो तो जयदेव उसके सभाके पण्डित हो सकते हँ नहीं तो
समश्च खो कि आदरके हेतु इन कवियोका नाम खक्ष्मनसेनने अपनी ¦
समा म॑ रक्ला हे इस्से चर सखि कुःजकी भाषा ओर अङ्धरेजी इति- `
हास वेत्ताओंका मत छेकर वंगालियोने जयदेवजीका जो कारे.
निणंय किया है वह अप्रमाण दै यह निश्चय 1 ओर खहत्कथा
उस कारके भी पिरे वनी है यह भी सिद्धान्तित हुआ”
अच्छा ! अव काशीदीके भूतपूयं राजा शिवप्रसाद सितारे
हिन्द अयने “इतिहास तिमिरनाशक के तीसरे खंडमं यो लिखतेहै-- ।
''समयके उख्टणष्ेरमे हमारे पडत खग जो ऊ आवना पंडिताई ॑
दिखलाते हैः छिखने योग्य नहीं है इसी एक बातसे सोच खो कि जिस ,
पंडितसे पाणिनि वेय्याकरणका जमाना पूगे पूछतेही -कंेगा ।क
सत्ययुगमे हभा था. लाखो बरस वीते परन्तु इससे इनकार न कणा
~ ~ ०
पुष्पदन्तो-दन्त । ९७
कि कात्यायनकी पतञ्जलिने रीका छकिखी ओर पतञ्जकिकी व्यासने
अव हेमचन्द्र अपने कोशपरै कात्यायनका नाम वरर्चि वताता दै
ओर कश्मीरका सोमदेवभद अपने कथासरित्सागस्मे छिखता दे कि
कात्यायन वररुचि कौश प्वीपे-जो अव प्रयागके पास जमनाके कनारे
कोसम गांव कहखाता दै-पेदा इआ पाणिनीसे व्याकरणमे शाख्ाथं
किया ओर राजानन्दका मंजी हुआ मुद्राराश्चस इत्यादि बहुतसे
ग्रन्थोसे सावित है कि नन्दके बादही चन्द्रगुक्त राज्यसिदासन पर
बेडा ओर चन्द्रग॒प्तका जमाना णेखा निश्चय ठहर गया दै कि जैसा
पठासखीकी खुडाई अथवा नादिरशादी अथवा प्रथीराञ ओर विक्रम-
कातो कहो किम पाणिनिका जमाना अब अदाई हजार वरससे
द्धर माने था खाखो बरससे उधर ? पतञ्जकि चन्द्रगुप्तके पीठे इअ
इसमे किसी तरका संदेद नदीं क्योकि उसने अपने भाव्यमे “समा
राजा मयुष्यपूर्वा इस सूत्र पर “चन्द्रगुप्तसभम्” पेखा उदादण
दिया हे 1" ॑
ये दोनौ टेखक हिन्दीके खुडेखकोौमे रब्धप्रतिष्ठ है ओर इनं
खोगौने जो कुछ छिखा है अविकरु उद्ध्रत कर दिया गया अव
कतिपय अंग्रेजी भाषाके विद्रानौने मी अपने अपने अन्थोमे इस
विषय पर टेखनी चखाई है अतएव उसे भी यहां पर प्रकटः कर देना
आवश्यकता जान पड़ता दै- ।
“'डाकतर राजेन्द्रकाकू भित्र यल् य्ट्० ङी० अपने “इन्डो
आय॑न्? नं० ९ पृष्ठ १९. मे कहते हँ कि-डाक्तर गोट उर्टकरके कथ-
नायुसार पाणिनीका व्याकरण ईसवी सनके पूवं नवं ओर ग्यारः-
हवीं शताब्दीके भीतर छिखा गया । पर प्रोफेसर मेक्समरूखर उसे
घटाकर ईसाके पूवं छटवीं शताब्दी बताते हैँ 1”
इसी प्रकारसे ्रग्वेदके अयुवादक ओर वंगविजेता इत्यादि
उपन्यासोौके खुटेखक--एवं इसी वर्घके ३० नवस्बरके स्वगंयाच्ी-
“सर रमेशचन्द्रदत्त" अपने “भारत इतिदास?मे छिखते दँ कि-“या-
णिनि व्याकरणं ईसामसीदके पिरे कमसे कम आड सौ वषेके
बना थाः, | ह
अव हमारे विचार-शीर पाठकगण स्वयं इन प्राचीन एवं नवीन
चिद्धानौके खेलसे अपने चित्तका छनूदर मिटा टेव क्मोकि पाणिनि
२॥
९८ पुष्पदन्तो-दन्त |
ओर कात्यायन अर्थात् वररुचि दोनौ दी कही ुरूके शिष्यं ¦
प्रमाणित दो चुके है वरन पाणिनिके सत्रोकी न्थूनता दूर करनेके
कारण कात्यायनका वातिक अष्टाध्यायी सूञज्रयाखके पीठका वना
हआ जान पड़ता दे । यदी सदी, पर कात्यायन वररचिदही का नामः `
है इस पर एक वात ओर मी कह देनी दै कि, को$ प्राचीन कवि
कात्यायन दो चुके हँ क्वोकि “मेदिनी कोशम" यह बात स्पशो.
गई हे। यथा-- ` `` किः
“कात्यायनो वररुचो, विशेषे च मुनेः पुमान् ।
कापायवस्रविधवा, द्ंजसरत्युमयोः चियाम्॥*
अर्थात् चुट्लिङ्क कात्ययान शब्द वररुचिमं ` ओर सुनि विशेषके लिये
मी कदा जाता दै, प्पवं कसायर॑ंगका ` वच्त्र धारण करनेवाटी अधेड़
विधवा स्री ओर पार्बतीजीके विषयमे स्रीलिद्ः अर्थात् कात्यायनी
होता हे। इससे स्पष्ट टै कि वररुचिसरे मी पदि कोई कात्यायन
अद्रृषि अवश्यदी हो चुके हैँ, नहीं तो “याज्ञवल्क्य र ठति" मं कात्यायन-
का नाम धमंशास्रकासोमे कैसे गिनाया जाता? जेसा किं प्रथम
धध्यायदीमे छिखा दे- | |
|
|
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“मन्वत्निविष्णुहारीत-याज्ञवल्क्योशनो ऽङ्किराः ।
यमापस्तम्व संवत्ताः, कात्यायनव॒दस्परती ॥ ४॥
पराशरव्यासशङ्क-टिखिता दक्चगोतमौ । `
शातातपो वशिषश्च, धमंशास्रध्रयोजकाः ॥ ५ ॥ |
एवं स्वयं पाणिनिने भी अपने सूत्रपाठमे- “स्वं ठोदहितादिक्त-
नतेभ्यः" ( £ । १1 १८ ) इस सरसे प्फा-प्रत्यय करके कात्यायन ओरं
कात्यायनी शब्दौकी रूपसिद्धिकी है 1 तो अव यह केसे कटा जा
सकता है कि पाणिनिके पू्व॑मे कोई कात्यायन नहीं था, यदि थातो
उखं प्राचीन कात्यायन ओर वररुचि कात्यायनके समयमे कितना
अन्तर हो सकता दै इसे आपी खोग सोच विचार केवं-मेकर
भी नही कह सकता । क्योकि मेने तो सिद्धान्तकोदीमे “श्रीगणेशाय
नमः” के अनंतर ही “मुनित्रयं नसर्ङत्य पदा था ओर तमीसे कात्या-
यनका नाम कणंगोचर करखिया था पर अव देखता हं तौ एकर
कात्यायनसे कायं नहीं चक्ता कोई पाचीनभी कात्यायन जान
पड़ते है, तो कहिए अब क्या निर्णय किया जाथे ? क्मौकि जो कुछ
पुऽपदन्तो-दन्त । ९९
त्रमाण मिखसके वे सव आपरोगोके संमुख उपर्थित करदिये, अतः
ज्ञो कुछ उचितो निणंय करछीजिये मेरी मं रमति इतना पवारा देख
खन कर भी पुष्यदंतके समयको कछ भी टीक नहीं कर सकी क्या
कि पकी नामके राज्ञा ऋषि ओर कवियौ की ठेर पड़ी है फिर पूवं
कालम योगादिक क्रियाओके अभ्यास रखनेके कारण प्रायः उच्चको-
टिके टोग दीघंजीवी भी होते थे यद्यपि गीतामे मगवानने स्वयं यहं
वात की दै कि-
` काडेनेह महता, योगो नष्टः परन्तप ¦ ॥ २॥
वह योग बहुत द्िनौसे नष्ट दोगया हे, हे परंतप ! आज वही
पुराना योग सेने तमसे कडदिया, कंयोकि त॒म मेरे भक्त ओर मित्र
हो ओर यद वड़ादी शप्त विषय है 1 इस वाक्यसे यदह स्य
योगकी त्रिया उस समयमेमी नष प्राय थीं परन्तु यह भारतवषं
जवसे विधर्म शासको के हस्तगत हुआ तबसे योगकी क्रियाय ओर
देवमूत्तियो की शक्तियां एक साथ ही जाती रही, जो हो प्राचीन
ऋषि-स॒नियौ का बहुत कार्तक वतमान रहना कोई अश्चयं की
बात नहीं हे यदि णेसा नहीं होता तो रघुवंशियो के सेकंड पीदीकीं
पुरोदिती भगवान वशिष्ठजी कैखे करः सकते १ योगी होने- दीसे रा-
जर्षिभर्तंहरि आजतक जीवित मने जाते हँ तो अवम इन भ्राचीन
महात्मा की महिमा कैसे अनुमान कर सकता हं १ उनरोगोके
जन्म ओर भरत्युकी तिथि कहांसे बतला सकता हं १ कयौकर उनके
ग्रंथ निर्माण का खमय दिधर करखकता हं !-इन सव बातौको भटी
भाति चिचारकर आपरोग जो कुछ आज्ञा कर उसीको ममी मान
खेनेके लिये प्रस्त॒त हें, क्योकि क्या पुष्पदं त, क्या वरचि, क्या का-
त्यायन, क्या पतञ्जलि, ये सवी खोग एक नहीं वरन अनेक हें, पठं
सवी खोग योगी ओर परम-दीर्घायु हप है तो ेखी दशाम अपने
मनमाना अलुमान करके दो तीन सहस्र वचं कह देनेसे काम
निकार खेना केवर कपोरु-कल्पना नहीं तो ओर क्या है हां वर-
रुचिकर लिये यह समय कहदिया जावे तो कोई अनुचित नही ह स-
२० पुष्पदन्तो-द्न्त ।
कता, पर पुष्पद्तकोा समय उक्त प्रमाणोसे नदीं सिद्ध हो सकता,
अतएव अव इस धिषय पर विशेष वाग्-वितंडा करना सर्वथा व्यथ.
ही सा ज्ञात होता है, तो फिर “सबसे भरा चुप? ।
निवेदक -
अ्वौचीन दीकाकार
॥ श्री; ॥
॥ शिवमहिम्नः स्तोत्रम्॥
मदहिख्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसद्रशी |
स्तुतिव्रह्या्टीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः ।
अथावाच्यः सवंः स्वम्रतिपरि्णामावधि गरृण- .
न्ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः ॥ १॥
अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयो
रतदुव्याच्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रतिरपि।
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः
पदे त्ववाचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥ २॥
मधुस्फीता वाचः परमभ्रतं निर्भिंतवत-
स्तव ब्रह्मन् कि वागपि खुरगुरो विस्मयपदम् ।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः
„ ` पुनामीत्यथं ऽस्मिन्पुरमथन बुद्धिभ्यंवसिता ॥ २॥
तवेश्वयं यत्तज्गदुदयरश्चाप्रख्यङ-
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिखषु गुणभिन्नासु तयुषु ।
अभव्यानामस्पिन्वरद रमणीयामरमणीं
विहन्तं व्याक्रोशीं विदधत इरैके जडधियः ॥ ४॥
किमीहः किकायः स खलु किञुपायसिभुवनं
किमाधारो धाता खजति किमुपादान इति च ।
अतक्यश्वये त्वय्यनवसरदुररुथो हतधियः ।
कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः ॥ ५॥
अजन्मानो खोक्ाः किमवयववन्तोऽपि जगता-
मधिष्ठातारं किं भवविधिरनाट्रत्य भवति ।
अनीशो वा क्याद्वनजनने कः परिकरो
यतो मन्दास्त्वां प्रत्यमरवर संशेरत रमे ॥ ६ ॥
द॥
हिवमाहञ्चःस्ताच्म् ।
ज्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं बेष्णवमिति
प्रभिन्े प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ।
ख्चीनां वेचिव्रयाद्रजङ्रिखनानापथजुषां
चणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामणंव इव ॥ ७ ॥
मरो्चः खर््वाङ्कं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपारु चेतीयत्तव वरद् तन्ञोपकरणम् ।
सुरास्तां ता्रद्धि विदधति भवद्भप्राणिहिता
न हि स्वात्मारामं विषयश्रगतृष्णा भ्रमयति ॥ ८ ॥
भ्रघं कश्चित्सवं सकटमपरस्त्वह्ध्रवसिद
परो धोव्याश्रव्ये जगति गदति व्यस्त विषये ।
समस्ते ऽप्येतस्मिन्पुरमथन तेविस्मित इव
स्तुवज्िहमि त्वां न खद्दर नु धा ुखरता ॥ ९॥
तवेश्वयं यल्लादयदुपरि विरिओ्चो हरिरधः
परिच्छित्त॒ः यातावनखनमखस्कन्धवधुषः ।
ततो भक्तिश्च द्धाभरग्र गरणद्भ्यां गिरिश य- ।
रस्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमयुघ्रत्तिनं फति ॥ १० ॥
अयल्लादापाद्य अिभुवमवेरिव्यतिकरं ¦
दशास्यो यद्वाहनभ्रत रणकण्डूपरवशान् ।
शिरः पञ्श्रेणीरचितचरणाम्भोरुडवठे ।
स्थिरायास्त्वहुभक्तखिपुरहर विस्पूजितमिदम् ॥ ११॥ .
अमुष्य त्वःसेवासमधिगतसारं भुजवनं
वटखात्केखासेऽपि त्वदधिवसतो विक्रमयतः ।
अभ्या पातालेऽप्यखसचछिताङ्खछटशिरसि ` `
प्रतिष्ठा त्वय्यासीटुध्वसुपयितो सुद्यति खलः ॥ १२॥
यद्रद्धि सुत्राम्णो वरद् परमोच्चेरपि सती
मधश्रक्रो बाणः परिजनविधेयिभुवनः।
न तिनं तस्मिन्वरिवसितरि तव्वचरणयों
नं कस्य ्यन्नत्ये भवति शिरसस्त्वययवनतिः ॥ १३ ॥
अकाण्डव्रह्माण्डक्षयचकितदेवासुरशृपा-
विधेयस्यासीद्यस्िनयन विषं संह तवतः ।
स कटप्राः कण्ठे तव न कुरुते न धिथमहो
' विकारोऽपिच्छाध्यो भुवनभयमभद्धव्यसनिनः ॥ १४ ॥
रि चमषिन्नःस्ताच्म् । ड
असिद्धार्था नेव क्वचिदपि सदेवासुरनरे
निवतन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः
स पश्यन्नीश त्वामितरसखुरसाधारणमभू-
त्स्मरः स्मतग्यात्मा न हि वशिषु पथ्यः परिभवः ॥ १५॥
मही पादाधघातादू्रजति सहसा संशयपदं
पदं विष्णोभ्राम्यद्धजपरिघरूग्णव्रहगणम् 1
मुड़ यौदोंस्थ्यं यात्यनिभ् तजराताडितंतरां
जगद्रक्चाये त्वं तटसि नु वामेव विरुता ॥ १६ ॥
वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोदमरुचि
प्रवाहो वारां यः पृषतटधुद्र्ठः शिरसि ते।
जगद्द्वीपाकारं जरुधिवलयं तेन कतमि
त्यनेनेवोन्नेयं धृतमहिम दिव्यं तव वपुः 1 १७
रथः क्षोणी यन्ता शतधरतिरगेन्द्रो धनुरथो
रथाङ्कं चन्द्राकों रथचरणपाणिः शर इति ।
दिधश्चोस्ते कोऽयं जिपुरतृणमाडउम्बरविधि
विधेयैः कीडन्त्यो न खलं परतन्ञाः प्रभुधियः ॥ १८ ॥
हरिस्ते साहस्रं कमख्वलिमाधाय पदयो
यदेकोने तस्मिनिजसुदहरनेनकमरम् ।
गतो भक्त्युद्रं कः परिणतिमसौ चक्रवपुषा |
याणां रक्चायं चरियुरदर जागतं जगताम् ॥ १९॥
ऋतौ खे जाग्रत्वमसि फलयोगे कत॒मतो ४
क्व कमं पध्वस्तं फति पुरूषाराधनभ्रते ।
अतस्त्वां संग्रक्य क्रतुषु फलदानप्रतिभुवं
रुतो शद्धा बहुध्वा द्रढ परिकरः कमंखु जनः ॥ २०॥
क्रियादक्षो दक्षः कतुपतिरधीशस्तनुभ ता-
सरषीणामात्विज्यं शरणद सदस्याः सुरगणाः ।
| कृ तुभ्रंशस्त्वत्तः क्रतुषु फरदानव्यसनिनो |
| भुवं कतुः श्रद्धाविधुरमभिचाराय हि मखाः ॥ २ १॥
| भ्रजानाथं नाथ प्रसभमभिकं स्वा दहित
गतं रोहिद्भूतां रिरमयिषुश्रष्यस्य वयुषा ।
। धचुष्पाणेय।तं दिवमपि सपतरारतममं
| ्रसन्तं तेऽद्यापि त्यज्ति म सगन्याध्मैसः ॥ २२ ॥
|
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शिवमदिख्नःस्तोच्रम् ।
स्वखांवण्याशंसाध्रतधयुषमहायतृणव-
त्पुरः ष्टु द्रष्रा पुरमथन पुष्पायुधमपि ।
यदि खेणं देवी यमनिरतदेदाधंघरनां-
द्व्रत त्वामद्धा बत वरद् मुग्धा युवतयः ॥ २२ ॥
शमशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सदटचरा-
श्चिताभस्मारेपः खगपि -चकरोरीपरिकरः ।
अमङ्कट्यं शीर तव भवतु नामेव मखिलं
तथापि स्मत् णां वरद परमं मङ्गखमतसि ॥ २७ ॥
` मनः प्रत्यक्चित्ते सविधमवधायात्तमरुतः
प्रहष्यद्रोमाणः प्रमदसलिरोखङ्कितद्रशः
यदाखोक््याहादं हद इव निमज्यास्रतमये
द्ध्वत्यन्तस्तस्वं किमपि यमिनस्तक्किर भवान् ॥ २५५ ॥
त्वमकस्त्वं सोमस्त्वमसि पवनस्त्वं हुतवह |
त्वमापस्त्वं व्योम त्वमु धरणिरात्मा त्त्रमिति च ।
परिच्छिन्नामेवं त्वयि परिगता विभ्रत् गिरं
न 1वद्स्तत्तत्तवं वयमिह तु यत्वं न भवसि ॥ २६॥
अयीं तिस्रो वृत्तीस्िभुवनमथो चीनपि खरा-
नकाराद्येवंणस्रिभिरभिदधत्तीणविश्ति ।
त॒रीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणभिः
समस्तव्यस्तं त्वां शरद् गृणात्योमिति पदम् ॥ २७ ॥
` भवः शवां रुद्रः पशुपतिरथोग्रः सह महा-
स्तथा भीमेशानाविति यदभिधाना्टकमिदम् । `
असुष्मिन्प्रत्येक प्रविचरति देवश्रतिरपि ` `
प्रियायास्मे धवाम्ने श्रणिदितनमस्यो ऽस्मि भवते ॥ २८ ॥
नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमो |
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर मदिष्ठाय च नमः 1
नमो वर्षिष्ठाय भिनयन यविष्ठाय च नमो |
नमः सवव॑स्मे ते तदिदमिति शर्वाय च नमः ॥ २९॥
बहुलरजसे विश्वोत्पत्तौ भवाय नमो नमः
प्रवरख्तमसे तत्संहारे हराय नमो नमः|
जनसुलश्ृते सच्वोत्पत्तौ खरडाय नमो नमः
प्रमहसि पदे निखेशुण्ये शिवाय नमो नम; ॥ ३5 1
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--- ~~ “~ जाक अ क
असुरखुरमुनीन्द्रौ रचितस्ये न्दुमोटे-
स गुरखुनिजमहिम्नो भ्रष्ट एवास्य रोषा-
शि वमदिश्नःस्तान्नम् । प्
कृशपरिणति चेतः कशवश्यं कव चेदं |
क्व च तव गुणसीमोट्छङ््घिनी शश्वद्रद्धिः ।
इति चकिंत ममन्दीक्ृत्य मां भक्ति राधा-
दरद चरणयो स्ते वाक्यपुष्पोपहारम्॥ ३९१ ॥ `
असितगिरिसमं स्यात्कञ्जरु सिन्धु पाञे
सुरतरुवरशाखा ठछेखनी पन्न मुर्वी ।
छिखति यदि ग्रहीत्वा शारदा सावंकारं `
तदपि तव गुणाना मीश पारं न याति ॥ ३२॥
4
ग्रंथितगुणमहिम्नो निगु णस्ये श्वरस्य ।
सकरुगुणवरि्ठः पुष्पदन्ताभिधानो
रुचिर मलघुचर सैः स्तोत्र मेत कार ॥ २३॥
अहरह रनवधं धूजटेः स्तो मेत-
त्पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमा न्यः ।
स भवति शिवरोके रुद्रत॒द्य स्तथा ५ च |
प्रचुरतधनायुः प्रवा न्कीतिमां श्च ॥ ३४॥
दीक्षा.दानं तप स्तीथं दोमयागादिकाः क्रियाः ।
महिम्नः स्तवपाटस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ॥ ३५॥
महेशा क्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः।
अध्ोय नापरो मन्ब्ो नास्ति तत्वं गुरोः परम् ॥ ३६॥ `
कुखुमदशननामा सवंगन्धवंराजः |
शिशुशशिधरमि दंवदेवस्य दासः ।
त्स्तवन मिद् मकार्षीं हिव्यदिभ्यं महिम्नः ॥ २७ ॥
आसमाप्त मिदं स्तोत्रं पुण्यं गन्धर्वभाषितम् ।
अनौपम्यं मनोहारि शिव मीश्वरवर्णनम् ॥ ३८ ॥
खुरबरसुनिपूज्यं स्वगंमोश्येकदेतं
पठति यदि मनुष्यः प्राञ्जलि नान्यचेताः।
रजति शिवसमीपं किन्नरः स्तूयमान- एः
स्तवनं मिदममोधं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥ ३९ ॥- ¦. ;
किचमदिज्ञःस्तात्रम् |
्रीपुष्पदन्तमुखपङ्कजनिर्गतेन
स्तोञ्रेण किल्विषहरेण हरभियेण ।
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन
खुप्रीणितो भवति भूतयतिमंदेशः ॥ ४० ॥
इति श्री पुष्पदन्तविरचितं
्िवमदिस्नः स्ता्रम्
नित्यपाठोपयोगित्वा देतन््रूखपान्न यपि श्रीशिवमरिखःस्तोत्रं
शक्ति महिस्नःस्तोत्र साहचय्यदिव पृथगरपेणेह सुद्रितप्।
॥ श्रीः ॥
` . शक्तिमहिश्ःस्तोत्रम् ।
क - = निक = ~~ ` य -----
2 यरय
श्री दुर्वासा उवाच-
मातस्ते महिमां वक्तुं शिवेनापि न शाक्यते!
भक्त्याहं स्तोतुमिच्छामि प्रसीद मम सर्वदा ॥ १॥
श्रीमातच्रिपुरे परात्परतरे देवि जिटोकीमदा-
सोन्दर्याणंवमन्थनोद्भवसखुधाभ्राचुयवर्णोञ्ज्वलम् । |
उद्यट्भाुसदखनूतनजपापुष्पध्रभं ते वपुः `
स्वान्ते मे स्फुरतु निकोणनिर्यं ज्योतिमंयं वाङ्मयम् ॥
आदिश्चान्तसमस्तवणंखुमणिपोते वितानपरभे
बरह्मादिप्रतिमाभिकीलितषडाधारांन्जकश्चोन्नते । |
बह्माण्डाग्जमहासने जननि ते मूर्तिं भजे चिन्मयीं =
१ सोषुञ्नायत पीतपङ्कजमदामध्यचिकोगस्थिताम् ॥ २ ॥
या बालेन्दुदिवाकराक्चिमधुरा या रक्तपद्यासना
रलाकट्पविराजिताङ्गरुतिका पर्णेन्दुवक्चोज्ज्वला ।
अश्चलक्सृणिपाशपुस्तककरा या बाकभाचुप्रभा
ता देवीं चिगुगं शि गां हदि मजेऽभीशर्थसिदधयै सदा ॥ ४॥
घन्दे वाग्भवमेन्दवात्मसटूशं वेदादिविद्यागिरो |
माषा देशखमुद्भवाः पशुगताश्छन्दांसि सक्त स्वरान् ।
ताखान्पचच्च महाध्वनीन्प्रकरयत्यात्मप्रकाशेन य-
„ _ त्तद्वीजं पदवाक्यमानजनकं श्रीमातृके ते परम् 1 ५॥
लोक्यस्फुटमन््रतन्जमदहिमा स्वात्मोक्तिरूपं विना
यहूबाजं व्यवहारजारमखिरं नास्त्येव मातस्तव ।
तज्ञाप्यस्मर्णप्रसक्तसुमतिः सव्ञतां पाप्य कः
शब्दब्रहमनिवासभूतवदनो नेनद्र(दिभि, द्पधते ॥ ६॥
+
किक क ~~ = कः
" <+ ----=------- - ~~~ ~~~ ~
रि यि १4 => अ = कछ" य
कहाक्तिमदिख्न.स्तोचम् ।
माप्रा यात्र विराजतेऽतिविशदा तामष्ठधा मातृकां
शक्ति कुण्डलिनीं चतुचिधतचं यस्तच्वविन्मन्यते ।
सोऽविदयाखिखजन्मकमंद्रितारण्यं प्रबोधाधिना
भरमीरत्य विकद्पजाखरहितो मातः पदं तड् जेत् ॥ ७
तत्ते मध्यमवीजमम्ब कखयामस्यादित्यवणं क्रिया-
ज्ञानेच्छाद्यमनन्तशक्तिविभवन्यक्ति व्यनक्ति स्फुटम्
उत्पत्तिर्यितिकद्पकनल्पिततयु स्वात्मप्रमावेन य-
त्काभ्यं ब्रह्मदरीश्वरादिविवुधैः कामं क्रियायोजितेः ॥ ८1 `
कामान्कारणतां गतानगणितान्कार्यैरनन्तेमंदी-
मुख्यैः सर्वमनोगतेरधिगतान्मानेरनेकैः स्फुटम् ।
कामक्रोधसखोभमोदमद्मात्सयारिषर्कं च यत्
बीजं भ्राजयति प्रणमि तददं ते साधु कामेश्वरि ॥ ९ ॥
यद्भक्ताखिरुकामपूरणचणस्वात्मप्रभावं मदा-
जाञ्यध्वान्तवचिदारणेकतरणिज्योतिः पवोधप्रदम् ।
यद्वेदेषु च गीयते श्रतिमुखं मात्रा्रयेणोमिति
श्रीविद्ये तव सवंराजवशरृत्तत्कामराजं भजे 1 १० ॥
यत्ते देवि तृतीयबीजमनटज्वाखावटीसंनिभं
सवांधारतुरीयशक्तिपरमव्रह्माभिधाशबच्दितम् ।
मधंन्यान्तिसगंभूषितमटोकारात्मकं तस्परं
` श्राजटूपमनन्यतुल्यमभितः स्वान्ते मम चयोतताम् ॥११॥
सवं सवंत एव सगंसमये कायंन्द्रियाण्यन्तरा
तत्तदिव्यहषीककमभिरियं संव्यष्चुवाना परा ।
वागथेव्यवहारकारणतचुः शक्तिजंगद्रपिणी
, यद्बीजात्मकतां गता तव शित्रे तं नोमि बीजं परम् ॥१२॥
अग्नीन्दुद्यमणिपषरभञ्जनधरानी रान्तरस्थायिनी
शक्तिब्रह्महरीशवासवसुखा मत्यासखुरात्मस्थिता ।
सृष्टस्थावरजङ्मरिथितमदाचेतन्यसरूपा च या
यह्वी जस्मरणेन सेवं भवती प्रादुभवत्यम्िके ॥ १२॥
स्वात्मश्रीविजताजविष्णुमघवश्रीपूरणेकवतं
सद्वियाकविताविखासकहरीकट्टो छिनीदीपकप्् ।
यी जं य्रिगुणय्रचृत्ति जनक ब्रह्मेति यद्योगिनः
शान्ता; सत्यम्रुपासते तदिह ते चित्ते दधे श्रीपरे ॥ १४ ॥
छाक्िभादिश्नःस्नाो्रस् 1 &
एकेकं तव॑ःमातके परतर संयोगि: वो योगिःघा {77
विद्यादिग्रकटग्रभावजनक्ः जाञ्यानधक्रासपटं ।
यन्निष्ठाश्च; -महोत्पखासनमदाविष्णुप्रहजादयो ए
देवाः स्वेषु विधिष्वनन्तमहिमर्फर्ति दध्येव तत् ॥१५॥
इत्थं चीण्यपि स्रूटवाग्भवसमदाश्रीकामराजस्पुख्1 15:
` चछक्त्याख्यानि -चतुश्तिप्रकरितान्युछष्द्टानि ते ।
भूत तुश्चतिसंख्यवणविदितान्यारक्तकान्ते `: शिते ,:
यो-जानांति संव खव जगतां खशिस्थि तिध्वंसकः ॥१६॥
ब्रह्मायोनिस्माखरेश्वरखुडस्टेखाभिरुक्तेस्तथा ।
¦ ;:. -मार्ताण्डन्दुमनोजदंखवेखुधामायाभिसत्तं सितेः ।
सोमाम्बुक्षितिशक्तिभिः प्रकरिते्वाणाङ्खतेदेः कमा--; ~;
| दण; श्रीशिवदेशिकेन्न विदितां चिद्या तवास्वाश्चये ॥ ९91
नित्यं यस्तव मातृकाश्चिरसखीं सोभाग्यवियां , जपे
त्संचूज्याखिख्चक्रराजनिख्यां ` सायंतनागभ्निघ्र भाम् 1
कामाख्यं शिबनामतच्वमरुभयं ` व्याप्यात्मना ` खवंतो
12६1; ¢ दीध्यन्तीमिह तस्य सिद्धिरचिरात्स्याच्वत्स्वरूपेकता ॥१८॥
काव्येर्वा+ पठिते; किमरस्पविदुषा- जोघुष्यमाणः. पुनः, ~~:
कि; तेव्याकस्णेचिबोधिषयाः कि -वाभिधानश्चिया ।
एतैरस्ब न -बोभवीति. खुकविस्तावत्तवः-श्रीमतो- ~ {~
या†चन्ञाचसरीसरीति- सरणि -पादाव्जयोः पावनीम् ॥१९॥
गेहं नाकतिःगर्वितःः-श्रणतति.. स्नीसंममो : मोक्षति:
¦ न> ` दधेषी मिति पातक्तं खङतति क्ष्माव्मो दासति ।
सत्युवद्यति-. दूषणं खुगुणति त्वत्याद्संसेवनात्. ; ~; -:7;
` ॥ : ` त्वां वन्दे भवभीतिभञ्चनकरीं गोरी गिरीशप्रिय।म् ॥२०॥
आ्रग्निरवीन्दु विम्बनिखयैरम्ब थि र
तरिश्रार्तसितभभैस्चुपमेयंष्मत्पदे भः
स्वात्मोत्पादितकाललोकनिगमावस्थामरादिजये-
रुद्तं च्रिषुरेति नाम-कल्येद्यस्ते स धन्यो बुधः ॥ २१॥
आद्यो जाप्यतमाथंवाचकतया रूढः स्वरः . पञ्चमः
सर्बोत्कृष्टतमाथवाच्कतया वणं; पवगोन्तकः ।
वक्तृत्वेन महाविभूतिसरणिर्त्वाधारगो हृद्गतो ह
भ्रमध्ये स्थित इत्यतः प्रणवता ते गीयतेऽम्बागमेः ॥२२॥
चै चा किम टिश्नःस्तोचम् 1:
गायत्री सशिरास्तुरीयसदितों ` ख्ध्यामयीत्यागमेः
राख्याता चिवुरे त्वमेव महतां -शमपरदा क्मंणाम् ।
तत्तदशनमुख्यशक्तिरपि चं त्यं च्दकमश्वरी `
7; ऋतर्दिन्थुरूषो देरिथ्च सविता बुद्धः शिवस्त्वं गु खः ॥२२॥
अन्नप्राणमनः्रयोधपरमानन्देः शिरःपक्चयु- `. `
च्पुच्छात्मव्रकरेमदोपनिषदां वाग्भिः घसिद्धीश्ते
कोशः पञ्चभिरेभिरम्बे भवेतीमेतत्पदटीनामिति
॥ ज्योतिः पज्वलदटुञ्ज्वंछात्मचपखां यो वेदः स ब्रह्मवित् ॥२६॥
सचित्तत्वमसीति वाक्यविदितैरध्यात्मवियाशिव- `
ब्रह्याच्येरखिलप्रभावमदहितेस्तेखिभि; सदहगरोः ।
त्वद्रूपस्यं मुखारविन्दविवरात्संघाप्य दीश्चामतो
यस्त्वां विन्दति तच्वतस्तददसित्याये खं मुक्तो मवेत् ॥२५५॥
सिद्धान्तेवं हभिः ` प्रमाणगदितैरन्यैरविद्यातमो | |
` नश्छतरेरिव ` सर्वमन्धतमसं ` ताचन्न ` निभियते।
यावत्ते सवितेव संमतमिदं नोदेति विश्वान्तरे |
जन्तोजैन्मविमोचनेकभिदुरं श्रीश्षाम्भवं ` श्रीशिवे ॥२६॥ '
आत्मासौ खकखेन्द्ियाश्रयमनोवद्धयोदिभिः शोचितः
क्थावद्धतयचंजनि च मरणं प्रतीति यत्कारणम् ।
तत्ते देवि महाविखासल्हरी दिव्योयुधानां जय- `` 7.
` ` स्तस्मात्सदगस्मभ्युपेत्य कलये त्वामेव चेन्सुच्यते ॥ २७॥ `
नानायोनिसंहखसंभववशाजंता जनन्यः कति छ
प्रख्याता जनका; कियन्तं इति मे सेच्स्यन्ति चाग्रे कति ।
एतेषां गणनेव नास्ति महतः संसारसिन्धोविधे 5
°^. तिं मा नितरामनन्यशरणं रश्चायकम्पानिधे ॥ २८॥
देदश्चोभकरेवंतेवंहुविधेदनिश्च दोमेजपेः ` ` ` |
संतानेहंयमेधमुख्यखुमखेनानाविधेः कमंभिः ।
यत्संकस्यविकट्यजारखमखिर पाण्यं पदं तस्य ते
दूरादेव निवतंते परतरं मातः पदं निमरम् ॥ २९ ॥
पथ्चाशनिजदेदजाक्चसमयेनानाविधेर्धातिभथि- `` `` ` `:
वहं पदवाक्यमानजनकैरथौविनाभावितेः ।
साभिप्रायवद्थकमंरख्दैः. व्यातैरनन्तेरिदं `` ``
विश्वं व्याच्यं चिदात्मनादमदभित्युज्जम्भसे पातके ॥ २०
न~
चास्िचदिश्नःस्तोज्रम् 1: &€
श्रीचक्रं श्रतिमूटकोश इति ते संसारचक्रात्मकं
विषव्य।तं तदधिषठिताक्चरशिवज्योतिमेयं संयतः
एतन्मन्बमयात्मिकाभिररूणं श्रीखन्दरीभि ॑
¦ . ।¡ सध्ये वैच्दवसिदपीठरुखिते त्वं चद्यविदया ` शिवे 1 ३१ ॥
दु प्राणविसगं जीवसंदहितं विच्दुचिवीजात्मकं
घरक्रूडानि विपययेण निगदेत्तारिबाखाश्चरःः
एभिः संपुितं प्रजप्य विदरेर्प्रासादमन्तं परं ` 7.
| गद्याटगृद्यतमं सयोगजनितं सदमोगमोश्चप्रदम् ॥ २२ ॥
आताघ्राकंसदस्रदीपिषरमां सोन्दयंसारेरलं
लोकातीतमहोदयेरुपयुता सर्वापमागोचरः
नानानघ्यविभूषगेरगणितेज।ज्वस्यसानाभितः-
स्त्वं मातस्तरिपुरारिखुन्दरि कर स्वान्ते निवासं मम ॥३३॥
शिञ्नन्नयुरपादकङ्कणमदासुद्धाखु टाक्चारसा-
कंक्राराङ्कितिपादपरङ्जयुगं श्री पादुकां तप् 1
उद्भास्वन्नखचन्द्रखण्डरुचिरं राजजपासंनिभं
ब्रह्यादिजिदशासखराचितमदं मूध्नि स्मराम्यमस्बिके ॥ २७ ॥
आरक्तच्छविनातिमादंवयुजा निःग्वाक्षदायेण य-
त्कोशेयेन विचिच्रलघयितेमुंक्ताफरेखुज्ज्वठेः 1
कूजत्काञनकिङ्किणीभिरभितः संनदकाश्चीगणे-ः क्त
| रादीतं उनितम्बविस्बमरूणं ते पूजया म्यम्विके ॥ २५ ॥
कस्तृरीघनसारकुङ्मरजो गन्धोत्करेश्चन्द्ने- , ``
¦ ;रालिघ्तं मणिमाख्यातिखुचिरं म्रेवेयदहारादिभिः1
दीप्तं दिव्यविभूषणेजननि ते ज्योतिषिमास्वत्कच- : ¦
` ¦ व्याजस्वणघरद्रयं हरिदरब्रह्मादिपीतं मजे ॥ ३६
मुक्तार सुवणं कान्तिकलितैस्ते बाहुवल्टीरहं
कोयूरोत्तमवाइदण्डवख्यह स्ताङ्गुीभूषणेः ।
संप्रक्ताः कर्यामि हीरमणिमन्मुक्ताफलाकीलित- ` ` : `:
| ग्रीवापटविभूषणेन खुभगे कण्ठं च कम्बुधियप् ॥ ३७ ॥
तक्तस्वणङूतोसकरण्डकयुगं माणिक्वमुक्तोह्छस- ` ¡` 1 7 11.
दीराबद्धमनन्यतुल्यमपरं देमं च चक्र इयम् । `
शा क्राकारनिकारदक्षमपरं मुक्ताफरं खुन्दर
बिभ्रत्कणंयुगं नमामि लितं. नासाग्रमागं शिते ॥ ३८ ॥
च्ाक्तमरिञ्ञःस्तोजष्ः।:
उद्यत्पू्णंकरनिधिधि-वदनं भक्तप्रसन्नं सदा षि
संफुटाम्बजपञ्नचिजखघुमा धिज्णारदश्चेश्च णम् ।
सानन्दं छृतमन्दहदासमसशत्परादुभंवत्कोतुकं 22
न्दाकरारखदन्तपलिन्कंशशिमापूणो स्मराम्यम्विके ।॥। २९ ॥
ग ज्लारादिरसाख्यं अिभुवनीमाव्येर्तुल्येच्च॑तं , ¦, `
सव ज्गीणसदङ्करागखुरभिश्रीमद्वपुधूपितम् । `
ताम्बरूखारुणपह्वाधस्युतं रम्यं ्रिपुण्ड् दध ` ` : ¦ `
! .:; (हभाखं नन्दनचन्दनेन जननि ध्यायामि ते मङ्गलम् ॥ ७० ॥ `
जातीचभ्पककुन्दकेसरमहागन्धोदिरत्केतकी | |
नीपाशोोकशिरीषञुख्यकुखमेः प्रोचचं सिता धूपिता 1
आनीखाञ्जनत॒ल्यमरत्तसश्युपश्रेणीव्र वेणी तव. `` `
1... \। : श्रीमतः श्रयतां मदीयददयाम्भोजं ससेजाख्ये ॥ ४१ ॥
टेखारभ्यविचिबरत्रयरितं देम किरीटोत्तमं
सुक्ताकाश्चनकिङ्किगीगणमहाहीरपवद्धोञ्ञ्वरं ।
चञ्चच्चन्द्रकखाक्खापमदितं देवद पुष्पाधचिते- . |
| मास्थिरम्ब विम्बितं सशिखं विश्रच्छिरस्ते भजे ॥ ४२॥
उल्ध्चप्तचसुवणदण्डकलितं पूणेन्दुविम्बाङति
च्छं मोक्तिकचि्रलखचितं श्चो्माश कोत्तंसितम् ।
मुक्ताजारुविखभ्बितं सकरशं नानाप्रस्नाचिते ¦
चन्द्रोडडाससर्वामराणि दधते श्रीदेवि ते स्वरधियः ॥॥७२॥
विद्यामन्बरहरयविन्मुनिगणक्डस्रोपच्चाराचनां ठ
वेदादिर्वुतिगीयभानचस्तिां बेदान्वतत्वात्मिकाम् ।
सर्वास्ताः खज तुयं तासुपगतास्त्वद्रषिमदेव्यःः परा- „=
स्त्वां नित्यं समुपासते स्ववि थवः श्रीचक्रनाथे शिवे ॥ ४४॥
पतं यः स्मरति पवुद्धसु मतिः श्रीमत्स्वरूपं परं
चद्धोऽप्याशु युवा भवत्ययुपमः ख्ीणामनङ्खायते
सो.षेश्वयंतिरस्छताखिरखुरश्रीजम्पणेकाख्यः `. | |
!! - .ˆ पृथ्वीपालकरिरीरकोरिवरमीषुष्पाचिताङ्घ्रभषेत् ॥ ४५॥
अथ तव धनुः पुण्डेष्षुत्वात्प सिद्धमतिद्यति- |
तिभुवनवबधूमुचज्ज्योत्स्नाकखानिधिमण्डलम्। `
सकङूजननि स्मारं स्मारं गतः स्मरतांनर- ` `
` च्िशरुतरनवधू फेहाम्भोधेः प्रपूर्णविधुभंवेत् ॥ ४६ 1)
लाक्तिमदिन्चःस्ताच्रसे ।: 9
प्रसूनशरपश्चकप्रकटजम्मणाराग्फित- : ` 1 =
बिखोकमवलरोकयत्यमंखुचेतसा चञ्चरम् ।; ¡`
अशेषतरुणीजनस्मरविजभ्भणे. यः खदा: --: 7;
परटुभंवतिं ते.शिवे च्रिज्ञगदङ्लणाश्चो भणे ।89:॥
पाशं प्रपूरितमदाखुमतिग्रकाशो 1. ¦ नी
यो वा तव अिषुरखुन्दरि खुन्दरीणाप्् ।
ाकषणेऽखिरुवशीकरणे प्रवीण थ 11:13;
चित्ते दधति स जगचयवश्यङूत्स्यात् ॥ ४८ ॥
स्वान्ते कलयतिःकोविदस्िलखोकी-. 1
स्तम्भारस्मंणचणमव्युदारबीयम्। ˆ ¡~ 1:51
मातस्ते विज्यनिजाङ्कशं सयोषा `: ` ।
देवास्तस्मयति च भूथुजोऽन्यसेन्यम् । ७२ ॥
चा पध्यानवशाद्भवोद््भवमदामोहं मदाजन्मणं. ` `.
प्रख्यातं प्रसवेघु चिन्तनवशात्तत्तच्छरव्यं खुधीः।
पाशध्यानवशात्समंस्तजगता सत्योवाशत्तं महा- ` ,
दगस्तम्भमहाङ्कशस्य मननान्मायाममेयां तरेत् ॥ ५० ॥
न्यासं रत्वा गणेशग्रहमगणसहायोभिनीराशिपीठेः ;
षडिमः श्रीमातकाणः सहितवडकरेरशेवा्देवताभिः
सश्रीकण्डादियुग्मेविमंखनिजतनो केशवाेश्चः तत्वे
षटर्बिशदिमश्च तच्ेभेगवति भवर्ती यः स्मरेत्ख त्वमेव १
स्ुरपतिपुरखक्ष्मीजम्मणातीतख्मी .
प्रभवति निजगेहे यस्य देवं त्वमायं ।
विविधतवकलानां पान्नभूतस्य तस्य | .{
निपुवनविद्विता सा जभ्मते कीतिरच्छा 1 ष्र् ॥ `
मातस्त्वं भूभुंवः स्वमंदरसि च तवः सत्यलोके सूये-
उारज्ञाच्रायशुक्राकिभिरपि निगमव्रह्मभिः भ्रोतशक्तिः ।
प्राणायाम।दियल्नैः कलयसि सकलं मानसं ध्यानयोगं
येषां तेषां सपर्यां मवति खुरङृता बह्यते जातते च ॥ ५३॥
क्व मे बुदिवाचा परमविदुषो मन्दसरणिः
क्व ते मातब्रह्ययसमुखविदुषामाप्तवचसाप् ।
अ वरून्मे विस्ूतिः परतरमदिम्नस्तव जुतिः
प्रसिद्धं श्चन्तञ्यं बहुकतरच।पल्यमिह मे ॥ ५७ ॥
दराक्तिषटिख्नः स्तोत्रम् 1
प्रसीद परदेवते मम हदि प्रभूतं भयं तमृएनराराोः
विदारय. दस्द्रितां दख्य देहि सर्बज्ञताम्। ` `
` निधेहि करू गानिधे चरणंवद्ययुग्मं स्वकं 7 ~ `
निवास्य जराश्चती चरिपुरखुन्दरि श्रीशिवे ॥ ५५
इति जिपुरखन्दरीस्तुमिमां पठेयः खुधीः ` ` 1 4
स सवदुरितारैवीपरलचण्डदावानरः1 `
भवेन्मनसि वाञ्छितं प्रथितसिद्धित्रद्धिभेवेव् ` `
अनेकविधस्ंपदां पदमनन्यतुट्यो भवेत्॥ ५६ ॥
पृथ्वीपाटप्रकरमककरखश्रजोराजिताङ्धिः
विदत्पुज्ञानतिखमाराधितो वाधितारसिः।
विद्याः सवाः कख्यति ददा व्याकरोति पवाचा `
खोकोश्चयनवनव पदेरिन्दुविम्बप्रकाभः ॥ ५७ ॥
संगीतं गिरिजे कवित्वसरणि चाम्नायः वाक्यरते
व्याख्यानं हदि तावकीनचरणद् न्द्रं च सबज्ञताम् 1
श्रद्धां कमणि काकिकेऽतिविपुलश्रीजम्भणं मन्दिरे
सोन्दयं वपुषि प्रकाशमतरं प्राप्नोति विद्वान्कविः ॥ ५८ ॥
भूष्यं वेदुष्यमुध्यदिनकरकिरणाकारमाकारतेजः |
व्यक्तं भक्तेमागं निगमनिगदितं दगमं योगमागम् ।
आयुष्यं ब्रह्मपोष्यं दरगिरिषिशदां कौतिमभ्येत्म भूमौ ¡` ‡
देहान्ते ब्रह्मपार परशिवचरणाकारमभ्येति विद्धान् ॥ ५९ ॥
दुवांससा मदितदिव्यस॒नीश्चरेण
विद्याकलायुवतिमन्मथंमूतिनेतत् ।
रतो व्यधायि ख्चिरं चिपुराम्बिकाया
बेदागमेकपरलीविदितैकमूर्तैः ॥ ६० ॥
सदसंदचुश्रहनिग्रहग्रदीतमुनिविग्रहो भगवान् ।
सर्वासामुपनिषदां दुव†सा जयति देशिकः प्रथमः ॥
` “. इति श्रीदुवासोमहासुनिविरचिता
[र शक्तिमदिम्नः | स्तुतिः समाप्ता ॥
न
श्च
‰
- ए (त # क किणो कत क शि =-= क , कक)
[ नि '
~
श्रीमदिम्नश्तोच्कर -छोकोका अकाराद्क्रम
5. ` पुराणो कथाका सेगठनः।
क
श्छोकाङ छोक।7दिपद :। - :- पोराणिककथाओंका उल्छेख ।
१४ । अकाण्डब्रह्म!ण्ड- : शिवपुराण सनत्कुमारसंदिता५१अध्याय।
मत्स्यपुराण २५० अ०।
स्कन्द पुराणमादेदवरखण्ड ९ । १० अ०
= ( काठकूट. मदाविषकी कथा.) । `
६। अजन्मानो टोकाः-शिवपुराण वायवीयसंदिता २६ अ० |
~ ( नास्तिक्यनेराकरण )। ` ५
२। अतीतः पन्थान-- . -.
१२।. ` अमुष्यत्वत्सवा--हिवपुराण ज्ञानसदेता ५६ अ०।
११। अयल्लाद्ापाद्य-रावपुर क्ञानसं० ५५ अ० ।
३२। आसतगिरिसम-
१५ असिद्ध(थानेव - स्कन्दपुराणमादेशहवरखण्ड २९ अञ तथा
। प्रभासखण्ड २०० अ०।
` `~ __ सिवपुराण.क्ञानसदिता १९अ०।
| ` ~ ` ` वं धमेसंहिता-८ अ० से १४ तक।
¦ 2: „` मत्स्य पुराणं १५७ अ०।
“~ 5; `. ; . ..( मदनदहनकथा)
२३। अखस्सरमनीन्देः- 7
३७.। अहरहरनव्य-- . `
३६ । आसमात्तभिदं -
४९ इत्येषा वाङ्मयी-- `:
४३. णक काट 72 14155;
1 किमीहः ककायः~रोवप्रु°बाथव(यस्० २६ अ० ( वतः )
३८ । कुसखुमदद्ननामा-- स्कन्दपुरणप्रमासखण्ड प्रभासमाहास्म्य
१८० -अ० । (-पुष्यदन्तेक्वर कथा । )
#॥१
@ि
क, +
1
# १५
^ + 0 2 , 0.
( २ ) (& ।
३१ । छृ्पारोणति-- स्कन्दपुराण बाह्यख.के घ्र द्योतरसख.१४अ
ढः 7.5; ¦ रिवपुखयण'चायवायस० उत्तराद्धे० अ०
तथाच. शिव पुऽ ज्ञानसहिता ७ । .,
„ < अर ( भाक्तवणन ) |
२० क्रतो खपे जाग्रत्-शिंत्रपु° चायवीयंसं ०.९६अ० से २०पर्य्य-
( दश्चकथाका उपोद्धात ।)
२१। क्रयादृक्लादश्चः- स्कन्द्पु<मादह्र्वरख० १अ०से५अऽतक््।
कै, प्रभासख० १९६ अ०्आर ``
"10 1. ` कारीखण्ड ८७ | << ! << अ० ।
| (दक्षयन्षा्ेद्धंसकी कथा सबीपुराणमे है)
॥ ˆ तवतत्व- ˆ ' ~“
8 । तवेदवय्ययत्तत्-पूर्वाक्तशिवपु° वायवीयसं ° २६ अ० ।
। तवेदवय्येयल्लात्-स्कन्दपु० माहेदवरखं ०अरुणाचलमाहा-
^ ` ` त्म्य ए ।२।अ० पुनः अख्णाचलम्ा०
++ उराधेमेरअश्स शद्पय्यन्त एवं पुनः-- `
` . स्कन्द पुऽ ब्राह्यख० सेतुमाहात्म्य १७अ०
तथा २४ अ० स्कन्दपुर धमासख० अश
, ` श 7 ` ` दख०्धओर `
1 । . स्कन्द् पु° मदिद्वेरखं०६अ०। |
, ... - -: रिवपु० विद्यइवरस० ४।५।६अ०
१6/१८ ८, ओर ज्ञानं सं २७अ०। ओर भी बहुशः |
¢
।
ॐ । न्रयीखाद्ययोगः-- नारदीयपुऽ पुवाद्धं ६३ अ०।
¦ 1; - शिवपुर वायचीयसर० पूवेमाग २<।२
अ० एवं उत्तरभागं २९ अ० यागवणन पं
२अ०मे पाञ्युपतपदिवणन तथा सनक
मारस० ५& अभ. `: ; 56
र्यी तिखोब्त्तीः--शिवपु°केकाससदिता खमत्र। ` ` ˆ^
क्ञानसंदहिता३अ०। वायवीयसं° उत्तरभागं
ऊ अऽ । सनत्कुमारसं० ३२ अ> ८ भोर
भी बहशः. ओकारवणन ) । >4
51 स्कन्द पु० -नोगरल ०१९९अ०(चयीवणेन ।
4.8: >
२६ । तव्वमक्रस्त्व सामः-करूमपुराणब्राह्या स° पृबोद्ध--१४;अ०)
२३५ । , दोक्चादान तप्रः--नारदाय घु पृच।द्ध ६४ अ०। तथा
९1 शुवकथित्सवे-- `
२९ । नमोनेदिष्टाय--)
२२ ।`प्रजनःथ नाथ-- -
३० । बहर रजसे --
- ऋ ^ # 4 ड [१ ,
२८ । भवः रावा रुद्रः-
३। मधुस्फातावाचः
रिच पु० ज्ञानसाहेता १४ अ० ( दीक्चा-
विधि ) स्कन्द पु° प्रभासखं०ः प्रथम-~
१२ अऽ ८ चोडराकखा वणन ) ।
स्कन्द् पु वैष्णव खं० अ० ४२ दरो ५०
रिव पु०ज्ञानसदहिता ४२ अ०।
मत्स्य पु०३1४अ०1 पव ~
स्कन्दपुराण ब्राह्मखण्डे सतुमाहार्म्य
८० अश. |
शिव पु० वायवीय स पूवेभाग १२ अ०
सरे १५ अर तक ( रुद्र खष्ट्यादि वणन)।
करुम पु० ब्राह्मी सहिता पूवांद्धं १५ अ० ।
तथा स्कन्द् पु° प्रभास ख ` वस्रापथः
खं०-२।९. अऽ । (भवराब्ड व्युत्पच्यादि ।)
` शिव पुर ज्ञानसंहिता ३अ०( शिव का
शब्दमय होना वाणत हे । )
२५ । मनः प्रत्यग्चित्ते-~ ` नारदीय पु०:पूवाद्धं ३३ अ०।
= ~ ~~ हं
र च, =
१। महिम्नः पारंते--
९६ । महीपादाघातात्--
३७ । महशान्नापरा-
८ । महोक्षः लर्वाङ्ग--
शिव पुट सनत्कुमार सं ४० । ५७ । ५
अऽ तथा-रिव पु० वियेदवर सं°
२अ० ( एवं अन्यत्र भो बहुशः योग
वणन मर्ता रे । ) ४; ।
स्कन्द् पु नागर ख० २५४ अ० (हसर्ता-
` ण्डव कथा) । ` `...
शिवं वु धमेसदहिता ४० अ० (अधोरकर्प-
की कथा )।
कन्द् पु° ब्राह्मखड-ब्राह्योत्तर ख० १५।
१६। १७ अ० शव पु० सनत्कुमार सं°
२९ अ०। ( भस्म व्रशसा ) ।
१३1 यददि'खताम्णा-
१८ । स्थःक्लोणीयन्ता-- `
9 ६ ४ # $
। ४4 ..*१
१७ । वियद्व्यापी तारा-
18
, &@ ४६ २ कए 71 3]
२९ । द्मश्ानेष्वाक्रडा-
२२ अ० । ( शिव-स्मरणमाहमा ) ओर.
४० श्रीपुष्पदन्त
३९. । खुरवरमुनि-
२३ । स्वखावण्याह्सा-
१९ । हरिस्ते सादखं-
>0034<
सखुरकथा): `
स्कन्द् पुऽ आवन्त्य खं० अवन्ती खड
४२ अ० । मत्स्य पुर १२९ अ० स १४०
` ; अर ओर नागर खं० दारक्दवरश्चेज- `
` माहारटम्य १३० अ०्(श्स पथका भाव
` (पुष्पदन्तेदबर कथा सविस्तर वणित ह)
{< ४ )
मरस्य पु° १८८ अ० तथा-ः
शिव पु० धमेसंहिता ७ अ ( वाणाः
अ० पय्येन्त । रिव पु० धमे सं ०.२ अ०।
सनत्कमारसदहिता ५२1 ५३। ५४ अ०॥
ज्ञान सं० २९ अ० । ( त्रिपुरदाह कथा ) `
स्कन्द् पु° कारी खण्ड--२७। २८ अ०
( गगा मादात्म्य ) पुनःस्कन्द् पु० अव- |
न्ती ` ख० चतुरशीतिलिद्धमादात्म्य ४२
स्पष्ट हं )। |
शव ० सनत्कुमार सऽ ३० अर)
तथा च स्कन्द् पु° ब्राह्मखड-ब्राह्यात्तर |
नारदाय पुर पृवाद्ध ४१ अ० (नाम
स्मरणमादात्म्य ) ` .4
स्कन्द्पु० प्रभासखण्ड प्रभास माहात्म्य
१८० अ० तथा श्रावन्त्य ख० ७७ अ
शिव पु० वायवीय सं° १३ अ०( अद्ध.
नारीदवरवणेन ) द
रिव पु० ज्ञान सऽ ७ अ०। ( विष्णुः
कृत पूजनवणेन ) । | व
शुभमस्तु ।
“गच्छतः स्खलनं कापि, भवत्येव विपश्चितः।* . `
॥ श्रीशो वन्दे ॥
नघ्रनिवेदन ।
0१५
जव अश्चशका जगल दी लगाया जा रहा है तो भूर चूक दोन
भी आवदयक हे, अतः जिन अद्ुद्धियो पर ट्टिषपडी दे उनका
शोधन कर दिया गया है, एतद्धिन्न ओर भीजो रह गरदा उह
श्युद्ध करलेने की प्रार्थना हे ।
आश्चयकी
ख्रोलोक्ये
( गुणार्भिन्नाख )
विनाराओ्
अगवतः
यापिषछठानां
साय्वाद
स्स्तुतः
द्यपायेन ए
दें
का
भअयलोक
बतरावरहि
भवत्पदिकरावाते,
रीं
याजन
कन्दोवि्िति
दुद
आश्चये का
खरै रोक्ये
( गुणभिन्नासु )
विनाराश्च तान्
भवतः
पापिष्ठानां `
सापवाद ` `: ,
। प
अयखोक `
वतरावहि `:
भअवेत्पष््कियो नाते,
, जक
टीव
प्रयोजन `
छन्दोविचिति
२२
र पिट ~
२ | चाडिपच्रम्
अशुद्ध शुद्ध ल~. प, पक्त
वुपयो गिनि बुपयोगीनि' ३९ १५ ,
चपुथपादे , „~ चतुथषाद्वे `. ३५ २७
मास्तकाना + मास्तिकाना ` ३७ २
मय्येवसुक्तं यथाप्ये अप्येवमुक्तं यथा ३७ २५. |
नणां चणा ` `. ३८ |
जाक 1 जलवि ३९. (1
पहुच नेकेस्थान ` ` ` ` पहुचनेके स्थान ` ` ३९ ९४
श्न्दोषिदशेष _. ‡ +तन छन्दोविशेष ` र 7१ अ २७)
निष्ठया $ जड 7 सव्यतः पग्र 5 थरा
3 न १ म पततः. कणः र = 1
स्वयमव स्वयमभव ` श +>), 48.,.- २१
भवती भवतो ^" "1६ “प
१ कृत _ ८ . ६३२ -भ९२॥
शतेति ७६ स्तोत्तिः : : ७७ ; ~ 1. श
विखोकयन् ; ` विलोकयन् ` : ७२. >+ जनौ
उधारा ९ उधाया ` `. 14111.
( भराम्यद्मुजःरिघ-) ्राम्यदभुजपरिघ-) ८२३ 528 ।
जगत 5 जागत :. ९.९९ क.
येः म, पे ` गिं ९.५ 589
वही र . बही 2 ९९ नन
न्याक्षीणी < ` न्यक्षाणी ` ` १०९१ एड
मिवा >, मवा ५ १०५ "14
आओराको ˆ ओर्यको ˆ. १०७ 6
लसिकारि सिकारो `. १०७ १४.
हथे ^, हाथे : ¡ क १०७ ` क {49
दास ४ ` शसा? १०७ ` 1४
प्राप्रोति ~ 1 श्राप्नोतिति शव; 7 9४5
सख्णं `$ खण 21 १०८ 44. {
श्रदहैजान > सहजानां : ;: ~~ ' १०८ ६१
( अहाय }) ` : निलाय): , रण्यति
=
"अङ्ुद्धा ८" 26 पु० ` "पक्ति
अगमे "+ अगमे ११० २०
(सखाथो) 2: [ साथी]; १९५ 1
सकप < 9 सकल्पःः ` १९७. 1; ; ~; १५
हदेया ४/9. हृदया. .:: = १९१९. 1:१२
अहदित 3 अाहाददिंतः ` १२० निस
व्खाक्वाणि <: ठ्याकस्वाणि १२३ ;- } . <
ब्र्यात्वकत्व, . 5; , ब्रह्मात्मकल्वः १२२: 11२९
( न विद्यः ) =; ; ( न विद्यः) १२४ 3५5९९
विद्य ¢ विद्यः» ¡¦ १२५७ 7:९७
मलिनाथ माटेनाथः १२७ 7; १९
वाणिको | वाणीको- ` १२५ ९९
बियाड्ढरण्य विराड्ढिरण्य १२७ २५
ध्यनिभि । श््वनिर्भि =: १२८ १४
ज्ुपयीगे ५; चुपयोगे <: १२८ 1728
ध्वनिभिः +$ \ | ध्वनिभिः ° (वीं १२९. ४ २५
यद्धाम ४) #: वद्धामः--;5 ‡ १२९. १ 211 : २५९
द.द्व्याय्य ~: यद्. व्याप्य. १२९ गहि
(चोथा) |, चोथा--1 १३४ १<
नामसु नामसु" ~ ९३६. ` , ` १५
अर्हौ > एरि (भिदिः 92 क (क्वेः 77 ३०
किति ` एति 7 पदेति अती 9 द वनर 785 ३९
इत्यदि इत्यादि १३० २७
प्रयदव "10 0 २५
तथा 0 + ^ "५भथेत् ^+ ~^ १७९ ३९
| (कः 7 स्कीः। 1058 ददथ ३०
बाणाभड णभ ५९२४५ २२
भचते गण भवतो गुण १५९ +++
भवड्गुणा भवड्णा १५२ <
कञ्च कखे १५२ १२
वरवे वरखे १५३ र
१ {^
;-अश्युद्ध ` श्युद्ध ` पु
ये | पे... म १५३
अणः 1. 3 गुणः - १५४
( अधोरास् ) . ` ( अघारात्) १५७
नारिनी . ` कारिनी १५७
भाविदु ˆ; भावहु ` १६३
खतीथे सुती । ` १६३
करणस्ब्पुटः . ˆ ` करसम्पुरः ` १६५
कण्टस्थं : : : कण्ठस्थे : ) १६<
साहायेन `. ` सादाय्येन ` १६८
कंस्टथ -:: कठस्थः. `: १६९
ज
४2 02..171
~; चुष्वदन्ता-द्न्त ।
उद्यष्ना ^. उद्याना ध १०७ |
ता परन्तु `` । १५
कोत्ययान ` ` ' कात्यायन ` १८
कदीम - : कोसुदीमे ` १८
` भका |
` गभं रहै. (जो) कोय, रहै गस (जो) कोय <
^ तहा जन्म नाह हाय, तिह कूल जन्म न हेय ९
२1/२४ २२२१२
व्ल
। =: यद्धिसभा-विसज्जनम्
धरष्ड 2्ष्
£ श्रः ॥
ॐ नमः श्री्दिवाय ।
श्रीपुष्पद्न्ताचा्ैविरचितं |
रिव महिम्नस्तोलम् । `
संस्कृत व्याख्याद्योपेतम् माषाटीकापययलुवादाभ्यां सम्बर्तिच्च
_ महिम्नः पारं ते परम विदुषो यय सदशी, ..
स्तुति बह्यादीना मपि तद्वसन्ना स्त्वयि गिरः ।
अथा वाच्यः सर्वैः स्वमतिपरिणामावाधे गृणन् , .
ममा प्येष स्तोत्रे हर ! निरपवादः परिकरः ॥ ९ ॥
ॐ मधुसूदनी टीका €
विद्वेदवरं गुर नत्वा महिश्लाख्यस्तुतेरयम् ।
पुवोचायेकतव्याख्यासंग्रहः क्रियते मया ॥ १ ॥
एवं किरोपाख्यायते-कशित्किर गन्धर्वराजः कस्यचिद्ाज्ञः
प्रतिदिनं भ्रमदावनकुखमानि दरलासीत्। तज्ज्ञानाय 'दिवनिमोल्य-
छद्घनेन मत्पुष्पचौरस्यान्तधानादिका सवौपि राक्तिर्विनक्घच तीत्य-
सिघ्रायेण राज्ञा शिवनिमस्यं पध्ये निश्चिप्षम् । वदप्रतिसंधाय चं
मन्धर्वराजस्तच प्रविच्छन्नव कण्टितशक्तिविभूव । ततश्च दिवनिमो-
दयोङ्घनेनैव ममैतारशरां वेक्क्यमिति प्रणिधानेन विदित्वा परमका
ङुणिक मगवन्तं सवेकामद् तमेव वु्ाव ।
[+
र शिवमहिश्नस्तोत्रम् ।
नेच स्तुतिनांम गुणकथनं, तच्च गुणज्ञानाधीनम्, अज्ञातस्य
तस्य कथनासंभवात् तथाच भगवतो गुणानामनन्तत्वेन ज्ञातमश्च-
छयत्वात्कथं तत्क थनरूपा स्तुतिरयुरूपा भवेत्; अननुरूपकथनं चो-
पासायवेति या शङ्का तद्पनोदव्याजेन स्वस्यानोदद्धल्यं दरीयन्नेव
भगवन्तं स्तोतुमारभते-
क्मदिन्लः पारमिति# । हे दर, सवाणि दुःखानि हरतीति हरः ।
योग्यं संबोधनम् । स्वदुःखहरत्वेनेव भ्रासिद्धोऽखि, न मम दुःखह्रणे
पृथग््यापार करिष्यसीत्यभिप्रायः। हे सर्घदुःखहर, ते तव मदहिन्नः
परं पारमवधिमविदुषः एतावानेव मदिमेतीयत्तयाऽजानतः । ककेत्व-
संबन्धे षष्ठी । अजानत्ककैका स्तुतियद्यखदभ्यनचुरूपा । अयोग्येति-
याचत् 1 तत्तर्हि ब्रह्मादीनां सवंज्ञानामपि शुणकथनरूपा गिरसूत्वयि-
विषयेऽवसन्नाः । अयोग्या एवेत्यथः । तेरपीयत्तयाऽक्षानात् इयत्ता-
या असस्वेन तदज्ञाने सावेक्यव्याघातोऽपि न । सन्मा्रविषयत्वात्स-
वेज्ञत्वस्य । अन्यथा श्रान्तत्वप्रसङ्गात् । तथाच श्रीभागवते- वि.
ष्णो वीयेगणनां कतमोऽहैतीह यः पार्थिवान्यपि कविर्विमम रजांसि'
इति । अथेति पक्षान्तरे । ययेवं तरव तहिं स्वमातिपारेणामावधि स्वस्य
मतिपरिणामो बुद्धिविषयता स पवावयिथत्रेति क्रियाविशेषणम् ।
स्रुचा यावद्िषयीरतं त। वद् ग्रणन् वाक्सखषिसाफस्याय कथय.
न्सरवोऽपि स्तोताऽवाच्योऽलुपाठम्भनीयः । ला वाग्यया तस्य गु-
णान्ग्रणीते करो च तत्कर्म॑करो मनश । जिह्वाऽसती द्ादुरिकेव सूत
न चोपगायत्युरुगायगाथाः' इति च श्री भागवतवचनात् । तर्हि नभः
पतन्त्यात्मसमं पलच्चिणः इति न्यायेन ममाप्येष परिकर आरम्भः
स्ता स्ताजविषयें निरपवादोऽखण्डनीयः । स्ववुख्यचुसारेण योग्य
इत्यथः । प्रथमार्धन स्तु तिनिरयाकरणव्याज्ञन सवेदुराधेगममदहिमत्व.
रूपा महती स्तुतिः इता, उन्तरार्धेन स्वुतिसमाघानन्याजेन सर्व
स्वुतिरनुरूपेति मह्कोौशरूम् ॥ अन्यश्च गन्धवेराजस्य महाकुराल-
तवादेकेनेव छ(केन यथाश्चुति वक्ररीव्या च हास्लिंकरयोः स्त॒तिस्त-
योरभेदृक्ञान्याभिभरेत 1 ' तत्र हरपक्षे यथाश्रुति व्याख्यातं, ह रिपक्चेऽपि
तदैव योजनीयम् । सबोधनपदं लु अदसेति । हरतीति हरः; संदती
तद्धिख्ोऽदरः । पालयितेत्यथः। अथवाऽ: अहो परम परा मा
#
सस्छृत-माषारीकाभ्यां संबख्तिम्- ३
लक्ष्मीधैस्येति तथा हे रक्ष्मीपते। लक्ष्मीपतित्वान्ममालक्षमीं स्वत एव
नारायिष्यसीति योग्यं संबोधनम् । यदि ते मादेखः त्वन्माहेमसंव-
न्धिनी त्वन्माहेमाविषया स्तुतिः । गिरो माहे इति योजनापेक्षया ते
स्तातेरत्येव समीचानम्, तत्ताहः अवसन्नाऽट्पा असददयनयुरूपा-
प्यस्तु, नत्वन्यद्व तानामनस्पाऽचुरूपाप । अचर हदेतुगमभं वरोषणम् ।
तव क।दरास्य । ब्रह्यादाना स्ताचकाना गेरः स्तुतरूपायाः पार एवः
दुषः। स्तोतु: श्म स्तुतेशुणदोषो च जानत इत्यथः । सवंदेवस्तुत्य- |
त्वेन निरतिशयसावं्येन च तवेव सर्वार्कृष्टव्वादिव्यभिप्रायः। स्वति ।
फट दयन् स्वस्य विनयातिशयं दरेयितुमाह । अथ स्व त्वां अति.
परिणामावधि अतिक्रान्तो बुद्धिपरिपाकावाधेः सामा यन्न त
यथा स्यात्तथा स्वराक्तिमतिक्रम्यापि यणन्स्तुचन् साऽपि जनः अ-
वार्य आभिमुख्येन वाच्यः । संभाषणीयस्त्वपेव्यथः । यस्मादेव स-
व॑प्रेवालुगरद्यते त्वया स्तांता अत एव ममापि स्तात्रे स्तुतिकनच पष
पारिकसे नमस्कारादिप्रबन्धः। कीदशः । अनिरपवाद्ः न विद्यतऽतः
कवायेनापवादो दूषण यस्मार्स तथा । अहारोते वाप्सनायम् । अहरह |
सर्वदेत्यथैः । यद्धिषयकस्तुत्तिकतृत्वेनान्यांऽपि सद्ा नमस्यः एकु
वक्तव्यं सख सव॑दा सर्वषां नमस्यतरो भवतीति भगवाते रत्यात्या
यज्यते । एवं यस्यायोग्यापि स्तुति; सान्निध्यफखा तस्य यण्या
स्तुतिः किं वा न फङिष्यतीति ध्वनितम् । हर पक्षेऽप्यवम् । तत्र ए-
रम श्रेष्ठेति सवाधनम् ॥ १ ॥ ६
ॐ संस्कृत टीका ९€
जयतः पितरा श्यो देताद्वेवस्वरूपिणो ।
ससक्ता इव गीरथां आप्तरङ्धावुभमा रावा ॥ ९ ॥)
( हर ! ) दे दीनार्तिहारिन् ! ( ते ) भवतः ( मिन्नः ) अष्टवि-
चेदवय्यान्त्गर्तासिद्धिविदोषस्य; महश्वस्येत्यथेः । यथा “अणिमा
प्रहिमा चेव रुधिमा गरिमा तथा । भ्रात्तिः प्राकास्यमीरित्व वाशत्व
एसिद्धयः'' इति प्रक्षिप्तामरः । महतो भाव प्व महिमेत्युख्यते-
र ्चिवमहिश्चस्तोत्रम् ।
मरत्शब्दात् “शृथ्वादिभ्य इमनिज् वा” ५।१।१२२ इत्यस्मात्सूत्रा
दिमनिज् प्रत्ययः । ततः “टः” ६।७।१५५ इति रिकोपः 1 ( परं )
उत्कृ्ठमन्यद्धा ( पार ) नयादिलङ्कनाद्वन्तव्यतीरं, यथार्थसीमान-
भिति यावद् । ( अविदुषः ) अजानतः ) कस्यचित् पुरुषस्य छता
( स्त॒तिः ) माहात्म्यवणन स्तुतिवाद इत्यथैः ( यदि ) कदाचित्
( अखदरी ) अनुरूपा अयोभ्या वा मवेहि कि चिच्रमिति
योजनीयम् 1 यतः ( बह्यादीनामपि ) बद्मोयेन्दरेनद्रादिदेवानामपि,
किञुतान्येषां (गिरः ) वचनानिः( सवयि ) भवतो विषये (अवसन्नाः )
परिसमा्ता, व्यथौ एव भवन्ति । यथोक्तं स्कन्द पुराणस्य माहेश्वर-
खण्डान्तगते-कोमारिकाखण्डस्य च चयस्िराऽध्याये ।
“न यस्यारमपि बह्मा महिमानं विवर्णेतुम् । -ॐ ? त
ततः किमिति त्वयापि स्तुते रारम्भः क्रियते १ इति चेत्सर्वेषां
खाधिक्रारतां अरतिपादय न्नाह । ( अथ ) अतः परं ( सवैः ) सम-
सतोऽपि जनः ( स्वमतिपरिणामावधि ) निजमतिपरिपाकय॒र
स्ववुद्धिविभवाञसार मित्यथेः । क्रियाविदोषणमिदं {
स्वन् कथयन् सन् ( अवाच्यः ) कदापि न निन्दनीयः अर्थात्
निर्दोष पव भवति 1 तर्द अस्मिन् ( स्तोत्रे ) मवदीयस्त॒तिरूप-
कमेणि ( ममापि ) पुष्पदन्ताभिधानस्य स्तो्रनिमीतुः श्रोतपाठकदे
रपौति ङुश्चणया (पष परिकरः) प्रगाढगा्रिकावन्धः समारम्भ इति
यन्तं
यावत् ( निरपवादः ) अपवाददीनो निदोष एवास्ति। पयनाऽ नां
कविः स्तोत्रारम्भे इदवरमारमवणनप्रसङ्खेषु सर्वेषाम
निरूप्य स्वुद्धिगेचरत्वावधि कथनमेव निर्विवाद्ामिल्य
कारणञ्चास्यापरिमदखोक पव दरोयतीति बोद्धव्यम् | पएतरि
धूजटिस्तोत्रे आदौ महिमशब्दभयोगात्तद्वणनाधिक्यच्चायं छ
“मदहि्लस्तोज'” नाल्ला व्यवहियते । यथा आदौ कपूरशब्दपयों 8
कारणादेव “कबूरस्तुति"" रपि भसि द्धिङ्गतास्ति अस्मिन् महिन
ने उनर्रिशच्छ्लोकावधि “शिखरिणी” चत्तमेव
ओक्त इत्तरत्नाकरे “रसे ष्दै दिछन्न। य-म-न-त-
रिणी'-ति॥ १॥
प्ययो ग्यतां
गमयति ।
प्रधान तदश्च ण-
गरणच् )
हिश्लस्तो-.
| संस्कृत- भाषादीकाभ्यां संवलितम्- ५
ॐ संस्कृत पद्याऽचुवादः $€
| ्चन्मदि्नो ऽन्तमजानतस्स्या, त्तवानुरूपा कथ मीदा ! ते स्त॒तिः ।
यतो विरि्चादिकदैवतानां, गिरोऽवसन्ना विष्ये त्वदीये॥
अथ स्ववुद्ध विंभव।जुसारःवदन् न कञ्ित्किख दोषमंहेति
11 7 (पररिनिन्दनीयः)
श्रारस्भ एषोऽस्तु ततोऽपवपदै, दीनस्स्तुतो मे हर ! सर्वथैव ॥ ९ ॥
व भाषा रीका $€ ॥
जाकी सत्ता ठेख छदि, श्रकुटी दिक तदहि साथ ।
लियत यह जग सत्य-सखम प्रन `गिरिजानाथ ॥ १॥
अखखख अनादि अनत जो निरगुन सगुन विशेख । `
निकार खाकार सोः रहत निरंजन वेस ॥ २॥
जो अद्िवदि दैत हे, देता-दवेत विचष्ट ( निकाम )।
रहत भुवन भरि व्यापि पुनि, सवते परे घनिष्ट ( विराम ) ॥
विद्वरूप जो विदवपति, अयन विदव-निवास । 4
चिति जरू पाचक पवन रवि; शशि आतमा अकाल ॥ ७ ॥ |
छ बह्याति कीट लौ, जाको विस्व (रूप) ख्लत।
। लव कक हैं सवे रहत, पुनि सवते विदगात ॥ 4 ॥ |
जाको वणन सब करे, जो नहि वरन जोग । _
। जादि वरनि जन धन्य बनि, मेटत निज भव रोग ॥६॥
जाको मगल नाम हे दंत परम पद् जाय ।
ताहि नरायन पति नमत, जो विधिहरि दर हाय ॥ ७ ॥
4
( हर ) हे दीनजनो के दुःख हरन करने बाठे । ( ते ) आपकी
( महिम्नः ) महिमाकी ( परं पारं ) यथाथ सीमाके ( अविदुषः )
4 [3 [+ #3 + ४4 ए
अन जानते जनकी की इद (स्ततिः) बड़ाई ( यदि } जो, कदाचित् `
( असदषी ) अयोग्य दोवेतो क्या अआश्चय है ? क्यौ कि ( बह्मादी-
| नामपि ) बरह्मा-दव्यादि) देवता की भी ( गिरः } उक्तियां ( -
(~ 14 - य ^^, ७
। यि) आपके विषयमे ( अवसन्नाः ) व्यथेही होती र, अथोत् रुक
® अः म ५७ [बे
ज्ञाती है । (अथ ) इसके अनन्तर ( सवः ) सवी कोद ( स्वमति.
& ` शिवमाहिश्नस्तोत्रम् ।
परिणामवाधि गृणन्) अपनी बुद्धिकी पकाई भर कहता हआ (अवाः
च्यः ) निदाके योग्य नहीं होता। अत एव (ममापि ) मेराभी
( स्तोत्रे ) आपके स्तुति गान मे ( परिकरः ) उद्यत होना अथवा
कमर वाधना ( निरपवादः ) दोष गानेके योग्य नदीं दो सकता ।
तात्पस्ये यद् हे कि, किसी के गुण गान करनेका नाम स्तात
। अतः गुण तभी गाया जा सकता है । जबकि, पुणे
रीति से जान छया जावे । फिर परमेश्वग्के गुर्णोका अन्त
नहीं है । इस कारणत उनके गुर्णो को कह डाखना मनुष्य
को शक्तिके बाहर हेरेखी ददाम स्तुतिकरना असंभव है इसी
| राकाको दूर करके धस -छोक भ यह भाव दया दै कि, जो आप-
को महिमाका पार नहीं पाखकादहै उसकी कटी हुई आपकी स्त॒ति
अयोग्य दोवे तच तो कु आञ्यैकी वात नहीं है, कयौ किं ओर
की कोन वात है ब्रह्मा-इत्यादि देवता्ओकी कदी स्तुतियां भी
आपके विषयमे यथार्थं नहीं हो सकने से रूकी पडी रदगई_अच य-
द शाका दोती है किः यदि समस्त जगत्के खष्टिकतो बह्मादिकभी
जिस काथ को नहीं कर सके तो तुम क्यौ एसे विषयं उद्यत हुपः
हो । तो उखका उत्तर यहं दे कि, अपनी बुद्धि के दौड भर सभी
< कह सकते ह् । अत एव इस स्तुति गान मे मेराभौ छग जाना
दूषित नहीं है । जैसा कि, गोस्वामी वल्सीदासजीने भी अपने
मानस रामायण मे कहा है-- `
` सब जानत पु प्रभुता से । तदपि के विजु रहा न कोई ॥ इति॥ ९॥'
ॐढ2& भाषापद्याजुवादः ९९
महिमा विल्ु जने भे, कि बिध भाषिन जाय ।
जह ब्रह्मादिक देवकी, वानी व्यथ बनाय ॥
निजमति वैभव भरि कहत, छहत दोष नाहि कोय ।
४०९ धिनी [+ ने
याते विनती मोरिहू, निरपवाद् परभु ! दोय ॥ १ ॥
7 क
सस्करत-भाषार्दीकाभ्यां सवखितम्- ७
<9ट भाषाविम्बम् €
वड।$ आपे की सकत नर्हि जानो कामे कहे,
भई ब्रह्माह की बचन~रचना व्यथं जरद् पे ।
अपानी बुद्धी कै विभव भरि भाषै चहि सवे
हमारी भी विन्ती हर ! निरपवाद बनि रहे ॥ १॥
अतीतः पन्थानं तव॒ च महिमा वाङ्मनसयो-
रत्ाघ्र्या यं चकित ममिधते श्रति रपि ॥
स कस्य स्तोतव्यः कतिविधगुणः कस्य विषयः
पदे त्ववीचीने पतति न मनः कस्य न वचः ॥ २॥
< मधुसूदनी टीका ३&
पुनरण्यस्तुभ्यतवेनेव भगवन्तं स्तोति पूर्वोक्तं स्वस्य ब्रह्मादिसा-
स्यसरुपपादयन-
अतीतेति * । पूर्वोक्त संबाघनमावतनायम्। तव महिमा सगुणो
निर्य णश्च वाड्रनसयोः पन्थान 1वषयत्वमतातः-॥तिक्रान्त । चदा
ब्दो ऽवधारणे । अतीत एवेत्यथेः । अनन्तत्वान्नधमकत्वाच्च । तथाच
श्रतिः "यतो वाचो निवतन्ते अप्राप्य मनसा सह इाते। वागावषयत्लं
` तच्च श्रुतेः प्रामाण्य न स्यादृलयाराङ्खयाद । य् श्रतिरप्यपोरूषेय्यपि
वेद वाणी चकितं भीतं यथा स्यात्तथा अभिधत्त तात्पयण प्रतिपाद
यति । सगुणपश्चे किचिदप्ययुक्तं मा भूदिति निगुणपन्न तु स्वभ्रका-
दास्यान्याधीनप्रकाशता मा भूदिति भयम् । केन प्रकारण । अतद्या-
दृस्या खगुणपञ्चे न तद्याचरत्तिरतच्याचत्तिस्तया । अभेदेनत्यथः
(स्च खल्विदं बह्म" “सर्वकमौ स्वेकामः' इत्यादिना सवाभेदेनेव भगः
वन्त प्रतिपादयति न त्वेकेकरा माहमन चद्तात्यथः ` । निगौणपक्षे
[ व (९
तुन तत् अतत् अलतियातत्कायत्सिकसुषाघद्यामे(त यावर । तच्चा
शिवमहिन्नस्तात्रम् ।
चुरंया तत्परित्यागेन जदद्(१)जदलक्चणयेत्यथेः । मायाधियोपददित
चेतन्यशक्तं तत्पदं तत्कायवुच्यादुपहितचेतन्य शक्तं त्वंपद्सुपाधिमा-
| गत्यागेनाचुपहितचैतन्यस्वरूपं स्वधकादामपि तदाकारच्रत्तिमात्रजनः
नेनावेयातत्का्यनिन्ररया बोधयतीकेति न तावता बाग्विषयत्वं मुख्यं
तस्येत्यर्थः । अत पवस ताड्छः सगुणो निगुंणश्च महिमा कस्य
स्तोतव्यः। कतरि षश्री। न केनापि स्तोतुं राक्य इत्यथैः । सगुणस्य
स्तोतन्यत्वाभावे देत॒माद । कतिविधगुणः कातिविधा अनेकप्रकारा
गुणा यत्र ख तथा । अनन्तत्वादेव न स्तुल्ये इत्यथे; । निगणस्य ,
स्तोतव्यत्वाभावे हेतुमाह 1 कस्य विषय इति । न कस्यापि विषयः `
निर्धमेकत्वात् । अतः एवाविषयत्वान स्तुत्य इत्यथः । सणुणो ज्ञेय-
त्वेऽप्यनन्तत्वात् निरोणस्त्वकरूपोऽपि क्षेयत्वाभावान्न स्तुत्यञ्चत्तर्दि
स्वमतिपरिणामावधि णन्निति पूचोक्तं विरुद्धेयतेत्यत, आदह -पदे
त्विति । अवौचौीने नवीने भक्ताजुच्रहाथं सीख्या यृदीतं च्षमवपिना-
# ~ क क
कपायेत्यादिविश्िषटे रूपे कस्य विदुषो मनो न पताति नावति, क.
स्य वचो नाविराति । अपितु सवेस्यापि मनो वचश्च विदातीत्यथः ।
तत्र दिरण्यगभेस्यास्मद्ादेञआ सममेव स्तुतिकतेत्वमिति न पूवा पर-
विरोधः ॥ हरिपक्षेष्येवम् । अथा यं अतच्याश्रा कायेप्रपञ्चमेदा -
च्च कितं भीतं माद्धन्नत्वेन कायप्रपश्चं मा पर्यत्विति शङ्कमानं श्चुतिर-
भिधन्ते इति पूवेवत्। अर्वाचीने पदे तु कमरकम्बुकोमोदकीरथाङ्ग-
कमखालयाकोस्तुमा्युपलक्चिते नवजर धरदयामधामनि श्रीविग्रह
ङण्ठवार्तिनि वेणुवादनादिविविधविहारपरायणे गोपकिसोरे वाचः
न्द्ावनवतिनि कस्य मनो नापतति, कस्य वचश्च नापतति अपग स
ता तातेर्ेस्तारो यस्मात्तदपतति । सकुचितमित्यथः । तव श्रीषेग्र-
हाचुचिन्तने तद्णादधकथने च विषयान्तरपरित्यागेन विखीयमाना-
वस्थं मनो वचश्चकमात्नरविषयतया सकुचितं भवति तव श्रीवि्रहे प-
वासक्तं भवतीति भावः ॥ २॥ ् |
(1) शव्न्युपस्यिता्य विविद दल्यज्य जवद्य =-= ~~~ दराकस्युपस्थितार्थं किविदेशौ पाल्यज्य अवरिशर्थे लक्षणा नहदजहलक्षणा--यथा त-
च्वमसी्यादे तच्वमिति पद्पस्थितयोः स्वज्ञवकिंचिज्ज्ञतांशयोः परि
भेदघ्रविषादनमित्याद्रद्यम् . |
पागपेकं केवलचैतन्या-
सस्कत-भाषादीकाञ्या सैवडिनम्-- ९.
92 संस्कृत टीका ३
भगवन् ! ( तव च ) अतः पर भवता ( महिमा ) . एेद्वय्यै
( वाङ्मनसयोः ) वचसो मनसश्च द्वयोरपि । 'अचंतुर-' ५।४।
७७-इल्यादिना निपातनात्साधघुः। ( पन्थानं ) मागेम् ( अतीतः.
अतिक्रान्तः, रखुङ्धितवानेवेत्यथंः । यता वाङ्मनसाभ्यामव सवाथ
परज्ञान भवितु शक्यते अत एव प्रव्यक्षाचुमानय्साप अविषय प-
वेति सिद्धम् । ८ यं ) व्वन्महिमानं ( श्चतिराप ) वेद पुरुषोऽपि (अं
तदाच्रस्या ) न तस्य व्याचछरत्तिः अतद्यादाततस्तथा, (नैति नेती"
त्यादिवाकयपरम्पराद्वारा, अथवा “यत( वाचा निवनत्तन्ते अप्राप्य
मनसा सह” त्यादिज्ञापनरीत्या ( चाकत ) यथया स्यात्तथा क्रिया-
विदेषणमिदं ( आभिधंत्ते ) कथयात) सूुचयतीत्यथेः। अथात् स्वरू
पटश्चणाभावात्तरस्थलश्चणेनैव वक्भुत्सदत या, नासन्न सन्न
सदसन्न मह्न चाणु" इत्यादिकथनद्वारेवं स्वाभध्राय च्यज्
यतीति दिक् । (स ) मादेमा ( कंस्य ) जनस्य ( स्तोतव्यः ) स्तोतु
योग्यस्स्यादपि तुन कस्यापानत व्यज्गयध्व॑निः । एव ( कलति-
विधगुणः ) तस्य कियन्ता गुणाः सन्तीति याथा्यन ज्ञातं नेरा
कयते । तथा च ( कस्य विषयः , अपितुन कस्यापि गोचरः इत्यथः
( अवीचीने ) खषटि-स्थिति-प्रक्याादसुख्यतया आत्मन्यनुघ्राद्यक
ददा नीस्तने ( पदे ) स्थानः ( कस्य सनोक्चः च न पतति) नेव
ग्रसरति, आपेवु सर्वैवामपि मनो वाक् प्रसरत्येव । अत्र निष्कठसूपे
ईदवरे स्वंतेरनधिकाारत्व प्रतिपाद्य सकलरूप सावकारात्वमस्ती-
ति स्वं ट [कृतमिति ॥ २॥ |
( तथा चाक्त स्कन्दपुराणस्थंमाहेश्वरखण्डायकामार्कालण्ड-
स्य ३३ अ० “श्रुतिश्च भता च वाक्ते कि तस्मात्परम भवत् ॥२५॥
= संस्छृतपदयाजुवादः ‡<
न मोचरत्वं महिमा प्रयाति, तवरा | वाणी-मनसोः कद्ाचत् ।
न वेद वेद्टोऽपि तताोऽभघत्त (नेती ति वाक्याच्चाकेत सदैव (यमेव)
स्तव्यः कथं स्यान्माहमा त्वदीयः १ केयद्शुण। वा ॥चचघयश्च कस्य 1
आत्मन्ययम्राह्य पदे न करस्य मनो वचो वा प्रसरत्यवदइयम् ॥ २
० षेः
रिवमहिन्नस्तोत्रम् }
ह भाषाटीका ‰९
स्त॒तिकन्तं अपने स्तुत्य देव से यह स्तुति कद रहा है अत एव
संव यहां पर अध्याहार कर खेना ऋटिये । अथवा -
पृचोक्त संबोधन का ।
हे भगवन | ( तव च महिमा ) भर आप की महिमा ( वाङ्म
नसयोः पन्थानं अतीतः ) वचन ओर मन-दोनो दीके मार्गम को
खांघगई है । अर्थात् बाणी ओर मन मी आपकी महिमा तक का-
दापि नहीं पहुंच सक्ते । अत एव ( श्रुतिरपि ) वेदं भी ( यं ) जिसे
( अतश्याच्रत्या ) अभेद ही से, अथात् यह नहीं वह, अथवा दतनां
ही भर नदीं । इत्यादि वाक्यो दी से ( चकितं अभिधते ) चकप-
कयादहुआासा कहता दे । अथवा भयभीत होकर
( स कस्य स्तोतव्यः ) भला पेसी आपकी महिमा को कोन गा स-
कता दे ? क्योंके (कतिविघणुणः ) उसमें [वि ~~ भकार कते गुण
ह १८ कस्य विषयः) किसका विषय हो सकता हे ? त् सवी
करी क शाक्ति के बाहर हे । फिर मी ( अवौचीने › नवीन अर्थात्
भक्ता के अज्रा कीखामय रारीर धारी ( षदे ) स्थानें (१
4 क ~ (९
केस का ( मनो वचः न पतति ) मन ओर वचन न पहुचेता ड !
तात्पयं यह कि-आपके निगुण रूप की महिमातो व॒ म |
मन दोनो दीके परे ह, क्योकि वेद् भी- र
"नेति नेति कदि जा्गुन करहि निरन्तर गान], =
तव भखा उक्षे कोन गा सकत है ? पर हां आप क ट 2
म आप छषमवाहन है, आप पावती के पति ह आद् प र
हं । इत्यादि धकार की कुछ वाते कहने के च्यि मन लोडने ताक ध्व ष
है । अथात् सगुण रूप र की कुछ थोडी खी स्तुति किल =
सेहो सकती हे। खसे स्तुति करने की साथेक क
ता प्रकट =>
है॥ २॥ होती
६ भाषापथानुव।दः ५९.
वानी मनके पथ परे, महिमा तुमरी नाथ | क
नेति नेति कदि वेद नित, गावत विस्मय साथ ॥
है कतेक गुन विषय किमि, कोन सक तिहि गा
काकी बानी भमन नरी, नये यनि | जाय ॥ स. ॥
(न २॥
[वा नि
म ल
॥ 1
हेत॒गमौदोषण माहं ।
संष्छत-भाषादीकाभ्यां संवखिनिम्- ११
हू भाषाविस्वम् <
बडाई सोरी ह वचनं मनह् क पथ परः
राते वेदौ भी चकित बनि माघ पवद पत् ।
अला केसे गावे कतिकः गुन काको वषय दः
अनोखे थाने चे गिरत मन वानी नाह कच ॥ ९ ॥
मरधस्फीता वाचः परसमश्त निर्मितवत~- `` .
स्तव ब्रह्मन् किं वागपि सर-गरो विस्मयपदम् ।
मम लव्वेतां वाणीं गणकथनपुण्येन भवत
पुनामी त्यर्थे ऽस्मि न्पुरमथन ! बुदि ठ्यवसिता ॥३॥
-ॐ£ मधुसूदन टीका ७
स्ववं स्तुलव्वेऽपि दरिदिरयाः सशक्ञयोरनमिनवया स्वुत्यानम
नोऽञुरञ्जन तद्धिना न तस्प्रसादस्त विना फठमिति पुनरपि स्त॒ते्वै-
व्यै प्रासे साथक्यं द्शयनस्ः,
+म्मप्विति %। दे बरह्मन विभो, खरणुरोब्रह्मणााप् बचा त वक
विस्मयषपद् वचमद्कारकारण [कम् । कराब्द् आक्षप । नेत्यथः । तत्र
करीददस्य । वाचो वेदलक्षणा निभितवतो
नि ववासवदनायासेनाविमवितचत, । कीटशीः । मधुंवर्स्फाताःमा-
(दिशब्दशणाकंकाविव मघुराः। तथा परममण्त निरति
व्ायाद्धतव यास्वाद्ाम् । पतेनाथगतमाचुयमुकतम् ।. परमद्वरवार्चा
तव्दाैयतयोर्निरति्चयमाधुचया मिथस्तारतम्य मध्वखत्च
उदाभ्यां चोत्यते । अय च वाचामुत्कषो महान यत्र छब्दगुणाङुका-
रातिरय विनार्थगुणाङंकासातिशय शत यत्र हिरण्यगर्मस्य वाण्य
विन चमत्कारकारण तन क्रा वातोऽस्मद्ादेवाण्या इत्यथः । ताह
कि स्तत्यत्यत आमम् त्वित्यादि । दे पुरमथन शजिपुरान्तकः भव-
तो शणक्रथनपुण्यन पता र: 1 वाणीं पुनामि निमेरीकसोमीलयाभेषा
येण तस्मिन्नयं स्व(तरूप् मम बु्धिब्यवासतादयता नतु स्तुतकारर-
न स्वा रञ्जयाभीत्यमिमरवयिणलयथः । बाज गस्प्त भनेनेमरयं नास्त
१२ दिवमदिश्वस्तोत्रम् ।
रीयकामेति स्तुतेः साथक्यमुक्तम् ॥ दारपन्षष्यवम् अ
यःते मथन गोकुलम् , अथवा मथ्यन्ते आाधाऽगताथमिति =
नः क्षीरोदः पुरं मन्दिरं गोकुटं दीरादा वा यस्येति पुरमथनसवे |
पै: । सवेमन्यत्समानम् । अथवा हे बरह्मन, वाचः सवस्या अपि भ
१५ निरतिरखयसारं निश्चयेन सिततवतः स्यगजुभूतचत ` सुर
क देवतोपाध्यायस्य तव मधुस्फोता मध्वुरिम्णा
1 रहिता वागपि वाग्देवता सरस्वत्यपि
६ न । तस्या मद्धाच््य नदद्न्तरमाक्तपराक्तिद्ध-
भ दभाति त्वादिच्छ्येव मभयं पञ्चत्तिरित्याह-मम त्वेता-
र पुण्यन ममत्वतां ममत्व वतमाना ससारसंस-
माते । निजगुणक थन, (५४५ स
गेकल्दरषितां चाणीं वाचं -पतस्य ठपतकलुरिति शषः । पुनामि निष्क
टयुषां करोमत्थितस्मिजयं हे कि छ सित यतोऽ
तोनायत्तेव मम 0.59 ति साधु
कमे कारयति तं यमेभ्यो केभ्य ते उ एवासाधु का-
धतिः (1 क नन्तुरनीशोऽयमात्म-
म
तेन परमका।रणिकस्त्वं रणागतवाणीपावन पुण्यत तस्वतितत्परं खो-
कं कतुं स्वयमेव प्रयतमानो यया कथापि -उल्या पसीदसी्य्थः ॥ २॥
नकल द
ओ सस्त टीका ९ ं
( बरह्मन ! ) दे ब्रह्मस्वरूप । ( मधुर्फीताः ) मधुवन् मधुराः
कामलाः माधुच्यशुणालद्धःताः ( चाचः) वेद् विवंचनानिः `( चय.
ममत ) उत्कृष्टखुधासदराः । ॥ क्रिय विशेषणमेव ( निभिः
तवतः ) कृतवतः ( तव ) भवतो वि ( खुरगरोरपि )
वाचस्पतेरपि वा किमुतान्येषां ( वाक् ) बाणी क विस्मययदं १ )
क थमाश्चर्य स्थानं भवितुमहेति ( न कद्ापीत्य् भिधायः । योर
मेव तर्हिं स्वं कथं स्तवने प्रव स दत्याराङ्खयाह- ( पुरमथन ! ) हे
्रिषुरासुरान्तक | अहं ( च )-इति रत्ववधारणे ( पतां ) वश्यः
माणामात्मीयां ( वाणीं ) गिर ( भवतः ) तै गुणकथनपुण्येन)
शुणकीत्तनपुण्यलाभाथमेव । करणे तृतीया । पुनामि › `वि
संस्कृत-मविारीकाभ्यां संवरितिमि- १६९
कसेमि ( इति ) हेतोः { अस्मिन् ) स्त॒तिङश्चणे ( अथं ) भरयोजने
( मम बुद्धिः उयवसिता ) ङतोद्यागा लत्व, । अन्र ब्रह्मण एवा-
ल्षवाग्जाटककवेत्वं प्रदरहयात्मनश्चा दत्व दुरीङत । च्राह्या तु
भारती आषा गावार्वाणा सरस्वती" स्यमरोक्तरोत्यजुसारणन
ब्रह्मन्निति खम्बुद्धिषदश्च वाक्कठवत्वमव् सृचव्रात , तथा च
+रशिवपुराण'' स्थवायुखंहितायाः पूचभाग अ> २३-उक्त-
त्वं हि बागश्तं खाक्चा, दहमथाश्त परम् ।
-यमप्यशतं कस्मा, दवियुक्तसुपपद्यते ॥ १६ ॥ ` / `
तथा चान्यदपि तत्रेवोत्तरभागे यथा-
ङाब्दजाकमदोषन्तु, धत्त दरारवैस्य बलभा ।
अर्थस्य रूपमलिलक, धत्ते सुग्धन्दु खरः ॥
च्छिवयोरव वागथेरूपत्वं प्रतिपादितमित्यवधयम् ।
इत्यादि वचना
({त्ेषधचरिताख्य महाकाग्ये
पद्योत्तराद्धेभावश्च यथा
पवित्र मत्ातजते जगद्ग
कथन्न सा मदद्धिरमावंखाम
› स्स्रता रसक्षाखनयेव यत्कथा ।
पि, स्वसेविनीमेव पवि्रायष्यति ॥
स रोऽ
9 संस्कृत पद्याजुवादः $€
वरमाश्चतरूपिणी गर मयु निभ्मितवान्भवान् स्वयम् ।
अत पव वृहस्पते राप, वचन विस्मयतां हि गच्छति ॥
अवते। गुणगानपुण्यतः, निजवाच भगवन् ! पुनाम्यहम्।
इति कारणता मया रत; स्वमति स्त्वर्स्तुतिकमेधर्भिणी ॥ ३ ॥
< भाषा यका 36
(ब्रह्मन् ) दे ब्रह्मस्वरूप ¡ ( मघुस्फाताः ) मघुखेभी मोटा अ- .
यौत् बहुतही मधघुर ( परम अच्त् ) सवोत्तम अश्चतके समान (वा-
चः ) वेदादिक चन के ( निर्मितवतः ) रचना करनेवाले ( तव )
9 ` शिवमहिश्चस्तोत्रम् ।
आपके विषयमे ( सुररोः अपि ) देवतां के गुरु बदस्पति की भी
(बर् ) बाणी ८ किं विस्मयपदं ) कया कु आश्चयेकी स्थान
हो खकती है ? अथौत् कद्।पि नक । ( हेपुरमथन ! ) देरिपरासु-.
रान्तक | मे (लु) तो ( पतां वाणीं) इस अपनी वा्णको ( भवतः)
आपके ( गुणकथनपुण्येन ) । 2 (गान रूपा पुण्यसे (पुनामि) पवित्र
किया चादता ह ( इति ) इस्रएिये ( अस्मन् अर्थे ) इस कामस
( मम बुद्धिः व्यवसिता ) मेते बुद्धि लगगड । भाव यह कि-वोटने
को भक्रिया वदादिक सुनाकर आपहीने निकाली है, ततव आपके
विषयमे बृदस्पति का भी कना कुछ आश्वयैजनक नहीं होखकता,
दम लोरगोकी क्या वात हे ? स पर यह् कका होती है कि जिस
विषयमे खस्चात् छदस्पतिको कछ कहनेका अवसर नदीं मिलता
ढस विषयम् त॒म कयां कहनेकों उदयत दो १ उसपर कते ह
कि-म तो केवर आपके गुणायुवाद्के पुण्यसे अपनी त
पविन्न कर रहा ज) दइसोायिये मेरी बुद्धि दस विषय म लगी
हे । यथा--“ निज गिरा पावन करन कारन राम जस तरस
कद्यो'' ( तु° रा० )॥३॥ ह
शष्ठ भषपद्याजुवादः ५६
मधुसी मधुरी ठम करी, वानी अग्रत समान ।
याते अतिविस्मित बनी, खुरगुर्
तवशुन गावन पुन्यते; निमे ल
मो ( मम ) वानीको पुरमथन | ख
| 28 नाषाविम्बम्
बड़ी मीठी बोली अछत ~रस धोली तुन श्रौ ।
भर शाभो | -याम छर-शर-गिरा विस्मय खची ॥
भपानी बानीको करहुं शुचि गाके तुव शने ¦
यी हेतू मोरी मति गिरिश । याच
प ` ह अ
<
अस्मिन्नसञ्यानां अस्मिख
संस्कृत-भाषार्ीकाभ्यां संवङितिम् । ९५
तवेदवर्य यत्त ञजगदुदयरक्षापरख्यकरत्
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिरषु गुणभिन्नासु तनुषु ॥
अभमव्याना मरिमि न्वरद् रमणीया मरमणीम्
विहन्तु व्याकरोर्छा विदधत इहैके जडधियः ॥ ४॥
< मधुसूदनी टीका <
पव हरिहस्थोः स्तुत्यत्वं सफलस्ततिकत्वं च निरूप्य ये कोचि-
~ [4 1 । क~ श्नराकवन्स्तोति ॐ (4
त्पापीयांसस्तस्य सद्भावेऽपि विवदन्ते तां --
तवेति # । हे वरद् श्ष्लितभ्रद्+यत्तव रेदवयं तद्वदन्तु निराकतं
पके जडधियः कोचिन्मन्दबुद्धयः व्याक्रोशीं विदधते। सक्षपसुच्चेभी- `
घणमाक्रोदास्तस्य व्यतिहारो व्याक्रोशी । अन्येन कलैमारन्धमन्यः
करोति अन्येन चान्य डति कर्मव्यतिहारः । व्याङपूवौक्ताशेः कमे-
व्यतिहारे णच् खियाम्' इति पाणिनिस्मरणात् । ततः स्वाथ अञ्
णचः सखियामम्" इति खूजात्। ततः खियां डप् । तां व्याक्रोरीम-
हमदहमिकया कुवते यत्सर्वप्रमाणध्रामितं तदपि जिघांसन्तीति यत्तद्भधां
मन्दवुद्धत्वं द्योतितम् । अत एव कर्यभिग्राये क्रियाफले. विदघातेरा-
त्मनेपदम् । नहि तद्याकोदीविधानात्तवेदधयैष्याघातः कितु तेषामे-
वाधः पात इत्यर्थः । कीरा तवैदवयेम् । जगड़द्यरङ्षाप्रख्यरूत् ज-
गंत आकाशादिरपञ्चजा तस्योदयं खा, रक्षा स्थित, प्रख्यं सदारं
च करोतीति तथा । अनेनाठुमानमुक्तम् । तच्च अजन्मानो रोका”
दत्य व्यक्त वक्ष्यते । तथा अयीवस्तु चय्याः त्रयाणां वेदानां तास्पर्य-
ण प्रतिपाद्यं वस्तु "सवं वेदा यत्पदमामनन्ति" इति श्चुतेः। अनेनागम-
प्रमाणमुक्तम् । तथा गुणेः सत्वरजस्तमोभि : ली ( - ख्याते ) लोपा.
भिन्ना प्थक्शृताखु । नत वस्वुग्या, भद् इत्यथः । तिखषु तव॒षु
बरह्मविष्णुमरेदवराख्याखु मरूतिषु व्यस्त विविच्य न्यस्तम् । परकटी-
छृतमिति यावत् । उपलक्षणं चेतव्लवेषामवताराणाम् । पतेन पत्यश्चं
प्रमाणसुक्तम् तेन सवैश्रमाणश्रमितामत्यथः । किडशीं व्याक्रोरीम् ।
तेटोक्षयेऽपि नास्ति भग्यं भद्रं कस्याणं ये-
ट)
=
=
^
॥
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१६५ `, रिवमहिस्चस्तोत्रम् ।
षां तेऽमञ्यास्तषां रमणीयां मनोहरां वस्तुतस्त्वरमणीममनो इराम् ।
अमनोहरेऽपि मनोहरवुद्धिभ्रान्तिरभाग्यातिरायात्तषामिव्यथैः ॥ हरि.
पक्षेप्येवम्। अथवा अस्मिस्तवेश्वर्ये अभव्यानां मध्ये जडधियो जड-
मतेरत्यन्तमपङृटस्येव्यथैः । तस्य वस्तुतो ऽरमणी व्याक्रोशी विहन्तं
एके सुख्या रमणीयां व्याक्रोरीं विदधत दत्यथैः । जडधिय शइत्येक-
वचनेन पूवपाश्चिणस्तुच्छत्वम् , एक इति बहुवचनेन सिद्धान्तिनाम.
तिमदत्व सराचेतम्॥ ४ ॥ ~
ज
` र व ~
( वरद् ! ) देवरधद् | भगवन् ! ( इह ) संसारे ( एके ) केचन ~
( जडधियः ) मन्द्मतयः, पापनिष्ठा इत्यथैः ( तिदषु ) तिसंख्यकास
( गुणार्भिन्ाखु ) गणा; सत्वरजस्तमांसि ते भिन्नः पृथग्भूतः
तासु । ( तव॒ ) रररेषु ( भ्यस्तं) आरोपितं, विस्तास्तिं वा
,( जगद्ुदुयरक्नाग्रट्यङृत् ) जगतां सवनानां उदयः खष्टिः, र्चा
(^. च नेप (क भ क \
परिपाखन, प्रक्या विनाशञ्च करोतीति तथा ( चयीवस्तु )
ऋग्यजस्लामाख्यवद्चयन्तगत ( यत् ) प्रसिद्ध (तत)
(न ङ् +£ (~ ह> -- (> ~ + >
( पदवय्य ) महिमा ( तत् निहन्तुं ) विनाशयितुं ( अस्मिन् ) सबै
(~~ ~ 4 भश ॥
सविगणं चद्जधनाः विदुपां { अरनी)
मनोरमता ग्हितां तथाच तला), नच ततोना -
+ (र २ 6 अभः यक्ता ) न(चमताना, यापिष्ठानां `
वा र्मणा) मनाहारि्णीं ( व्याकोरीं ) सायवाद्निन्दां, अनर
न्याङ्पृवात्कराशेः कमेव्यतिहारे णच खियाम्"-३।२।', ३
इत्यतः णच् प्रत्यये ृते-- “णचः दिय ग
त ` लया मञ्-५।४। १७ ततश्च ,
लिथां ॐप्। ( विदधते ) कुर्वन्तीति य
४
सस्कृत-भाषारीकान्यां संवङितम्- १.
क संस्कृतपद्यानुवादः %
आसेपिते तिसखषु ते तुषु प्रभुत्व,
भिन्नासु शङ्कर ! गुणे रनधे मेदाः ।
४ उत्पत्तिरश्चणलयादिकर भवस्य,
ब्रह्माच्युतेहवरखरूपघरं परं यत् ॥
हन्तुं तदेव वरदायक । निन्दनीयां,
निन्दा मभव्यजनमानसराजदसीम् ।
छक्के महाजडधियो वकडृत्तयो षा,
` छस्मो | काचि दिदधते द्घते न बुद्धिम्॥ ४॥
+ भाषा टका भ््
( बरद } ) हे घरदायक । ( इह ) यहां, संसार मे ( पके )
कोर कार ( जडधियः ) जडवुद्धि लोग ( यत् तव पेश्वथ्य ) जो
आप द ददवरता अथवा महिमा हे ( तत् ) उसे | विहन्तुं ] खंडन
करने क किंवा मिटा देने क लिय ( व्याक्रोशी ) सापवाद निन्दा
( विदघते ) करते द । आपका देश्वय्यं कैसा हे । कि ( जगदुदय-
रक्षायदयरूत् ) जगत की खषटि पालन = ^ संहार का करने वाला
हे, किर ( व्रयीवस्तु ) कक यर् ओर सम तीनोदही वेदां का
पति पादित वस्तु है, ओर फिर (तख यणभिन्नञाख तजुषु व्यस्तं)
तीनो ही सत्व -रज-तम गुणो से| पृथक् हप दारीरो मे फेला हआ
अथीत् गुणो के अनुसार ब्रह्माविष्णु -महश सूपो मे प्रकट हु
है । अव निन्दा का विशेषण देते दै कि (अस्मिन ) इस समस्त
गुण से परिपूणं आप क देदवय्यै मे समश्च रखने वाखोके लि
( अरमणीं ) मनोहारिणी नदी है पर ( अभन्यानां ) नीच बुद्धि
वादे अथवा पापनिषठ लोगो के लिप । रमणीयां ) बड़ प्यारी ह ।
मावा यद कि-संसार म सी भका के लोग होते ही है-उही.
मे कोर कोर मन्दमति जन, संसारक उत्पात इत्यादिके करनेवाले
री वेदो मेँ प्रतिपादित ओर नीनौ गुणा से तीन रूप धारण
करनेवाडे आपके उल सवे प्रसिद्ध पेवथ्यै (ष्ह्वरता) दी को
३
टै रिवमदिन्नस्तोत्रम् ।
रमतु कै
मिरा देनेके छिद समश्चदोास के आने परमतुच्छु पर नासम र,
चिये बडी वाकी आपकी निन्दा कर्न छगते है, इस च्छक
ससार मे भले ओर अनभल दानां का मिला रहना सिद्ध
स,» म | |
जसे क-
"खेड पोच सव विधि उपजाय \ `
५ +< ग ॐ9 (र ६1
गनि गुन दोष वेद् विकगय ॥. _
कटि वेद् इतिहास फुराना ।
विधि भ्र्पच न् अवगुन साना? ॥ ( तु° रा० ) ॥
इससे इख व्रंथ के वनने क समय अनीदवरवादी नास्तिको का
वतमान रहना भी सूचित होता हे । केसी निन्दा करते ह-उन
वातौ कोञअगे वाले छाक मं खोख्दिया हे ॥ ७॥
, +. & सषापयानुवरादः
जगत खि रक्ता धरखयः महिमा करति तंह्यारि ।
वेद कहत रय गुन धर, वि हरिहर तनु धारि ॥
वरद | नीच मनभावनी, ताहि मिरावन हेत ।
अजुचित (कुत्सित ) निन्दा करहि जग, जडमति परम चेत॥ ५॥
= | 9 9९ ॐ मपानिम्बम् ‡&
च विद्ये देदव््यँ जग सजन रक्षा ख्य करे
| ध्यक हेके सेई त्रिगुनमय तीनो तयु तरण
भ भ
यही के मटै को जगति बहुतरी अनभरी,
डी भारी निन्दा करत जडबुद्धी जन =.
= | न खटी ॥ &॥
संस्करेत-माषारीकाभ्यां संवङ्तिम्- १९
। किमीहः किंकायः स खु किमुपायचखि भुवनं `
; किमाधारो धाता जति किमुपादान इति च । .
अतश त्वय्य नवसरदुःस्थो हतधियः
कुतर्कोऽय कंश न्सुखरयति मोहाय जगतः॥ ५ ॥
= -सघु््दनी टीका स
` ये त्वात्म प्रस्यश्चमपद्् चवते चयी चान्यथा वर्णयन्ति, तेऽञखमानेः
नैव नि सकय: । तच्चाचमानं श्विल्यादिकं सककैकं कायत्वात् घट
वदिति जगडद्यरश्वाध्रखयङृदित्यनेन सूचितम् । तज पूरो को क्त-
ज्यान िवीजप्रतिकूल तकंयुद्ावच नत) पू्ैपश्चिणो निराङ्कवन्स्तौति
अथवा कीसी व्याक्रोशीं विदधत इद्याकाङ्घायां तां वद्न्स्तोति--
+ किमिति # दे वरदेति पूर्वैच्छोकाल्संबोधनाचुव्ञः । त्वयिं
विषये कुतकस्तकाभसः कंश्िद्धतधियः कानपि दु्रबुद्धीन जगतो
विदवस्यापि मोदहायाऽन्यथाभ्रतिपत्तये मुखरयति वाचारान्करोति ।
कीरे त्वयि । अतक्यं तकीगोचस्मैदवये यस्य तस्मिन्लवतकोगो-
के, _ क द
भ्ित्तकः स्वातन्द्येणोपन्यस्यत सख सव।प्याभास इ~
चरे व्वयियः क
त्यथः 1 प्रमाणानां स्वमोचरशन्यत्वार्स्वागोचरे ` प्रामाण्याभावो युक्त
एवेति भावः । कुःतकौमेवाद _ किमाह इत्यादिना । स ` घाता परमेदव-
रखिभुवन खजतीति सिद्धान्तमनूय तत्र ` दूषणमाह । खलु किंत
किमः का दहा चषा यस्येति । तथा कः कायः दचारीरं कते रूपं
यस्येति किकायः। क < पायः सहकारिकारणमस्येति करिसुपायः।
क आधासेऽधिकरणमस्येति किसाधारः। किमुपादान सखमवायिका-
र्णं अुवनाकारेण निष्पायमस्येति किंखुपादएनः । सवज किराब्द आ-
शिषे । इतिशब्दः भ्रकारार्थः। चराच्द्ः दाङ्कान्तरससुच्याथेः । ङ-
। खटा हि घरं कुवैन्स्वशरीरेण व्यामियमाणेन चक्रभ्रमणादिचेष्टया
सलि पायेन चक्रादावाधारे खदमुपादानम्तां घराकारं क-
सोति, पलं जगत्क तपि वाच्यः । तथाच कुखाखादिवदनीदवर प्वे-
कद
त्यमिप्रायः । घटादिदष्टर्तेन ल किवयादेः सकरेकल्वं स्यते ।
`
29 , ` सिवमटिन्नस्तोत्रम् ।
तथाच घरादिकतेरि करैत्वौपयिकंः यावद्दृष्ट क्लित्यादि क्त्यपि
तावद्वयं स्वीकतंग्यम्, ्टन्तस्य तुल्यत्वात् । तथाचोभयतःपाद्ा
रज्जुः । तदङ्गीकारेऽस्मदादितस्यत्वादनश्वरत्वं तदनङ्गीकारे च क.
तैत्वानुपपस्याऽसिद्धिरेवेत्येवंरूपः कतकं इत्यथ :। सिद्धान्तं वद्न्कु-
तके विशिनष्ि-अनवसरदुःस्थः नास्त्यवसरोऽवकाडो ऽस्येत्यनव-
सरः, अत ्प्व दुःस्थो दुष्टत्वेन स्थितः। विचि्नानाद्याक्तिमायावसेन
सवेनिमातरि स्वंतकांगोचरे त्वयि नास्ति कुतकीवसर इवः
तथाचाक्तम्-'अचेन्त्याः खल्ुये भाकान तांस्तर्केण योजयेत" न च
घयादिकतेरि यावद्दष्टं तावरिक्षत्यादिकरथेपि साधनीयम्, व्याधि
विना सामानाधिकरण्यमातरस्यासाधकत्वात् । अन्यथा महानसे धु-
मवहधोव्यांतिग्रहणसमये पव व्यजनादिमत््वमपि दष्टामिति पवताद.
घपि तद्जुमानं स्यात् 1 तस्मात्साधम्यसमा जातिरेषा । कवा
तकत्वाद्चुत्तरम् । पराच्छान्त चाच ख्रिभिरिस्युपर म्यते । द्रिपश्चि-
ऽप्येवम् ॥ ५ ॥ ।
+ संस्कृत रक 3
तामेवोक्ता व्याक्रोशी , विशदयति । (सः) परसिद्ध | ;
खष्टिकता ( किमीहः ) खष्टो तस्य का हहा, अ थोत्कय। ६ न
श + ४ (क) भ
शवन खजतीति सवत्र योजनीयम् । ( किंकायः; ) की 1
शेन शरीरेण वा ( ८५९१ ) केनोपायेन, की भूपः क
( किमाधारः ) केन आधारेण, कुजस्थित्ेत्या > भूत्वा
सन् । केन उपादानकारणेन, किञ्िमित्तमितिजत् ( किसुपादानः :)
भावाद् दुर्वैलस्तुच्छ इतियावत् ( अयं ) सप्ु ) त
स्क्ितविचारः ( काञ्चित् ) अनेकान् ( हतधियः; ) विन कतकः ) ईः
गतः ) जोकस्य ( मोदाय ) प्रतारणाय ( मुखरयाति
संहछृत- भाषादीकाभ्यां संबडितम्- २.१
अत्र अचिन्ःयप्रभावे हंदवरे स्पृ्टा-काय-कारणादिरूपः कतका जग-
द्श्चनायेवेति सोपपत्तिकं नास्तिकादिमतं तिरस्छृतमिति यथोक्तं
पुराढिः-.शच्छया कुरुते देदह, मिच्छया वितनु्ेवेव । कीडते भग-
घान् लोके, बालक्रीडनकेोरिव ॥ ५ ॥
तथाच स्कन्दपुराणस्य माहेदवरखण्डे-असणाचलमादारम्योत्तर-
खण्डेऽप्युक्त अ० १०- |
“कस्मादेष समुत्पन्नः किम्मूखः किसु पाधिकः ।
कुतस्त्यः किमुपादानः कया शाक्त्य प्रकाहाते ॥ २१ ॥'
+ संस्कृतपयानुवादः |
कयेच्छया कीट शराङूपधारी,
केनाप्युपायेन च कस्य हेतोः ।
स्थित्वाथ कुत्राव्जजनिविंधाता,
करोति खष्टि जगतां त्रयाणाम् ॥
पवंविधं निरवकादाहतं कुतकं,
कुर्वन्ति नाम कुधियो विषये त्वदीये ।
नोतकणीयविभवोऽस्तिभवा नतस्त,
मादाय सर्व॑ज्ञगतः प्रवदन्ति केचित् ॥ ५॥
|
क भाषारीका
‡ । ॐ स
अय आस्तिको के मताजुखार ब्रह्मा खष्टि-कतो हे जेखा कि
पू छक भ तीनों देवो को प्रतिपादित कणुके ह-अत पव धस
सिद्धान्त के ऊपर नास्तिक हव्यादिको के कुतकां का उलृेख करते है
( सः ) वह प्रसिद्ध ‹ धाता ) खषटिकतौ ( तरिशुवन खजति) चैखोक्य
को सिरजञता हे (किमीहः) कोन सी इच्छा रलतम है-अथांत् किस-
इच्छा [ गरज ] से खष्टि रचता हे, ! ( किंकायः ) कैसा दे घरखेता-
हे-अथौत् खष्टि रचते समय उसका क्सीर केसा रहता हे ?(कि
सुपायः ) कौन से उपायों का स्वीकार करता हे | ( किमाधारः )
द्धोनसा आधार रहता दे-अ्थीत् कदां बैठकर अथवा किंस वस्तु
पर रखकर-हस्यादि, योष्ठौ ( किमुपादानः ) किसकारण से, किंवा
२२ „9 63 शिवमदिभ्नस्तोत्रस् |]
क्यो खष्टि करता है £ ( इति च ) इत्यादि भकार की सरमा कः
तेते शंकाओ। से युक्तं होन पर भी ( अतकर्थेदेवय त्वयि ) तक कं
रेने के योग्य नहीं हे वेदवये जिसका पसे आपके विषय मेँ ( अन
वसरदुःस्थः ) अवकार [ मोका 1 नहीं पाने सेः अस्वस्थ । १
नेद षटवुद्धिवाखों का ( जगतः मादाय ) संसार को मोदित करन
के लिथि अथात् मजाक म रकरः फंसने के किप ( सुख `
रयति ) क्टवाता है ( खच्छं ) निश्चय करके । भावा्थ-यह द् कं
यदि ब्रह्माही खष्टि सचता है तो किस रइच्छासे, कैसा दारीर धर
कर, ओर कोन सी सामग्री [ मसाला ) लेकर, कहा; वे, कि सका-
रण सरे खष्टि कर्ता है? यह सब नमति खोगोंका कतकं केवल
संसार के ठगनेही के (मः दे-इसमे कछ सन्देह नदी है, क्योकि `
आपकी महिमा्मतो तक करनेका स्थान ही नही है अतएव वं
सर्वधा अचिन्तनीय हे-फिर आस्तिको का तो, यह सिद्धान्त खड `
ही दे कि की पी नेक माः ।
“जहि खष्टि उपद्र विविध वनदे संग सहाय न दूजा"
त° रा०)॥ ५॥
@& भाषापयनुवादः +
ङगिदि इच्छा किमित धरी, का उपाय भयलोक ,
कहां वेटि ब्रह्मा खजत, किटि कारन वेरोक ॥
` तुच पेदवजं अतक्य पे, करि ङतके. हतवुद्धि ।
मादिं जग अवकास बिनु, वतराबहि निज खद्धि ॥ ५॥
| ++ | दः भाषावेम्बम् +ई
च - ॐ : ; जी
\ करी का इच्छा सो क्रिमि तु धरी का जतनते,
कदा वेव्ये) ब्रह्म! रचत जग-खष्ठी किहि चयि ।
जगत्के मोह को कुतरक कवुद्धी सब १ कितौ |
~. (९ पेदवज्ञ ष
तिहा सो देशव अगम उनदी (को) कयां श्चलाक है । ५9
संस्कृत -भाषादीकाभ्यां सवरितम्- २.१
अजन्मानो लोका; किमवयववन्तोऽपि जगता-
। मधिष्ठातारं किं मवविधि रनाद्त्य भवति ।
अनीसलो वा कुयीद् मुबनजनने कः परिकरो `
यतो मन्दा स्वौ प्रत्यमरवर संशेरत इमे ॥.६ ॥ `
‰& मघसदनी रीका च ` |
- पव प्र्तिक्रूखतक परिहृत्यायुक्कतकखुद्धावयन्स्ताति- `
४ क ~ वर भ त
अजति हे अमरवर स्ददेवश्रेष्ठ, अवयववन्तोऽपि सावयवा
अप्पि रोका; क्षित्यादयः किमजञन्मानो जन्मदीनाः । किशाञ्द आक्षेपे ।
तेन न जन्मदहीनाः कितु जन्या प्वेव्यथः । तेन सावयवत्वेन श्चित्या-
देने जन्यत्वदेतोरासिद्धत्वम् | ध्यावद्धिकार त विभागो खोकवत् इति
न्यायात् स्वसभानसन्ताकभेद्प्रतियोगितेनेव जन्यत्वनियमाच । तथा
जगतां क्षित्यादीनां भवविधित्पततिक्रियाऽधिष्ठातार कतोरमनाद-
त्यानपेक्षय छि भवति । अयक्षयेव भवतीत्य धः । तन् कायेत्वसकतेक
लयो रव्यसिचारान्नानिकान्तिकस्वं देतोः। तथानी शो चा इदवरादन्यो
वा यदि कुयौत्तरि ुवनजनने कः परिकरः का खाम्री ।अनीदवरस्य
स्वरारीररचनामप्यजानतो विचित्रचतदेस्ुवनरचनाऽससवददवर
पव रचनां कसेतीव्यथैः । परिकरामिति पाटे को वानीदवरो शुवन-
जनने परिकरमारम्भं कयत् । अपि त्वीद्वर एव छ्योदित्यथेः । पत
नाथौन्तसर्ता परिहिता । एवमद्मानदोषावद्धल्य राङ्कितदोषान्तरं नि-
राकु्वन्नुपखदरति-यत इति । यत एवं सवेभ्रमाणसिद्धस्त्व, अतस्ते
मन्दा मूढा नतु विद्धंखः इमेये त्वां प्रति संशोरते सदेदवन्तः कि-
सुत विप्यवन्तं इत्यथः । 'जन्मायस्य यतः इति न्यायेन यतो वा
इमानि भूतानि जायन्ते । यन जातानि जीवन्ति, यलप्रयन्स्यभिसंवि-
दान्ति । तद्भय आनन्दो ब्रहेति व्यजानात् इत्या दिशरुतिरेव परमे वरे
रमाणम् । अजुमानं व्वचक्कं तकमा श्चुतन स्वातन्ञ्येण प्रमाणसित्ति
ष । ह र्पिक्षेऽप्यचम् ॥ 2 ॥
२४ ` ` शिवमदिन्नस्तोत्रम् ।
` -+ सस्कृत का श्र
पूर्वोक्तमेव व्यञ्जयति । ( अमरवर ) दे सुरशेष्ठ ! देवाधिदेव ।
ˆ महादेवेत्यथेः (अवयववन्तोऽपि) अङ्खोपाङ्कखमन्विता अपि (खोकाः)
भुवनानि ( किं ) कथं वेति पृच्छायां ( अजन्मानः ) जन्मरहिताः
खन्ति किमेतेषां जन्म न विद्यते ? यतः सावयवत्वन्तु जन्मत्वाव-
च्छिन्ञमेव यथा घटपटादयः, तद्वत् खोका अपि सावयवा, तर्हि
सावयवत्वाद वदयमेव तेऽपि जन्मवन्त श्ययेव सिद्धम् । पवमेव
( मवविधिः ) खजनकमोपि ( जगतां ) लोकानां ( अधिष्ठातारं ) .
चेतनस्वरूपं निमित्तकारणं इदवरं ( अनादृत्य ) तिरस्कृत्य अनये- `
क्येत्यथेः ( कि ) इति भदने ( भवति ) भवेतुमरति
कतोरं खष्टिभेवति कि ? तथाच दिक्कारुधमौधमे परमाण्वादीनि
चेतनाधिष्टानस्वीरूतान्येव स्वकार्योत्पसो भवसर न
( वा ) अथवा ( अनीशः देदवरत्वहीनः ` दैदवरमिन्नो महदै्व््यब-
दितः कश्चित् ( कुयात् ) कत योग्यो भवेशेत् तदा तस्य ( भुवन
जनने ) कोकखष्ठो ( कः ) किं रूपः ( परिकरः ) सामग्री, पगा.
गाज्रिकाबन्धो वा, कृ-विक्षेपे ।-हत्यस्माद्धातोः ‹ कोर ह
५७-हत्यपए्-प्रत्ययः । अथवा पुंसि संज्ञायां घः पायेणः ङः । ३।
११८-इत्यस्मात्घ-प्रत्ययेऽपि रुपासिादधः । तथाच ः ।ओ
ष {ज
2 (~ ॐ
अथाद्कनव
“भवत्परिकराब्राते, पर्य्यङ्कपरिवारयोः ।
प्रगाढगाश्रिकावन्धे, विवेकारम्भयोरपि |" इति विश्वप्रक दाः ।
अथवा-“यज्ञारम्भौ परिकरो "-इतितिकाण्डशेपोतः क
( यतः ) यस्मात्कारणात् ( इमे ) पूरवोकतमतवादिन, ऽर्थो प्राह्यः
~ प [क्च ० ‡ 1
मूढबुद्धयः ( त्वां भरति ) भवतो विषये ( संशेरते , ^ द ४८५
न्तीति । अत्र विनेवेदवरं न. कोऽपि खष्टिकमीणि सन्देह ति
निरूप्य तन्निमित्तकाऽखिखोऽपि सन्देहो दरीङृत 5, समथ
रयवधेयम् ॥६॥
संस्कृत-भाषायकाभ्यां सवटितम्-- २४
& सस्कृतपयानुवादः
भूत्वा कथं सावयचा स्तु लोका, अञजन्मिन स्सन्ति कदापि वाच्याः।
जगन्नियन्तु श्च निरादरेण, कश स्वयं जन्म ( सृष्टि) विधिक्रमो वा ॥
भवेद नीशो भुवनादिखष्टो, कथं समथः परिचिन्त्य मेतत् १।
हमे मदामन्दतमा यतत स्ते, संरते त्वां प्रति देव. दव ! ॥ ६॥
< माषारका श
( अभरवर ) हे स्वेदेवश्रषठ । महादेव ! ( अचयववन्तोऽपि }
समस्त अंगो से परिपूणे रहनेवाठे भी ( लोकाः ) त्रिभुवन ( कि )
क्या ( अजन्मानः ) जन्म से रहित ह १ अर्थात् कया इन सव भुवना
का जन्म नर इञ हे, आपसे आएपदी उत्पन्न होगये दै, ( भवः
इबिधिः) सृष्टिका कमे. ( जगतां अधिष्ठातार ) समस्त लखोकाके
नियन्ता जगदीश्वरको ( अनाद्द्य ) म्रनने के विना ( कि भवति)
हे (वा ) अथवा ( अनीशः ) हृदवरसे भिज्ञ, यदि
क्याहो सकतादहं
कोई ( कर्य्यात् ) खट करे तो (मुवनजनने) खसार कणं स्ट रच
ज्य, उसीकी ( कः परिकरः ) कौनसीं सबमश्री | मसाला ] हे
( यतः ) जिसके लिप ( दमे मन्दाः) ये सव मतिमन्द् (त्वां भरति स
करने गते है । भाव षह हे कि-जि-
` श्चेरते ) आपके ऊपर सन्देह 4
सर्म अग दोते ह वह जन्मधारी होता हे अत श्रय थे, उव् चादौ
[ अथवा असंख्य । ब्रह्माण्ड अङ्गयुक्त दोनेस अवदयमेव जन्मवन्त ही
ड-क्योकि जगत्कतो के विना दसरा कई कसं खष्टि रचसकूता हे १
यदि मान लिया जावे कि ईंदवर से भिन्न कोई दूता हा खष्टिकती
हेतो वतलाना चारिष्टं कि उसके पाल कोन, क्तेनसी ख।मभ्रियां
द-? अथोत् वद भीं कटां वेठकरर देखा रूप धरकर पव कौन से
~ (>. : + ८ & ५
वस्तुओ को टेकर खष्टि रचत क त ह
फिरये खव मूख आपद्ीक विषयम क्या सन्देह करते है-इस-
से यह सिद्ध होता हे कि आपह खष्टि रचने वाले हं । इस इराक-
भ
= इससत पिये “किमीहः” (५) इलोक की करी हु समस्त शका-
(-:
२६ शिवमदहिन्नस्तोत्रम् |
ओका युक्ति पूर्वक समाधान करदिया है-ओर उक्त कुतर्कोका
तकी द्वारा खंडन करके सावयवत्व होने से जन्मघारी दोनाभी
सिद्ध करदिखाया है ॥ ६॥ ॑
= माषापयानुवादः +
अन्म खृहे विन खोक किमि, अवयव युक्त खात १।
॥ ध " ऋ अ.
| | विनि विधाता के खजे, कैसे जग बवनिजात ॥
~ विचु जगदीसे को रहत, उद्यत सजेन ( सष्ठी ) माहि १।
मादेव ! तुम चै करत~संसय मूढ बुद्चां ( वता ) हि ॥ ६ ॥
जमकर वयश्व 2 ~ ~
‰ भाषाविम्बम् श्ट
विना लीन्दै जन्तै सकट जग कर्यो अंग धरई £
भखा कैसे कता विनहि सव खष्टी वनिगई ?।
विधाता जो नादी खजन गि को उद्यत रहै ?
= [५
तवी ये अज्ञानी क (ध)रत बहु सन्देह तुम पै ॥ ६॥
वरय सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णव भिति
अभिन्ने भस्थाने पर मिद् मदः पथ्य मिति च |
रुचीनां वेचिन्या दज्ुकुटिरनानापथजषा.
छरणा मेको गम्य स्त्व मसि पयसा मणव इव ॥७॥
ॐ मधुघूदनी टीका +
पव तावन्परतिकूरतर्क परिहृत्य | भगवद्धिमुखान्निरस्य सर्वषां 1
य्ि्स्थानाना भगवत्येव तात्पर्य साक्षारपरम्परया वेति घद्
न्स्ताीति- 1
सस्कृत-भाषारीकाभ्यां सवटितम्- २७
कैत्रयीति # । हे अमरवर, नाना सकीणीः पन्थानः नानापथाः ऋज- `
घश्च कुरटिकश्च कलुक्रिलाः ऋजुकुरिखाश्च ते नानापथाथेति ऋः
जकारलनानापथास्ताज्जुषन्त भजन्तीति तथा तेषां चणामधकाय-
नध्रिकारिसाधारणानां तत्तत्साघनावुषठानैः साक्षात्परम्परया वा
त्वमेवेको गम्यः प्राप्यः नत्वन्यः कथिदैत्यर्थः 1 अत्र दष्टान्तमाह-
पयसामणव इव । यथा ऋल्चुपथजुषां गङ्गानमंदाददीनां साक्चादेव समु
द्रः प्राप्यः, यथावा कुटिखुपथजुषां यसुनासरय्वादीनां गङ्ादिः्रवे
श्द्धारा परम्परया, पव बरेदान्तवाक्यश्रवणमननादोनेष्ठानां साश्चात्व
प्राप्यः, अन्रेषां त्वन्तःकरणट्युद्धि तारतम्येन परम्परया त्वमेव भ्रा
व्यः । चतत्वनैव मोक्षयोग्यत्वात्परमात्मभ्युपगमाच्चत्यथेः । नचु-
जमा साति तं विहाय किमिति कुटिकमागे भजन्ते ऋञ्चमागेस्येव
क्ीघ्रकलदायित्वादित्यत आह । प्रभिन्ने प्रस्थाने इदं परं पथ्यं अदः
परं पथ्यमिति च रुचीनां वेचिञ्यात्तस्मिस्तस्मिडशासखप्रस्थाने इद-
मैच धरष्ठमिदमेव मम दहितामतीच्छाविशेषाणामनेक्प्रकारत्वात् भा-
ग्मवीयतत्तत्कर्मवासनावदन ऋजुत्वकरिखत्वनिञयासामथ्यात्छटि-
टेऽपि ऋञभ्ान्व्या भ्रवतंन्त इत्यथः । प्रस्यानभदमव दशयति , च-
यी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति । स्वेशाखो पलक्षणमेतत् ।
तथाहि घ्रयीशब्देन वेदत्रयवाचिना तदुपलक्षिता अष्टादशा विद्या
अप्यज्न विवक्षितः । तत्न ऋण्वेदो यज्छवेदः .सामेवदो$ धवेवेद् इति
वेदाश्चत्वारः शिक्षा कल्पा व्याकरण निसुक्त छन्दा ज्योतिषमिति ।
वेदाङ्गानि ष् 1 पुसखाणानि न्यायो मीमांसा धमेराख्ाणि चति चः
त्वायुपाङ्गानि । अननोपपुराणानामपि पुराणष्वन्तभोवः । वेरोषिकशा-
खरस्य न्याये, बेद्न्तशाखरस्य मोम स्पयाम्; सदपित मरणम
साखडयपातञ्जलपाश्चुपतवेग्णवादाना च धमेशासरेष्विति मिरित्वा
चतुदश विद्याः। तथा चोक्तम् “ुखाणन्यायमीरमासाधमशाखाज्गामश्चि
ता: । वेदाः स्थानानि धेयानां घमस्य च चतुदश! इति। पता प्व चत्-
अिरुपवेदैः सादिता अष्टादश विद्या भवान्त । आयु चद] धवेदो गान्धकै-
वेदोऽथदणद्ं चेति चत्वार उपकबेदाः। ता एता अषाद् य वद्या सां
ख्यमित्यनेनोपन्यस्ताः । अन्यथा = नताश्रसङ्ञात्। सवेषां चास्तिकाना-
न्नेतावन्त्येव चाखयध्रस्थानानि। अन्येषामन्यकद्!रनामेष्ववान्त मावत् ।
ननु नास्तिकानामपि प्रस्थानान्तराणि सन्ति तेषामेतेष्वनन्तभोवा-
पाता
२८ ` ~: शिवमहिश्स्तोत्रम् |
त्पृथग्गणयितुमुचितानि । तथाहि शल्यवदिनेकं प्रस्थानं माध्यमिः .
कानाम् । क्षणिकविज्ञानमाज्चदेनापर याोगाच्ाराणाम् । ज्ञानाकारः
् ७ , १ (न -
चुमेयक्षणिकबादह्याथवदेनापर सोजान्तिकानाम् । पत्यश्चरूवलश्चणः-
क्षणिकबाद्छाथवष्देनापर वेभाकिकानाम् ! पव सौगतानां भरस्थानच-
वुष्टयम् । तथा देहात्मवादेनैकं स्थानं चावकाणाम् । पव द् दातिरि-
त्देहरपरिणामात्मवचदेन द्वितीय प्रस्थान दिगम्बराणाम् । एवं मिलि
त्वा नास्तिकानां कटू प्रस्थानानि तानि कस्मान्नाच्यन्ते । सत्यम् ।
वेदवाद्यत्वात्तु तषां म्छेच्छादिभ्रस्थानवत्परम्परयापि पुरुणा थीनुप-
योगव्वादुपेक्षणीयत्वमेव इह च खाक्षाद्वा परम्परया वा पुमर्थोपयो-
गिनां वेदोपकरणानांमच भस्थानानां भदो दर्दितोऽतोन न्यूनत्वङा-
वकारः ॥ अथ खक्षेषेणेवां प्रस्थानानां स्वरूपमेदहतुः प्रयाजनसेक्
- च्यते बारानां व्युत्पत्तये । तत्र धमै बरह्मप्रतिपादकभनपोरुवयं खम्भ
णवाक्ये वेदः । स च मन्व्राह्मणात्मकः । तञ मन्त्रा अचुष्ठानकारण-
भरत द्वव्यदेवताधरकाचशकाः तेऽपि चिचिधाः । चद्रग्यज्ञः खामभदात्।
[< क,
त्र पाद्वद्धगायञ्यादिच्छन्दोविशिष्ा ऋचः “अ्िमीरि पुरोदितम्
इत्याद्याः । ता एव गीतिविरिष्ठाः सामानि । तदुमयविटक्चणानि य.
= {£ १ द रि > ¶्चि ते ~ $ [3 ।
युर 1 त्त्रा ^~ [+
वि 21 २ । तव निरूपिता मन्त्राः बाह्यमिति
विधिरूपम् ,अथवादरूपम्, तदुभयविलक्षणं च । कर
¢^ (= ~ ^~ (~ ' तज राल्द्भावना
विधिरिति भाट्वाः। नियोगो विधिरिति माभ ती
~ =) 2. कराः । इण्साधन
विधिरिति तार्किकादयः । सर्वो विधिरपि चतुर्विधः । उत्पच्यधिका-
रविनियोगमेदा | = ह ताव: । ऊत्पत्या ॑
शत क माचरबोधक्रो विधिरुत्प-
त्वापः । सत्ति (२णकरतव्यता-
कस्य करणस्य यागादेः फटसम्बर धवोधक्रो सत्ति ( स्क तेठ >
५ 5 3 स . वक.धरधिक्रारविधिः
द्रापूणमासाभ्यां स्वगैकामो यज्ञत इत्यादिः । क ~
विधिर्विनियोगविधिः वीहिमि्यैजञत', "समिधो दः व
साङ्खपध्यानकमेधयोगेक्रवोधकः पूरव विधि्रयमे व ४ विधिः।
थ © १ "11 # 4
खच श्रौत इत्येके । कटप्य इत्यपरे ॥ क्स्व भ ध 9.
£ € [क
णकम अथकमे च । तञ क्रतुकारकाण्याधित्य विरि 9 क । त-
^ क (~ _ (~ _ 4
दपि चतुवधम् । किकः न नर
९ ~ ६: । त् व् ५
(९) "तजर कमेस्वरूप' इति पाः । (२) इतिकतेव्यताढ् गक
(गस्य, इति पाठः ।
सस्कृत- माषाररीकाभ्यां सवङितिम्- २2. `
ह्वणोऽश्चानादधात, यूपं तश्चति' इत्यादावाधानतक्षणादिना सस्का-
रविदषविदिष्टाशरियूपादेरत्पात्तः । स्वाध्यायोऽध्यतव्यः” “गां षयो
दोग्धि" इत्याद्ावध्ययनदोहनादिना विद्यमानस्यैव स्वाध्यायपयः-
प्रथतेः भ्रसिः। "सोममभिषुणोति", “वीदीनवहन्ति" "आज्यं विखा-
यतिः इत्यादावभिषवावधघातविकापनेः सोमादनां विकारः । बीही-
प्रोक्षति, पल््यवेश्चते' इत्यादौ धरोश्चणविक्षणदिभिरव ह्यदि द्रज्याणां
सस्कारः । एतच्तुष्टय चाङ्गमेव । तथा करतुकारकाण्यना्रेस्य
तमभ॑कमे । तच्च द्विविधम्। अग आधान च । अन्याथमज्गम् । अ-
नन्या श्रधानम् । अङ्गमपि दिविध संनिपत्योपकारकमारादु पकारक
च । तत्र प्रधानस्वरूपनिवाहकं प्रथन , यथाऽवहननप्रोक्षणा फलोप
कारि । दवितीयं यथा भ्रयजााद् । पव सवूणाङ्गल युक्ता विधिः प
तिः । विकलाङ्गसंयुक्तो विधिविरूत, । तदुभयविलक्षणो विधिदवीः
होमः । एवमन्यदप्यूह्यम् । तद निरूपितो विधिभागः । आशस्त्यः
निन्दान्यतरलश्चणयां विधिरोषभूत 9 । स च तरिविधः
गुणवादो ऽचवादे सू । ध 4
को गुणवादः 'सादित्यो यूपः हत्याः । न
ऽयुवादः अ्निहिमस्य न | ४
{~ = ाभबोधको वादः शन च्छत्" इत्या-
सिरता रभे यण ; स्यादनुवादाऽवधारिते । भूताथै-
(८ शवादाख्लधा मतः" इति । तत्र तरिविधानामप्यथवाद्ा-
म् । ्ेवताप्विकरणन्यायात् । अ त
रम् । तच्च बाधित विषयत्वाञज्ञापकत्वाच नं गुणवादाचुवादयोः +
ण
भूताथवादस्यतु ~
हन्यते । तदेवे निरूप
विदि
बादस्तद्धानाद्
स्वाथ तात्पथरहितस्याप्योर्सणिकं प्रामाण्यं न विः
तो ऽधेवादभागः। विध्यथेवादोभयविलक्षणं तु
ह क ध 4 ड
~ वेऽप्यजष्ठनाप्रतिपादकत्वान्न कि
` वेदान्तवाक्यम् । तखचाज्ञातज्ञापकत्वऽ°4ख ५ द् चान्न
धिः। स्वतःपुरषाथपरमानन्दक्ञानातम नता स्वाथ उपक्रमोपसंहा-
रादिचड्वधतात्पथलिङ्गवत्तया स्वतः प्रमाणभूत सवोनपि विधीन-
९ ~
भ
[ दय >र 1 [ड ध
न्तः करणद्ृरद्धद्वास स्वंशषतामापादयदन्यरोषत्वाभावाच्च नाथे
नि पणाकाग
(१) 'स्वार्युऽपि' इतति पाठः। | |
६० `. क्षिवमहिन्नस्तो्रम् ।
घादः तस्मादुभयविरक्षणमेव वेद्रान्तवाक्यम् । तच्च काचिदज्ञातः
क्षापकत्थमात्रेण विधिरिति व्यपदिदयते । विधिपदर।हितमपि परमाः
णवाक्यत्वेन च क्चिद्भूताथेवाद इति उधषह्ियत इति न दोषः ।
तदैवं विध निरूपित ब्ाह्यणम ॥ पवं च कभकाण्डब्रह्यकाण्डात्म-
को वेदो घमौथकाममोक्चदेतुः । स॒ चं प्रयोगत्रयेण -यज्ञनिवीदार्थम
ग्यजुः सामभेदेन भिन्नः । तज दौ्रप्रयोग कग्ेदेन आध्वश्रवप्रयोगो
यलुरदेन, ओद्धात्रप्रयोगः सामवेदेन । ब्राह्मयजमानप्रयोगो त्ववा
न्तर्भूतौ । अथवैवदस्तु यज्ञाचुपद्चक्तोऽपिः शान्तिकपौष्टिकाभिचारि-
कादिकमेप्रतिपादकवेनात्यन्तत्रिठक्षण. पव । एवंच प्रवचनमेदासयः
तिबेदं भिन्ना भूयस्यः शाखाः । एवं च कमंकाण्डे व्यापारभेदे ऽपि(९)
सबीसां वद शाखानामेकरूपकत्वमेव ` ब्रह्मकाण्डमिति चतुणी वेदानां
प्रयोजनभेदेन मेद उक्तः ॥ अथाङ्गानामुच्यते । तञ्च शिक्चाया उदा
त्ताजुदात्तस्वरितडहस्वदीषेष्ट्ुतादिविरि्टस्वरव्यञ्जनात्मकवर्णोचचा-
रणाविशषज्ञानं प्रयोजनम् । तदभावे मन्बाणामनथेकफरत्वात् । त-
था चोक्तम्-“मन्ञो दीनः स्वरतो बणतो वा मिथ्या प्रयुक्ता न तम-
थेमाह । स वागवज्ञो यजमानं हिनस्ति यथन्द्रराज्रुः स्वरतोऽपराधा
त् इति । तत्र सवेवेदसाधारणी शिक्षा अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामि' इत्या
(२)दिनवसखण्डात्मिका पाणिनिना प्रकाटिता । प्रतिवेदशाखं च पि
श्नरूपाः । प्रातिदशाख्यसंज्ञिता अन्येरेव मुनिभेः प्रदिताः। प्वं वे
दिकपदसाधुत्वक्ञानेनोदादिकं व्याकरणस्य प्रयाजनम् । तच्च "ज्ाद्धे
रादैच्" इत्या्यध्याया्टकात्मक महेरवरप्रसदिन भगवता पाणिनिने
च प्रकादितम् । तन्न कात्यायनेन मुनिना पाणिनीयसूत्रेण वातिक
विरचितम् । तदद्धार्तिकोपरि च भगवता पतञ्जलिना महाभाष्यमा-
रचितम् । तदेतज्जिमुनिव्याकरणं वेदाङद्कमादेडवरमित्याख्यायते । कौ
माराददन्याकरणानि तु न बदाङ्गानि कितु छोकिकप्रयोगमाचज्ञान।
थानीत्यवगन्तन्यम् । पव शिक्षाव्याकरणाभ्यां बणच्चारणे पदसा.
धुत्वे च क्ञाते वैदिकमन्तपद।नामथ्ञान(काष्कायां तद मगवता या-
स्कन समाञ्नायः संमान्नातः( स व्याख्यातव्यः) इत्यादि योद
शाध्यायात्मक निरुक्तमाराचितम् । तत्र च नामाख्य्राततनिपातापस-
- खगभेदन चतुर्विधं पदजातं निरूप्य वेदिकमन्त्रपदानाम्थैः प्रदिी
(५) 'घबात्मन' हति पाठः । (२) पञ्चलणड। भिक" हति ५।ढः: ।
धे = 8 प | -"~----~ -- 97 न क -8 ॥ - ति, ऋ /| 3 ४० ॐ - | _ (7 |
` संस्कृत -भाषार्टीकाभ्यां संवकितम् । ३१
| च । भन्त्राणां चायेयार्थप्रकाद्ानद्वारेणेव करणत्वात्; पदाधज्ञएना-
नर्वाञ्च घाकयाथन्ञानस्य ` मन््रस्थपदाथन्ञानाय निरुक्तमवदयमपे-
म् । अन्यथाचुष्ठानासंमवात्। खण्येव जर्भरी तुफरीतून इत्यादी-
तेदुरूदाणां भरकारान्तरेणाथज्ञानस्यासभावनीयत्वाच्च पव निः
चण्ट्वादयोऽपि वेदिकद्रव्यदेवतात्मकपदा्थैप्यायशब्दात्मका ` नि-
`रक्तान्तभूंता एव । तन्र्षप निघण्डुसन्ञकः पञ्चाध्यायात्मको ` भ्रन्थो
गता यास्केनवः छतः । अन्येप्यमरदेमचन्द्रादिभ्रणीताः कोषाः
सभे निघण्टुरूपत्वन निरूक्तान्तगेता द्रष्टव्याः 1 पवस्ड्न्बाणां पा-
द् वद्धच्छन्दोविदाषविरिश्टत्वात्तदज्ञाने च निन्दाश्रवणाच्छन्दोविज्े-
षनियित्ताजुष्ठानविदेषविधानाच्च छन्दोक्ञानाकाङ्घायां तत्प्रकार
नाय भ्धीश्रीखीम्ः इत्याद्यष्टाध्यायात्मिका शन्दोविचितिभगवता
पिज्ञलनगिमस विरचिता । त्र “अथ लौकेकम् इत्यन्तनाध्यायच-
ण गायञयुष्णिगचष्टुञजरह तीपद्धचरिष्टुन्जगतीति सप्त छन्दा्ति
सवोणि सखावान्तरभदानि प्रसङ्कान्निरूपितानि । “अथ लोकिकमः
इत्यारभ्याध्यायपञ्चकेन पुराणेतिदहासादावुपयोगिनि लोकिकानि छ.
न्दौस प्रसङ्गान्निरूपितानि व्याकरणे छोकिकपदानिरूपणवत् । एवे वे-
दिककमाङ्गददादिकालज्ञानाय ज्योतिषं भगवतादित्येन गगोदिभिख्च
प्रणीतं बहुविधमेव । प्वं शाखान्तरीयगुणोपसंहारेण वैदिकायु्टान-
कमविरोषन्ञानाय कट्पस्ुत्राणि । तानि च प्रयोगच्रयभेद्ाश्चिविधानि ।
तज्ञ हौ्रप्रयोगप्रतिपादकान्यादवलायनसांख्यायनादि्रणीतत्नि ।
अ(ष्वथवप्रतागध्रतिपादकानि बोघायनापस्तम्बकःव्यायनाादेप्रणीता-
नि । ओद्धाजध्रयोगभ्र'तिपाद्कानि तु (१ )खास्वायनकरीह्यायणादिमि ;
भर्ण।तानि । प्व निरूपितः षण्णामङ्गानां प्रयोजनभद्ः ॥
चतुणीमुपाङ्गानामधुनोच्यते । तत्र॒ सगेप्रतिसगेवेशामन्वन्तरवशा-
चचरितघ्रतिपादकानि भगवता बादरायणेन कृतानि पुराणानि ।
तानि च ब्राह्यं पाद्मं वैष्णवं दवं भागवतं नारदीयं माकेण्डेय
आनेय भविष्यं बह्मवेवर्ते छेङ्घं वाराहं स्कान्दं वामन को मात्स्यं
गारुडं ब्रह्माण्डं चत्यष्टादश्च । पएवसुपपुराणान्यप्यनेकप्रकाराणि द्र्ट-
ध्यानि ॥ न्याय आन्वीक्षिकी पञ्च।ध्यायी गोतमेन प्रणीता । भमाण.
4 'ल।द्यायनद्राद्यायगादोभेः' इति पड. ।
३३ । 7 रिवमदिन्नस्तोत्रम् ।
प्रमेयसंरायप्रयोजनद ्टान्तल्तिद्धान्तावयवतकनिणयवादजस्पवितण्डा-
हेत्वाभासच्छल जाततिनिग्रहस्थानाख्यानां ` षोडशापदाथीनामुदेदालक्ष-
| णपरीक्षायिस्तत्वज्ञान तस्याः प्रयोजनम् । पव दराध्यायं वेदरोषक-
| शाख कणादेन प्रणीतम् । दव्यगुणकमेसामान्यावल्ञेषसमवायानां
षष्णां ` ` भावपद्ायोनामभावसक्तमानां साघम्येवेध्म्योभ्यां ब्यु-
त्पादने तस्य प्रयोजनम् । पतदपि न्यायपदेनोक्तम् ॥ प्व मीमांसापि
दविधा ) कममीमांसा शारीरकमीमांसा च। तत्र द्वाददाध्यायी
कमेमीमांस्वा .अथातो धम्जिज्ञासा' इत्यादि अन्वाहार्य च द्रोनात्'
इत्यन्ता भगवता जेमिनिना प्रणीता । तत्र धर्मप्रमाण१, घ्ममेदाभेदोर,
शेषशेषिभावः ३; ऋत्वथपुरुषाथेभेदेन परयुक्तिविदोषः ४, श्रुत्य्ै-
पाठनादिक्रमभेदः ५५ आधकारविशेषः ६, सामान्यातिदेशः ७,
विदेषातिदेच्छः <, ऊहः ९» वाधः १०, तन्त्र १९, प्रसङ्गश्च १२.
इति क्रमेण द्वादशानामध्यायानामथौः। तथा च सकषैेणकाण्डम-
प्यध्यायचतुष्यात्मकं जेमिनिना प्रणीतम् । तच्च देवताकाण्डसंज्ञया
परसिद्धमप्युपासनाख्यकमेप्रतिपादकन्वात्कर्ममीमां सान्तगेतमेव ॥ त-
था चतुरध्यायी शारीरकमीमांसा “अथातो ब्रह्मजिज्ञालाः इत्यादिः
अमाच्रत्तिः शब्दात् इत्यन्ता जीवब्रह्यैकत्व साक्षात्कारे तुश्रवणा.
ख्यविचारथतिपाद्कान्न्यायायुपदशयन्ती भगवता बाद्रायणन छर.
ता। तत्र सवंषामपि वेदान्तवाक्यानां साक्षात्परम्परया वा पत्य-
गभिन्नाद्वितीये ब्रह्मणि तात्पयमिति समन्वयः प्रथमाध्यायेन भद्
शितः । तञ्च च प्रथमपादे स्पष्व्रह्मालिङ्गयुक्तानि वाक्यानि विचारि.
तानि द्वि्त\यपादे त्वस्प्टबरह्यछिज्गयुक्तान्युपास्यबह्मविषयाणि । चृ-
` तीयपादे $स्पष्ब्रह्मलिङ्घान प्रायशो ज्ञेयब्रह्मविषयाणे । पयं पादज.
येण वाक्यविचारः समापितः ।. चतुर्थपादे तु प्रधानाविषयःवन सख.
दिह्यमानान्यन्यक्ताजादिपदानि चिन्तितानि ॥ प्व वेदान्तानामद्धये
जह्मणि सिद्धे समन्वये त रूम्भावितस्शतितर्कादिविरोधमाराङ्ख तत्प.
रिहारः क्रियत शव्यावेरोधो दितीयाध्यायेन द्प्ीतः। तचाद्यपादे
सांख्ययोगक्राणाद्ादिस्छतिभिः सांख्यादिषयुक्तैस्तरकैश्च विरोधो वे
द्न्तसमन्वयस्य परिहृतः । द्वितीये पादे सांख्यादिमतानां द्टन्व
प्रतिपादित, "ऋनकर
चारस्य । ठृतीये पाद् महाभूतर्ष्ट्याद्श्चतीनां परस्परविरोधः पूरैः
सस्कृट-भाषारीकाभ्यां सवरितम्- ३३
भागिन पारेहतः । उत्तरभागेन. तु जीवविषयाणाम् । चतथेपदे
इन्द्रिया विषयश्रुतीनां विरोधपरिहारः ॥ तृतीयाध्याये साधननि-
रूपणम् । तच प्रथमपादे जीवस्य परलोक गमननिरूपणेन वैराग्यं नि-
रूपितम् । द्वितीयपादे पवेभागेन त्वपदाथः रोधितः । उत्तरभागेन
च तत्पदार्थः । तृतीयपादे निगुणे बह्यणि नानाच्ाखापाठितः पुनख-
्तपदोपस हारः कृतः । प्रसङ्गा सगुणवियासु शाख।न्तरीयगुणोप-
खहारायपसंदारो निरूपितो । चुथंपादे निगैणत्रह्मविद्याया बहिर
ङ्गसाघनान्याश्रमध्रमेयन्ञदानादीनि, अन्तरङ्गसाधनानि शमदमनदिः
ध्याखनादीनि च निरूपितानि ॥ चतुर्थेऽध्याये सगुणनिगुणाकेचयोः
फट विोेषनि्णयः छतः । तत्र प्रथमपादे ्रवणाद्ाचच्या नियोणं जह्य;
उपासनावृया सगुणं वा ब्रह्म साक्षात्छृत्य जीवतः पापपुण्यारेपल
क्षणा जी वन्मुक्तिरभिदहिता । द्वितीयपादे च्रियमाणस्योत्करान्तिभ्रकार-
श्चिन्तितः । ठृतीयषादे सगुणब्रह्मविदो शखतस्योत्तरमा्गाऽभिदितः ।
चतुथैपादे पूवेभागेन निगंण ब्रह्मविदो विदेदकेवव्यभ्रासिरुक्ता । उत्त
रभागेन सय॒णनब्रह्मविदो ब्रह्मरोके स्थितिरुक्तेति । इदमेव स्ेशा-
द्राणां मूधेन्यं, शाखान्तर सवेमस्थैव रोषभूतमितीदमेव सुमुश्वभि
रादरणीयं श्रींकरभगवत्पादोदि तप्रकारेणेति रहस्यम् ॥ एवं धम-
क्ाख्ाणि मयुयाज्ञवल्क्यविष्णुयमाङ्गिरोवसि्ठदक्षसंदतेखातातपप-
राद्यरमोतमश ङ्गखिखितदारीतापस्तम्देशनोग्यासकायायनचरहस्प-
` तिदेवरनारदपेटीनसिप्रश्चातिभिः कृतानि वणाश्रमघमेविश्चेषाणां विभा-
नन ्रतिपादकानि । एव व्यासकृतं महाभारतं, वाल्मीकिरतं रामा |
यणं च धर्मदास पवान्तभूतं स्पध्रमितिदासत्वेन प्रसिद्धम् । सांख्या- |
दीनां धर्मेशाखान्त मोवे$पीह स्वशब्देनैव निर शातणथगेव संगतिवौ-
च्या । अथ वेद्चुष्टयक्रमेण चत्वार उपवेदाः । _ तत्रायुवेदस्याष्टौ
स्थानानि भवन्ति सूत्र सारीरमेन्द्रियं चिकरिव्ला नदान विमानं क-
टपः सिद्धश्चति । बह्मप्रजापद्यरिवधन्वन्त यीन्द्रभरद्वाजात्रेयाभ्चिवे-
इयादिभिरूपदिश्रकेण संक्षिप्तः । तत्रैव खुश्वतेन पञ्चस्थानात्मक
प्रस्थानान्तर कृतम् । एवं बाग्भटटादिभिरपि बहुधति न राखमेदः ॥
कामराख्रमप्यायुवदान्तगेतमेव । खश्चुतेन वाजीकरणाख्यकामरा-
खाभिधानाव् । तच्च बारस्यायनन पञ्चाध्यायात्मकं कामदाखं परणीत-
म् । तस्य च विषयवैराग्यमेव पयोजनं, राखोद्ीपितमाभणापि वि.
९
६४ ` शिवमहिश्नस्तात्रम् ।
धयभोगे दुःखमात्रपयैवसानोत् 1 चिकेत्सादा{खस्य च रोगतस्साः
धनरोगनिजरत्तितत्साधनन्ञानं प्रयाजनम् ॥ पव धयुचेंदः पादचतुष्-
` यात्मको विद्वामित्रप्रणीतः। तज प्रथमा दोश्चापादः । द्वितीयः सं-
ग्रहपादः । तृतीयः. सिद्धिपादः । चतुथः श्रयोगपाद् ; । तच परथमपाः
दे धजख्लणम्िकारिनिरूफणं च कतम् । ` तत्र॒ घचुःशब्दश्चापे रू-
डोऽपि चलुवेधायुधवायी . वतेते 1 तच्च चतुविधे मुक्तं अमुक्तं मु-
क्तासुक्तं यन्त्रमुक्तं च । तज मुक्तं चक्रादि, असुक्तं खङ्गादि, मुक्तासुक्त
क्ञाट्यावास्तरभेदादिः । यन्जसुक्तं ररादि। तत्र मुक्तमखामेत्युच्यते ।
अमुक्तं राखमित्युच्यते । तदपि ब्राह्यवेष्णवपाद्युपतप्राजापत्या्चेया-
दिभेदाद्नेकविधम् । एवं साधिदैवतेषु समन्त्रकेषु चतुर्विधायुधेषु
येषामधिकारः स्षन्नियक्मासणां तद्चुयायिनां च ते सरवै चता्धाः
पद्तिर्थगजतुरगारूढ(ः दीक्ाभिषेकशाङनमङ्गककरणादेकं ` च
सवमपि प्रथमपादे निरूपितम् । सवेषां ` राखविदाषाणामाचार्यस्य
च कष्यगपूचक्त सश्रहणभ्रकारा दशितः द्वितीये पादे । गुरुसंप्रदाय-
सिद्धानां राख्रषवराषाणां पुनः पुनरभ्यासो मन्व्देवतासिद्धिकरण-
मपि निरूपितं तृतीयपादे । एव देवताचेनाभ्यासादिभिः सिद्धानाम-
र रणा भवागञ्चतुचेपादे निरूपितः । क्षत्रियाणां युद्धं द्टद-
भ्यः प्रजापालन च धलुर्वेदस्य प्रयोजनम् । एवं च जह्य.
-वजापत्वापक्रमण विद्वामिवप्रणीतं घनुर्वेदशाखम् ॥ पव गान्धर्ववे-
दशां भरतेन प्रणीतम् । तच्र चृत्यगीतवाद्यभेदेन बहुविघोऽथः प्रप
` "तः॥ दवताराघननिर्विकल्प्रकसमाध्यादि'च्चिद्धिश्च गान्धर्ववेदस्य
*गजनम् । पवमथश्ञाखं च बहाविधं नीतेदाख्रमदवराखं गजा.
ख शिल्पा सूपकारदासख चतुःषाष्टक्काराख्ं चति। ताश्चतुः
¶ध्क्लाः रेवागमोक्ताः-गितम् ६, वायम् ९, चत्यम् ३, नास्यम् ७,
आछख्यम् ५, विरेषकच्छेयम् ६, तण्डलङ्खुमवलिविकाराः ७. पुः
ष्पास्तर्णन् < द् शनवसनाङ्गरागाः ९» मणिभूमिकाकमै १०, हायन-
रचनम् १९; उद्कवायम् १२, उद्कधातः वादः १३, अदूुतदशै-
नवादता १८, माखान्रथनकस्पः १५. रख रापीडयाजनम् १६, नेप
ध्ययागः ६७, कणपत्रभङ्गाः १८, गन्धयुक्तः १९; भूषणयेोजनम् २०,
इन्द्रजाछम् २९, कोौचुमारयोगाः २२, दर्तलाघ्रवम् २३, चि जङ्ाका-
पुपमक्तविकारकरियाः२४, पानकरसरागाकल्षवयोजनम् २५, सूचा
संस्कृत-माषारीकाभ्यां संवरितम्- ३९
पकम २६, सृचक्रीडा २७; णाडमसरुकवाद्यानि २८, भहेटिकापति-
मालाः २९. दुधञ्चकओागाः ३० पुस्तकवाचनम् ३९, नाटिकाख्या-
यिकाद्शनम् ३२, काव्यसमस्या पूरणम् ३२ पष्टिकावत्रवाण विकल्पाः
३४, तककमीणि ३५, तक्षणम् ३६, वास्ताषेया २७, रूप्यरपरीक्चा
३८, धातुबादः ३९, माणरागज्ञानम् 8९, आकर ज्ञानम् ४१, चृश्चायुर्वेः
दयागाः ४२, मषकङ्क्ककुरलावक्युद्धानाधः ४२, उुकसारेकाप्रखाप
नम् ४७, उत्सादनम् ७५; केशमाजनकेरालम् ४६, अक्षरमुषटेकाकः "
थनम् ७७ स्टेकितकविकल्पाः ४८, देशभाषालज्ञानम् ४२ पुष्पश्करि-
कानिमित्तज्ञानम् ५०; यन्तरमातृका ५१ धरणमातरका ५२, असवा-
उयस्पाय्यम् मानसीकाव्यक्रियाचिकव्पाः ५२ छलितकयोगाः ५४, |
अमिधानकोशन्दोज्ञानम् ५५, क्रियाविकस्पाः ५६ ` रुितविक्रटपा |
५७, वस्मे पनानि ५<, द्ूतचिशेषः ५९. आकपेक्रीडा ६०, बालक्रौ
उन कानि ६१ वैनायकी वि याज्ञानम् ६२, वेजयिवियाज्ञानम ६३, वेता-
लिकीिविद्याज्ञानम् ६४, इति चतुः षष्टिकला नानामुनेभः भ्रणातम्।
तस्य च ख्स्य कैगिकालोकिकतत्तत्प्रयोजनमदे द्र्टभ्यः।'एवमष्टा
द हाविद्याखयीशब्देनोक्ताः ॥ तथा साख्यशाखं क।परन भगवता
प्रणीतम् । तत्र जिविधदुःखा्य्तनिच्रत्तिरव्यन्तपुरुष्राथं इद्यादेषड-
ध्यायाः । तच्र प्रथमेऽध्याये विषया निरूपिताः, द्वितायेऽध्याय परध्रा-
नकायी्ने, तृतीयेऽध्याये विषयवराग्यम्, चतुथऽध्याय 1वरक्ताना |
पिङ्गला र(९)रादीनाम। ख्यायिकाः, पञ्चमेऽध्याये परपक्षनिजयः, षष्ठ |
सर्वा्थसक्चेपः । भररूतिपुरूषविवेकन्ञानं साख्यशाखस्य भ्रयाजनम् ॥ |
तथा योगद्लाख-मगवता पतञ्जलिना भ्रणीतम् अथ यागाजुला-
सनम्, श्व्यादि पाद चतुष्टयात्मकम् । तच्र प्रथमे पादे ्चत्तच्नात्तानय
धात्पकं समाधवराग्यरूप च -तत्खाधनं नरूपतम् । द्धताय पादे |
विश्चिघ्तचित्तस्यापि समाधि्तिद्यये यमानियमासनश्राणायामप्रत्याहा-
रधार णाध्यानसमाधयोऽषछावङ्गानि निरूपितानि । ठतीायपाद् याने
विभूतयः । चपुथपादे कैवल्यमिति ( तस्य च वजातायत्रलययान् |
शेघद्वारेण निदिष्यासनसलसिद्धः प्रयोजनम् ॥ तथा पडुपातमत पा- |
श्ुपतं शाखं भगवता पद्युपातिना पड्छुपाशावेमोश्षणाय अथातः षा-
4 ~~~ ~ र~
(१) कुमारादीनां! इति पादः ।
।
३8 शिवमदहिम्नस्तोत्रम् ।
दुपतयोगतरिधिं व्याख्यास्यामः*. शइत्यादिपञ्चाध्यायं विरचितम् ।
तत्राध्यायपञ्चकेनापि कार्यरूपो जीवः पद्यः, कारणं पशयुपतिरीदवः !
योगः पञ्युपतो चित्तसमाधानं, विधिभस्मना त्रिषयणस्नानादि नर
पितः । ढुःखान्तसंज्ञको मोक्षश्चास्य भयोजनम् 1 एते एव काकार
णयोगविधिदुःखान्ता इत्याख्यायन्ते ॥ एवं शेवं मन्वदाख्यमपि पा-
श्युपतश्ाखान्तगेतमेव द्रष्टव्यम् 1 पव च वेष्णवनारदादि भिः कत
पञ्चराजम् 1 तत्र वासुदेवसकषेणप्रद्युम्नानिरुद्धाश्चत्वारः पद्ाथो निरू
पिताः । भगवान्वासुदेवः परमद्वरः सवेकारणं तस्मादुत्पद्यते संक
पेणाख्यो जी वस्तस्मान्मनः प्रद्युम्नस्तस्मादनिरुद्धोऽदंकारः। खव
चेते भगवतो वाखदेघस्येवां शभूतास्तद भिन्ना एवेति तस्य वासदेव.
स्य मनोावाकायद्ात्ताभेराराधनं कृत्वा कतछङृत्यो भवतीत्यादि च नि-
रूपितम् । पवं वेष्णवमन्बसाखरे परिमित १ मपि पञ्चरा्रमध्येऽन्त-
भूतम् । वामागमादिशाखं ठ वेदबाह्यमेव ॥ तदेवं ददतः प्रस्थान-
भदः । स्वेषां सक्षपेण त्रिविध पएव प्रस्थानभेदः । तत्रारम्भवाद् पकः+
परिणामवादो देतीयः, विवतेवादस्तृतीयः! पाथिवाप्यतेजसवायवा-
याश्चतुविंधाः परमाणवो द्यणुकादिक्रमेण ब्रह्माण्डपर्यन्तं जगदारभ-
न्ते । असदेव कायेकारणव्यापारादुत्पयत इति परथमः ताश्िकाणां
मीमांसकानां च । सत्वरजस्तमोगुणात्मकप्रधानमेव महदह कारा-
दिक्र्मण जगदाकारेण परिणमते, पूवैमपि सष्ष्मरूपेण सदेव कार्य
कारणज्यापारेणाभिव्यज्यत इति दवितीयः पश्चः सांस्ययोगपाद्युपता-
नां, ब्रह्मणः परिणामो जगदिति वेष्णवानामपि। स्वपकाङपरमान-
न्दाद्वितीयं ब्रह्म स्वमायाचशा न्मिथ्येव जगदाकारेण करप्यत इति
चृतीयः पक्षो बरह्मवादिनाम | सर्वेषां च प्रस्थानकरूणां मुनीनां
वि वतेवाद् पयेवसनेनाद्वित प्च परमेश्वर प्व ॒वेदान्तपरिपाये
4 तात्पयम् । नहि ते सुनयो स्ान्ताः ससक्ञत्व त्तेषां ` कित
११ बहिर्विषयध्रवणानामापाततः परमपुरुषार्थ भवेरो न मवतीति ना-
स्तिक्यनिवारणाय तैः प्रकारभेदाः प्रदरिताः। तज्ञ तेषां तात्य.
मवुद्धा वेद विख्द्धेऽप्यर्थे तेषां तात्पयसुस्क्षमाणास्तत्तन्मतमेवोपदि-
यत्वेन गृह्णन्तो जना कजुकुरिखनानापथज्ञुषो भवन्तीति न सर्वेषाश्च-
॑ ज्ुमागे एव श्रवेशो, नच वि(१)पर्ययेऽपि प्ररमेद्वराप्रा्षिरन्तः करण. `
क शुदधिवदेन वश्चादज्चमागाश्रयणादेवेव्यर्थः | दरिपक्षेऽप्येवम् ॥ ७ ॥
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संस्कृत- भाषारीकाभ्यां सवङितम्- ३७
ॐ संस्कृत दीका ‰६
` अधुना नास्तिकादिमतं खण्डयित्वा इंदवरसत्तासिद्धिविधाना
र्परमास्तकाना मवान्तरमवं प्रपञ्चयति । ( घरयी ) ऋग्यजस्सा-
भाक्तं श्रोतमतं ( सङ्घ ) प्ररतिपुरूषवादि कापिराखं पञ्चवि-
शाततच्वोपखन्षितं वा ( योगः ) पातञ्जकदश्नाक्तस!घनरूपो यो-
गक्रियाभ्यासः ( पश्छुपतिमतं ) हवागमोक्तसिद्धान्ताचुसारि पाद्यः
पतं मतं ( वैष्णवं ) नारदपञ्चरात्रागमादिकथितं विष्णुद्रैवतं मतं
( इति ) अनेन विधिना( प्रस्थाने ) गमनयि मागे ( भरभिन्ने ) वहुवि-
धत्वं गते सति । अहम्मन्या स्तत्तद्चुष्ठाथेनः पवं वदन्ति यत्
( इदं ) मदुक्तमेव ( पर ) सर्बोच्छृष्ं तचमषस्ति । अस्मात्परं ना-
स्ति किञ्चिदिति च ( अदः ) पतदेव ( पथ्यं ) सेवनीय, ग्राह्य वा।
पथिन् शब्दात्-“धमंपथ्यथेन्यायादनपेते--७। ७। ९२--इत्यतः
अनपेतार्थे यत् । ( इति च ) इत्येवं भ्रकारेण ( सुचीनां ) इच्छानां
( वेचिच्यात् ) भिन्नरूपत्वात् ( ऋजुक टिकनानापथज्ुषां ) सरल्व-
ऋादिभेद्ाद् नकविधमाशगामेनां, स्वेच्छाचुरूपभ्रमणकारिणां (चणा)
मडभ्या्णां, देहिना मेवेति तास्पयाथेः ( पयसां ) सवषां जलानां (अ-
णव इव ) समुद्रसमानः ( स्वं) ध्व ( पकः ) अद्वितीयः ( गम्यः )
गमना: ( असि ) विद्यसे । 11 2
तथा चोक्तमपि . मीतायाम्-“यथा नदीनां वहवोऽम्बुवेगाः,
समुद्रमेवाभिमुखा द्वन्ती-"'ति (र< अ० ११ ) एवमेवोक्तं सु-
ण्डक्ापनिषदि च-“यथा नयः स्यन्दमानाः ससुद्धेऽस्त गच्छन्ति ना-
मस्ये विहाय । तथा विद्धान्नामरूपादिमुक्तः, परात्परं पुरूषसुपेति
दिव्यमिति च <॥३ सुऽर ख०॥'
इद «“ऋज्ञकुरिरे'"-तिपदं सुचि-च-पयस्सु सवे योजनीयं
अथवा क्रूमेपुराणोत्तराधैस्थदवरगी तायां मय्येवसुक्तं यथाप्ये
यथा नर्दनदा रोके सागरेणे कतां ययुः ।
तद्ध दात्मा श्चरेणा सो, निष्कठेने कतां बजे--""दिति भावश्च-
अ०२। च्छो० ३८ । साथकत्वात् । उद्कानां खसुद्र इव सर्वेषां श्रो
ज प्राप्यस्थानं व्वमेवा सीतिच प्रकटितम्! यथाचो-
चमपि-- | |
३८ शिवमहिन्नस्तोत्रम् ।
"पक मेष परं तत्व, मभिन्नं परमार्थतः ।
| तदेव रखचिवैचिच्या, न्नानात्व समुपागतम् ॥ ” :
| पयेनासुनेव-“स्चयो विचित्राः"-अथवा-"“भिन्नसचि हि छो-
क ` इत्यादिरूपा छोकोक्तिः भसिद्धेति ज्ञेयम् ॥ ७ ॥ । |
हि
| | 9 संस्कृतपयानुवादः १९
वेदज्रयी भ्रूतिपूरूषवादि साङ्ख्ययोगः पतञ्जलछिमुने रथ वैष्णवं वा|
ख्यातं महापञ्युपते मेत मत्र खोके, भिन्नं वदन्ति खुखदं निजमाम मेव ॥
धभो | स्चीनां हि ` विचित्रतावशा, द्नेकवक्रज्ुपथध्रचारिणाम्
नृणां त्वमेको गमनीय शृदवरो, । यथा स्भसरा मर्णव पात गस्यताम्॥७।॥
यह भाषा टीका १६८
अब्र नास्तिकादिकफि मत।का यथाथ रीति से खण्डन करके
श्दवरकी सत्ताको भरीमांतिसे सिद्ध करदेने पर इदवरवादी `
आस्तिकाके अवांतर मतोंका मडन करके पेक्य दिखाते है-
(जयी) ऋग्वेद, यजुवद, पव सामवेद्-इन तीनो वेदोका कदा इ आ
भात मतत, (साङ्ख्य) कपिलमुनिका कथित प्रकृति पुरूषवादी सांख्य
शास्र का मत, ( योगः ) पतंजलि मुनिका भाषित योग शाद्यकां
मत, ( पञ्युपतिमतं ) शैवागम-इत्यादिमे अभिहित पाद्युपत मत,
प्व ( वैष्णवे ) नारद्पंचरात्रादि प्रथो उक्त वैष्णव मत ( इति )
शस प्रकारसर ( परस्थाने ) गमनयोग्य मागेके ( प्रभिन्ने ) बहुत विधौ.
के होनेपर, अपने अपने मतके असार खोग यह कहते ह कि
( इदं परं ) यही मेरा कहा हआ मत सवस उत्तम है (अदः
पथ्यं ) यही सवन करनेके योग्य हे, अथवा मागेके उपयुक्त है
( इति च ) इस रीत्तिसे ( रुचीनां वेचिघ्रयात् ) अपनी अपनी रचि.
योंकी विचिच्नतासे ( ऋंजकुटिलनानापथज्ञुषां ) सीधे आर टेदे
अनेकविधके मागेको धरकर चलने वाले ( नृणां ) मयप्योके किम्या |
संस्कृत-भाषारीकाभ्यां सवलितम्- - ३९
देहधारियोके ( पयसां अणेव इव ) सीध टेदढे मार्गमामी-ज्नोके
[ गमनीय ] समुद्र के समान ( त्वं पकः गम्यः असि ) आप अकले
पर्हुच नेकेस्थान दँ-अथोत् जसे सीधे अथवा टेढे वहनेवाके
सवी जक समुद्रम पर्हचते हैः वैसेदी इन सव श्रौत सांख्य योगा-
दिक मतके पराप्य स्थान एक मात्र आपदी हँ ज्ेखा कि कदा है-
“आकाशात्पतितं तोय यथा गच्छति सागरम् ”
अथवा-““सवकर मत खगनायक एदा । ` =,
भजिय राम पद् करि दढ नेहा ॥ ( तुऽ याऽ)" `. |
मधुसूदनी शकारम इस व्छोक पर बहुत विस्तार करिया गया | |
ह~ वेद्य बात सश्चिर रूपके उद्धृत करदी जाती दं । | |
°च्रयी--राब्दसे तीना वेद ओर उनसे उपलक्षित ` अठारह |
वियाअकोभी समञ्चना चाहिष -उसमे-कगवेदः यजुवद, सामवेद्,
अथश वेद वेद् है । शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरक्त छद् ज्योतिष
६ वेदांग । पुराण, न्याय, मीमां खा, धर्मैशाख ४.उपांग दं । इनमे
उपपुराणोंको भी पुराणो हीक अन्तगैत समञ्चना चादहिपर-तथा च
वेदोषिक दाख न्याये, वेदां तश मीमांसामे, महाभारतः, रामा-
यणः, सांख्य, योग, शेव, वैष्णवा-दिकौको धर्म॑लाख। ही में मिल:
| देनेसे १४ विच्य होती ै-इनके अतिरिक्त चार उपवेद ह-अयु-
वैद, धञधदः गान्धवैवेद ओर अथं शाख -इन स के जोडदेनेखे
१८ विचायं होती है समस्त. आस्तिककि इतन हीं राख माग हँ
ओर मी जो प्छदेशीयमत हं वे सवभी दही के अन्तरत ह । यापर |
ह दाका दै कि-माथ्यमिक ९ यगाषचारः २ खीतरान्तिक ३ वे भाषिक
५ चावीक ५ दिगम्बर ६ये छ.जो नास्तककं मत भद् है इनक! भी
करये" न्दी उठेल करादिया-“ तो इसका समाधान यह £ कि-वेदिक |
मतके विरुद्ध होनेसे स्ठेच्छादिकाके मतानुलार व सव. चारों
पुरषारथके उ प्रयोगी नहं है-इस कारणस इनको छोड देनाही |
उचित हे । अव सक्षेपते पूर्वोक्तं भर्थानकि थाड़ासा विवरण
नी लिख दियाजाता है । धमे ब्रह्म ्रतपाद्क अपसवरय प्रमाण
वाक्य वेद हे उसमें मन्त्र ओर ब्राह्मणभाग दा भद् ह् । उनम उक्त-
तीनोदी वेदों विथरे रहनेते मन्बके तीन भेद दोते है। ओर
| ्राह्मणके भी तीन मेद हैः अथीत् विध्रिरप्ः अथेवादृरूप पव उभय |
¢
० ध) शिवमदिन्स्तोचम् ।
विलक्षण । उसमे उत्पात्ति अधिकार विनियोग, ओर भयोग-के
भदस विधि चारप्रकारके हैँ । इनमे प्रयोगके भी दो. मेद है यथा
| शुणकमे ओर अथकमे उन्म गुणकर्मै-उत्पत्ति, आप्ति, विति,
ओर सरूकति के भेदसे चार श्रकारका दोताडै। यदी अथक
भदो प्रकारके है, एकतो अङ्ग, ओर दूसरा श्रध्रान, उसमे अङ्क
भीदो प्रकारके है, यथा सनिपत्ोपकारक तथा आरादुपकारक
इस भातिसे विधिभागका निरूपण दै । अब अथेवादका मेद्
कहते ह-वद तीन भरकारका है अथोत् गुणवाद अनुवाद ओर
भूताथवाद । इख रीतिसे विधि ओर् अथवाद् दोनांहीसे विलक्षण
| हानेते उभय विखक्षण वेदातवाक्य है दस प्रकारस त्रिविध ब्राह्मण
भी निरूपित इुआ। इनसच परकारांसे कमकाण्ड तथा ब्ह्यकाण्डात्मक
वेद् ही श्वमै अथे काम ओर मोश्चका कारण है वह यज्ञादिकके नियौ.
हाथ ही ऋग् , यज्ञः ओर सामक भदसे भिन्न हे, अथोत् हौ्नपयोग
ऋग्वदसे, आध्वयेव प्रयोग यलुर्वेदसे ओर ओ) द्वाचभ्रयोग सामवेदसे
होता है । बाह्म _ ओर. यजमान योग भी इसीके अन्तर्गत हे 1
अथव वेद यद्यपि यज्ञके उपयुक्त नहीं हे, तथापि रांतिक, पौशिक
आभिचारिक, इत्यादि कर्मके प्रतिपादक होनेसे वड़ा ही बिलसप
दे । इस आंतिसे भवचनके मेदसे भतिवेदमें भिन्न निका वहुतेशी
शाखायं हे । यद्यपि ` कमेकांडभ व्यापारमेद् दोना खिद्ध ॐ
तथाप समस्त शाखाअ'का एकरूपत्वही ब्रह्मकाण्ड डे-इस
पकारसे चारोदी वेदोका प्रयोजनभरसे मेद कहागया । अव
› स्वारित, हस्व,
अङ्गका कदते दै । रिश्चाका उदात्त, अयदात्त
दषे, ष्ठत इत्यादित युक्त स्वर-ओर व्य॑जनात्मकः चवणोके उच्चारण
विरेषका ज्ञान ही प्रयोजन हे। क्योकि इन सयक यथाथ ज्ञ(न
नहीं होनेसे मत्रोका अनथही फल होता है, जसा करि कहा हे
“मन्त्रो दीनः स्वरतो बणैतो वा, मिथ्या पयुक्तो न त मथ माह
ख बाग्वज्ना यजमानं हिनस्ति, यथेन्द्र रुः स्वरतो ऽपराधाल्'
अथात् स्वरसेहीन अथवा वर्णसे हीन किंवा अशुद्ध भरयोग
किया गया मन्न कदापि यथाथ नदीं हो सकता-क्योकिः वह वचन-
रुपी वज्न होकर यजमानदीको नादा करड।लता हे ज्ञ इन्द्राच
( च्रजाखुर ) स्वरहीके अपराध से स्वयं नष्ट हागया-यदह शिकला सनि.
संस्कृत-भषारीकाभ्यां सवरितम्- 4
वरपाणिनि दीने भ्रका्ित की है जोकि आजकल भ्रचङित हे-इ-
सी भ्रकारसे भ्रल्येक वेदक राखाओं पर भिन्न ` भिन्न रूपके प्रातिः
काद्य नामकी रिक्षायं अनेक मुनि्यो षषी नाई इई हे । योंही वेद
क पर्दोकी शुद्धता को जानखेनेके छिये व्याकरण शाखका योजन
हे । जिसे भगवान् मदेदवरके भ्रसादसे उही महपि पाणिनिने.आ-
ठ अध्यार्योका खू्रपाड बनाया है जो अष्टाभ्यायीके नाम सि परसिद्ध
हे, उसीपर कात्यायन सुनि ( वररूचे-जो पुष्पदन्तके अवतारः मा-
न जते हे उहो) ने वातिक निमोणकिया हे उनपर ऋषिभ्रवर ` पतंज-
लिने महाभाष्यक्री रचना की है-इन्ी तीनो खुनियो ( खुनिज्य ) के
बनयि हण ञ्याकरणको वेदाज् अथवा मद्देश्वरब्याकरणकदाजाता ह
खसे भिन्न जा दखर कौमायादिव्याकरणा ह वे वेदाङ्ग न॒ही हे किः
न्तु केव लौक्केक -भयोगोही के क्ञानाथ ह-यह समञ्चखना चाह ।
ठ इस ध्रकारसे शिक्षा ओरं स्याकरणसे अश्चवरोका उच्चारण एवं
पर्दोकी खछद्धताका ज्ञान होजाने. पर वेदके मन््पर्दोका अथे ज।ननेके
लिये यास्कसमुनिने तेरह अध्यायो म निरखुक्तकी रचना कि है जिः
मै. पद समूद को नाम, अख्यातः निपात ओर उपसगके भदसे
के
चार प्रकारका निरूपण करके वेदिक. मन््पदों का अथे ददेखलाया
हे । क्यो कि जवलो मन्जके पदोका अथक्ञान. नहीं हो ठेव तवर्लो
उसका अयष्ठान करनाही सवेथा असम्भव है जसे “सृण्येव -
री तफरी तून" इत्यादि पदक अथे समञ्चटेना किसी कार्ते
सम्भव नदीं डे-त पव वेदिक मन्तरपद्कं अथक्ञानक. चयि निः
रल परमावद्यक दै । यदी वेदक कथित दरन्य-द्वतात्मरक पदार्था
क्रे पयीय शाब्द रुप निघट हइव्यादिकभी निरुक्तहीके. अन्तभरंत ई ।
उखमे भी निधटु नामक पाच अभ्यायोक [ प्रथ पक्त यास्कमुनि-
दीका प्रणीत है-आओर इसके आतिरक्त अमराखह् अथवा हेमचन्द्र
इत्यादिके बनाये हपट कोष भी निघटुके समरूपहोनेसखे निर्कदीके
-न्तमत हे । एवे च~ऋन्वेदके मन्त्र पादवद्ध श्चन्दोविशेषसते युक्त दै
अर किखी किखी अचुष्ठानमं छन्दोविरोषदीका विधान [कया गया
हे-अत पव चछृन्दोका जाननाभी अआवद्यक इअ क्योकि बिना
(3 € ^ न्न (> [निः [* 4 [कनद
उसके ्ञानके क्राथैकी हानि ओर निन्दा होती हे। इसी ल्ियि
९
मगवान् पिगकनागने आठ अध्यायोमे सूज्रपाठ बनाया है, जो षि-
४,
दर शिवमहिस्नस्तोत्रम् |
गलचुत्रके नामसे प्रसिद्ध हे-उसके तीन अध्यायो मै गायनी, उ-
ष्णिक्, अनुष्टुप्, चदती, पक्ति, चिष्टुप्, जगती इन सातो वेदिक
छन्दको अवातर भेदके साथ खविरुतर वणेन किया हे, फिर
| पाच अध्यार्योमिं षुराण-इतिदासादिकके उपयोगी छोकिक छन्दक
| वर्णन कयादै 1 इस रीतिसे वैदिक कर्मोके अग देसी [ पौणमा
| सी ]-इत्यादि कार जाननेके चयि ज्योततिषभी आवद्यकदे-जिसे
भगवान् खुयनारायणने तथा गगीदिक [ १८] महर्षियौने चहुत
धरकारसे विरचादै । योही भिन्न भिन्न शाखके मन्ोंको मिलाकर
वेदिक अयुष्ठानके विदोष कर्मोको समस्चनेके दिप कल्पसूच च.
ने हं । वे सव प्रयोगो के तीन भेदं होनेखे तन प्रकारके है-जिन्े
दोब-भरयोगोंके किप आदवरायन, सांख्यायन इत्यादि सदाय
-निर्भित्त बोधायन, आपस्तम्ब, ओर कात्यायन -(* )इत्यादिके निः
मित ईदै-एवं ओद्वाज-पयोगाथं खाख्यायन, वीह्यायणं आदिके विः
रचित सूत्र द । इस पकारसरे छवो अगोंका प्रयोजन तथा सेद निः
रूपण कियागया 1 . | ।
अव चारो उपांगोकाभी प्रयोजन ओर
के ५
| च र भद् कहा जाता हे। भं
गवान् छष्णद्धेपायनने अष्टादरा पुराणोंको
ध, | च ॥
तिसर्म = ~ ~ चचरितं ड था ह्जां सगे, पः
! वशा, मन्वत र =र_वशाजुचरिर्तोको कट करते हे -उनः
के नाम इसछीकसे जानने चाहिये, क
"मद्वय भ-दयं रो वं, व-घयं ब्र-यं तथा ।
अ ना-प-लिङ्गक्-स्कानि,
९ मत्स्य पुराण ।
२ माकेण्डय-पुराण ।
> भागवत पुराण ।
8 भविष्य पुराण ।
` ५ शिववुराण।
६ घिष्णु पुराण।
रणानि पथक् पृथक् ॥
१० ब्रह्माण्ड पुराण ।
१९ ब्रह्मवेवतं पुराण ।
१२ अभे पुराण।
९३ नारद् पुराण ।
९७ पड्म घुराण ।
१५ छग पुराण ।
७ वाराह पुराण । ९६ गरूड पुराण
८ वामन पुराण । १७ कमे पुराण ।
९. ब्रह्म पुण ।
©) वह कीन का्यायन ह १ बररुचिही अयषा कृसरे कं$------------- ^ वररुचिही अथवा दूसरे केोई--
सस्कृत-भाषारीकाभ्यां सवठितम्- ४३
योही भ्रायः अखारह उपपुराणमी ह-जिन् देवीभागवतः का-
डिका पुराण, वायु पुराण, कल्कि पुराणः ओर सास्वपुराण-दइत्या-
दि दहै । न्याय आन्वीक्षिकी पचाध्यायी गोतमश्ुनिने बनाया है
जिसका प्रमाण ९ भमेय २ संशय ३ प्रयोजन ७ दशान्त ५ सिद्धा
स्त ६ अवयव ७ तक < निशय ९ वाद १० जल्प १९ वितडा १२ ३-
ल्वाभास १३ छर १७ जाति १५ ओर निग्रदस्थान ६६ नामक सो-
ल्य पदार्थौके उदेदरा खश्चण पवं परीश्चासे तत्वज्ञानका दोनाही-
व्रयोजन हे । यही ददा अभ्यार्योके वैदोषिक शालको कणादक-
विने निमीण किया है-जिसक। दव्य १ गुण २ कमे ३ सामान्य ४
पृविरोष ५ समवाय ६ ये भाव पदाथे ओर सातवे अभाव ७के
लाधम्ध-वेघस्य॑से व्युत्पात्ति करनादी भ्रयोजन है । यहभी _ न्यायी
हे । इसी भांति भेमांसामी दो प्रकारकी दै-प्क तो कममीमांसा
ओर दूसरी शाशरकमीमांसा । उसमे भगवान् जेमिनिमुनिने बार
ह अध्यायकी कममीमांखा बनायी दै-जिखंम धमेभ्रमाण. ९ धमके
मद् ओर अमेद् २ रोषदोषिभाव ३ यज्ञके ये पुरूषाथं भदसे भ
योग विष ७ वेदाथ-पाठटनादि कमभेद ५ अधिकार विशेष ६ सा-
मान्यातिदेरा ७ विदाषातिदे् < ऊह ९ बाध १० तन्न ६९ जार
परसग १२-येदी बारहो अध्यायोंके प्रधान अथै ह । तथाच सक-
षेणक्राण्डभी चार अध्यायो जञमिनिसुनिहीने निमौण किया हे।
वह यद्यपि देवताकाण्डके नामस : प्रसिद्ध है पर उपासना नामक
क्के प्रतिपादन करनेसे कभमीमां साहीके अन्तगेत हं । पवख
चारही अध्या्योकी शारीरकमीमांसा भगवान् बादरायण | बेद्-
व्यास ] की वनाद हु है-जो कि जीव ओर ब्रह्मके पक्व साक्षा-
तकारक हेत भवणाख्य विचारके प्रतिपादक न्यायोको दिखलाती
ह । उखके पिले अध्यायमें समस्त वेद््ान्तके वाक्योका साक्षात्
चा परंपराद्धासा प्रयगभिन्न अद्वितीय ब्रह्मम तात्पस्यं कगाया दहे ।
योदीं दूसरे अध्यायमें वेदान्त वाक्योके अद्ितीय ब्रह्मम सिद्धहो-
जानि पर सम्भावित स्शरति ओर तकीदिकोके विरोधक राका उ.
डाकर उसका परिहार देकरके अविरोधको दिखाया हे। फिर ती-
खरे अध्यायमे साघननिरूपण किया दै । पव चाथे अध्याये स.
गुण ओर निगुण विद्याओंके फङवि्चेषका निणेयकिया गया हे ।
ष शिवमहिश्नस्तोत्रम् ।
यही सव रारखोक मस्तक है ओर दुसरे शाख इसके दोषभूत
[ वैच धुचे ] दै-यदी राख भगवान् दाकराचाय्येके भाष्याञ्ुसार
समस्तमोश्चाभिखाषी ठोर्गोको आदरणीय ह ॥ इसी प्रकारसे ध-
भेदासख्ाको भी-मचं १ याज्ञवल्क्य २ धिष्णु ३ यम ४ अगिया५व
सिष्ठ € दश्च अ सवत < रातातप < पराद्यार ९० गोतम १९ दाख
१२ छखिएखित २३ हारीत १४ आपस्तस्व ९९ उशाना १६ व्यास १७
कात्यायन १८ लह स्पति २९. देवरे २७ नारद् रद चेटानसि २२
इत्यादि महर्षियोने बनाये है-जो उन उनलोर्गोकी स्तयां कशः
जाती हे । इन सबोमे बणाश्रमके धमेविरषोंका विभाग विस्तार-
पूचैक कहागया ह । यदी व्यास-रचित महाभारत तथा महर्षिं
वाद्मीकिङूतरामायण ययपि इतिहाखके नामसखे भरसिद्ध॒ हे पर
चास्तवमें धमेराखादीके अन्तगत द । सांख्यादेकमभी धर्मदासः
दमे परिगणित है परन्तु यहां पर उनका स्वयं निर्देश किया हे
अततणव वे सव परथकदी रक्ते जतेदं। |
अव चासंही वेदाके चार उपवदौकामी यथाक्रम भयोजन शष-
द् दिखाया जाता दे-उसमं ऋग्वद का उपवेद आयुवैद्, यजु्ेदका
धञुवैव, खाम वेका गान्धधैवेद, ओर अथववेदका अथैका
ऋ (~ 4 ॐ ठ् अ (1
उपवेद् दे । जिसम आयुरवैद्के आठ मेद हें अथात् सूज १ शार
२ ेन्दिय ३ चिकिरसा ४ निदान ५ विमान ६ कर्प ७ ओर सिद्धि <
जिसके ब्रह्मा १ प्रजापति २ अचरि ३ घन्वन्तरि ७ इन्द्र ५ भरद्टाज्
# क तान य ७ ओर अभिवेद्य < श्त्यादि कता ददी खोगोके
ङपदेरालसार चरकरसुनिने उसे सश्चिर किया है-योही
क ही खुश्चुत
` पचि स्थाना ( मेद ) का दुसरा भस्थान रचा हे-योर वाग्भट
अश्तिनेभी बहुत कः चिखा हे, पर वह सखव एकी ध
इस ल्ियि शास्म कोद भद् नहीं हे । क भी आयु्ेदहीके
अन्त म्द भी दही
। अवन चाजीकरण नामकः कामराख्यको
ङिखा दै उस्र वार्स्यायन सानन पांच अध्यायो स प वा य प वनानि पा
भकामदतरमं सात अधिकरण है-यथा-स्रधारण ९ सभयोभि
माय्थोषिकारिक ४ पारदारेक ९ वैशिक ६ ओर .ओपनिषदिक ७ ल
अध्याय है जिस्र पर यद्ोधरकी जयमङ्गला नामकी दीका हे
देढना घाहिपए ।
क २ कन्यासे्युक्तक
हः सव मिलाकर ३६
\« अध्यायोका कामश्ञाल्न कौन हें !
सस्कृत-भाषारसीकाभ्यां सवरितिम्- ४५
घनाया है-उखका भयोजन केवर विषयोसे वैराग्य: दोनाही है
क्योकि राखोदीपित भागेसे भी विषयोके भोगम केवर दुःखहीं
अन्ते पात्त होता है । वेयकशाख्का प्रयोजन रोगोकी : उत्पत्ति
इत्यादि तथा रोके दूरकरनेवाखे उपाय आदिका ज्ञान दोनादी
सख्य है । अथ च पादचतुष्टयात्मक धञुवेंद्को विदवामित्रजीने
बनाया हे-उनमे' पिखा दीक्चापाद् है । दूसरा सग्रहपाद, तीसरा
सिद्धिपाद, ओर चौथा भ्रयोगपाद है । इसके श्रथम पाद्मे धुषकां
छत्तण ओर आधेकारियाका निरूपण क्रिया गया हे-धयुःदाब्द्
यद्यपि धञुषदीके ये रूढ ( भरचछित ) दै, पर च रोही ्रकारके
आय॒र्घोका सूचक है । वे चारों प्रकार ये दं-सुक ( चखायागया )
अमुक्त ( हाथमे लिए इषः चलाया गया ) सुक्तासुक्त ( जिसे -कमभी
हाथमे रखकर चलाना पडे कभी फककर चाना पड़े ) ओर
यत्रमुक्त ( जो दूखरेके खदारेखे चखायाजावे ) जेस सक्त चक्र
अथवा चक्का इत्यादि, असक्त खड्ग तरवार गद् इत्यादि, रुक्ताखक्त
भाला वा वरी बिद्ाल भश्वति, ओर -यं्सुत्त वाण किंवा गारी
इत्यादिक । इसमे स॒क्तको अख ओर अमुक्तको शख कहा जाता दे ।
वे अद्र भी बाह्य वैष्णव पाद्ुपत भ्राजापत्य अश्िय इत्यादिभेदोसे
बहुत प्रकारके ह । इख रीतिसे देवा्धिषठित मेके . सहित
चासोही भरकारके आयुधम जिन क्षत्रिय कुमार्योका अधिक्रार दै,
वरे खबभी पदाति ( चैदक.).. रथी, गजारोदी मौर ` अदवासोदी
( असवार ) के भेदः खे चार भकारके होते है-एवः दीश्ता
अभिवेक सकन ओर मङ्गलकरण-दइत्यादि सव कुछ अथम् पादमं
निरूपित हे । समस्त दाख विशेषोका तथा आवचाय्यका लक्षण
पैक ग्रहण करनेकी विधि दृखरे पादम कही गह दे । गुरुसंभरद्षयके
अञुसार सिद्ध शख विरोषोका बारवार. अभ्याख. ओर -मच्रके
देवताका सिद्धकरना तीखरे पादम कथित है.\.फिर्देवतओं की
पूजा ओर अभ्यासादिकसे खिधडपः अख विरोषोका, भरयोगकरना
चतुथेपादमे वर्णित हे । ्च्रेयोंका निजघमीचरण खश्राम. करना
तथा दुष्ट डां ( ठेर ) चोर इत्यादि भरजावगेका पालनकरनादी
धलर्वेदका प्रयोजन हे । इख्भांति.. ब्राह्यभाजापल्यादि क्रमसते विश्वाभि.
रका रचित धयुर्वैद -श्याख दै । |
४६ शिवमहिश्चस्तोत्रम् ।
गान्धवेवद-दाख्र भरतसुनिने निर्माण एकिया है, जिसमे नाचना
भ भ 9 > ४५ ^. ५९
गाना. ओर वजानाके मेदस बहुत प्रकारका प्रपच दे । देवताकी
आरघना, ओर निविकट्पक समाध ( चित्तकी एकतानता)
आदिकी सिद्धिरही गां ध्वैवेदका प्रयोजन हे ।
ओर अथे चास्जमी बहत भकारका दै-जसे नीतिराख,
अदवल्ाख्र, गजरासख्, रिस्परासर, सखूपकारदाख्ः आर चतुःषि
कलाराख्र । वे चौसठ कलायं हैवागममे यो कदी गद है।
१ गीत; ` २४ चि्रराकापूपविकारक्रिया,
२ वादय, २५ पानकरसरागासवयोजन,
३ चतय २६ सूचीवापकमे
` ७ नास्य, ` २७ सञक्रीडा,
५ आखेख्य, ` ` ` ८ कीणाडमरुक्वाय, `
& वियेषकच्छेयः २९. पहेचिकाप्रतिमाखा,
७ तड्खुक्कसमवलि विकार, ३० दु्चैचकयोग,
< पुष्पास्तरणः, ` २९१ पुस्तकवाचन,
९, द्रानवसनाङ्गरागः, ३२ नारिकाख्यायिका ददन,
१० मणिभूमिकाकमे, ` ३३ काञ्यसलमस्यापूरण,
११ शयनरचना, ` ३९ पष्टिकावे् बाणविकर्प,
१२ उदक वाद्य ३५ तक्के, ` .
१३ उदकधातः, ३६ तक्षण;
१४ अद््खुत दरोन वेदिता, ३७ वास्त॒विद्या,
१५ माखाच्रथनकल्प, ` ३८ रूप्यरत्नपरीश्छा,
१६ शखरापीडयोजनः, . ` ३९ धातुवाद्,
१७ नेपथ्ययोग, , ४० मणिरागज्ञान,
१८ कणेपत्नभङ्ग, ७९ आकर ज्ञान,
१९. गन्धयुक्ति ७२ च्रक्षायुवैद,
२० भूषणयोजनः , ४३ मेषकुक्कटखावक.
२१ इन्द्रजाल युद्धविधि,
२२ कौचुमारयोग, ४४ छ्युकसारिका-
२३ हस्तखाधव, प्रखपन,
संस्कृत-भाषार्टीकाभ्यां सेबङितम् । ७
४५ उत्सादन ५५ असिधानकोराच्छन्दोज्ञान,
५६ केदामाजनकौरार, ५६ क्रियाविकट्प, |
४७ अक्चरमुषटिकाकथन, ५७ ककितविकस्पः
४८ स्टेच्छितकविकर्प, . ५८ वस्रगोपन, |
४९. देाभाषाज्ञान, ‰ ¦ ५९ द्यूतविरोष, ।
५९ चुष्पकरारेकानिमित्तज्ञान,& ° ` आकषक्रीडा `
५९ यज्नमातृका, 1 ६१ बारखक्रीडनकः;`
५२ धारणमातृका, ` ६२ वैनायिकी विद्याज्ञान,
५३ असंवाच्यसपास्य-; ` ६२ वेजयिकषेयाज्ञान, `
मानसीकाव्यक्रिया, ` ` पी) ` {1
५8 छलितकयोग ` ` ` ` ६४ वैतालिकीविद्याज्ञान,
येदी चोखो करयं दहं। :
उपय्युक्त समस्त विषर्योको अनेक सुनिर्योने बनाये . है, उन
सर्बोका लौकिक ` ओर ` अलोकिक उनके उनके अयोजर्नोका भद्
समद्चना चादिए। ॑ 75 9 गई
इस भ्रकारसे अटारहौ विद्यायै जयीशाब्दके दारा कदी गई ।
अव सांख्य शाखका निरूपण कियाजाता है जिसे भगवान कपिल
देवजीने निर्माण किया है ज्ञेखा कै तुरसीृत रामायण म कहा दै-
““देवडती पुनि ताखु कुमारी |
जो सुनि कदेमकी धिय नारी ।
आदिदेव प्रथु दीन दयाला;
जर धरे जेहि कपिर कृपाला । | |
सांख्य राद जिन प्रकर बखाना, {11:4: |
तच्च विचार निपुन भगवाना ॥ इति ॥ |
जिसमे त्रिविध दुःखकी अतिशय निचृत्तिद् परम पुरुषाथं
है-यह छ अध्यायोमे यो कहा गया हे-यथा, भथम अध्यायमे
विषयोका निरूपण किया हे । दुखरे मे श्रधानकार्योको कदा ह । |
तीसरेमे विषय वैराग्य हे। चोथेमे पिगर कमारादिक `बिर्तोकी |
आख्यायिका ह । पांचवैमे परपश्चका निजय है । ओर छठे अध्याय |
मरै समस्त अर्थौका सक्चेपं हे [ सत्तर आय्यौङछदकी कारिकाओंमं |
सांख्यतसख कौमुदी नामक प्रथ प्रसिद्ध हे जिख पर गौडपाद्ा-
८ । 1; शिवमदहिन्तस्तोत्रम् ।
चायेका. भाष्य अथवा वाचरुपति मिभ्रकी इत्ति पठन पाठनमें
प्रचछित दै] भ्रकति-पुरूषका ज्ञानदी . सांख्य ` शाखका सख्य
प्रयोजनदहे। ` ` | ६
योगदाख् भगवान् पतंजलिका बनाया हआ हे [ जो योगश्तूजके
नामस परसिद्ध है ] जिसमै चार पाद् है । प्रथमः पादमं चित्तच्चात्ति-
का रोकना ओर समाधि वं बेराग्यका रूप तथा उनके साधर्नोको
निरूपण किया हे 1 दुसरे चादम विश्िप्तचित्तवाटेकी समाधि की
सिद्धिके च्िये-यम, ९ नियम, २ आसन, ३ प्राणायाम, ४ प्रत्या.
हार, ५ धारणा, ६ ध्यान, ७ ` ओर समाधि, ८ नामक योगके
आ अगोको निरूपित किया दे । तीसरे पादमें योगकी ` विभूति.
यका वणेन हे 1 चौथे पादमं केवट्य-निरूपण . है-दस चाखका
विजातीय भ्रत्यर्योके निरोघद्वारा निदिध्याखनकी सिद्धिदी घरयोजन
है { योगसूज पर महाराज भोज-देवकी बनाई इई चत्त हे ]॥
ही चछापत्तिमत अथीत् पाद्युपत शाख हे जिसे स्वयं मगवान
पद्युपतिदीने पद्युपाशको डलके छि पांच अध्या्योमे रचा हे।
जिसक्र पांचोदी अध्यार्योमे कायैरूप-जीवही पड्ु, ` कारण-पञ्युपति
हेदवर, उसी पड्युपतिमे चित्तका समाधान ` करना-योग, `एवं
` मस्मसे तकार स्नानादि कर्मोका करनादी-विधि दै । येदं
काये-कारण-योग-ओर विधि दुःखान्व के. जाते दै इसी वुःखा.
न्त-सन्ञक मोक्चकी सिद्धि इस राख्का भ्रयोजन हे । इसी राति त्त
दोव-मच्रराखमी पाद्युपतदणख्के अन्त्भत हे ।
[ उक्त पाद्युपत शाख्रका वणन हिवपुराणकी वायुसंहिताके
पूवेभागमे उनतीखवे अध्यायमें भी पाया जाता है ] ॥
इसीभांति वैष्णवशाख् नारदादिमदरियोका चनाया हज ह
जो नारदप्र॑चराज् कदखाता द 1 जिसमें वादेव, सकंषेणी, शः |
ओर अनिरुद्ध, यही चारा पद्ाथं निरूपित दै । अथीत् मन्व
वासुदेव परमेदवरदी सवके कारण दै -उन्हीसे सकर्षण नामक जीव
उत्पन्न होता है-उसीसे उत्पन्न इआ भचुम्न मन हे-फिर उससे
अनिचख्द्ध संज्ञक अहङ्कार उत्पन्न होता दे । ये खब भगवान् बाख.
देवदीके अराभरूत होने उनसे भिन्न नदीं ह अतः उसी वाखदेकी
मन-चचन ओर कायसे आराधना करके मनुष्य छतछृल्य होता
संस्कृत-भाषारीकाभ्यां सवङितम्- ४९
का १ = = ल;
हेः यदः सव वातं निरूपण की गं ई । चैष्णवमंजाखंभी पचः
[नक व ~ ~ 2 ६ 9 0
रातरहीमे अन्तभूत है { वैष्णव मतका विष बणेन-पद्मयुराण-त्र-
हयवेवर्तपुराणके कृष्णजन्मलण्ड, विष्णुपुराण ओर 'भागवतादिकों
++ 4 + # # ~ ॥# 3 [1 ~~
रमी मिलता है-तथा च इस विषयम॑ हरिभक्तिविखास नामक
ग्रथ अवदय द्रष्टव्य दै] ॥
ॐ ४ = क => ^ - न्कानौन
. इस प्रकारसे समस्त धस्थान भद दिखला दियं गया । इन
सबौके मतायुखार सक्चेपसे तीनही श्रस्थान भेद. सिद्ध दोते दै,
~ “ 3 द ए: ॥ मि
अथौत् अ{रभवाद्, परिणामवाद, अर ` विवतवाद् । प्राथेर्वी, जख,
तेज; ओर वायुः -श्ह। चारके परमाणु दथधणुक शत्यादिके क्रमसे
{3 ~ क भ अ + भ, ।
व्रह्मा ड पयेन्त जगतको बनाते द । का्य-करारणक व्यापारसे असत्
क < ॥ च, [ र्य ~ (७
[छठा ] दी त्पन्न होता है, यह पिला आर॑भवादं तक शाख्रमता-
[+ ) प. " ॐ क
मासक रोर्गोका , हे । सच्वं-रज-तमागुणात्मक
वटम्बी तथा म
धानी महत्-अहकारादिकके क्रमसे जगतका आकार बनजातां
हे -पूर्थभीः सक्मरूप कारण व्यापारसे सत् [ सत्य 1 ही काय
दे-यदह दुसरा पश्च. परिणामवाद सांख्ययोग
अभिव्यक्त दोता
= ्् [नः [ ३ १
ओर पाद्युपतमत वारक हे बह्यदीका परिणाम जगत् है यही
वेष्णव छोगोकाभी मत हे । स्वप्रकाशा परमानन्द्अद्वितीय ब्रह्म
अपनी मायाके चस मिथ्याकीं भांति जगतके आकारं कल्पत
ले जाता है-यहं तीसरा पश्च विवतेवाद् ब्रह्मवादी खोगोका हे ।
ससी अस्थान वना वाङे मुनिखोगोका विवतेवादके अन्तर्म
वेदयान्तध्रतिषा्यय आद्वितीय ब्रह्मी तात्पय्थै हे। [ यहां पर यह
लका होती हि कि तो 'फर हतने प्रस्थान ( मतभेद ) कयो क्रिये
गये-उसका समाधान यह है कि-] वे मुनिलोग श्रांत न्दी थे
सव कुछ जानतेथे, कितु बाहरी विषया आसक्त दोनेसे छोगोँका
चथा प्रवेद परमपुरुषाथम नदी हां सकता अत एव नास्तिकताके
दुरकरनकी इञ्छासे उन. महादभावाने ये सब प्रकारभेद दिंखलायें
| इसी कारणस उन लो गोंके ठीक ठीक तात्पर्यको विना समक्षेदी
ज्ञो छोग वेदसे विरुद्ध अधमं मी डनक्ते तात्पयेकी उत्वेक्चा करके
उनके मतको उपादेय समक्चकर प्रहण करछेते ह वे दी-कजकशि-
लनानापथमगाभी ( धां ) होते है-दखीसे सभी लोगोका सीधे
मागे प्रवेश नही होता-ओर इसी विपयेयमें परमेरवरकीभी
॥५।
|
|
|
५७ रिवमदिन्नस्तात्रम् ।
भ्रा्ि नदी हो सकती-दां अन्तःकरणके शुद्ध दाजाने परः पाठेसं
ऋलुमागेका आश्रयण करनेहीसे सिद्धि खाभ होता दे। यह समस्त
रास्रोका निचोड दै ॥ ७ ॥
द्धः भाषापयाचुवादः श
वेदिक खांख्य रु जोग मत, वेष्णव पाञ्युपतादि 1
कहत कते धिश्न पथ, यदह उत्तम हितवादि ॥
छूधे रेढे मागे चि, रुचि विचिता पाय ।
जरु अख वहतो जाई नर, तुम सम सिधु समाय ॥ ७॥
द्धः भाषाविम्बम् च
गने कोडः वेदे दरि दर मती सांख्य-मतको
कै योगाभ्यासी खगम पथ येदी सवदिमो । ~
ख्ची नानाभांती कञचु कुटि मागे धरि ( बहि) चली
नरके नाराके जरखधि-सम हौ गम्य तुमहीं ॥ ७॥
महोक्षः; खटवाङ्क पर्य रजिन भस्म भणिनः
कपाटं चे तीय त्तव वरद् तन््रोपकरणम् ।
सुरा स्तां ता गृद्धिः दधति तु (शेभवद्श्रूपणिदितां
न हि स्वात्मारामं विषयस्रगतठष्णा रमयति ॥८॥
| दः मधुसूदन रीका +
एव सवेशङ्कद्धारेण हरिहरस्वरूपं निरूप्य तदेवावाचीनपदस्थं
स्ताति-
#मरोक्च इति # । हे वरद्, तव परिपूणपरमेदवरस्याप्येतत्तन्नोप-
करणं तन्त्रस्य कु टम्बधारणस्योपकरणं साधनम् । तदेवाह । महोक्षः
सहायश्च बृद्धब्रषभः, खटूवाङ्गं खरूवाया अवयवः शाखविदेषः का.
पालकानां प्रसिद्धः, परद्युः टङ्कः कुठारो वा, अजिनं चमे, भस्म
न न
(९ ) विदधति चति पाः!
।
संस्कृत~-भाषार्टकाभ्यां सवर्तिम्- ५५१
पांशुः, फणिनः सपः, कपारु मयुष्यशिरोस्थि चेति सक्तकम्।
नन्वव दर्द्रस्तुष्टोऽपि कि दास्यतीत्यत आह--खुर इत्यादि ॥
ख॒रास्तु भवत्लेवया भवद्घभ्रणिष्देतां भवतो भू विक्षेपमात्रेण समः
पतां तां तामसाधारणीसद्धि संपत्ति दधति धार्यन्ति ।. त्वमति-
दरिद्रस्त्वद्धक्तास्तु सवै खरास्त्वत्प्रसादात्खश्टद्धा.इति व्यतिरेक त.
शब्द् आह् । यो छ्यन्यान्धनवतः करोति ख तद्पेक्चयाधिकधनवान्भ-
वतीति प्रसिद्धं खोके । नच तर्दीदशोऽपि स्वयं कथं महोक्चादिमा-
ज्रपरिवार इत्यत आद-नहीत्यादि । हि यस्मात्स्व आत्मनि स्वरूपे
चिदानन्दघने आरमल्याक्रीडत इति तथा तं न भ्रमयति न मोह
यति 1 विषयस्गतृष्णा विषया इन्द्रियाथोः खब्दस्पदेरूपरसगन्धा-
स्त पव खछगतृष्णा जटवुद्या गृह्यमाणा मरसोचिका यथा सरगतष्णा
रबिरदिमरूपा जख विरुद्धस्वभावापि भान्त्या जलमयीवाभासते
तथा विषया अपि दुःस्वरूपा भ्रान्त्या सखुखरूपा अभासन्त इति
रूपकाः । यर जीवोऽपि स्वात्मारामतां भराप्तो न विषयासक्तो भव-
ति, तत्न किमु वक्तव्यं नित्यमुक्तः परमेदवरो बिषयेनौभिभूयत इत्य
भिप्रायः । तन चषभारूढा खट्वाङ्गपरश्चफणिकपालालंृतचतुखेजा
च्मवसना भस्माङ्गरागा विविधभूषणा मादेदवरी मूर्तिगुरूपदेशन
ज्ञाता स्त॒त्यादिभिराराध्येत्यथैः । वस्तुतस्तु पुरुषप्रधानमहददकार-
तन्मातरेन्द्रियभूतानि महोश्चादिरूपेण शुक्तानि भगवन्तं महेश्व रुपा
सत इत्यागमप्र सिद्धम् । तस्य जगत्कुडुम्बस्य तच्वान्यवोपकारण-
मिति निष्कर्षः । हरिपक्षे तु महोश्चः अक्षश्चक्रं “अक्षो रथावयवके
च बिभीतके स्यादश्ाणि पण््डतजना विदुरिन्द्रियाणि' इति धरणिः
महस्तेजोरूपं, भस्मफणिनः भस्मवच्छुश्रस्य कोमलाज्गस्य च फणिनः
दाषस्याऽजिन शारीरत्वक् खट्वा चाय्या । तथा कपाठं क शिरः
पाल्यतेऽनेनेति कपाट शिरडपधानं तस्यैव भस्मफणिनोऽ ङ्गं किचि-
दुच्दरतावयवविशषः । अथवा केन जलेन पाल्यत इति कपाल पड्म
शङ्गा वा तस्मिन्पक्षे भस्मफाणिनोऽङ्क अजिनं च सद्वा) अङ्गं पयेङ्क-
स्थानीयं अजिनं च तदुपरि आस्तृ तवसखस्थानीयभिति बोद्धव्यम् ।
तथा परश्युरिति परश्चुरामावताराभिभ्रायेण । दे वरद्. पतावत्तव
तन्त्रोपकरणमिस्यादिपूरवैवत् । अथवा विषयश्गवष्णा अविद्यान्तः
करणोपरतं प्रतिविस्बकस्पं जीवं ग्यामोहयस्यपि रामं अनन्तसस्य-
५२ शिवमहिन्नस्तोन्नम्
ज्ञानानन्दात्मकत्वेन योगि(र९)नां रति विषयं त्वां विम्बकल्पं मोहयति
न स्वावरणांशोनाभिमवति । उपाघः प्रतिविम्बपश्चपातित्वात् । कीः
डरी सा । स्वात्मा स्वः सच्िदानन्दात्मकस्त्वमेवात्मा स्वरूपं यस्याः
सा, तथा त्वस्यध्यस्ता-सा स्वसत्तास्फूतिप्रद् त्वां क्थ व्यामोदये-
दित्यथेः । अज्रापि चक्रादीनां भगवष्ेभूतित्वं वि ष्णुपुराणादौ भ्रसि-
डम् ॥<॥
` & संस्कृत् टाका ४
( चरद ! ) देवरदानोन्सुख ! ( मदोश्चः ) मदोश्चासो उश्चा च
महोक्षः मदादयमः । “अचतुर -५ । .8 । ७७-इत्यादिना निपात-
नात्खाथुः ( खट्वाङ्गं ) खुखं खणपयायोऽख्रविशोषः केचिद्ण्डस्यों
परिब्रह्मकपार खट्वाङ्गमुच्यते कचित्-'“खर् वाङ्ं ` नरपज्र "-मि-
स्यप्युक्तम् । तथा ( परञ्युः ) परं खणातीति परद्युः ` आाङ्परयोः
खनिशभ्यां डच? । २३-उणा०-इतिकुः । परदवधापरपर्यायः
मसि द्धोऽखरविरोषः। ( अजिनं ) चम्मं ( भस्म ) क्षारं [ म॑स्मतस्व-
जानाथ चदजावाखोपनिषद् दरष््येति | (फणिनः ) सर्पौ
( कपाङं ) खण्डं ( च ) इति समुचये ( इति › पलं वेधं ( इयत् )
एतावदेव ( तव ) ते ( तन्ोपकरणं ) प्रधानपरिच्छेद्ः, भपञ्चरूपेण
स्थितमुपकारकमिति वा । अस्तीति रोषः । परन्तु ( सुराः )
देवाः इन्द्रादयः ( भवद््ररणिहितां ) भवतो श्क्षपमा्रेण पदता
(त त).अतियग्रसिद्धां ( ऋद्धि ) सम्पदं ( विदधति ) धारयन्ति।
यदे तर्हिं स्वयं कथन्नोपभुज्यते ^ -दत्याशाङ्कथाह । ( हि ) यस्म।त्
कारणात् ( विषयग्बुगवृष्णा ) भोगानां च्छा श्खगतराष्णकेव रहा
( स्वात्मारामं ) अत्मतच्वज्ञं योगेन पुरुषं ( न भ्रमयति ) कदापि
नेव चाखुयितु शक्नोति अत्र भगवतोऽमञ्यं परिच्छदं व्णीयित्वा
परमसखद्धिदातृत्वञ्च प्रदद्य निमोवित्व-परमयोगित्वादियुणगणा
यथावदेव विशदीशृता इति ॥ < ॥ -
ननन न 1 1
(१) कोगिनामविषयं' हति पाडः ।
सस्कृत- भाषारीकाभ्यां सवलितम्- -“ "भर
च संस्कृतपदयालुवादः ॐ
] 6५ + + „ ट नक # र
| मदोक्षखय्वाङ्गकपाङख पोः भस्मालजिनं पद्यारेयच्वदीयम् ।
प्रपञ्चरूपण महापकारि, मत प्रभो ! त वरदाच्रगण्य | ॥
परन्तु शक्रादय पव देवा, शरक्चेपमात्रेण त्वया धद ताम् ॥
सम्द्धि खद्धां प्विव ! धारयन्ति, न याति योगी विषयेषु ठृष्णाम्॥<॥
+ भाषाटीका
( वरद् | ) हे वरद्ायक । ( मटोक्चः ) बडा अथवा बूढा वैक
( खट्वाङ्गं ) अखविंराष { अथवा पाटीके समान -काप्रलिक छोर्गो-
का प्रसिद्ध। कर्द की मलष्यकी पजडीकोभी खटू्वांग कहते ह । |
( परद्युः ) फरसा ( अजिनं ).चमडा अथवा खाक ८ भस्म ) छार,
णिनः) सांप (कपाल ) मड, खोपडी .( च ) इत्यादि
राखी (फ ि
( इति ) इख भांतिसे ( श्यत् ) इतनीदही भर ( तव ) आपको ( तन्तरा-
पक्ररणं ) पृजीपसार [ हेखीयत ] हे 1 परन्तु ( खख: ) देवता खोग
( भवद् भूधरणिदितां ) आपकी भकुटीके प्रसादको दीडइक (तांतां)
` उन उन अर्थात् बड़ीभारो ८ ऋद्धि ) स म्पन्तिको ( विदधति ) धारण
` करतें दै, अथात भोगते ह यदि आप प्ल दानिं ह तो स्वयं कर्यो
नरी संपन्तियोको भोगते { इस साक परःकते ह कि ( हि ) क्योकि
" स्वाद्मासरामं ) मत्मन्ञान) योगी पुखषकरो ( विषयस्गतृष्णा ) विषयों -
की अथीत् रूप~-रस- गन्ध -स्पस. आर शब्दरूप सरगतृष्णा जरकी
बुद्धिखे वाद्परके किरण आभप्राय ह. जलसे विरुद्ध
स्वभाव होने परभी सर्के किरण अमम पडहप. तृषाते श्युगोको
जनते जलमयदी भासते & वैसे श्रांतिवशा डःखमय व्रिषयभी सुख
ङूप जान पडते ह ] (न ) नदी ( भ्रमयति ) भ्रमसे रु सकती हे।
तात्पय्यं यह् ह कि आपकी सवास वेल, चारों राथोमें खट्वाङ्ग
रसा, खपे ओर कपालः लारदीका आढना विना, ओर अग
राग राखी भर तो हे, पर आ।पहीकी भके हिलनसे ब्रह्म-विष्णु-
इन्द्रादिक देवते कागभी बडीते बडी सश््धिर्योका भोग करते हे,
~ == ~
९९४ ` दिवमहिम्नस्तोत्रम् ।
किन्तु आप आत्मज्ञानी महापुरुष दोनेके कारण उन तुच्छ विषयाकी
भाग-खार्सा नही करते । वास्तवमे आत्मज्ञान दोजने पर खाधा
|
रण जीवभी विषयासक्त नही होते तो फिर साक्चात् परमेदवरको
प्वचयाका खछग-ठृष्णा कसे भरमासकता ? इसकं पूवे निगुण इदवर
की स्तुति होुकी दे इसीसे इख इखोकमे अवाचीन अथौत् सगुण-
रूपका वणन [किया हे । महादेवके स्वरुपका वर्णन त॒लसीदासजीने
भी रामायण गोरी विवाह पकारणम पेखाही किया हे-
यथा-“ङण्डर ककन पाटेर व्याखा,
तु विभूति पर केहरि छऊला ।
शद ककार खुंद्र शिर गङ्गा,
नयन तान उपवीत भुजङ्ा
गर कठ तर नर-रिर माला,
आराव भष रिव धाम ऊपाला \
कर चरा अरू डमर विराजा,
चर नसह चाट वाजांह वाजाः'॥ (तुण्रा०) ॥ < ॥
छ भाषापयानुवादः +
वरधा राज्ञा खार फनि, फरसा रा कपार ।
वरदायक { इतनी अहे, तुमरी पूजि पखार ॥
उच ङ राकं दिरन ( दान ) ते, लहत ऋद्धि खव देव ।
आतम ज्ञानिहि विषयकी, खगतृष्णा नहि सच ॥ ८ ॥
च
छः भाषाविम्बम् +
बडा बधो टांगा प(फ)रखु खग(गज) छाला भसम छ
कपाञे सप।को ध(क)रत निज तंत्रोपकरने ।
सश्द्धी पावेहं सकल खुर तो-भोद हिरत
प्रभू-लागा पं तो विषय~-श्गतिस्ना ( कृष्णा ) नि चदे ॥ ८ ॥
भ
संस्छृत~-भाषार्दीकाभ्यां संवङितम्- ५९६
धरुवे कथि त्सवं सकर मपर स्त्व घ्रुव मिद्
परो धोव्याधोग्ये जगति गदति व्यस्तविषये ।
समस्ते ऽप्येतस्मि न्प्रमथन ते विस्मित इव
` . स्तुबज्जिहेमि त्वां न खलु ननु धृष्टा सुखरता ॥९॥ ` |
। + & मधुसूदनी रीका ` ५ ॑ + ‰
पच स्घुव्ययोदैरिदरयानिगणं सगुणं ख स्वरूपं निरूपितं, संप्रति
स्तुतेः प्रकारं निरूपयन्स्तोति- .
कध्युवभिति # । हे पुरमथन, तेः स्तुतिप्रकारेस्त्वां स्तुवन्न जिदेमि
नाहं खज्ञ । विस्मित इव जातचमत्कार श्व । यथा कथ्िदद्भुतं
खष्टरा विस्मितस्तत्परवरात्वाष्ोकोपहासमगणायेत्वा विचेष्टते तथा
हमपि स्तोतुमयं न जानातीति जनो मामुपदसिष्यतीति र्ज्ामग-,
णयन् त्वर्स्तुतो पचतो ऽस्मीत्यथैः । तैः कैः भ्रकारेरित्याह । वः
मित्यादि । कथ्ित्कोऽपि सांख्यपातञ्जलमतादसारी सवे समग्रं ज-
गद् ध्रवं जन्मनिधनरदहितं सदेव गदंति । व्यक्तं वदतीत्यथेः । नद्य-
सत उत्पत्तिः संभवति न वा खतो विनाद ईत्याविभोवतिरोभावमा-
सुत्पात्तिविनारारब्दाभ्यामभिटक्ष्यते । तेन परमेद्वरोऽपि तावन्मा-
ञरस्येष्टे न त्वसत उत्पत्तेः, सतो वा विन।शस्येत्याभेभायः , । इति
सत्कार्यवाद् एकः पश्चः । तथाऽपरोऽन्यः खगतमताजुवर्ती `सक-
रुमिदमश्चव क्षणिकमिति गदति । नहि खत; स्थिरत्व संभवति ।
अथक्रियाकारित्वमेव सत्वम्। (१)तच् सद थस्यक्षणयोगेन न विलम्बे
नोरपद्यते इति। एकस्मिन्क्षणे सवाथाक्रियाख माेरत्तरक्षणेऽ सत्वमेव ।
तथाच परमेदवरस्यापि क्षणिकविक्ञानसतानरूपत्वादखावसत उत्प
ततश नत सतः स्थिरत्वायेति द्वितीयः पश्चः खवक्षाणिकतावादल-
क्वणः ॥ तदुभयपक्षाखदिष्णुश्च परस्ताक्क समस्तेऽप्येतस्मिञज-
गति श्वौव्याध्ोव्ये नित्यत्वानित्यत्व ठयस्तविषये लसिन्नधमेवतिनी
गदति ( आकाश्ादिचतष्क१ू थभ्यादिचतुष्कपरमाणवश्च नित्याः ।
~
आकादाकालदिगात्ममनः युथिच्यादिपरमाणवश्च नित्याः इति वा )
(१) “सदर्थस्याक्षेपायोगेन' इति पाठ ।
५६ शिवमदिञ्लस्तात्रम् ।
कायद्वव्याणिः चानित्यातनि। तथा खानित्यानाञुत्पत्तिविनारयो री
परमदवरा नतु नित्यानामपीत्यथेः। इत्येव तृतीयः पक्षः । तथाच ति
ष्वध्येतघु दै ताज्ञकाराद्ष्डेतीयसखन्माचरूपस्य परमेदवरस्य स्परां
ऽपि नास्तीति सोप्ःश्िकखङ्ाचतेडवय रूपेण स्तुतिः सवेथा ज्ञा
करात्यथः । ताङ् कामात न चछ्जस इत्यत आह् । नलु अहो खदु
निश्चितं सुखरता वाचाकता धृष्टा निटज्ञा 1 तथ(च सुखसर्तैव छ.
्ञामपङ्र्तीत्यथः । पव सवप्रकारप्रचाद्कवादादीनामाभासच्वमु ४
क्तम्, आद्धेतीयवाद स्यच छुजानास्पद्त्वेन सत्यत्वामति द्रष्टव्यम् ।
पतच त्वं मकस्त्वं सामः इत्यादो स्पष्ठीकरिष्यतेः\ ह।र पञ्च ऽप्यवम् |
ध
तत्र पुरमथनराब्द्ः ब्रारत्याख्यातः ॥९ ॥ । < ५ +र 1 |
व - १ =+ ~+ ~ ॐ % > न
जे २८. दः सस्छृत टीका. + | ` "क
( खुरमथन ! } दे जिपुरद्!हक ! ( कश्चित् ) सांख्यपातञ्जखद्ः
चनो लयायी ( सवे ) सचराचर मखिरं ( इदं ) ददैयमानं ( जगत्.)
ब्रह्य'ण्डमण्डल ( शुचं ) नित्यं अविनारीति यावत् ( गदति )
यति । तन्मते समस्त भपीदं जग दविनदवरमेव । ( तु ) इति हेतु `
निदान ( अपरः ) तद्धिनो बोद्धादिमताद्वतीं ( सकलं ) अदोषं
जगत् ( अधुवं ) अनित्यमेव वदाति 1 ( परः ) ताभ्या , मन्यो वीत-
रागो मध्यस्थः ताकिको वा ( समस्त$प्येतस्मिज्ञगति, धरोव्याधन्ये)
चत्वाछ्चवत्वे, निव्यत्वानिल्यत्वे इत्यथः ( व्यस्तावेषये ) निष्धिघप्र
भाणे 1भन्नघ्माचच्छिने वा (गदति ) कथयति । यथा-आकाद्ादि
पञ्चक परमाण्वदेकश्च नित्य, घटपटादि कार्यजातमानेत्यमिति
वद्ात । अनेन. पकारेण तेः बृचक्राथतानत्यत्वानत्यत्वारेवादि भिः
( विस्मितं इव ) आ्य्यैतां गतो मोदहितश्चाहं ( त्वां ) भवन्तं (स्त्-
वन ) स्तुत्या तोघयन्, सन् ( जिदेमि ) लज्ञे, रुज्ञितो भवामि (नख)
` अहा | ( खद ) निश्चयेन ( मुखरा ) बाचाखत। (न च्चा ) अपि
तंसबथैव ४ । ध्वन रभिघ्रायः। काचन्कारस्य जिहेमीतिपदेनैव
सङ्गति रखुरीछृता । अञ जगतो नित्यत्व मनिव्यत्वं नव्यानित्यत्व्च तन्त
त्पथाञुखारेण द योवित्वा तद्विषये स्वाश्च्यैतामपि प्रतिपाद्य अगवतः
स्तुस्यथमात्मनो बाचारतेव प्रकलीकृतेति ॥ ९ ॥
संस्कृत-भाषाटीकाभ्यां सवखितम्- ८९७
& सस्करेतपदयाचुवादः +
` प्के शुवे वक्ति जग त्खमय्र, परो वद्य घव मेव सर्वम् ।
घुवाश्चवं कश्चि दिद वीति, भ्यस्त सखमरः तो विषय स्ततोऽस्य ॥
णवं वदद्धि वडुभि निज मत, ते वादेभि विंस्मयता मह ङतः ।
` छजञे स्तवं स्त्वां न्तरिपुराखुरान्तक! वाचाखता धष्टतया युनाक्ते माम्॥९॥
क । ।
१" "शी
षड ५ र । |
"क न ह
क 2.3 छ भाषायका चू ह
॥ च ~ । १५ <
इस प्रकारं अगवानके निगण ओर. सगुण रुपोका +वणेन क~ +|
। रके अव स्तुति करनेका रकार दिखते दै-( पुरमथन । ) हि.
( : -द न ९ 6 9 +
॥ पुरा खर्द् 1 ( कश्चित् ) काद, अथात् साख्य ओर पातंजल
इत्यादि दशर्नोका माननेवाला (इदं सवे ) यह सचराचरसम
स्त ( जगत्.) ब्रह्मांड ( शवं ) निस्य दै, अथात् इसका कभ? नारा
नरी हाता-पेखादी कहता हे ( अपरस्तु ) ओर उसस भन्न दूखरा
- अर्थात बीद्धावि वं) अष [ सारा 1] ससार
ता, अथात् बाद्धाद्क ( सकरकं अशु ) सासा
अनित्य डे यदी सिद्ध करता) ( परः ) इन दोनोदीसखे भिन्न
दीतरागी अथवा तार्किकं (समस्ते अपि. ध १0
~ भ ~+ ~~ रम. ध, आनः
्रोव्याधौव्ये व्यस्तविषये ) इस समध्रभ। संसारम 1 (4 ह
न्य्व सिन्नघमैवर्तौ बने रहते दे-अधात् जगतन ५/९
नित्यत्व दोना दी मिले दै-अभिभाय चर कि प्रथिवी, ज, तज्,
` कादा, काठ, दिच्चा,-आत्मादिकंक ५ तत्य ~
= ज अनित्य हे-रेखा (गदति) कहता हे | अत णव (तेः) |
आर ९ (~ (~ | ट्व न, ~ ५ > ५ |
~ निक द्वारा ( विस्मित दव ) मान चकित होकर (त्वां
उन खब दार ० मि ) बहुत |
नन 9 स्न आपकी स्तुति करताहृआ । जिहेमि ) बहुत राजत
॥ ( खलु ) निश्चय करके ( मुखरता न धुः
; अहो < ।
होरा । ( नञ ) अह नरौ हे अथीत् धृषटदी हे । भाव यह दहे
ण?) बाचाखता धष < ध ड
कि १ कहे हप वानो भरकारकं रतचादियोनें द्वेतदी को स्वी
9 ॥
(भ्य ओः न्मा वर्का स्पहोभी नरह
कार किया हे-दसीसे अद्विवरूपर सन्मा परमद ४ नही
होने पाता-श्सल्वियि इन लोगौकी सिद्धान्त-राखको दखकर म
तो अश्चयेम पडगया ह -दसीसे आपका स्तुत +. राज्ञतं
होरहा द्व-फिर्मी वकवाद्वीपन [डर किमे विना नहो मानती ॥
(§
#
॥
#
4
+< रिवमहिन्नस्तोत्रम् ।
॥
& भाषापयाचुवादः |
एक कहत जग नित्य यह, दूजो कहत अनित्य । ॥
अपर कहत दोऊ मिखुत, जगम नित्य -अनित्य ॥
इहिविधि अचरचंम पसे, अस्ताति करत खुजाङं ॥ #
काह करो वाचारूता ( वकरवादिपन ); खत डिटाई खड ॥९॥
<< भाषाविम्बम् + `
कै कोऊ सारा जगत नित, दृजे अनित है,
्् ॐ + @ , (> (= ~> (अ „९ ५.
~ , . यरे भावै नादी नित आनेत दोऊ मित हे ।
4 ~ ~. ति चकित क्रि = (ना ॐ
यदी भाता कत स्तुति चाकंत ह खाज्ञत वर्नो,
नदीं ढाठी जिह्वा तजति बकवादीपन त्वो ॥ ९ ॥
` तवै श्वर्यं यत्ना य दुपरि विरोचि रैरि रधः
परिच्छन्तं याता वनर मनटस्कन्धवपुषः ।
ततो भक्तिश्रद्यमरगुरुगरणन्यां गिरिद य~ `
स्वयं तस्थे ताभ्यां तव कि मनुवृत्ति नै फङति॥ १०॥
दः मधुसूदनी दीका +ई
पव -ऋछाकनवकेन स्तुतिखाम्रीं निरूप्य स्तुतौ धस्तुतायां
खमस्तश्रमाववतामश्रसस्योाहरिविरच्योरपि त्वत्प्रसादादेव त्वत्सा-
क्लात्कार इत्येव निरतिशयं मादार्म्यं प्रकययन्स्तोति-
क#तवेति# । हे गिरि श,तवानुड्त्तिः सेवा कि न फरति। अपि त
सवेमेवं फति । त्वत्साक्ात्कारपयन्तं फं वदातीलयथेः । तचा- `
न्वथम्यतिरेकाभ्यां कारणतां द्रढयितुं भगवद युचत्तिग्यातिरेके फल.
~ ॥
व्यातिरोकमाह । यचस्माद्नलस्कन्ववपुषस्तेजःुजमूतैस्तवेदवयै
ट ९ वस्तजःपुजमू तंस्तवेद
स्थूल रूपं परिच्छेन्तुमियत्तयावधारयितसुपयू्व विरचिचैह्या अधो-
ऽधस्ताद्धरिर्विष्णुः यज्ञात्सवेप्रयजेन यावदवन्तुं शक्तौ तावदयाौ गतौ
अनक नाऽकम् , न परिच्छन्त समथावित्यथेः । यच स्थखरूपमप्य-
परिच्छेद्य तत दुरे सुकष्मरूपपरिच्छेदसम्भावना । तेन त्वदजुच क्ति चि.
ना हरिविरंच्योः भ्रसिद्धमहाप्रभावयोरपि स्वं न विज्ञेयस्तत्र का वातौ.
9
+न
संस्कृत-भाषार्टकाभ्यां संवङ्तिम्- ५९
ऽन्येषाभिति व्यतिरेकमुक्ताऽन्वयमाह । ततस्तस्मा(त्कारणा)रस्वय-
लवेफःस्यादनन्तरं ताभ्यां हरिविरचिभ्याम् । -छाघद्खङस्थारापा
्ञोप्स्यमानः' इति चतुथी । तयाोज्ञानायव्यथः । कादयाभ्या भाक्त
्रद्धामरगुरखग्रणद्भ्याम् । भक्तिरत्र कायका खवा, ्द्धास्तक्यवुगद्ध
(मानसीसेवा), तयोर्भयोऽतिरायस्तेन गुर श्रेष्ठ नेरातराय यथा
तथा गृणद्भ्यां स्तुवद्भ्यां वाचेकीं सेवां वेद्याम् । यद्ध गुरुतर
। भवाति 1रारूच्याद् तत्पवनपर्जन्यादि भि विक्रियामुपेति अर्घ |
द्रव्यत्वात् , तथा स्तुत्तिरप्यतिगोरववती शिलाच्यादिस्थानाया
पवनपञजन्यस्थानीयेर्विद्नेश्चारयितुं न शक्या गुरुरान्दन ध्वानत्- |
म । एवंरूपेण तवैवं स्तुवच्यां ताभ्यां किमित्याह । _ स्वय तस्थ
स्वयमेव नतु तयोः प्रयल्ेन तस्थे स्वमात्मान भकारय्।त रम । अच
तवैदवयमिति कदेपद् द्रषरभ्यम् । श्रकादानस्थेयाव्ययोश्च' इत्यात्म
नेपदम् । यद्धा यणदृभ्यामिति कतरि कृतीया । तस्थ [स्यत नित्त
मिति भावप्रत्ययः । ततस्तयोर्निदृत्तावपि कि तवाचच्ू्तन फति ।
अपितु फटव्येवेत्यथः । तस्मादेव हरिविराचभ्यामप त्वद् चुबुर्यव
त्वं साक्चाच्छतः का वाती ऽन्येषामित्यन्वय उक्तः । एव त्वद युदासः
व स्वै फरतीत्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां दटीरृतम् ॥ दरपन त गिरो
गोवभ्रनाख्ये रोते गोपी रमयन्निति गिरिशः श्रीविष्णुः । अना 1१
रि मन्द्रं इयति तनूकरोति क्षारोदं मश्चान्नाति शारा । योजनिका
पूवैवत्। दरिः सर्पैः रोषः विरचिदोषाभ्यामप त्वल्पयेव त्वं प्राप्त
खांप्रदायि
ति पूवेवत्सवम् । अचर अनिर दात कचित्पाठः सन
कः । तथा चान्यत्रोक्तम् (नोध्वे गस्य सरसिजथुवों नाप्यध श्या
पाणेरासीदन्तस्तव हुतवदस्कन्धमुस्यो स्थितस्य इति ॥ १०॥
& संस्कृत धका
( शिरि ! ) देगिरिशायिन् ! गिरौ देते इति गिच्य “गिरौ
डद्डन्दासि"” ३ । २। १५-इत्यतो डः । अथ । गिरि राश्रयत्वेना स्या
स्ति-““लखछोमाष्देपामादि-” ५ । २।१० ०-हइत्यादिना शः । तथाचाक्तम-
पि कचित्-“"हसो हिमालये शेते दरि यात महोदधो? । ( अनक
स्कन्धवपुवः ) ञ्योतिस्समूहशयार< १ ज्योतीरूपस्येव्यथेः । ( तव )
भवतः ( पेदवय्यै ) महस्वं, स्थूरखरू मिस्यशः ( यत्नात् ) महता ॥
६० „+ शिवमहिन्नस्तोत्रम् ।
परिश्रमेण ( परिच्छितं ) एतावदिति निश्चेतुं, परीश्चार्थं वा ( उपरि )
उद्धृदेरो ( विरिञ्चः ) ब्रह्मा । “विरिञ्चो दुदिण रिञ्जो वा
डघणो मतः ।”-इति शाब्दाणीवः । काचेत् विरञ्चि रपि रुभ्यते--
यथा “चिरं विरचिनचिरं विरञ्चि" रिति । ( दरिः ) विष्णुः ( |
धः ) अधोदेरा एवं इमो बह्मविष्णू ( अनलं यातौ ) असमर्थो मृतौ ।
कचि “दनिलस्कन्धवपुष' इत्यपि पाटो दद्यत तत्र वायुरायेर-
ख्ये त्यथः । ततो वायुतच्वप्यन्ते लिङ्गस्य मस्तकं कालान्निपयै- ¦
न्तं मूल, बह्मा बह्माण्डव्यापी, विष्णु रसत्वनिवासी कथ मेतो
भवती महिमान परिज्ञातुं समथो स्यातामिति तात्पय्यीर्थः (ततः)
तदनन्तर ( भक्तिश्रद्धाभरगुरुग्रणद्भयां ) भाक्त अजने, श्रद्धा वि.
श्वाखपूर्विक। स्पृहा, तयो भेरः समूहो भारो वां महत्व मित्यथैः;
तेन गु महत् यथा भवति तथा गरणद्धयां स्तुचद्भथां ( ताभ्यां )
ब्रह्य विष्णुभ्या-अज-“"छाघन्ड्ङस्थादापां क्ाप्स्यमानः- १। ७।३७~
इत्यते बोधनार्थै चतुर्था । ( यत् ) तवेदव््यै ८ स्वयं ) स्वयमवं
( तस्थ ) भाप । “ध्रकारान स्थयाख्ययोश्च "१ । ३ । २ ३-इत्यात्मने.
पद्म् । ( तव ) भवतः ( अनुृत्तिः ) सेवनं ( किन्न फलति ) अपिः
त सवमेव ददातीत्यथेः । अन्न कदाचि दहमहमिकया विवदतो जैः
ह्यविष्ण्वो मेध्ये ज्योतीरूपं लिङ्गं भरकटय्य तदाचन्तसीमपरिज्ञाना-
थे माद्य च क्वैगवता तौ असमर्थो सन्तौ स्वय मनुगरहीतो-इतिः
शवपुराणोक्ता कथाऽवगन्तन्या स्कन्दपुराणस्य मादेदवरखण्डान्तः
गेताऽखणाचल माहास्भ्येप्येषा कथा सविस्तर वणितास्तीति च। तथा
2, भ [3 (+ नि
चेव मेवोक्त मस्मत्पित्व्येः "पण्डित चन्ददालरनिपारिनि नजानेः
मितविद्वनाथस्तुतो-
"यः कञ्जभूकमखनाभविवाद काले,
प्रादु ञकार निजवोध मनन्तलिङ्गम् ।
पुञ्यं हरे विधि मपृज्य मत कार,
त विश्वनाथ समया सहितं भजञेऽदम् ॥१
स्कन्द् पु° मादेद्वर-कोमारिकाखं-२३-अ०
, ~ खष्ट्यादौी लिङ्गरूपी स विवादो मम बह्मण; ।
` अभ्र् यस्य परिच्छेदे नाख माचां वभूधिव॥ २<-॥
[१।
सस्कृत-माषारीकाभ्यां सवरितम्- ६ १
= संस्कृतपयानुवादः
" „9 [क | २, भ छ - ~ ।
ज्योतिःस्वरूपस्य हि वेभव न्ते, ज्ञातु तोयो जल शायिदेवः।
ब्रह्मो परिष्टाद्पिनो समर्थौ, स्यातां यदा तो खरबरन्दधन्यो ॥
` धद्धामहाभक्तिभर स्स्त॒वद्धयां ताभ्यां तदा तरस्वय मेव तस्थ । _
स्वयंप्रकाशा ऽद्य | गिरो ! सत्ये, तवा जुत्तिः फलिनी सदेव ॥१०॥
= भाषाटीका %
( गिरिश ! ) दे कैटासवालिन् ! ( अनकस्कन्यवपुषः ) ज्योतिः
पज शरीर धारी,अथोत् ज्योतीरूप ( तव अ पके ( फेदवय्ये )
प्राहासम्यको, किंवा स्थूलरूपको ( परिच्छिन्तु ) परि खनेकेखियि, किः
तना है-इसकी जांच करनेको ( यलात् ) बड परिश्रमसे ( विरिचः )
रह्मा, तो ( उपरि ) ऊपरको ओर ( हरिः ) भगवान् विष्णु ( अवः )
नीचेकी. ओर ( यातो ) जानेपर ( अनलं ) अखमथेदी इु-( ततः )
तदनतर ( भक्तिधद्धाभरगुरुगणद्ध्यां त। भ्यां ) भजन ओर भद्धाके
भारसे गौरवयुक्तदोकर स्तुति करने पर उन् दोनो ही देवधेष्ठोसें
( स्वयं तस्थे ) आपस्वयं मिले अथवा प्रकाश्चेत इण-क्यों कि ( तः
व अनुचत्तिः किन फति १) आपकी सेवा क्या नदीं फलती
हे १? अथीत् सभी फलको देती ह । तात्पय्यं यह € कि-पूबौक्त
ऋछोकोमे स्व॒तिकी सामग्रीको निरूपण किया, किर स्त॒ति आरम्भ
करक परमधनावदाी ब्रह्मा विष्णुभी आपके भजन् आर सवन
से आपको जानसके है थह बातभी धकर करदी-क्यों कि ब्रह्मा तो
बह्मांडभरही म॑ व्याप्त रहते ई, ओर विष्णु जठ तच्वके निवासी
होनेसे उन सवके परे रहने वाजे आपको कैसे जान सक्ते ं-दां
जव आपी स्वयं उनको जनादेते दैः तभो जन सकते है-जेसा
कहा दे- | णठ
“साड जाने जदि दृह जनाई,
जानत तद्ये तदये दाइ जाई । ( तु° ०)
दिव पुराण मे यह कथा दै कि-एकवार बरह्मा ओर विष्णुमे
यह विवाद उठपडा क्रि बडा कौन ? दोन ही सुरश्रेष्ठ रिवके
।
६२ - शिवमहिञ्नस्तोत्रम् ।
पास गये तो उहोने अपने ज्योतिर्खिङ्कका पता रुगाने वाङेको वडा
ठहराया इसपर ब्रह्मा ऊपर चले विष्णु नीचकी। ओर सिधारे-फिर
ब्रह्मान तो ग। ओर केतकी पुष्पको साक्षी देकर अपनकोा अन्ततक
पडचने वाखा बतलाया पर विष्णुने हार मानली-इस पर भगवानने
ब्रह्माको अपूञ्य ओर गांको मलक्भोजी प्वं केतकीको करक ओर
स्पाका स्थान बनाकर त्याज्य करदिया-पर सत्यरूप विर्णुीको
अपनेसेभी शरष्ठ॒होनेकी आज्ञा दी-इसीसे गोका पिला भामं `
शद्ध ओर आगेका भाग अद्युदध दै-ओर केतकी रिव को नरह च
ट ६ जाती, खष्टिकता दोनपर भी ससारमं यज्ञोको छोडकर ब्रह्या
का पूजन नहा हाता-यह कथा कग पुराण तथा स्कन्द् पुराणा-
दिको म भी बडाः पाष्रे जाती दे-इससे यह वात सिद्ध हादी हे
एके पालं जा यह् कह आयक देवते _आपदीके भदक दीहई स-
स्पात्त भगतं ह सा वह्यं वात सबदेवश्चेष्ठ ब्रह्मा विष्णुके ऊपर अनु
ग्रह वणेन करके दिखाई दे-जिससे यह स्पष्ट है कि ये देवते रोः
गभी परमृष्ावकी उपासना करकेदी चड़ महत्व पदको प्राप्तहए ह~
इसं प्रकारसे परम दैव देवताका बणन करके अव द्त्यराक्षसादिक
दर्वोकाभी आगे वणन आरभकरते दह ॥ १०॥
द्धः भाषापद्यानुवादः +
वमर ज्योती िगकी, महिमा बृञ्चन छाय ।
ऊपर ब्रह्मा चदिचरे, नाचे विष्णु सिघाय ॥
थकिके अस्तुति तिन करी, अद्धा भक्ति बटाय।
मिक आप कव नदि फे, तुव सवा पनफाय ॥ १० ॥
द भाषाविम्बम् श
परीछा-लेवको तुव अगम देदवजे पदमे
गये विस्नू ( ष्णु ) नीचे उपरि चलि बरह्मा थकित भे ।
भज खद्धा-(श्रद्धा)मक्ती करि तुरत आपे तिहि मिखे
वंह्यारी श्वासे नाहं लहत सा कोन फल हे १॥ १०॥
संङ्कस्त-भाषार्दीकाभ्यां संवङितम्- ६३
अयत्ना दापा् त्रिभुवन मवैरव्यतिकरं
दशास्यो य द्ाहून श्रृत रणकण्डूपरवरान् । `
हिरः पदाश्रणीराचितचरणाम्भोरुहबलः
स्थिराय स्त्वद्धक्ते छि पुरहर विस्पूजित मिदम्।।११॥
ॐ मधुतूदनी टीका + |
अथ बकिरावणयोरखरयारपि भगवद ग्रहं दरयन्स्तोति-
। अयल्लादिति%# । हे पुरहर, स्थिराया निश्चलायास्त्वद्धक्त-
स्तव सेवायाः विस्पूजिताभेदं प्रभावोऽयम् । किविशिष्टायास्त्वद्भः
=; । शिरःपद्यश्रेणीरचितचरणाम्भोरुहबलेः । -शिरंस्येव पद्मानि
अथीद्रावणस्य तेषां श्रणी पड्किस्तया रचितः कट्पितञ्चरणाम्भोरु-
हयोः पादपद्चयाधलिरूपहायो यस्यां सा तथा । रावणेन हि नवभिः
विजयि सोभिः स्वदस्तछृत्तेः रोभोरुपहारः छते इति पुराणम्रसिद्धः-
म् । कि तद्विस्पूजितमित्यत आह । यत् द शास्यो रावणा बाहः
्विदशातिथुजान् । कीटशान् । रणाय युद्धाय कण्डूः लज्: । तस्र"
हेति यावत् । तया परवशांस्तदधीनानश्चत धृतवान् । रणकण्ड्भहि
रणेनैव निव्ते । रणसखम्मर्वाच्च सर्वदा कण्ड्रेव तद्भुजेष्विति
भावः । तर्हिं रणं सपाद्य किमिति तत्कण्ड्रं न निवतेयतीति चेन्न,
परातिमह्छामावादिस्याह । तिभ्रुवनं चलोक्यमवैरव्यतिकरं न विद्यते
वैरस्य विरोधस्य व्यतिकरः कारणं दपादि यत्न तत्तथा आपाद्य ।
त्रेखोक्य्वाततिनो वरानिन्द्रादीन्स्वदास्यं नीत्वत्यथेः । तदप्ययल्लाद-
` यन्ञेनैव । स्वयमेव रावणपराक्रमे श्रुत्वा सवं वीरा दपौदि च्युक्तवन्त |
इत्यर्थः । तथा चानएयासनेव निजितत्रिजगतेा रावणस्य सुजान |
कण्डूनैव शछान्तव्येष शोयौतिशयो भगवद्भक्तेरेव भभाव इत्यथः । |
आसादय इति कचित्पा ड; । तस्य प्राप्येत्यथंः ॥ हरिपक्षे तु । जीणि |
जाघ्रत्स्वप्रसखषुप्त्याख्यानि पुराणि भक्तानां जीवानां स्वसाक्चात्कारेण |
हरतीति तिपुरदरो विष्णुः । हे पुरहर मोश्चद्ायक विष्णोः दशा- |
स्यो यत्तादशान् बाहून्थुजानश्चत तच्वद्धक्तेरेव पूवै ऊताया इदानीं |
फटस्पेण पररिणममानायाः, अत एव स्थिराया अनककरपव्यवधा- |
वि)
~
ब, डिवमहिन्नस्तोत्रम् ।
| नेऽपि यावत्फरप्यैन्तं स्थाथिन्यास्तव सेवाया विस्फूजितमिदं ना-
| न्यस्य प्रभावोऽयमेत्यथैः । व्वदीयचेकुण्टपुरद्वारपाखस्य पाषेद्प्रव- |
रस्य ब्रह्मशापव्याजेन स्वदि च्ख्येवाखरी योनिमजुभवतोऽपि राव-
णस्य त्वद्धक्तिप्रभावषदेव निरतिखय पौरूष मित्यथेः । तथाच वर्खर्वैर-
| चनेः त्वद्धक्ते्विस्पफूजितमिदं यागलाखायां त्वद्एगमनत्वत्पाणितोय-
| , दानत्वच्चरणाम्बजस्परेनादि एनत्सवे सचयन्सवोधयाति 1 हे 7शे-
रःपद्मश्रणीराचतचरणाम्भोरुह । अच्रापे वेरिति सम्बध्यते । ष-
खेः शिरः प्व पद्मश्चरणी पद्यमयी निशश्रेणिका पादावेक्षेपभूमिस्तस्यां
रचितमर्षितं चरणाम्भोरूह येन स तथा । योगपञ्चपीठे हि भगव-
्चरणारविस्दाधारत्वेन बखेः शिरोऽपि पद्यधीटत्वेन निरूपितम्
-शिर्छब्दस्य निव्यसापेश्चत्वाच्चात्र सपेश्चसमासो न दोषाय, देव.
दत्तस्य गुरुकःरुभितेवत् 1 बिना खल््र मगवद्धामनावतारप्राधनया
पद्ज्यमिता भूमिर्दयेति प्रतिज्ञात, त्र पदद्ययनेव सर्वस्मिञज्जगति भ- `
सवताक्रान्ते स्वसत्यपाखनाय ` क॒तीयपद्स्थाने स्वार एव वलिना `
दन्ते, तच्च मगवतए स्वपादाम्बुज्नावष्न्धाभेोते पुराणभरसिद्धम्। `
नद्यतादशः भरसलादो ब्रह्मादिभिरपि कुग्धोऽस्ति। तस्मादलिक्ृताया-
स्त्वद्धक्तरेव भ्रभावोभ्यमित्यर्थः ॥ १९ ॥ |
= सस्कृत रीका
( अिषुरहर ! ) हे भिपुरविदारक ( दशास्यः ) रावणः ( यत् )
धरलिद्धं ( अयल्ञात् ) विनेव भ्रयासेन ( चिथयुवनं ) चैखोक्यमाचरं ( अ-
वेरञ्यतिकरं ) स्वरा सम्पकंशाल्यं, निष्क ण्टकामित्यथः ( आपाद्य )
आसाद्य, छृत्वा वा ( रणकण्डरपरवरान् ) युद्धखजपराधोनान् , स
छ्मलोल पानिति यावत ( बाह्वन् ) अजान ( अश्चत ) श्चतवान् (त.
त् , शिरः पद्मश्रेणीरचितचरणाम्भोरूदवलेः ) शिरांसि सुण्डान्येवः
पद्मानि तेषां श्रणी पङ्क स्तया रचिता कता चरणाम्भोख्टयोः प
द्कमख्यो बलिः पूजोपहारो यस्यां -तस्याः ( स्थिरायाः ) अचखाया,
टदढायाः ( द्धतः ) भवस्सेवायाः (इदं) भरत्यक्ष ( विस्फूर्जितं ) विक.
चित्तं, प्रतापफर अस्तीतिद्ेषः । अर रावणस्य निन्द चेलोक्यः
राज्याधिपत्यरूपं फं त्वद्धक्ते रेवति भाक्तमदिमा यथावर्स्फुरी-
त इति ॥ १२ ॥ |
सस्कृत-भाषारीकाभ्यां संवकितिम्- ६९
= सरक तपदाचुबादः &
स्वशाच्ुसम्पकं विहीन मेत, वैलोद्स्य मापाद्य दराननो यः।
दधार ( बभार) बाहून् रणरम्पटार्स्वा, नसङ्कामकण्डाते वरावद्ान्वा॥
शिरोब्जमालारचितांघेपद्म-वरेः स्थिराया मवत स्सुभक्तयाः ।
भक्ते ्टद्ानजतिनः पुरार। वस्पू़ाजत त त्पकटं विभाति ॥ ११॥
चः भाषारीका +
( िषुरहर ! ) हेत्रिपुराखरान्तक ! ( दशास्यः ) दरासुख राव-
णत्ते ( यत् ) जो ( अयत्नात् ) विना भ्रयासदहीके ( ैखोक्यं ) ती. -
नो खोकोको (.अवेर्यतिकरं ) अपने शच्रुवगसे रहित ( आपाद्य )
` बनाकर ( रणकण्डूपरवशलान ). सच्रामको खुजलीसरे पराधीन,
थात् युद्धाभखाषी ( बाहून् ) [ वसा | सुजाओको ( अशत )
` घारणकिया ( तत् ) सो, वह ( शिरः णद्मश्रेणीरचितचरणाम्भोरुह
। बलेः) मुडरूपः कमलाकं माखासखे कागई ह चरणारावन्द््क। पूजा ज-
सकी एसी ( स्थिरायाः ) निश्च ( त्वद्धक्तेः ) आपदह।की भाक्तका
` ( इदं ) यदह, अत्यक्ष (विस्फूाजत) विलास अथवा प्रत।प-फठ. हे ।
अभिप्राय यहाके-कुख प्रयत्न क्रये वनाहा नैखक्यिभरका न्क
रकः र।ज्य पाकर प्रातद्धन्दी योद्धा नहीं मिलनेसर अपने बाइअ।
की खुजटखाहटको प्रानेम जा रावण दार्पत बना रहा उसकाका
रण अपने मुंडांको काटकर आपके चरण कमल।पर चदा देनेकी
दद भक्ति दै-अथांत् आपी की सवाका उक्ते यह असाघासर्ण कल
प्रिखाथा ' यथा-
“रन मद मत्त फर जगधावा । प्रतिभट खोजत कतहु न पावा ॥
ब्रह्म खृष्टि जह कगि तचुधायी । दसमुख वलवता नरनास ॥ `
इत्यादे ।
ओर फिर जेसीकि र।वणकी उक्ते अंगदके प्रति कहा गह हे--
“'जान उमापति जासु खुरा,
पूजे जहि प्लिर खमन चट।ई 1
सिर खरोज निज करहि उतार,
पूजे अमित वार त्रिपुरारी (तु ° रऽ)'॥ ११॥
९,
&& शिवमदिन्स्तोत्रम् ।
` दः भाषापद्यनुवादः
विचु प्रयास बरेखोक ह, करि निष्कंटक राज । |
भयउ द्सानन मुलन धरर, परम विवस रन खाज ॥ |
सुड-मारु पद कमर पे, तह्यरे दियो चढाय ।
तुव ढ़ भक्ती विम फक, च्रिपुरान्तक ! आधेकाय ॥ १९१ ॥
|
|
|
।
ॐ भाषाविम्बम् + |
विना जनने जीत्यो चिभुवन घरी रावन सये
अुजासाली दके भयउ रन-कंड् वस्र तवे ।
चडढादौीन्द्यो सीसे करि कमरखु-माला चरन-पे
तिदारी भक्तीका प्रकर फट स्वामी विदितदै॥ ११॥
अमुष्य त्वत्सवासमधिगतसारं भुजवनं |
चरा त्कैरानेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः ।
अङृभ्या पाता ऽप्यलसचलिताङ्गष्ठरिरासि
त्वय [
प्रतिष्ठा त्रय्या सीद् भुव मुपचितो मुद्यति खरः ॥१२॥
र मधुसूदनी ठका +&
, पव वलिरावणयोभक्तिवदादयुग्रह प्रदह्यं तयोरेव दपेैवरालिग्रहं
प्रद् रायन्स्तोति-
अमुष्येति # हे पुरहर, अमुष्य पूर्व्छोकोक्तस्य रावणस्य
भरातष्ठा (स्थात; त्वा अरुसचलेत)ङ्गुष्टशिरसि सति पाताटेऽप्यः
खञ्या जासात्। अटस मन्द् यथा स्यात्तथा चलित क स्पतसङ्कुषठः
दराऽङ्कुष्ठाश्च यन सं तथा तास्मन्। चालटेतामात हस्वत्वच क
म्पतेश्चखतेर्मिं्वाचु शासनात् । तथाच तवाङ्कुछठकम्पनमारेणेव तस्य
वौरयासमिमानिनोऽधः प्रवेरोऽ्दयाक्यपरतीकार आसादित्यथेः। अमुष्य
कि कुवतः | त्वदधिवसतावपि केलासे तव मान्द्रेऽपि स्फटिकगिरो
भुजवनं सुजच्न्दं विशातेससख्याकं बखाद्धिक्रमयतोऽतिन्लोर्येण भ्या
पारयतः 1 दमसुत्पास्ये छङ्कायां नेष्यामीत्यमिप्रायेण भजचेष्टां कवे
सस्कृत-भाषारीकाभ्यां सवलितम्- ६७
व्यथे: । कीदशं भुजवनम् । त्वत्सेवासमाधेगतस्रार तच सवया
सर्माधिगतः प्राक्त: सारो वख यन तत्तथा । त्वत्प्रसादनव बलमा
साद्य त्वदृगरहमुत्पारयतीत्यदो रतघ्नता माल्य चेत्यभिप्रायः। एवं
हि पुराणभ्र्लिद्ध “भगवत्प्रसादादासादितवबरन रारणत स्वबङ्प-
राक्षाथ भगवन्निवासस्यापि केडासस्याोत्पारनमारन्यम् । ततश्च षाः
वेलया भीतया प्रर्थैतो भगवान्केासस्याधोगमनाथमङ्कषछाप्रमात्र
शनेव्याी पारयामास । तावन्माजेणेव शक्षीणवखो रावणः पाता भ-
विवेका । पुनश्च भगवता करुणया सञुद्ध्रतः' इति । नलु भगवल्प्र-
सादा्छब्धवसे रावणः कथं भगवन्तं तदानीं षिस्खछतवानित्यत आ
ह । धवं निश्चितं उपचितः सश्रद्धः सन् खटः कतन्न। सुह्यात छत
विस्मरति स्वोप्चयदेतुमपि न गणयतीत्यधः ॥ दरिपक्षे ल॒ । के-
लासे कष्टिः क्रीडा चव प्रयोजनमस्येति कैकः केखोऽसिः खड्गो य
स्य सः केटाखिः । इच्छामात्रेण निकिंतसवरानोरापे तव क्रोडाथ-
मेव नन्दकधारणमित्यथः 1 अमुष्य बखेः त्वदाधक्सतोा त्वाचवास
तव स्वरवास्पदीभूतेऽपि चंखोक्ये बरुन्मद्प्यामद् त्रैखोक्यमिति
स्वत्वाभिमानाद् भुजवनं दस्तोदक विक्रमयतः मम स्वत्वत्यागपूव-
कमेतस्य प्रतिग्रहीतुः स्वत्वमुत्पाद्यामाव्याभप्रायण भगवतः पाणाः
वुदकं घ्रयच्छतः । कीट सुजवनम् । त्वत्सवया समाघगतः खारः
सौ भाग्यविन्ञेषो येन तत्तथा । तव पाणिपद्मसंबन्धेनातेतरां शभ
मानसुद्कामेत्यथ | तथाच सचजगान्नचासस्य तच स्वत्वास्पद्ा बूत
यत्तत्स्वकयामेति मत्वा तुभ्य ददता बरङुमदहानवापरयवः । त्वया तुं
परमक्रारणिक्तेन प्रतिनज्ञातविक्रमजयामतश्रूमद्न-~ चि तस्य साम
्यमासाय तस्य (९)मत्ततानिद्त्तय याभ्य एव दण्डः रत इत्याह ॥
त्वयि अख्सचचिताङ्खष्टशिरासे सति तस्य ब्रातष्ठा पस्थातः पाता-
` छेदलभ्यासीत् का वाती स्वगैमत्येयोः । अथवा पाताल ष्वेद्यमानः
स्यापि बटठेरिन्द्रादिभिरप्यरभ्या व्राता कातराखात् । त्र सवेद्ाए
भगवतः संनिहितत्वादिति भावः । जल्स सरीर चेतः कार्प-
तोऽङ्कष्ठः शिरास अ्थाद्र्यर्येन तास्मिन् । यथा तृतायाक्क्मभूम्ययः
वलिना द्विरसखि पसारिते तत्न च. त्वदायपादङ्खृष्ठसबन्धमान्रेणेव
1 न न न नव अब न नग्नो
(९) 'ममतानेवृत्तय' इति पाठः ।
९ ` शिवमहिन्नस्तोत्म्।
तस्य पाताखग्रवेखो जात हइत्यथैः । धुवसुपाचेतो इत्याय्र्थान्तरः
न्यासः पूवंवत्। अथवा खलखाऽयमसखुरो बारेरुपाचतः मुद्यति । अ-
तो मोदानेच्रत्तयेऽपाचतः कतेव्य इति भगवतोऽभिप्रायवणनम् । "य.
स्याहमयग्रडामि तस्य वित हराम्यहम्" ति भगवद्धचनात् ॥ १९२॥
छ सस्त टीका शु
षे भगवन् ! हत्यध्यादाय्यै ( त्वत्सेवासमधिगतसार ) भवदारा-
घनबलेनैव भ्राप्तचरं ““सासे-बले स्थिरांरो च । "-इत्यमर-मेदिन्यौ ।
( जवन ) वाहुखम्रहं. चिं रातिखङ्ख्यकःवा दन मिवे त्यु पमिति स.
भासः । ( बलात् ) रक्तिपूवेक-५अपादाने पञ्चमी ''- २।३। २८।
( त्वदधिवसतौ ) भवतो निवासस्थाने ( केलासे ) स्वनामाविख्याते
हिमणशिरिश्चिसखरे, के जे खासो -यस्य सः-केलाखः-हखदन्तात्"
& । ३1 ९%-त्यक्-तस्यायं कैलासः । अथवा केटीनां समूहः कै.
रछ-“तस्य समरूहः'-७ । २ । ३७ इत्यण्-तेन आस्यते अचेति, आस
उपवेराने- “द कश्च -२ । ३ । ९२१-इति घञ्य् । ( विक्रमयतः ) स्वप.
राक्रमं दशोयतः ( अमुष्य ) पूर्वंकथितनाम्नो रावणस्य ( त्वयि )-
( अरुसचाङेत ङ्गष्ठरिरसि ) अङसेन अप्रयत्ना देव चितं अधः
छृत अङ्ष्ठस्य शिरः अग्रभागो येन सः-तस्मिन् । पता त्वयि भ-
वति सति ( प्रतिष्ठा ) स्थितिः ( पाताटेऽपि ) रसातलायधः परदे
शेऽपि ( अलभ्या ) सवेथा दुकमा ( आसत् ) बभूव । अहो ! यु-
क्त मेवेतत् । यतः ( उपचितः ) उत्छृष्टलक्षम्या सम्पन्नः सचद्धो वा
( खरः ) इुज्ञंनः ( मुह्यति ) मोहं प्रापनोव्येव-इति ८ वं ) निथि-
तम् । अथोन्तरन्यासेनव कारणानिरददाः। अत्र कदाचि र्स्वभुजदर्षितो
रावणः केखसपवेत सुच्चसरान, ततो भगवता निजाङ्कश्ठा्नमागन ना-
मितो गिरिस्तं नितरामपीडय दिति फोराणिकी कथाऽजुसंयया ! ॥१२।
+ सस्कृतपयाऽचुवादः + स
त्वदीयसेवाक्तमहावरु वराद् ,-भुजावनं दरेयतः पराक्रमि ।
दशाननस्यो दरतोऽ तिदर्पिणः, त्वदीयकेखासनिवासपर्वतम् ॥
अभू कम्पना 'दरसातचेऽपि स्थिति रेव ड्भ ।
इदं परं निश्चित मेव धूजटे ! खरः सद्द्धः खल्युं मुह्यति प्रभो !॥१२॥
।
संस्क्रत- भाषारीकाभ्यां सवङितम्- द९
= भाषाटीका ऋ `
ठेभगवन् ! ( च्वदाधेवसतौ ) आपके निवास स्थान ( केलासे.
ऽपि) करल(स पर्वतम मी ( व्वत्सेवासमधिगतसार ) आपहीकीं
तेवासे प्राप्त हए बरसे परण `( जवन ) { वीसों | थुजारूपा वचन.
को ( विक्रमयतः ) पराक्रमी दिखाते हप (अमुष्य ) इसी पृवाक्त
राचणकी ( भ्रातिषठा ) स्थितिः. [ रदाइख ] ( त्वयि ) आपके ( अरस-
चलिताङ्घठशिर सि ) [ खति ] नलसाते इये अंगुठाके अग्रभागको
हिरदेने पर ( प।तालेऽपिः ) पातारूमभी ( अरूभ्या आसीत् ) नीः
( शवे उपचितः खलः, मुद्यति ) यदह बात श्व हे कि,
मिक सको
चदा इञा दष्ट अथवा रुतन्न मोदको भरा दोताहा द । अभिधाय
स्पष्टदैकि- ५
रते भुजाओं को खुजखाने वाला रावण जव
पना जोडी योद्धा नही पाखका तो जआपरहीकी स्रवासे बल-बलरा-
ते हप अपने अुजोक्ण खज्टी भिरानेके किए आपदीकं निवास
स्थान केकास पवेत को उठाने कगा पर जव आपने अपने अंगुठाके
कसे दवा दिया तो उल पातारं भी ठिकाना नदीं मिला ।जा
वह आपदीसे वर पाकर अ{पहीको बर दिखने रगा सो यह कोई
आश्चर्य कौ वात नदी षे, कयां कि ओ ग अथवा दुष्ट जनं बः
दती पाकर अवदयमेव मोदान्ध दो जात ६, जेखाकि. कहग । ..
८भविषयी जीव पष्ट प्रथुतार (11,
मुद मोह वख होहि जनाद ।
अथवा
५जयहितें नीच बड़ाई पावा, न
सो प्रथमरि दि ताहि नखावा । ” ( वड रा )
य ही रावणके कैट(स उठाने की बातभी रामायणम इस तैति
वही युद्धकी च
~
से कही गर दै-- | |
"कौतकदी कै कास पुनि, दीह्े्ि जाई उठाई ।
मनँ तौलि निज बाहु बल, चद अधिक खख पाद् ॥ **
अथवा अगद्के धरति भौ सावणकी फेसीही एक उक्ति लिखी दहै
` ध्वुनि नभर मम कर निकर, करि कप्रखन पर बास ।
७० शिवमदिस्नस्तोत्रम् ।
सोभेत भयड मरार हव, सथु सहित कैलास ॥,
श्सी भाति केटासको मदादेवका निवासभी लिखि यथा-
“परम रभ्य गिरिवर केखासू,
जदा सदा सिव उमा निवासु' 1 ( तु° रा०.) इत्यादि॥१२ ॥
. @ भाषापदयानुवादः +
सो तुव सेवन पाइ वरु, निज भुजवन पनकाय ।
तुब निवास केलास गिरि, ब करि कयो उखाय॥
| ` ~: रचिक अगूटा-नोकते, चापत गयड पताल ।
खरु सपाति पये अवसि, परत ( फसत ) मोहके जाल ॥ १२ ॥
चः भाषाविम्बम् + ॐ
अुजौामं सवाते परम-वर पाई तुमदिसोः ।
उरखाख्व चाद्यो गरब-वस कैखास गिरेको। ; ~ 8
` अगूठाके दाचते दसवदन पातार घलिगो, | |
सखद्धी पविते अवाति खर मोहान्ध वनतो ॥ १२॥ ` |
ट पे यटाद्धे सुत्राम्णो वरद् परेमाच्चैरपि सती-
मधश्चक्रे बाणः परिजनविधेयान्रेभुवनः । |
न तच्चित्रं तस्मि न्वरिवसितारि त्वच्चरणयो-
ने कस्या उन्नत्यै (१)मवति शिरस स्त्वय्य वनतिः १३॥
ॐ मधुमूदनी टीका श्रुः
8 वत्र भगवद्धिषये खमुन्रतयो्वलिरावणयोरट्यन्तमवनतिरदूदिता।
अश्ुना तज्रावनतयोरिनदरवाणयोरत्यन्तसुब्रति ददयन्दरिदरे स्तोति- `
#यदिति# । सुत्राम्ण इन्द्रस्या सपत्ति परमोच्चैः सतीमष्य-
धाश्चकरे न्यककतवान् । बाणो बलिखुतः । कीदशः । परिजनविषेय-
चिञुवनः परिजनो दासस्तद्वद्विथोयं वद्यं त्रिभुवनं यस्य, पारिजना-
नामिव विधेय वदयं चि्चुवनं यस्येति वा। स तथा उच्चैः सर्तीं य-
व्धच्कर तदन्यत्र चित्रमपि तस्मिन्बणि न चित्रं नाश्च्म्। कीदस्चे ।
(९) खन्लेवतित्रक्तिः गक 'युन्नल्य इति भरचकितः पाटः ।
संस्कृत-भाषाटीकाभ्यां सवङितिम्- ७९
त्षेश्च रणयोवेरिवसितरि नमस्कतेरि शन्द्रसपत्तरप्यधः करण त्वन्नम-
स्कारस्य न पयोघफलं कित्वेकदेशामात्राभिस्याह ॥ न कस्या शति ।
स्वयि विषये शिरसो य{ऽवनतिनैमस्किया खा कस्यै उन्नत्यै न मव-
ति। अपि तु सर्वामेवोश्नति मोक्षपयैन्तां जनयितुं समथो मवत्येवे-
स्यशचैः । अवनातिरप्युन्नतिदेतुरित्यतिश्योक्तिसकीर्णो ऽयमथोन्तर-
न्यासः । सर्वोर्छृ्टत्वमचिन्त्यमाहिमत्वे च भगवतः सूचयतीति भा-
चः | हरिपक्षे तु । हे परम वरद; सखुजास्ण इन्द्रस्य वाणः शर ए-
कोऽपि ऋद्धि सपत्तिमु्चरघोऽपि सर्तीं त्रिखवनञ्यापिनीं चक्रे
रतवान् यत् तत्तास्मन्खुत्रास्णि न चित्रमित्यादिपूवेवत् । त्वत्पर
साददिय सवोनसुरानेकेनापि ब {णन जित्वा क्जिभुवनराज्य प्रा
तवाजिन्दध इत्यथः । अत्र बाण इति दाखमात्नोपटक्षणम् । कीरशो-
वाणः । परिजनवद्धिधियमायत्तं त्रि्ुवनं यस्मात्स तथा । षं
पूववत् ॥ १२ ॥
क संस्कृत टीका भ
( वरद् ) देवरद्ायक । ( परिजनविधेयत्रिभुवनः स्वद्ासी-
छृतत्रेखोक्यः ( बाणः ) बाणनामाङ्धरः ( यत् ) क्ियाविशेषण मव्य-
यपदं ( खउत्रास्णोऽपि ) इन्द्रस्यापि, किसुतान्यषां । खुप जायते इ-
ति सुत्रामा-“आातोमनिन कनि व्वनिपश्च- ३ । २। = त्यनेन म-
निन्बत्ययः। ख-उद्-दव्यु पसगेद्वयश्रयायातः सूजामा दुनि रपि
भवति । “खुत्रामा गोत्र भि जी वाख चुन्रहा शा । इत्यमरः ।
( परमोच्चैः-सखतीं ) परममदस्व गतां ( ऋद्धि ) सछाद्ध दवराजाध्ल-
पत्यसस्पदमिति मावः । (वाप ) तिक ( तत् ) यत्तदो-
नित्यसम्बन्धः । ( त्वच्चरणयाः ६ - ( वरिस
तरि ) शुश्रूषके वरिबस्यतीति वरिवखिता-सवक इत्यथः । नमा
वरिवश्ित्रङ १ कयच्- १। २ (4 मन्दत क्यच् ह तत~ क्यस्य
विभाषा” ६।७। ५०-टति यलोपच्च । ( तिमन्र ) बाणासुर (चि
जं न ) आश्चय्येस्थानं न भवति । धवः ५ ), भवतो विषये
( शिरसः ) मस्तकभागस्य { अवनत, ) ने, प्रणाम इति
तौ यावद् ( जपि ) किख शषणमिति-अपिमावः । ( कस्य ) साघार- |
तस्या पि जनस्य ( उन्नत्यै ) अभ्युवाच ( न भवति ) अपितु सखचैषष |
७२ रिर्विमहिश्चस्तात्रम्।
` मेव महोदयदा्री सम्पद्यते इतिध्वनिः 1 अत्र शिरसो ऽवनत्यैवो न्नः
ति ठेभ्यते इति विरोधालङ्कारः । यदा भवतः धणामेनेव परमेत्करषः
खछाभो भवति तद्वा परमाराघकेन वाणासखुरेण रेन्द्रं पद मधरीहृत ख
त त्किमाश्चय्यं मत्य भिघ्रायः स्पष्ट एव । पतेपूक्तेषु त्रिषु -ऋछोकेषु प
रमञ्चेवानां रावण-बाणादीनां बलप्रतापादिकथनेन घरभोरेव महिमोः
त्कषचणनं विशादीकूतम् ! खापराघानां तामसाना मपि निजभक्किः
तत्पसणां पस्माुन्रादको भवनिवेति ध्वनितम । नञ मगवन्महिभः
वणेना मारभ्य किमिति परमपापिष्ठानां दैव्यराक्षसाद्योनां कथोच्य-
ते-इतिचेन्न । भगवत्यादपद्मपणिदितमनसां केषाञ्चि दपि स्मरणं
विभो स्तोषकं स्मतेणा्च मङ्गलजनंक मेवेति ।
रावणशङूत रिवताण्डवस्तोञं खुप्रसिद्ध | भेव परन्तु वाणङूत-
दिचताटक मपि स्कन्द् पुराणस्थं द्रष्टव्यम् ॥ १३ ॥ ¦
चः: संस्छृतपयाजुवादः भ |
पुरन्दरस्यापि महासखद्धा सब्द्धि महाय महोन्नतां यत् ।
+ तिरञ्यकार 1 स्स्वदासीकृतसधलोक ; ॥
त्वत्पाद् पङ्केरुहसेवके तत्त्, तस्मिन्न वैचिञ्य सुपेति किञ्चि
स ् 0 भ क (भ ति त् ।
रता त्वद थं रिरखो नति हिकस्यो न्ति श्नेव करोति शम्भो! १३
¦ दैः भाषा रीका $
( वरद् ! ) देवरदानोन्मुख ! ( परिजनविधेयचचिभुचनः ) अपने
दासाके समान वनादिया है बेलोक्यमाघ्रको जिसने पसे (वाणः)
वाणाखुरने ८ यत् ) जो ( खच्राम्णोऽपि ) देवराज - इन्द्रकीभी ( पर-
मोच्चेः सतीं ) बहुत वदी भारी ( ऋद्धि ) सख॒द्धिको (अधराचकर)
नीचे करदिया ( तत् ) सो, वह ( त्वच्चरणयोः ) आपके चरणके
( वरिवसितरि ) धणामकरने वारे अथात् सेवक ( तस्मिन्) उस
वाणाखुरके विषयमे _ ( चित्रं न) क आयंजनक नहीं है
कथाकि ( त्ववि.) आपके ल्यि (कस्य) किसजनका ( रतै
अवनतिः अपि ) सिरका काना भी ( उन्नये ) अभ्युद्यक्त छप
(न भवति) नदीं दोता-अर्थात् सवी प्रणामं करने वाटेका मरोदय
होता हे । भाव यहकि-तेलोकयविज्ञयीं बाणासुरने. जो इन्द्रकी
संपत्ति को लु समद्रकर नीचे करिया सो तो कोद आश्चर्यकी
संस्छत-भाषारीकास्यां सवरितम्-- ७३
वात नदी दै, क्योकि वह आपका परम उपासक था, पर लाधा-
। रण जन भी अपके निमित्त सिरको नीचा करेतो बड़ी ऊंची
उन्नति को प्रा करकेता है। यहां पर सिरके जुकानेसरे ऊची
गतिका पाना वणन किया दे-इससे विरोधारुकार तथा -अतिडा-
योक्तिके खित अर्थान्तरन्यास का समावेश स्पष्ट है पूर्वोक्त चारा
-चछोकौसे महादेवोपासक . सच्वगुण-बेश्चष्ट विष्णु, रजोगुणी
ब्रह्मा, ओर तमोगणप्रधान राण बाणास्ुरके ` उत्कषंकी कथा खू-
चित करके भगवानकी बड़ी भारी मदिमा दिखायी हे। शस पर
रावणादिक अद्ुर रा क्षकं बल ओर प्रतापादिकः वणेन करनेसे
पाप~कथाक उल्येखका सदह नहीं करना चादिप्-कयाकि इदवरके
चरणा-रवेन्द् का उपाखना करने वारे सबीरोग का स्मरण करना
पगवानक्रो भाता ओर मेगल्को देतादी है-इसस ` भगवानहीक
महिमाका प्रभाव सूचित क्रिया गया है ।. कथे्कि जगदीङ्वर् अपः
ली अपेश्चा अपने भक्ताको वडा सुनकर विष प्रसन्नदाते . ह? व
की क ~ ऋ + ओज [
अपन सवकौको अपनेसे ऊपरी रक्खा चाहत ज्ञेखा कि
~
| कटा ह -- ध
शश्र तख तर कपि डार परः ते किय भु समान् ।
क
र- |
भरे मन प्रभु अस विखलवाखा रामत अधिक्र रामकर दाख '॥१३॥
भाषप्रयाजुवादः ५)
जा इन्द्राखनकी कशा, ऊचो सपति नाच
~~ वतहधो सतै, सवक चिथुवन वीच ॥
चाना-सुर कगेदघा सव, सवक जु ॥
यह नहि अचरज ताहिरगि, तुव पद् स्रवत जाय ।
काहि न उन्नत करत सिर, त॒बदहित अवनत हाय ॥ १३॥
=; भाषाविम्बम् २
तृन-सरिस सम्पत्ति महत,
नायो दासखसा संकटः जग वानर वरा ।
न्न स नही होत कद्छुभो,
ह्यारे भक्तापे अचरज तकच्मी, _
नाने कने (अं) रहत नदि का उननाति भरू ( बडा ) ॥ १६ ॥
क्री इन्द्रा खन्कः
4 @
9४ क्षिवमटहिन्नस्तोत्रम् ।
अकाण्डब्रह्याण्डक्षयचकिंतदेवासुरकृपा-
विधेयस्या सी य खिनयन विषं सहतवतः ।
स कस्माषः कण्डे तब न कुर्ते न श्रिय महो
विकारोऽपि इखाघ्यो भुवनभयभङ्गव्यसनिनः॥१४॥
+ मधुसूदन टीका
अधुना कालकूटप्रख्यजल्योः सहारं ददायस्दाकरनारायणो
स्तोति- |
अकाण्डा #। हे त्रिनयन, विष समुद्रमथनोदभूतं कारक्र
रखाख्य गर सदह्धतवतः पीतवतस्तव कण्ठे यः कटमाषः कालिमा-
सत्स कालिमा तव कण्ठ क्रियं शोभां न कुरूते किम् अपितु
ङ्रूते एवेत्यथेः । नज भगवानतिरायितविदोषदरीं मदानथदे तुकं
विष किमिति पीतवानित्यत आह । अकाण्ड इति । अकाण्डेऽसमये
ब्रह्माण्डश्चयो महाभ्रख्यो विषो्मिवेगात्सं मावितस्तस्माच्चकिता भीतां
देवाऽसुरा इन्दरबिपरशुतयस्तेषु कृपा द्या तया विधेयस्य वदयस्य।
अन्यस्येतत्पाने सामथ्यै नास्तीति विदहवक्राणाय विधं स्वयमेव पीत-
वानित्यथेः। ननु विषविकारात्कल्माषः कथं कण्डे शोभां तनोतीत्यत
आह । अहो इत्यादि । अदो आश्रये । भुवनभयभङ्भ्यसनिनः परमे-
वरस्य विकारोऽपि दलाध्यः प्रदंसनीयः । श्ुवनस्य खोकस्य भयं
जाखस्तस्य भज्ञो निरन्वयनाद्छः स पव व्यसनं सर्वमन्यद्धिहाय क्रि-
चम णत्वल्यसन तदस्यास्तीति तथा तस्य । तेन जगदुपरृतिरतं
दूषणमपि भूषणमचेत्यथैः ॥ ह्रिपक्चे तु । हे जनयन याणां
खाकाना नयनवत्सवावभासक, (तद्धिष्णोः परमं पदं सदा परयन्ति
सूरयः । दिवीव चक्षुराततम्" इति श्चुतः । अकाण्डेऽका> ब्रह्माण्ड.
क्षयो महाप्रलयः । दैनंदिनप्रख्यजलपूरवेगात्संभावितस्तस्माच्च-
किंताये देवासुराः स्वायसुवमचुप्रतयस्तद्धिषयकर्पावदीकुतस्य
तव धिषं जरं "विषं क्ष्वेड विष जरम्' इत्यादिकोशात् । तच्च
प्रर्यकारीन यज्ञवाराहरूपेणावगाद्य पङ्कीरत्य संहृतवतः न्ोषिन.
वततः पङ्कव्यामिश्रणन यः कल्माषो मलिनमासरीत्स कटमाष; स्तो.
सस्कत-भाषारीकाभ्यां सवङितम्- ७९
तृभिर्बण्यमानः अथा्स्तोतृणां कण्ठे थियं शोभां न कुरुते इतिन।
[र भ १
अपितु कुर्व पवेव्यथः । अथान्तरन्यासः पूवंवत् ॥ १४ ॥
= संस्कृत टीका + |
( निनयन ! ) हे चिखोचन ! ( अकाण्डव्रह्माण्डक्षयचकितद्वा- ।
खर कूपाविधरयस्य ) अकस्मा देव असमय प्वेति वा, ब्रह्माण्डक्षयेण
समस्तब्रह्माण्डगोलकविध्वंस्ेन, आकालिकपरर्यसम्भावनयेति या- |
वत्, चकिताः विस्मयाविष्टा ये देवा अखराश्चतेषुकूपा विधेया
कर्वञ्या यस्य तस्य, अर्थात् परमकारुणिकस्य । तथा (विष) क्षीरो- |
दमशथनोद्भूतं कालकूटं महाविषं ( संहृतवतः ) निगीणवतः, विष-
वायिन इव्यथः ( तव ) भवतः ( कण्ठे ) गख्देे, यः ( कल्माषः }
ऊष्णपाण्डुरो चणैः¦ कलयतीति कल्-“किप्-**३।२।११८। माषयत्य
मवति वर्णानिति माषः “हन्त्य्थाश्चे"-ति चुरादौ पाठात् णिच्च
ततः कठ् चासौ माषश्च कट्माषः। “कट्माषो राश्चस कष्णे शवले
ऽवा -ति देमचन्द्रः। नौलिमेव्य्थः। ( असीत्, स कि धियंन
करुते १ ) रोमां न करोति, इति ( न ) अ पित परमां धियं सम्पाद्-
यति । द्धौ नञौ परतां [ दायं ] बोधकौ भवतः। कचित् च इत्यपि
वाड स्तत्र वितर्केऽरथो विधेः । ( अदो ! ) युक्त मवं तत्, ( सुवन
भयमङ्गब्यसनिनः ) सकरुलोकव्रासनिवारणतत्परस्य _ पुखगस्य
( विकारोऽपि ) महान् दोषोऽपि सवथा ( इकाष्यः ) स्तुत्य पव
अवति । अत्र परमदयादं भगवन महाविषं निपीय चलोक््यरक्षणा्थ
त्रेवात्म(नं नीखकण्ट अकारे तिपौराणिकी गाथा खभ्रसिद्धा पि महेशः
स्तुव्या तीवसमीचीना कतति द्रष्टव्यम् ॥ _ ५
उक्तं च स्कन्द पु० माहेदवर-कोमारका-लग्ड ३३ अ~
५अ काण्डे यच्च ब्रह्मण्ड श्चयोदुक्त हल! टम् ।
कण्डे दधार धीकण्ठः कस्तस्मा त्परमो भवेत" ॥ २१॥ |
ॐ संस्कतपद्याचुवादः % =
अकाण्डलोकश्चयभीतदेका-खराजुकम्पावराचातन् स्त |
य त्कालक्कूरं पिबतो वभूव, महाविष उयम्बक ! नीरखुकण्ड ! ॥
्मीलवर्णत्व मतीवद्योभां, करोति शम्भो } भवतो जु कण्डे ।
्ह्माण्डरक्षाकरणोयतस्य,दलाघ्यो विकारो ऽपि सद्ा महद्धिः॥९४।
७६ ` हिवमहिश्तस्तोत्रम् ।
> ` =+ भाषाटीका & ह . 4
पूरवीक्त चारो छोकोनिं भगवद्भक्तोकी मदिमाको भरकर करके
अव साक्षात् भगवानकी महिमाओंको आरभ करते देँ । ( चिनयः
न ) हे चिटोचन । ( अकाण्डब्रह्माण्डक्षयचकितदेव(खुर-कूपावि ध.
यस्य ) अचानकी सचराचर ब्रह्मांडभरको नाश होता इअ स:
मद्यकर धवराये हप देवता सौर असखुराके ऊपर -दयाके बहाव
होकर ( विषं ) क्षीरसागरके मथनस्रे उत्पन्न हुए कालकूट नागरक `
महा-विषके ( सहतवतः ) पीडाखने वाले ( तव ) आपके ( कण्ठे )
कट्रजो ( कट्पाषः) नीखापन हदोगया हे (सः) वद (रियंन
कुरुते-इति-न ) शोभाको नक करता है पेखा नदीं है-अथोत् बः
इत बड़ी शोभाको बद्धा रहा है ( अहो )-आदचर्यखूुचक अभ्यय
पदहे । ( भुवन-भय -भज्ग-उ्यसनिनः ) . समस्त सखसारके. भर्योके।
भगकरदेन वारे व्यसनाका ( एवकारोाऽपि -्छाध्यः) विकार भी सः
चथा प्रराखादहोके योग्य. दै-अथात् यहकि-यदि आप उख काठ-
करूर विषको नर्द पीते तो समस्त ससारही उससे भस्म दोजाता
| अतः देवता दत्यांका भेद त्यागकर आप वड द्या करके उसे पी-
| कर स्वय नाककठ -वनगये, इससे आपकी दोभा कु घटौ नदी
् वरन् ओरभी बढगडई, क्याकि जो कोद ओर सव कार्मोको छाड
अपन सुखकरं त्यागकर ससारमात्रके भयका दूर करनेमें पकाश्र
चित्तसे ्गजाता है उसका विगडजानाभी भरासितद होता दे।.
यही भाव स्पष्ट हे जेसाकि कहाभी ह। | ।
५ (( 9, क क, क % 4 १ | व , स १
च परहित खागि तज । सतत सत प्रसंसहि तदी” ॥
- “जरत सकर खरच्रद, विषम गररु जेहि पान किय ।
तेहि न भजासि मतिमद. को दयार सकर सरिख' ॥ (त०्रां०)
॥ ॑ स भाषापदयाचुवादः +
अनायास ( विनि कार ) बह्मांड छय,-च केत सुरार देलि।
कालक्रर विष पीजियो, तुम करि छपा विसषि ॥
सो नीलापन कठ; तुमरे सोभा देत ।
भव भय भजन व्यसनिकर, विरति प्रसंसा हेत ॥ १४॥
संस्कृत ~भाषार्टीकाभ्यां सवङ्ितिम्- ७७
‰ भाषाविम्बम् `
अनायास लोकै भसम कश्देतो कालि विवे
उट।के पीठीह्णथो त॒म कारे दया दत्य सखुरप ।
वही सोभा कारा (नखा ) पन रागिकर कठतख (मनि) मो,
विकारो गति है जगत अयदारी-उ्यसानक। ॥ १४६ ॥
असिद्धार्था -नेव क्वचि दपि सदेवासुरनरे
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः ।
सं पर्य नीर त्वा भितरसुरसाधारण मभूत
स्मरः स्मक्षव्यात्मा न हि बडिषु पथ्यः परिभवः १५
| & मधुसूदनी टीका ४
अथ कामस्य जानिनिधने दरेयन्हरिहर। स्तत्ति- .
` #अलसिद्धाथी इति । हे इरा, यस्य स्मरस्य विशिखा बाणा
सदेवासुरनरे जगति देवाखुरनरादि सित् जलिः जयिन उत्खष्टाः
क्चिद्यासिद्धा्था अङूतकाया नं निवतन्त । अपित् सिद्धाथो णक
नित्यं जयिनं पव भवन्ति । जयिन इति स्मरस्य वा विशेषणम् ।
नित्य जयद्चीखस्यत्यथः। सख पतादशापोरुकवानपि स्मरः यथान्यः
देवा मम जय्यास्तथाऽयमधीतीतसर्दैवठल्य त्वा पयन् स्मतेव्यात्मा
भ्रूत् स्मतव्य स्मरणीय आल्मा शरार यस्यस तथा । नष्ट दइत्यथः।
पदंयन्निति देतो शतृप्रत्ययः । लश्चषणहेतो च शातः स्मरणात् । "तदधे
तत्पद्यन्नेविवीमदेवः प्रतिपेदे ईइातवत् । तनेतरदेवसाधारणत्वेन
त्वद्दीनमेवाव्यवधानेन विनारादेवः का बातो परिभवदेरिति भा
चः । तन्न कैमुतिकम्यायमादं । नहीव्यादि । हि यस्माद्रिषु जिते-
न्द्रियेष्वन्येष्वपि परिभवास्तरस्कारः पथ्यो हितो न भवति । स्वना
जायेव संपद्यत इति यावत् । 1क पुनः परमवरिनां बरे परमेश्वरे
। व्यर्थः ॥ हस्पिश्चे त । हे इतरसुरसवेविलक्षण देव, पूवे स्मरत.
व्या स््रताऽपि स्मरः कामस्स्वा पदयन्नभूज्ञातः। त्वस्सकाश्चा-
॥॥
७८ = शिवमटिन्नस्तोत्रम् ।
ञ्ात इत्यथः । पितेव खलु पुत्रं जातमान्नरमयरोकयति, अतः पुत्राः
ऽपि तमेवावलोकयतीति पक्यन्नभूदिव्यनेन जन्यजनकभावो रभ्य.
। कथं जातः । साधारणं तव तुल्यरूपं यथा स्यात्तथा । आत्मा
पुत्रनामासि" इति श्रुतेः । तत्क सवीशेन भगवत्तद्यः, तथा चन
तस्य प्रतिमाऽसिति यस्य नाम महयशः', न तत्समश्चाभ्यधिकश्च व
द्यते" शव्यादिश्चुतिविरोध इत्याशङ्य वेरक्षण्यमाह । नदीत्यादि ।
वरिषु जितेन्द्ियेषु टि यस्मात्स्मरोन पथ्योन हितः। तत्र देठः
परिभवः परिभवत्यनथं योजयतीति परिभवः कामः। स खलु स
वेषां ससारबन्धदेतुः, परमेदवरस्तु स्वैषां ससारवन्धस्यास्यन्तो-
च्छेदहेतुरेति महदेलक्षण्यमित्य्थः। असिद्धाथ इ्यादि पूर्ववत्॥१५॥
५, ॐ सस्त टीका शुः
( शशा !) शे इति इंशः-तरखम्बुद्धौ,-“हगुपधत्वात्-३।९।३५ कः”
स्वामिन् ! ( यस्य ) कामस्य ( विर्षिखाः ) बाणाः ( सदेवासखुर-
नरे ) देवद्ानवमनुष्यादिसमन्विते, स्वगेपातारम्त्यलक्षणे, समस्ते
( जगति ) सारे ( कचिदपि ) कुत्रचिदपि ( असिद्धाथौः ) अङत-
प्रयोजनाः व्यथा बा ( नैव ) स्ैथा नहि ( निवतेन्ते ) किन्तु छत
रत्या पव प्रत्यागच्छन्ति, अत एव ( नित्यं ) सवेदा ( जयिनः )
विजयिनः सन्ति । जयिन'-इति पदन्तु "यस्ये' तिपदस्यापि विेष-
णत्वमिच्छति । (ख स्मरः) प्रसिद्धः कामदेवः-“कामः पञ्ुदारः
स्मर-' इत्यमरः । ( त्वां ) भवन्तं ( इनरसुरसाधारणं ) अन्यसामा-
न्यदेवसडदा ( पश्यन् ) विलोकयन्, विचारयन्, सन् वा ( स्मत.
भ्यारमा ) स्मरणीयशरीरः, अनङ्ग इत्यथः ( अभूत् ) वभूव । विनष्टो
ऽभूदिति यावत् ( हि ) यस्मात्कारणात् ( विषु ) जितेन्दरियधुरः
षषु ( परिभवः ) अनादरः,तिरस्कारदेष्टि रिति वा ( न पथ्यः ) पथो
ऽनपेतः पथ्यः-श्धमेपथ्यथेन्यायादनपेते-'” ४।४।२२ इतियत्। कदापि
खखकारी नहि भवतीति । अचर प्रसिद्धो मदनदहनमाहेमः वदतो
यथाक्तञ्च मदाकवि कालिदासेन ““करमारसम्भवा" ख्ये काव्ये
“क्रोध प्रभो { संदर संहरेति, यावद्धिरः ख मस्ता रान्ति ।
[ह \ <~ ७ 9
ताच्तत्त बह्व अवनन्रजन्मा, भस्मावकशेष मदन आकार '? ॥ १२५ ॥
| संस्कृत-भाषार्टीकाभ्यां सवख्तम् । ७९
| ॐ सस्कृतपयाचुवादः
स्वलक्ष्यरीनाः कचिदेव नाखन्, मयुष्यदेवाखरमण्डटेषु ।
बाणा यदीया जयिनो जगत्षु, सिद्धाः सद्ा नेव कदाप्यसखिद्धाः ॥
` स कामदेवोऽ न्यसरे स्समानं, सामान्यरूपेण विलोकयन् त्वाम् ।
जनङ्गतां प्राप जितेन्द्रियेषु, अनगदरो नैव कदापि पथ्यः (काय्येः) ६५॥
क
` ॐ भषा टाका चु
( दंश! ) हेनाथ | ( यस्य ) जल कामदेवके ८ विशिखाः )
चाण ( सद्वाखुरनरः ) स्वगे-पाताल ओर मदखाकके रहने वाड.
देवता दैत्य आर मयुर्ष्योके सहित ( जगति ) ब्रह्मांड ( चिदपि )
कर्टू{पर भी ( असिद्धाथो : ) अपने कार्यको विना सध ( ज्ञेव नि-
वत्तन्ते) कदापि जरते नरह है प्व (नित्यं जयिनः ) वेद् विजय.
छाङीही बने रहत ह । (सख स्मरः) वहा कामदेव ( त्वां ) आपको
( इतरखुरसाधारणं ) दूखरे सव सामान्य देवतोके समान ( पद्य.
न् [ सन्] ) देखता हा अर्थात् णक साधारण देवतासा सम
स्ता हआ ( स्मतेग्यात्मा ) स्मरणकरनेके योग्य है शारीर जिका,
अथौत् अनङ्गदी ( अभूत् ) होगया, ( हि ) क्योंकि ( वशिषु ).जिते-
न्द्रिय कोगोमे ( परिभवः ) अनादर करना (पथ्यः न ) उचित, अ-
थवा सुखकारी नी दोता-अभिप्राय यदकं जिख कामदेवके बाण
समग्र ्रह्मांडमे कमी व्यथे नदी होते वरन सदेव विजयी वनेरहते
है ठेस अ्रहाधयधर यह कामदेव आपके साधारण देवताखा-
समश्च आपक)। दृष्टि फिरते ही जकर छार रोगया-अथान्तर न्या-
प
ससे बातका पुर करते है कि-सच हे जितन्द्रिय पुरषोके अपमान
करनेका पेखादी फर मिखता है-यह कथा प्रायः समी पुरा्णोमे-
पा जाती हे वरन शिव पुराणम तो इखका बडा विरुतार दै-जि-
सका कु थोडासा अश गो० सरखुसी दाखजीने अपने रामायणके
वालकांडम मी अनुवादित किया दै-उसीके अंतमे यदह लिखा
दे-यथा-- |
“भय दख मन छाम विसषी,
नयन उधारि सकर दिसिदेली।
८० ¦ डिवमहिन्नस्तोत्रम् ।
सोरभ पट्खव मदन विलोका,
, भयडउ.कोप कंपेड चय रोका । भन रिः 9
तवं सिव तीसर नयन उधार,
| | चितक्त काम भयउ, जरि छारा ।
| हाहाकार भयड जग भारी,
डप स्ुर भ अखुर खुखारा-दइत्यादे'' (तु° रा०)॥ १५॥
द्रः भषापयानुवादः +
दवा-सुर-नरम कतहु, कबहु न होइ असिद्ध ।
जाक खोटत ( फिरते ) बान नहि, विजयी जग परसिद्ध
भो अनगं सो काम लखि, तुहि सव देव समान ।
हेत जितिद्रन पे नहा, !देतकारो अपमान ॥ १५॥
दैः भाषाविम्वम् + `
विना काज साध कतहु नर-दवा-सखुरन मे,
नदीं खोटे आवै कवह्ु विजयी बान जिहिके। ` |
भयो कामे छारा इतर खुरसो बु तुमको +
जितेन्द्रीसे ढी ठापनहु (न) सुखकारी करहुं भयो १॥ १५॥
मही पदाघाताद् व्रजति सहसा संशयपदं
पद् विष्णो स्र।म्यद्भजपरिषरुग्णमग्रहगणम्
मुहु र्यो दौस्थ्यं यात्य निभ्रतजटाताडिततटा
जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ॥१६॥ `
र ॐ मधुसूदनी रीका + ५६. |
अथ जगद्रक्षणार्थे नतेनावतरणे दरोयन्हरिदरो स्तोति-
छ भहीति# 1 हे दक्वा, जगद्वक्चषाये त्व नरास तरत्यासे । सथ्यायां
जगन्विं जिघांसन्तं वरखब्धतत्काखरूबखं महाराक्चस निजताण्डवेन
माह यसीोत्यथः । त्वं तु जगतां रक्षाये ड(श।व्यासर, जगन्ति तु त्वत्त
[
प ९. नटक्ि' इति पाठः ।
संस्कृत-माषारीकाभ्यां सवलितम्- <
ण्डवेनं सखरायितानि भवन्तीत्याह । महीव्यादि । तव चरणाघातेन
। सदसा सराययदं सकट मही वरजति । तथा विष्णोः पदमन्तरिश्चं |
भ्रम्यद्सखुजपरिघरूगणग्रहगणं भुजा प्व परिघाः अतिसुन्रत्तपीवर- ` |
` छढदीधत्वात्तेभ्राम्यद्धिभैजरूपपरि घे खरणाः पीडिताः ्रहगणा नक्षत्र |
सम्हा यत्न तत्तथा संरायपदं बज्तीव्यथः। तथा योः स्वर्लोकः अः
निश्रता असच्त्ता या जखास्ताभिस्ताडित तरं भ्रान्तदेशो यस्याः सखा
तथा सुहुरदस्थ्य दुःस्थत्व याति ध्वे च क्रमेण याणां खोक नामपि
सद्यो दद्दितः। नन्वसौ सवैज्ञोऽप्यपायमपयखोचयन्नेव किमित्येवं
विघताण्डवे प्रत्त इत्यत आह । नन्विति । नञ अदो विश्रुता परमः
महत्ता । प्रभुतेति यावत् । वामेव भ्रतिक्रुङेव । . अनुक्रमाचरत्यंपि
किञ्चित्परतिकूरमवदयमाच रतीव्येव शब्दा थः । दयते हि स्वल्पकेऽपिं
राजनि स्वदेशरक्चषणाय सेनया सह संचरति स्वदेशोपद्रवः, किमुत
तादृशे महेदवर इत्यथ; । हरिपश्चे त॒ । दे दश त्वं जगद््षाये नटसि
नरवदाचरसि । नरशब्दाद्ाच।रार्थं क्िपि भ्रत्ययलोपे नरसीति
रूपम्। मल्स्यादिभूमिकां भजसीत्यथः । कस्यामवस्थायां जगद्रष्त'
णाथेमवतरणमित्युच्यते । महीपादिव्यादि । मर्दी पातीति महो य.
जा तस्म।द्ाघातात्ला मही सह समक्राङतेव संखायपदं वरजति ।
आ समन्ताद्धातो नारोऽस्मादित्याघातो हिखः। तथा च यदैव हि
शछ्नस्य राज्यं तदेव सकट बज तीत्यथेः। तथा च विष्णोः पदमधिष्ठान
यत्र भगवान्विष्णुः स्वविभूतिभिः खह पूज्यत तद्विष्णोः पदं देवयज-
नाख्यं यज्ञरालखादि । तत्कीड शम् । भ्राम्यद्धिभजस्थपरिधेभुजरूपप-
रिव खणो मभ्नो प्रहगणः सविज्ादिरूपः सोम( १)पात्रसमूहो य्न
तत्तथा यागादियुमकर्माणि यदा ध्वस्यन्ते तदेस्यथेः । तथा दयोर्दौ-
स्थ्यं याति । अनिशर तजदखाः पाखण्डवतचिन्हभूतास्ताभिराताडितं
अभावमिव गमितं तरं तङ्ख पदं सत्यरोकाख्य यस्याः सा तथा ।
पालण्डिभिर्दि वेकुःण्ठलोकोऽपि नाङ्गीक्रियते कि पुनरिन्द्रादिरोक
व्यचः । यद्ा चेवं तदा त्वं नरवदाचरसीव्यथैः। तथाच भगवद्धचन
गीतास्-"यद्ए यदा हि धमेस्य ग्खानिभ्रवति मारत । अभ्युत्थानमधः
म्स्य तदात्मान खजाम्बहम् ॥' इति । श्रीभागवते च~यद्योखयेष्वपि
(१) “प {विज्ञे षक्षमृहो" इति पाठः ।
१६
= ` अम वनम 9 ननि ~ कि र ~ =
॥। ~~ = “4 ऋ 2 1 ॥ व“ म र (द (विः यिका वि =
६ 8 च । -- ॥
पि य
८२ - , हिवमहिन्नस्तोत्रम् ।
खतां न कथा हरेः स्युः पाखण्डिनो द्विजजना बुषा चदेवाः ।
हास्वधावषडिति स्म गिरोन यत्र श्चास्ताः भविष्यति कल्म =
नयुगान्ते ॥' इत्यादि । नन्विच्छामात्रेणेव जगन्ति रक्षितुं श्चमोऽ ९.
कि मत्स्यादिसूपैः ङ्गिभ्यतील्यत आह । नन्वित्यादि । नु गि
विभुता विभववन्ता । संपन्नते ति यावत् । वाभेव चक्रव । | ससय
प्रकारे वक्रेगव यकारेण स्वखपत्ति सफलयितुं संपन्नः कार्यं करो |
व्यथः :। ` तेना्विधमेदवयमो(र)त्पात्तकं दशयन्मक्तानाममिध्यानाय
तानि तानि श्रवणमनोदराणि चरितानि तेन तेनावतारेण धत्ते भमः
वानिति भावः ॥ १६॥. | ष
@ सस्कृत शका ॐ |
हे विभो! यदा (त्वं जगद्रक्चषधि ) जगतां रकश्चणाय, रक्षसि
धरतारणाय ( नरसि ) गृत्यसि, नाख्यं करोषि। तदा ( मही ) भूमिः।
कमा कनि मदिनी मही""-व्यमरः । मह्यते इति मदहिः- “अचः दः ~
५।१।३९-ङ० । ""कृदिकारादाक्तिनः-७.१।४५-ग०-इति ङीष् ।
वीचिः पङ्कि मदिः केलि रित्या्या हस्वदीषयो"-मितिवाच-
स्यातः | भूलोको वा । छोको यथा ऋगवेद -२ ५६।२-“तिसतो महीः
उपरा. स्तस्थुः -महीः रकाः] इति तद्भाष्ये सायनाचाय्यैः । ( पा
दाघातात् ) चरणविन्यासरूपताडनात् ( सहसा ) सरिति ( सशय.
पद ) उत्पतति अथवा अधः प्रयातीति सन्देदस्थानं ( व्रजति )
गच्छति । तथा च ( विष्णोः पदं ) आकारां, भुवर्खोको वा-“वियं
द्विष्णुपव् वापि पुस्या काराविदायसी -' त्यमरः ` ( आ्राम्यद्धजपरिध-
खग्णग्रहगणं )-सञ्चालितवाहुरूपपरिथे रवस्द्धो सन्नो वा नक्षजव्गो- |
यस्मिन् तत् तथा भवति । अथाद् अुजपरिचाखुनकभणेव ग्रहगणः
समूहो भुनो भवति । णवं ( चौः ) स्वैः स्वर्लोक इत्यथः ( सुदुः)
|
।
|
वार वारं (अनिश्चुतजटाताडिततरा) असच्रतजटाकलापेस्ताडितं तटं
धन्तभागो यस्याः सा-त योक्ता सती (दौस्थ्यं) ठुःस्थत्वं दुःरवस्थत्वं वा
( याति ) प्रयाति ( ननु ) इति वितके ( विभुता ) वैभव मदवय्यै
तु ( वामेव ) प्रतिक्रुरे व भवति । तर्हि त्वन्तु जगद्क्षार्थमेव नटसि,
(१) 7 क नन्कााकनकराकन्न्स् हृति पारः ।
संस्करृत-माषार्ीकराभ्यां संवङ्ितिम्- ८३
परन्तु तेन कमणा भूशवःस्वर्खोकानां सवंषाञ्च भरल्य पवोत्पद्यतेः
तत स्त्वत्ताण्डवं विनाशकर मिति चेन्न 1 95 2
परखयाच्चिरिखादग्धं, पुन रुत्प्यते जगत् । ‰ _
भरङृषटकथसंयुक्त, प्रयं ताण्डवं विभोः ( हि तत )॥९॥ _
५. छषतरेषु धान्यलवनं, शराणां मूलदाहनम् |, ~ +, ~
` ताण्डवाडम्बर स्तद्धः, स्प्रख्यानखतापितान्। `: 1
` परमाणु न्प्रकुरूतं, खष्टियोग्या न्पुनः स्वयम् ॥ ३ ॥ ;: 1 ::
, ` अतोऽस्य नर्तनं कोक-~रश्चायाः कारणं परम् ।
विचारणीय विद्धदधि-मेदामङ्गरलक्षणम् ॥४॥ इतिदि क्॥१६॥
| & संस्कृतपदाचुवादः +> | ॥
` व्रज्ञति सदयतां सदसा मदी, चरणताडनतो भवतो विभो 1
॥ि
` अजल त(विदता ग्रहतारका, गगनमध्यगत वितता दुतम् ॥ - . `
भजति दौर्थ्य मथो तिदशालयो, निरतश्च (भ) कपत राहत; ।
नटसि य जगता मभिगु्तये, काटिनता सुपयाति हि वेमवम् ॥१६॥
। माषायथका श्र
_ - हे जगवन् ! जव कीं ( त्वं ) आप, ( जगदवक्षायै ) संसार् की
रश्चाके छिपः ( नटलति ) तांडव करते ठै, अथौत् नाचने<रुगते ह, तो
(मरी ) पृथिवी, अथात् भूलोकं ( पादाघातात् ) पेरोके चोट से
(सहसा ) तुरतदही ( सशय पद् ) संदेह की भूमी, अथोत कमी तो
ऊपरको उड आती है आर फिर नीचेको धसर जाती है इख
कारणस सदेह पदको ( व्रजति ) चरी जाती हे । ;:( विष्णोः पद् )
आकाश्चमडल, अथवा अुवलाक्त . ( भ्राम्यद्धजपरिघरूगण्रहगणं )
॥ अवति | धमते छुप बाईरूप पारि्धो [ बेवडा] स रुकगये हें म्र
नग निखा हो जाता हे । भथात् आपके हाथ हिने स
। श्र ओर नश्चत्रादिकों की गति स्कजाती हे । तथा (चोः) स्वगो
ज्ञदाओ सि उक्र खा रहा है कोर जिसका-पेखा होकर ( दौस्थ्यं \
८४ ¬ शिवमदटिक्चस्तोत्रम् ।
दुरवस्थताको ( यात्ति ) प्ास्च होता है । पेखा क्यो होता है १ ६खः
पर कहते हँ किं-( नञु विथुता वामा एव ) अदो ! वैमव तो टेढा
होतादी है। भाव यह हे कि आपतो ससारकी रक्लादीके (इ.
तांडव करते है पर उखसर तीनौदही खोकोंकी दुदेरा होने खगत ६
क्योकि चटवय्यै तो सदा प्रातिक्रूरु हदो तादीदै । इसपर यह दाका दता
हे कि सवेज्ञ॒ ओर स्सवौन्तयोमी दोकर जे महादेवजी संसार क
दितके लि नाचते है उलसे ब्रह्मांडमरका नारदी दोने गता दै,
तो फिर उनका नाचना भला केसे कदा जा सकता हे ? इसका
समाधान यह है किं- थगवान् जव नाचते ह तो उनके तांडवदहीसे
प्रखयानरु उत्पन्न दोकर सारी खष्टि को भस्म कर देता है-फिर
उसी भस्म दोने के कारणस पृथिवी-इत्यादि पाचों भूतो के परः
माणु खिके च्वि विखेष उपयुक्त दो जाते ईह, ज्ञेसे कि सर्टरी
का जुदा पक देनेसे विशेष पनफने कगता ह-उसी भांति मदा-
रुद्रके तांडव से खष्टिकायं का विशोषतः उपकारही होता है-पर जो
हानि देख पडतीं है उसका कु दूखरा कारण नहं ै केवल इत
नादी भर समञ्चखेना चादिण कि-पेश्वयंशाटी कोगोके धरवध करने
मे भ्रायः _ बहुतरी वातां का उख्य फेर हअही करता है। अवतः
रिवजीके तांडव सरे ससारकी रक्षाही होती है-यह सिद्ध हे ।
पतद्धिष्न यह बात धत्यक् दे कि, साधारण राजे महाराज्ञे छग
भी जब अपने देशा अथवा राज्यके रक्षणावेश्षणके लिये दौसा पर
ज्ञाते ह तो भजालोर्गो का हित तो देखादी तेसा होता हे पर भारी
सकटका सामना करना पडता है थाड़ दिन हप कि नि
महाराजपंचम जाजे प्रि आफ वेर्स २ 4 9 पं
धरे थे तब उनकी सवारीनिकालनेके भवन्धत मासो पूवेदीसे वना
रसम कितनही खो्गोका मागे चलना रोकादिया जाताथा-किर
अवभी छोड मोरे कमच।री गण प्रतिषे रीतकाल म धरा (-ेय्य-
त ) छोगोके खुवीतेददीके लिग्रे अपने प्रान्तके प्राम्यदेक्तौ ( देहा
तां) मेदी करने जाते ईदै-उनका अभिप्राय पभरजाओंको खख (ओआ-
साम ) देनेदीका है, पर भ्रजागणको जो जो सुख अथवा दुःख प्रा
होते दै-उसे वेदी च्छेग॒ समद्स्कते ह जिहे कभी दोरा म अपने
>~ ऋ : क
(न न क, र अ क्र नन आ)
संस्कृत-माषारीकाभ्यां सवरख्तिम्- ८५
ष्वेच।र ( मोकदिमे ) के छिपएः जानका सौभग्यः प्राप हुआ होगा-
क्योकिन तो वहां खाने की सामग्री मिता ह, न रहनेक चिः
पकर ठिकाना लगता है किर सहायक ( वकीलमुखतारों ) काव
सेन ( फीस ) ओर यान (पका) की श्वृति ( कराया ) तो दुनेसे
` कभी घटती दही नक्ष तो कहिए जब साधारण मनुध्या क पड्वय
का पेखा टेढा फल चखन। पड़ता ह तौ उस सबराधष्ठाता दरेवाधिः
देवक तांडवसर लोक्य मा्नका थरु उथरु दाजाना क्या असस्म-
खहे ? इसी लिप कहागया हे कि-“नच वमिव विभुता) `
इ भाषापयानु्रादः +
पद्ाघातते अवनितर, ससय ( सकट ) भरो रखुख।त ।
नभ भाजत ( घुमत ) युज परेघ कगे, तारागन सक्जति ॥
होत जरा फटकारते, सरग ( स्वगे ) दुखी बहुबार।
जग रच्छा खमि ( दित ) नरहु वै, वैभव कठिन विक्रार \१६॥
क भाषाविम्बम् च
रगेते वैके धरनितख्मे ससय खये, (६)
उटाये हार्थो के गगनमर्ह तारा रुकिगये ( इ ) ।
जराके कटकार सरग सगरो खल्वर मची
जगत्-रच्चा छागी ( हेतू ) नरह विभुता टेढिदि रची १६
वियद्यापी तारागणगुणितफेनोद्रमरुचि
प्रवाहो वारां यः एषतलघदृष्टः शिरसि ते |
जगद् दटीपाकारं जरधिवल्यं तेन कृत मि
त्यनेने वो न्यं ध्रतमहिम दिव्य तब बपु; ॥१५॥
छ मधुधुदनी टीका +
अथ गङ्भाया उदरणधारणे दरखछयन्दरि्रो स्तोति- .
कवियदिकि# । हे हदा, अनेनैव लिङ्गेन तद दिव्यं दिवि भ
सक्रदेवनियन्क वषुः शरं धरतमहिम सर्वैभ्यो महन्तर उन्नयमुद-
नीयम् । तव वपुषः सवमह तरत्वमेत।चतापि निश्चेतुं चाक्यं किमिति
८ & 1 शिवमहिस्नस्तोत्रम् +
भरमाणान्तरमत्रापेक्षितव्यमित्ति एवकारार्थः । इतिराब्दः प्रकारार्थे ।
पवप्रकारेण लिङ्खनेत्यथैः । तमेव शकारे दरीयति। यदित्यादि
वियदाकारां घ्याप्नोल्याच्छादयतीति तथा तारागणेन ` नश्चजचन्देन
स्वान्तःपातिना गुष्णता श्रत्व दिगुणंसजातीयच्वाद्र्धिता केनोद्भः
मसछच्यस्य स तथा पतादच्वा चारं प्रवाहः स तच दिरासि पृषतः
खुघुखष्टः पुषताद्धिन्दोरपि चघुरल्पतरः पृचतलचुः सख इव दष्ट आ
खोकितः । तेन तु घारां प्रवाहेण जलःधवयं जगद्रीपाकारं छतं
जरध्ीनां बृन्द जगद्भूलोको द्वीपाकारं जम्बृद्धापादिसप्तकस्पं य-
स्मिरूतथा विदितम् । “अगस्त्येन हि ससख सखद्रेषु पीतेषु पुनर्भगी.
रथानीतगङ्ाभ्रवाहेणेव तेषां पूरणं जातम्" इति पुराणभ्रसिद्धम् !
तथाच यो जखरादिस्तव शिरसि विन्दोरप्यत्पो दृष्टः स पवा
फियान्मन्दाकिनीनास्रा वियच्यप्यास्ते, . कियान्भागीरथीति गङ्खेति
च प्रसिद्धा भरखोके सखघससुद्रानापूयोस्ते, किर्यास्ति भगवतीति
सज्ञया पातालमभिव्याप्यास्ते इत्यनेन तव दिव्यव
मीयते त्यथः ॥ दरिपक्षे - लु ! तारागणशुणिताः फेना यस्याः सौ
तासागणगुणितफना गङ्गा तस्या उद्गमे उद्धवे रुचिः खोभा यस्य स
तथा शिरसि सवेलोकानां शिरःस्थानीये ब्रह्मलोके वचिछलने लक्षि
छचरणाङ्खष्ठनिभिन्नब्रह्माण्डविवरादागतो . गङ्गोत्पत्तिदेतुवियघ्यापको
यो वारां भरवाहः ख ते त्वया पृषतलघुच््ठः विन्दोरपि खघुद्ः।
बिन्दोरपि घु यथा स्यात्तथोपलन्धः इत्यर्थः । अनेनेष लिङ्घेन च
तव दिच्यं वपुः बिलना दिभ्याका्चे आविभावितं बेविक्रमं सूय
ध्रतमदहिमोन्नेयम् । रष पूववत् ॥ ९७ ॥ ` 4: |
पुषो मदहर्व मञु-
^
| 1 ॐ संस्कृत ॐका- श ` |
हेभगवन् | ( वियद्न्याधी ) जाक्ाराचद् व्यापनशीखः ( ताराः
गणगुणितफेनोद्वमखचिः ) तारागणो नक्षजरसमूहं स्तेन गुणित! उ
पमििता तद्वत्तां प्रापितेति यावत्-फेनोह्मस्य हिंडारोत्पत्तः ख.
चिः शोभा यस्य स एतादृशः ( यः ) प्रसिद्धः (वार) जखनि“
पः खी भूम्नि वा वारी” त्यमरः ( प्रवाहः ) खरोत; ओघो वा (ते)
तव ( हिरसि ) शिरः स्थितजटाजूट-हन्यथों छक्षणयां । (पचतल-
चुदृ्टः ) विन्दु तदश सहष्म्पों विलोकितः“ 'एषरित विन्दु पृषता-“
[ये
आ
संकृस्त~माष्ारीकाभ्या ` संवलितम्- ८७
्व्यमरः । ` ( तेन ) ` प्रवादेण ( जखधिवखयं ) समुद्ररूपपारिखावे-
षितं ( जगत् ) अवनं ( द्वीपाकारं ) अ्ुखण्डसददां ८ कृत ) विनिः
परितं ( अनेनैव्र ) देत॒ना ( तव ) भवतः ( दिव्यं ) सरवोक्कृष्ट (बुः )
शारीरे ( ध्रतमदिम ) महामहिमा, केचि त्सम्बुद्धिषद् मेत दि-
त्याह । तत्र तो महिमा सवंक्ञत्वं सवकठेत्व ओ येनेति योज्यम् 1
(दतिः ) एवं विधं ( उन्नेयं ) ऊदनीय वोध्य मिव्यथः। कदाचिद
गस्त्यसुनिना पीते सुद्धे य कतए ¢ ङ्गते सति रिकसिरःस्थितया
विन्दुरूपता मा ५/२ शङ ध षूयखमाणः सागये जगत्परिखारूपो
वरीवर्ति । हमा मव _पासाणकरा कथा मवलम्ञ्ये द् गङ्गाधररूपमदहि
पवर्णने खुष्डुकृत मिति, विचारणीयं विद्धद्भिरिति पव मेकाक्तं च
स्कन्दपुः मादेदवर-कमारिकालण्डे ३३ अ०- |
"भवियद्यापी खरसरि त्पवादयो विभरुषाङृतिः।
वभूव यस्य शिरास्ति कर्तर्मात्परमो भवेत्॥२३॥ इति ॥१७॥
= सस्कृतप्र्यानुवादः च: `
यो व्योमवद् व्यापकशीरुता गत, स्तारागणाशङ्कित । वर्धित )
॑ ` फेनकान्तिमान् ।
वारिप्रवाहो लघुषिन्दु रूपश्च क्, शम्भो ! जरा जूटतटे तवे श्िदः ॥
छथ, द्पस्वरूपर जरखमध्यवात्ि ।
छत जगा तेन सखन (4 = (= ~ । [>
महामहिम्ना मित् अद रूहनायम् ॥१५७॥
= भाषाटीका
मिन् ! ( वियद्वधापी ) अकाराके समान सवत्र भरा
ह स्वा 4 र ई
गुणितफेनोद्धमरूचः ) नक्षत समरुहसे गुनी
त वाडा ( तासगण
रह् = (~ = ~ (~ *
ग्ट है फेनके नकन द्रोभा जिखकी-पेखा ( यः ) जो ( वारां
वाहः ) जलका खरोत ८ ते शिरसि ) आपके मस्तक.पर अथोत्
जटाजूट ( पृषतलघुद्ः ) वृदके समान छोटासा देखपडता हे
( तन ) उसी प्रवाहस्ते ( जलषिवरय ) समुदरखे चेाहुआ ( जगत् )
सार ( द्वी पाकार ) दीपक आकार्का अथात दीपरूप ( छृतं )
दिया गया ( अनेनैव ) एक इसी कारणसे ( धृतमहिम दिभ्य )
नडी भारी महिमाको धारणक्िये हए, परमदिन्य ( तव वपुः )
८८ | ` दिवमहिन्नस्तोत्रम् ।
आपका हरीर ( ऊदनीयं ) समश्चनेक्रे योग्य हे । शिवपुराणादिकोमि ।
यह कथा प्रसिद्ध हे किं जव अगस्त्य मुनि सब समुदरोको षीगयें
तो राजिं भगीरथके साथ आकर श्री गगाजीन अपनेरी प्रवा.
हसे उन सथको वुरा किया-वदी बातत इस ्छाकमे दिखाई गर
है । तात्पय्यै यह कि जा जर आपकी जरम प्एक बूदसा छ्र्कतां
हे उषसे सच खमुद्र भर गये जिनसे यह जगत् राप्ते समान वनग.
या-वस इसीस आपके शशरकी महिमा घ्रकर हे। यह गंगाधरं
रूपक महिमा कही गड दे-गङ्गाजीका वणैन यद्यपि रामायणम क-
हक स्थानौ पर भिता है पर्यहां पर केवल दतनाही उदृधरतकषि-
याजातादहे- ` |
“गङ्ख सकर मुद मङ्गल मुखा,
सव स्वुख करनि हरनि भव सूखा ।
कदि कदि कोटिक कथा प्रसङ्गा,
राम विरोकतं गङ्ञ् तरङ्गा ॥' ( वः रा० )॥ १७ ॥
छः भाषा पययानुवाद्, %
तारा गन सम फेन रुचि, व्यापक मनुं अकास ।
खलियत तुमरे सीस पे, जरू लघु द विलास ॥ #
अंदुधि-परिला ीपसम, तासो जगत !घिराय । ॐ
यात तुच बपु दिव्यकी, महिमा जानी-जाय ॥ १७ ॥
दः भाषा बिम्बम् +
+ अक सिम केटी प्रहगन-ख्ची फेन-उवकी,
जो की जो धारा तुवर सिरसि बरन्दों सम रली ।
घहीते दीपा ( टापू ) सा जगत जरधंवेशेत भयो,
यदीसे जानी हे वपुष- महिमा दिव्य तुमरो ॥ १७ ॥
संस्कृत -भाषारीकाभ्यां सबरितम्- ८९
रथः क्षोणी यन्ता रातधुति रगेन्द्रो धनु रथो `
रथाङ्के चन्द्राकोँ रथचरणपाणिः रार इति ।
` दिवक्षो स्ते कोऽयं चिपुरतृण माडम्बरविधि-
= रविपेथैः क्रीडन्त्यो न खलु परतन्त्राः भभुधियः॥१८॥
+ मधुतूदनी रीका म
अथ खङ्कातिपुरदादी दश्यैवन्दरिदरौ स्तोति-- |
क्रथ इति* दे इंरा | ज्निपुरतृणं दिधक्षोस्तव कोऽयमाडम्बर-
विधिः याणां पुराणां समादारसखिपुर तदेव तृणं अनाय्रासनाइय -
त्वात् । तदग्धुमिच्छोस्तव केयं महत्प्रयोजनसुदिद्येव संभ्रमरचना।
नहि लोकिका अपि नखच्छये कुडारं परिगृह्णन्ति, अतस्तवाव्यस्पे
प्रयोजने न महान्प्रयास उचित इत्यर्थः । आडम्बरबिधिमव दशेय-
ति । रथ इत्यादि । क्षोणी पृथ्वी रथरूपेण परिणता, शतध्तिन्रष्या
यन्ता सारथिः, अगेन्द्रः पर्वतश्रेष्ठो मेरः धनुः कोदण्ड, सोमसूर्या
दे चक्रे, रथचरणं चक्रं तद्यक्तपाणिर्विष्णुः शयो बाणः+. चतुथवा-
कये श्रुतोऽप्यथोखब्दः सर्वत्र वाक्यभेदाय योजनीयः । इतिशब्दः
प्रकारार्थः । चिभ्रुवनमपीच्छामात्रेण सहरतस्तवेवेपरकारेण लाम `
श्रीसपादनमाडम्बरमा्रमित्यथः । प्एवमाक्षिप्य परिहारमाह । विधे-
धेरिव्यादि । खलु निश्िवं प्रभो शेदवरस्य धियो बुद्धयः खकस्पविशे-
घाः परतन्ाः पराधीना न भवन्ति, अपि तु स्वतन्ञा प्व । ताः को-
इश्यः। विघयेः स्वाधीनः पदाथः क्रीडन्त्यः खेरन्त्यः । नहि क्रीडा
याँ प्रयोजनायपेश्चास्ति । तस्माद्िचित्राणि वस्तूनि स्वाधीनतया
क्रीडासाधनीशृष्य क्रीडतस्तव सवोणि कायणि स्वख्छामात्रेण क-
तै श्चमस्य छोकिकवेदिकनियमानघीनबुद्धेने किञ्चिदस्यजुचितमित्य-
यः ॥ दरिपक्चे त॒ । जीए चिक्रूटगिरिचिखसणि पुखण्याश्चयो यस्येति
नरिषुर लङ्कापुर तदेव तरण त दग्धुमिच्छोस्तव कोऽय श्रीरामरूपेण स्तु.
ग्रीवखख्यससुदवन्धनादिश्चाडम्बरविधिः । रथः क्षोणीलयादि रूपकं ।
दवो णीच रथः, तश्चतिरिव यन्ता, अगेन्द्र इव धनुः, चन्द्राकोविव-
रथचक्रे, रथचरणपाणिरिव शारः» स्वतस्यवौयो बाण इत्यथः । क्षो-
१२ \
| ९० ` .. शिवमहिस्नस्तोत्रम् |
| ण्यादिसदशरथादपाद्ानमेताररात्यटपश्रयोजनायापेक्षित॒मुचितं न
| मवतीत्यथेः । शेषं पृदैवत् ॥ १८ ॥ ` `
” ˆ "द्म संस्कत रका हिः
| देधभो-! ( खिपुर्कणं ) याणां पुराणां समाहार सिपुर, तदेव
तृण मिव अत्तितुच्छ मित्यथः ( दिधक्षोः ) दग्धु मिच्छाः (ते) तव
( अयं कः आडम्बरविधिः १ ) किं प्रयोजन मुददिदये यं सथ्रमस्च-
ना, आयास इति वा । अत्यल्पे ऽपि कार्य्यं किमिति महा न्प्रयासः
| स्वाङूत इति यावत् । त मेवा उस्बरर्विधि विचरणोति-! क्षोणी ) षु-
| थि्वी-^क्लोणि ज्यौ कादयपीं क्लिति”-रित्यमरः । ८ रथः ) यानं, रथ-
रूपा रता, एवमेव ( अथो ) पदमपि सर्वर यथाव योजनीयमिति,
( शतश््तिः ) ब्रह्मा ( यन्ता ) सारथिः छतः ( अगेन्द्रः ) गिस्थिष्ठः
खमेखः ( धुः ) चापः छतः (चन्द्रार्कौ) सोमसूर्यौ ( रथाङ्ग ) दे चक्रे
विहिते, “र्थाङ्गन दय चक्रे ना चक्राङ्गविहङ्खमे-इति मेदिनी (रथ
चरणपाणः ) चक्रपाणि, विष्णुः ( दारः) वाणः कृतः (इति )-र-
दस्तु प्रकाराथेः, एवं विध इति वा । महाकालरूपेण रेलाक्यघलः
3 भा रणस्तच ताइशरणसाम्रीसज्ञीकरण माडम्बरविधानं मेवेति
यावत् । अथाक्षेपं परिहरति । ( खलु ) इति निश्चयेन ( विधरेथैः }
स्वायत्तपदा्ैः सेवकजने वा ( क्रीडन्त्यः ) खला कुर्वन्त्यः ८ धुः
वियः ) अभूणां महतां बुद्धयः सङ्कलपविशेषाः ( परतन्जाः › परा-
धनाः ( न ) कदापि न भवन्ति। अथात् क्रीडाकाले चरयोजना-
अयद्ला न सम्भवति। इयं चरिपुरद्ाहकथ। रदिवपुराणादिखु पसिः
वास्त तथा प्यत्र महिमवणनाथं मेवं संश्चित्तरयेणा षन्य॑स्तेः
ति1 स्कन्दपु० मादेदवरकोमारिकाख० इद अथ
क्षोणी रथो विधियैन्ता रासेभ्ं मन्दसे शुः । | |
रथाङ्गे चापि चन्द्रक युद्धे यस्य च चेपुरे ॥२५१ भावः स्पशः ॥१<॥
ॐ सस्करृतपयाऽनुवादः *&
पृथ्वी रथः लाराथे रात्मयोनिः रारासनं यर सुमेर रासीत् ।
| म 1 मन्द्रपवेतो ऽभूत् ]
बभूवतुः सामरवी च चक्रेः वाणो ऽमव चक्रधरो ऽरिमेत्ता ॥
किं दग्धु मिच्छन् त्रिपुरातितच्छ, माडम्बरं तत्र भवान कार्षीत् ।.
विधेयखीलानि पणाः प्रभूणां, धियः स्षतन्ञ। नचु (खलु) सर्वव ॥१८॥
९
संस्कृत -भाषारदीकाभ्यां सवटितम्- ९१
॥ +` भाषाररीका *
हे प्रभो ! ( चिपुरकृणं ) जिपुरा-खुर नामक पक कण को ( दि-
, धक्चोः ) जराडालने की इच्छा करने वाछे ( तव ) आपको ( अयं कः
आडम्बरविधिः १) यह कौनसा आडवर ` फेकानका श्रयोजन था,
जो आपने ( क्चोणरथः ) भूमीको रथ, ( रातध्रतिः ) बह्याको ( य-
न्ता ) साराथ ( अगेन्द्र : ) खमेरू पवतेन्द्रको ( घुः ) धनुष (चन्द्रा-
करी ) चन्द्रमा ओर सूयंको ( रथाङ्ग ) रथके पिये (अथो) इसी
भांति ( रथचरणपाणिः ) चक्रधरः, विष्णुको ( शारः ) बाणके रुपे
परिणत क्रिया (-इतिः ) -यहां प्रकाराथे वाची .अव्यय हे । ( खद्द )
निश्चय करकं ( प्रणुधियः ) स्वामीकी बुद्धियां ( विधयः ) स्वाधीन
पदार्थो अथात् अपने आश्वन खोर्गोके साथ ( क्रीडन्त्य ) [ स-
त्यः ] चेल करतीं हई ( परतन्त्राः न) पराधीन नहीं होत । अथि
श्राय यह दं के~-जव आप अशाष ब्रह्माण्ड का ध्रख्य करने खगते
र तो उस समय पर किसी .वस्तुके ज॒खनेकी आवदयकता नरी प-
डती तो फिर एक तृणके समान महान् तच्छ तिपुरको ` दग्धकरनेके
दिण जो इतना चखेडा वद्या किं भूमीको रथवनाकर उसमे च-
नद्र-सयैकी पहिया गाई किर ` ब्ह्माको सारथि, बनाकर समर प-
शतको धद्ष एवं खाश्चात् विष्णुको बाण बनाया-भला यह सब आ-
डवरनहीं है तो ओर क्या हे दल स यदी ज्ञात दो ताहे कि प्रभु.
लोगोकी बुद्धि अप नाके साथ खख्वाड म खगजाने परभी परा-
शीनं नहीं होती । यद त्रिपुरा-खुरको कथा वहत प्रसिद्ध दै-उसे
यह वरदान दुका था कि जल थर सवक्रो | छोडकर जब पकी
बाणतते तीनो पुर भस्म हों तव वह असुर मरे-इस स अन्य किसी
से असाध्य समञ्चकर स्वय महादेवजीने एकी बाणम उन सवको
। दिया-इस रखोक म यह दिलाया हे कि बह्मा ओर
वर्त कर [स
के आधीन, पर आप किसी के आधीन
विष्ण दृत्यादि सवी आप
ध्परम स्वतज न सिर ये कोड, `
भवि मनहि करहु तम सोई । ( तु° रा०)॥ १८१ .-
९.२ रिवमहिश्नस्तोत्रम् ।
र भाषापदययानुवादः +@
रथ भूमी सारथि विधी, धनुष सुमेरु मदन ।
रवि ससि दोऊ चक्र जरह, चक्रपानि भे वान ॥
कत आडबर त्रिपुर तृन-जारन रुगि यह कीन ?।
सेवक सन क्रीडा करति, प्रमु-मति निज आधीन ॥१६॥
= भाषाविंम्बम् श
` षिधी सार्थं, भूमी रथ, हिमगिरी चाप वनीं,
हरी इेगे बनि, रवि ससि भये चक्र जवी ।
ऋ @ (~~ [~ १ ६, ५ [९
तयासी पेखी क्यं त्रिपुर तृन जारे कर करं (री),
2 ऋ खद 9 ( 2.4 ज~ भ [
स्वदासखासे खेदे प्रभु-मति पराधीन नहि दे (शी) ॥ १८ ॥
द्रि स्ते साहसं कमर्बलि माधाय पदयो-
ये देकोने तस्मि चिज सुदहर नेत्रकमलम् ।
` गतो भक्तयु दवेक; परिणति मसौ चक्रवपुषा
त्रयाणां रक्षाये च्रिपुरहर जागर्ति जगताम् ॥ १९ ॥
5 > + मघुसूदनी टीका +
अथेन्द्रोपेन्द्रयोभेक्ति तत्फटं च दशंयन्हरिदरौ स्तोति-- `
#हरिरिति% हे जिषुरहर, हरि्विष्णुस्तच पदयोः सहसरं सहस्र-
खख्यापरिमाणं कमलानां पद्मानां वलिसुपहारं । सहस्रकमरात्मकं
बर्खिमित्यथेः । आधाय सप्रप्य तस्मिन्कमरुसदसखबलखावकोने सतिः
एकेन कमलेन भक्तिपशक्षाश्च स्वया गोपितेन हीने सति नियमभज्ञो
माभूदिति तत्पूरणाथे तद्। कमलान्तरमरूभमानो निजमात्मीयं ने:
च्रकमरूमेवोदहर दत्पाटित वान् । यदैवं स्वनेओस्पाटनरूप भजनं, अः
सौ भकत्युद्रेकः भक्तेः सेवाया अत्थन्तभरकरषैः चक्रवपुषा खुदश्ीनरू:
पेण परिणति गतः चयाणां जगतां रक्चये जाग्ति। परिपाङनार्
सावधान पव वतेते इत्यर्थः । पवमाख्याधिका च पुराणभरसिद्धा ।
तथा चेवविधाचिन्त्यमाहारम्यस्त्वमसाति भावः ॥ दरिपक्षे तु । ि-
सस्कृत-मोषार्टीकाभ्यां सवलितम्- ९३
वुरहरेति प्रारव्य।ख्यातम् । हरि रिन्द्रस्तव पदयोः साहस्र कमलब-
लिमाधाय । कीददां नेजकमट नच्ाण्येव कमखानि यस्मिन्स तथा
नेत्रसदस््नात्मकं कमलसहसख्रवलिमित्यथेः । युग पन्नेत्रसटसख्रव्या-
पारेण त्वच्चरणये।(दश्चनरूपमाराघनं कत्वव्यथेः । -आराधनप्रयोजन-
माह । निजमात्मानमकः सदहायान्तरशन्यः। अनेतस्मिन्नेत्धोकविः
लक्षणे स्वगेलोके उदहरदुद्ध्रतवान्। स्वर्खोकाधिपतिमात्मान कत
घानित्यथः । निजमरुद्धतुं युगपन्नेजसदस्रेण त्वच्चरण।वखोकने यत्प
घणत्वं असौ भक्त्युद्धकः चक्रवपुषा चक्रं सेन्यं देरावतोचचेःभवः
प्रथति तद्रेण परिणति गतेः परिणतः समुद्रमथनेन लक्ष्मीपीयुषा-
दिश्रादुभावात्। चयाणां काकानां रक्चाय जागततींत्यादि पूववत् ॥१९॥
छ सस्कृत टीका +
( तिपुरहर ! ) देत्रिपुरदाहक ! पूर्वकथितविधिनेव त्रिषुरविष्व-
सके ` त्यथः । ( हरिः ) विष्णु § ( तव ) भवतः ( पदयाः ) चर
णाम्बुजयोः ( साहस्रं ) सहस्नसंख्यापरिमित ( कमखबखि ) पक्षो र
पारं ( आधाय ) निवेद्य ( तस्मिन् ) सदस -कमलात्मकवलो (प
कोने ) पकेन कमलेन ईने सति, अरष्सङ्कट्पत्वभया त्प्रात्ञातल
ख्यापूरणाथ मेव ( निजं ) आत्मीयं ( नेत्रकमरुं ) चक्षुरूप कमल,
पुण्डरी काक्षाभिधानत्वात् ( उददरत् ) उदपारयत् ( असो ) स्व-
नेजक्मरोत्पारनरूपः ( भक्त्युद्रेकः ) सेवनश्रकषेः ( चक्रवपुषा ) खु-
द्हीनचक्रस्वरूपेण ( परिणा ) परिणामे, फकरुपरिपाकावस्था मि.
त्यथः ( गतः) चाः सन् ( याणां ) स्वगेमत्यपाताखाख्यानां ( ज-
गतां ) खोकानां ( रक्चाये ) परित्राणाथ मेव ( जागतं ) जागरूकः
सावधानो वा वतते । अजर स्वने्रपद्यो पहारदाना देव हरिणा हरस:
कारान् रब्धं खुद श्ौनचक्र मित्याख्यायिका खप्रसिद्धापि बोधयति,
यत् विरवम्भरस्या प्ययुश्राहको भगवान् विदवबेदवर पवे त्यचिन्तनी-
यता विरादीकता प्रभो मेदिश्ल इति । तथा चोक्तमपि स्कन्दपुराणे
ब्रह्ददवरसण्डारुणाचटखसमाहास्म्ये अ० १६-
कोने चद्यस्मादस्रे स्वनेेण रताचेनम् । |
श्चालिन् ! खदश्यौने दश्वा देत्यद्धिष मसूतुषः॥ १९ ॥
।
। |
।
।
९. शिवमहिश्चस्तोत्रम् ।
` अस्मदुक्ताख्यपितृव्यचरणे निंजनिभितपूजापुष्करिणीग्रन्थोपान्ते (
विद्वनाथस्तुतो - तद्थोक्त, ठ
` “यरप।द्पद् परिक टिपित भुध्ररूप,
चक्र ज्व क्ञ्ज्वरनरी प्ति खुदे रीनख्यम् ।
विष्णुधियं निखिखदत्यविनारादक्च,
त विद्वनाथ मुमया सहितं नतोऽस्मि" ॥ १९ ॥ षः
| त ॐ सस्कृतपयानुवादः ॐ ~
साहस मम्भोजवखि विधाय, त्वदीयपाद्स्बुजयो रमेशः ।
यदेकपद्मोनवखो च. तस्मिन , स्वने ्रपाथोज सुदा जहार ॥
उद्रेक एष भगवन् | भवतः खुभक्ते-्यातो ऽथ चक्रवपुषा परिणामरूपम्
2 चिन रनः (न~ [> भ ९ (
नैखाक्यरक्लणाचचा प्रातः परया, ज्ञागत्ति दुष्टदलनोत्कखुद सौनाख्यः
| द भाषारीका +
` ८ चरिषुर्हरः ! )हे जिपुरविदारक, ! अथात् पूर्वाक्तप्रकारसे ्िपुरा
सरके द्पक । ( दरिः) भगवान् विष्णुने { तव ) आपके ( पदयोः)
चरणा पर ( साहसं ) पूण सहस. सेख्यक ( कमलवखि ) कमलके
पका उपहारः ( आपाय ) रखकर, अथवा निवेदन करके ( तस्मिन्)
ल सहल कमलका पूजाम ( पकोने ) [ सति ] पक [ पल ]के
धटजाने पर, नजखंकट्पके भ्रष्ट दोजानेके डरसे ( निजं ) अपने
(नेत्र कमलं ) नयन रूपी कमलको ( उद्हरत् ) निकालकर घरदिया
( असौ भक्त्युद्ेकः ) यही भक्तिकी प्रकर्षता [ ज्यायसी ] ( चक्रब-
पुषा } खदरोन चक्रके स्वरूपसे ( परिणति ) परिणामक ( गतः)
पराप्त होने पर (त्रयाणांजगरतां ) स्वगे-मल्ये-पाताकादि तीनहा लोक्ञा
के ( रक्षाये ) पालनके चयि (जागर्ति ) जागती रहती हे अर्थात् साव.
धान बनी रहती हे । अभिधाय यह हे कि-जिस खदसन चक्रके
द्वास.भगवान् विष्णुने बेरोक्थ माका पालन करके विदवंभरका
नाम भाक्त किया हे उसके भी आपी कारण है-आपहीके अब्रदसे'
उनको खुदशेन चक्र मिला हे-यह कथा पेसेही पुराणोमें असिद्ध
हे-पकवार भगवान् विष्णु,. सहस संल्यक कमलो देवाधिदेव
के सहस्र न(मकं असार एक एक कमल चदान ठगे अतम परी-
संस्कृत-भाषाटीकाभ्यां संवचितम् । ` ९९५
क्षा छने के लिये श्रीश्चङ्करजीने एक पुष्प शुक्त करादेया जव विष्णुः
को पक फ़का घरजाना ज्ञात हआ तो उक्णने विचार किया
किं मेरा नाम पुडरीकाश्च भ्र्िद्ध है सो अब एूख नर्द है तो उ
सके वदेम अपनी एकः आंख निकार कर चद्व ओर फेसाही कि
या इख अपूर्वं महांभाक्तको देखकर भगवान्, आद्युतोषने परम भ-
सन्न होकर उनको खुदशन चक्र दिया ` जिससे वे. जैखोाक्य भरकं
पाठटनकती होगये -इ्ससे धद ` वात ` भटी भंतिभ्रकर होती हे
ओसरो कौन कदे साक्चात् विष्णु भगवानके भी अचु्राहक स्वय
महादेव स्वामी दही ड ॥ १९॥ |
= भषापरयानुवादः % क
हरि खहस्र अरविद् बालि; तुव पद् पूजन खाय ।
एकः घटः पर निज नयन-कपख!ह द्या चदढाय ॥
चक्र खुदरन रूपते? भया भाक्तं पारनाम ।
चिभुवन रच्छा खागिजो, ज गत आहु जाम १९ ॥
(4
भाषाविम्बम् ` |
पूजा कीही संहस~-कमलासं मर 4८.
धेथे प्क के कमरुखम अखि निज दयी ८
वही भक्ती वाढी सफारत भई चक्र-तयत,
। सो जागत रहं ॥ १९ ॥
जगत्-रच्छा गी चरउुर्टयर
क्रतौ सत्ते जाग्रख मसि फख्योगे कतुमता ^ _
क्र कर्म प्रध्वस्तं फएटतिः पुरुषाराधन मते ।
अत स्त्वां सप्रक्ष्यं क्रतुषु कटदानप्रतिभुव
श्रतो श्रद्धां बद्धा कत(0परिकरः कमस जनः ॥२०॥
| ॐ मधुसदनी टीका ॐ ~
| धवं पूवदखाकखु । परयरवरारसाधनादत सवपुरुबाथप्रात्तरन्व
| यन्यतिरेकाभ्यायुक्ता । त केोचिन्मीमांसलषकमन्याः परमेदवरनिरपे
। ्षाल्कमजनितादपूवोदेन ` शमाुभभपत त्वष्डस्ता! क्नराकवन्दरि-
च
च
(१) दढ ~इत्यपि पाटः ।
शद शिवमदहिञ्नस्तोत्रम् ।
~
हरो स्तोंति--
कक्रताविति#। हे धिवुरहरेति सम्बोधनं एवो काद चुषञ्ञ्यते ।
क्रतो यागादेकमोणि आद्युतरविनाशस्वभावत्वात्सुत्त कीन स्वकारणे
सृक्ष्मरूपतां प्राप्त ध्वस्ते सति , क्रतुमतां यागादिकमेकारेणां कारा
न्तरदे रान्तरभावितत्तत्फरसम्बन्धे तन्निमित्तं त्वं जाग्रदासि भवुद्ध
पव वतसे । घतेमाने विदितेन खजा जागरणस्य स्वेदास्तित्वसुच्य
ते तेन खवैदेवावदहितोऽसीत्यथः। ननु किडगादपदवाच्यक्रियायाः
स्वगां दिसाघनत्वान्यथाजुपपत््या कर्प्यमपूचमेव फल्योगाय जाग
तिं किमी इवरेणेत्यत आद । क्ैत्यादि । प्रध्वस्तं विनष्ट कर्मं पुरुष-
स्य चतनस्य फर्दातुराराघन विना कर फति । न काषोत्यथः।
नहि रोके कुजापि विनष्टस्य कमेणोऽपूर्वद्धाराफलजनकत्वं दष्टम्।
खोकालुसखरेणी च वेदेऽपि कल्पना लोकवेदाधिकरणन्यायात् । चे-
तनस्य तु राजाद्राराधतस्य विनेवापूवै सेवादेः फरजनकत्वं दद्यः
ते । तत्र लोकद ्रपकारेणेव वैदिककर्मणामपि फटजनकत्वसम्भवे
न खाकावरूद्ापूवफरृद्ठत्वकट्पनावकाडराः । अपृ हि लोकसिद्ध
कारणान्तरनिरपेश्लं वा स्वगोदिफलं जनयेत्तत्सायेक्षं वा । आये त-
त्फरूापभोगयोग्यदेदेन्द्रयादेकमपि नापेक्षेत । न चेतदिष्, सर्वस्या
प उलङ्'लाद्ः रसारसयुक्तात्ममनायोगादि दष्टकारणजन्यत्वाभ्यु
वगमात् । द्धेताय तु लाकासद्धदेहेन्द्रियाद्यपेक्षावदीदवरापेक्चापि नि.
यता, काकं तथादशनात् । तस्माचच्छृतिन्यायासिद्धेश्वरपदार्थधमिं
चाधकट्पनाद्ारमयूवेपदा्थस्य नेरपेक्ष्यधमेमान्नवाधकलट्पनम् । ‹
ख्मत उपपत्तः हाते न्यायात् । इदं चापवेमभ्युपेत्य तत्सािक्त्वमी-
रवर स्याक्तम् । वस्तुतस्तु नापूवं किचिखमाणमस्ति। क्िडादीना-
मष्टा्युपायतावाचकत्वात्। तदन्य थालुपपत्तश्च श्युतिन्याय सहसि.
छ परमरवरणवापरक्षवात् नापूचासाद्धः । अपूव च तत्फलदाचरत्वं च
डय भवाद्धः कल्प्यम् । अस्माभस्तु केवखमादवरः कटप्यः । तस्य
फठदातृत्वादिकं तु चतनत्वाद्राजादेवद्धेकसिद्धमेव । सर्वज्ञत्वन च
तत्तत्क्मानुरूपफरुदातत्वान्न वेषम्यनेघण्यादिदोषप्रसङ्गः । यत एवं
त्वमेव सवेक्मफरदाताऽतस्त्वां कतुषु श्रोतस्मातैकर्मस कालान्तरं
फलसाधनवु फठदानप्रातिथुव फर्दानाय रप्मकमिव सम्प्रेष्य सः
स्यक् श्रुतस्न्ञातन्यायः प्रकषण ननाश्चत्य कमफरद्रातुस्तव सद्धा
संर्छृत--भाषारीकाभ्यां सवरितम्- ९9
च भ्रतिपादिकायां हि श्रुतौ “एतस्य वा अक्षरस्य प्रदासने गार्गं चा-
बाप्रथिव्यौं वधते तिष्ठतः । एतस्य वा अश्चरस्य श्रद्ासने गामि द्-
दतो मचुष्याः प्ररंखन्ति यजमानं देवा दर्वा पितरोऽन्वायत्ताः” "क
मीध्यश्चः सर्वभूताधिवासः “पष उ द्यव साघु कमे कारयति त यः
श्रान्निनीषते पष उ पव वाऽसाु' इत्यादिकायां श्रुतो द्धं बद्धा अ-
यव।दत्वप्रयुक्तस्वाथाप्रामाच्यदाङ्यनिरासेन खोकासेद्धद्डतरन्याया-
जग ९}दीदतया देवताधिकरणन्यायेन स्वार्थं भामाण्यं निश्चित्य ज. |
नः श्र॒तिस्खछतिविदहितकमांधिकारी कमस श्र।तस्मार्टखु कृतपारेकरः |
छतः परिकर उद्यमो येन स तथा । कतारस्भो भवतीत्यथेः । परतिभू- |
लाद्यं च पएताचन्मात्रेणेव विवश्छितम् । यथा कञ्चिदुत्तमणेः श्रम
गनिष्िते श्षिधकाखावस्थानं स्वधनापणलमथ काचेत्प्रातिखुवं निरू
य अधमर पलायिते खते वा पतस्मादेव कशिनः प्रतिञुवः स-
कराशात्स्वघन भाप्र धामीत्यमिध्रायण यस्मे कस्मेचिदेधमणौयणे परय
| चटति तद्धदधमणेस्थानाय कमण अ 041 9२
स्थानीयात्तत्फले ्रपस्यामीत्यभिभरिणेत्तमणस्थानीयो यजमानो
निःशङ्कमेव | कमौयुतिष्ठतीत मावः ॥ 1 (अ पूव.
चत् । यद्वा खनः साधुजनः कमे श्रुति स््रतिविहितं कमाछत छत
घान् । काडराः सखुजनः। पारिकरः परि ~ 3. क सुख राति द्द्“
वैषां खुखकरः । अदिखक इत्यथः । 'दटढपरिकरः' इति
तीति तथा स < १
+ संस्कृत टीका
देजगदीश्वर ! ( क्रतो ) यजा दिशत्ये ( खत ) विलीने ध्वस्ततां
गते सति ( क्रतुमतां ) यागादिकमकाच्णा, यज्वनां ( फलयोगे )
स्वमीदिफकसाघने ( स्वं जाग्रत् अप्त = +:
द्रति यावत् रात्श्रल्ययः. तिष्ठसि । यतः ( ध्वस्तं ) षविन्ठं ( कम )
काथ ( पुरुषा राधनं ) चतनस्य, फलदा रादवरस्थत्यथः आराधन
लवनं ( ऋते ) विना (क फलति ) न कापीाते ध्वनः । ( अतः)
-वदमादेव कारणात् ( क्रु ) वक्ञा १ ( फरदान प्रतिशुवं )
| अ प्रतिभूः खघ्चकः उत्तमणाघमणयोमेध्यस्थ स्तं ( त्वां )
पफ
(१) "गृहीतेन" १९; ।
~
१३
| ९ 'शिवमटिघ्नस्तोत्रम् ।
भवन्तं ( सम्प्रेक्ष्य ) सम्यगवलोक्य निथिव्यव्यभिग्रायः (जनः }
खछोकः, श्ुतिस्परत्युदितकमीधिकारी ( श्रुतो ) वेदवाक्षये ( श्रद्धां )
श्ङ्कारहितां समप्रमाणां स्प्रहां ( वद्धा ) ददी, निश्चित्य वा
( कर्मसु ) श्रोतस्मातैविधिषु ( दढ परिकरः ) स्थिरोद्यमो भवति ।
कचि त्छृतपारेकर इत्यपि पाठो रभ्यते,-तच्न छृतारम्भ इत्यथः
| कतेञ्यः । अचरा चतनस्य कमेणः स्वयमेव फरूदाने ऽक्षमतां निरूप्य
पतिभुरूपा चेतन्यमया दीद्वरादेव फरधासि ज्ञापयित्वा महामदिम-
भ्रददीनपू्वेकं कर्मवादिनां मीमांसकादीनां मतं यथावन् निरस्तं
भिति ॥ २०॥ ५
| %@ सस्छृतपयानुवादः +& |
यज्ञे विनष्टे फरदानहे तोः, त्वं सावधानो भवासि प्रयज्लात् ।
फ्त्य नाराध्य भवन्त मीशा | क यज्वनां कर्मं कदापि नष्टम् ॥
मतो ऽवखोक्य क्रतुषु प्रभो ! त्वा, फखप्रद्ानप्रतिभूस्वरूपम् ।
शद्धां विधायाथ जनः प्रयोगे, श्वुन्युक्तबाक्थे बहुलादरो ऽस्ति ॥२०॥
| चछ भाषा रीका ‰&
र. दे कीरथरः । ( कतो ) यज्ञ इत्यादि ककि ( सप्ते )[ सति] `
ताजान अथात् ` विनष्ट होजने परः ( क्रतुमतां ) यज्ञकता रागक `
( फलयोगे ) स्वगादिक फर साधनो ( त्वं जाग्रत् असि ) आपी
जागते रहते द~स्योंकिं ( प्रध्वस्तं ) विन, अथवा विगङ़ाइआं
( कमे ) यज्ञादिक कायं ( पुरुषाराधनं ) चेतनसूबरूप फलदाता
ई्वरक आजराध्वना किये ( ऋते ) विना (क फति १ ) कहां फटी-
भूत हाता हे १ अथोत् कदींमी फक दायक नहीं होसकता । (अतः)
सीं .कारणसं (क्रतुषु) यज्ञादिक, कर्मौमि ( फख्दानपत्तियुवं ) .
फर दनक समय ल्क [ जामिनदार ] ( त्वां ) आपको (सम्पेक्ष्य)
अच्छी रीतिसे देखकर ( जनः ) खोग, [अ थौत् जो शरुति-स्म्रातिके
कदेदुए कर्मकि अधिकारी है ] ( श्चुत ) वेदके वचनो ( शरद्धां )
आद्रयुक्त विरोषं इच्छाको ( बद्धा ) बांध कर अथात् दढ करके
( कमेसु ) कर्मकिं करनेमे { ददटपार्किरः ) स्थिर उ दाते ह~
अथीत् कमर कंस कर उस कर्मके करने पर इट दोजाते है । अभि-
भाय यदद कि-यक्ञादिक-सकल कर्म तो अचेतन है, अत पव वे सष
संस्कृत-माषारीकाभ्यां सबकितम्- ९९
स्वयं फल न देखकते, तव उनके फलाका दाता एक माज ईदव-
रही हे, क्योकि वह सर्वज्ञ ओ।र सराक्तिमान् है, इस ऋछोकमें यह
वात दिख गै करि जेते कोद महाजन जव किसी ` अधमण
[ असखामी ] को कछ देता दैतो णक किसको मध्यस्थ | जामि
लदार ] बनशटेता है, शस्य किं यदि अधमणे कहीं मरःगयाः
अथवा कही भगनया, तो जो मध्यस्थ रहता है उसे अपना द्रभ्य
ठेखकता है--उखी धकारसे सव क्म तो अधमणरूप है, ओर
कर्मोका करने वाखा पुरूषही उन्तमणे { महाज्ञन ] है--बही. ईष्वर
> खञ्जक अथवा ध्रतिभू [ जामिनदार ] रहनेसे निरशंक - दोकर
क्मीको करता है- क्योकि यदि कमे नष्टभी दोजावे, तो उनक्त
प्रतिभू स्वयं आप [ ईदवर ] दी वने रहते दं--इखसे कतो-को
किसी कर्मपर फल नहीं पानेक। अथवा कर्मके निष्फर दोजनेका
संदेह नदीं रदजाता, अत एव् श्रुति -स्छतिपुराणा दिकोकि कर्मा पर
तर्मोका मरोखा बना रहता है-अथौत् यदि इेदवरके. विना आराधे
कमी फल देखकते हं, तो जब कमे नष्टो जार्यगे तो उनका फर
कौन देखकता हे १ अतणएवं समस्त फरटोके दाता ईदवरदीको जाग-
ङक देखकर खव छोग क्म करनेम तत्पर होते है, यदि पेखा नरी
ह्येता तो संखास्मै सव कर्माका सेनादी बन्द दोजाता-यह बात
सब प्रकारे सिद्धदे।.
+ भाषापद्याजुवादः ४
करतु सृत चै जाग्र, ठम फल वितरन हेत ।
वि अवराधे पुरुषको, विगरे का फट दत १॥
ति = > कि जग, जग्यनके फर मादि ।
प्रतिभू त॒मदि विच = दि
करि खद्धा खति कम प, जन {निज कमर कसा ॥ २० ॥
-& भाषाविम्बम् ध
क्रतूके सूते चै फलष् वानि अवे नित जगे,
[ य क ०9. [ ॐ
विना तो आराधे कस्म 1चिगर १ फलि सकं १।
को ज्ञो फर--मिकनको जामिन लं
श्रुती पे ख (श्र) दासे कमर कलि कम जन कर ॥ २० ॥
।
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१०० शिवमहिश्नस्तोत्रम् |
क्रियादक्षो दक्षः कतुपति रधीश स्तनुशरता-
म्रृषोणा मालिज्यं रारणद सदस्याः सरगणाः |
कतुश्रेष(१) स्त्वत्तः क्रत॒फर्विधानव्यसनिनो(२)
धरुवे कतः श्रद्धाविधुर मभिचाराय हि मखाः ॥२१॥ `
& मघुसूदनी टीका श्र `
प्व मगवत्प्रसादन क्तुफटप्रात्रमुक्त्वा 1वांहतानां सखभषफड
जनकत्वानुपपच्या धमाख्यमपूवं द्ारत्वन कस्पनीयमिति पक्षो निः
राङृतः। सप्रति विहिताकरणनिषिद्धकरणयोरञ्चुभषफरस्य सगव.
स्पसाद्ाखाभ्यत्वात्तदथमवद्यमधमाख्यमपूवे कउपनीयमितिराङ्ायां
राजाज्ञाखद्वनादारव भगवद्ज्ञाछछद्कनादखिलानथंफरत्वं दशद्धारेै-
व माचष्यतत्स्राभप्रायण भगवत ऽप्रसद््न कतुफलाप्राप्तमन्थग्राति
च दरदोयन्दरिहरो । स्तोति-
क्रियेति # । दे रारणद, दक्षो दक्चनामा नजापातः स्वय क्रियां
स्वञुछयाखु दक्लः प्रवीणः । यज्ञविधो कुरा इत्यर्थं
माघकारावरेषणमुक्तम् । तथा तनुतां ररोरेणामधीशः स्वाभी
प्रजापतित्वात् । पतेन सामध्यमाधेकारिविशेषणसुक्तम् । पतादशः
करतुपातयेजमानः । तथा ऋषीणां चिकाखदसिनां श्वगुप्रश्चतीनामा
(त्वज्यश्छात्वक्त्वमाध्वय्वादिरूपता । तथा खुरगणां बह्यादयो देवग
णाः सदस्याः सभ्या उपद्रष्टारः । पताररसवंसाम्ौसं पत्तावपि
त्वत्तः परमदवरादश्रसन्नात्करतोयज्ञस्य भ्रेवः भ्रेशो जातः । क{डरात्।
क्तुफखविधानन्यसनिनः क्रतोर्यज्ञस्य फट स्व गाद्. तस्य विधानं
निष्पादन तेन व्यसनी तदरकनषछठस्तस्मात् क्तरूखदाक्स्वभावो ऽपि
स्वमवज्ञाय क्रतुभ्र रुना नौत त्यथः । पतदेव द्रढयन्नाह । वामि
ति । धवं निथितेक्रतुफखदातरि परमेदवरे विषये शरद्धाविधुरं भ
क्तिरहित यथा स्यत्तिथचिषठना मखा यज्ञा #्ठुथजपनस्याभिचा-
राय नाशावव भवन्तत्यथः ॥ ह। “पक्ष तु । तवुश्तामधीदाः त
पतिः; तच स्वशरारमेव विश्र।ते पुष्णन्तात तनुभ्तो दैत्या देववा-
ह्यास्ते हि सडुरनरपिवृभ्यो न भरयच्छन्ति सर्वहिसया स्वरा रीरमेव
अ~ क = ॥ =-= > ~
(५) कतुधशः। (*) क्रतुषु कलदनग्यसनिनः । प।ठषपि ।
। पतन वद्धत्व-
१,
संस्कृत -भाषारीकाभ्यां सवदल्ितिम- १०१
पुष्णन्ति तेषामधी्ो राजा वचिः क्रतुपत्तियजमानः, अथवा तन्नु
नक्वीणान्विश्रति पुष्णन्ति ते तचश्तों वदान्यास्तपामधीशो दात् १)
कीराश्रगण्यो बाङः। कासः । क्रयाद्च्लदृक्षः इन^कष्लन्याज्लाणाणन्द्र- |
यानि यस्य स उदक्च; ॥क्रवाद्द्चश्चासावुद् द्छच्चातव लतया । खरघु
देव गण्यन्तं दात खुरगणा द्वतुट्याः पुरुषाः सदस्याः । श्रद्धावः
धयुरत्व च भगवद् चुखहातन्द्रादद्वगणः सह वराधात् । स्वभक्तद्वा-
षा हि पगवतः स्वद्रादादप्याघकः । रघ पूववत् ॥ ८१२॥
॥ । ऋ सस्रत टीका च्छ |
( शरणद } ) देशरणातिदारेन { ( क्रियादक्षः ) सकङकमभ्रव-
त; ( तश्चतां ) रारारधारणा (अधीशः) स्वामी ( दक्षः )दश्चप्रजा-
( क्रतुपतिः ) यक्ञकताऽ-यजमानः तथा (कष्री्णा) त्रिकाकदशिः
नां श्गुधश्चतीनां ( आत्विञ्य ) ऋत्विजो भावः, ऋालविकंशूत्य समित्य
। प्वं ( सुरगणाः ) ब्रह्माद्या द्वा एव यत्र ( सदस्याः) स-
या उपद्रष्टार इति यावत् । प्तादशावशष्टसामन्रीसम्पत्तावाप
( क्रतषु ) यक्षेषु ( फठदानन्यसाननः ) फर स्वगादिक तदहनि व्य
खनी, तदेकनिष्ठ स्तस्मात् ( त्वत्तः ) भवतः सकारा देव ( क्रतुभ्र
ताः ) यज्ञविद्धसः । अभूदिति यष ( हि ) यतः ( श्रद्धािधुरं ) सक
सकर्मफलदायक इदवर भक्तिविरादेतं यथा स्यात्तथा ुष्ठिताः (म
ल: ) यज्ञाः ( कतैः ) यागका रणा यजमानस्य ( अभिचाराय ) वि
नाङ्ायेव भवन्ती ति (धघुच) विनिश्चित मेव । कचित् क्रतुभ्रश' इत्य-
चर क्रतभ्रेष इव्याप पाट स्तत्रा प्यथ, स पतव । तथाच क्रतुषु फल
द्ानव्यसानन- हत्यज्ञाप क्र तफ खवघानन्यसानेन-~इति रछभ्यतभ्थे-
स्पष पव । अच्राखखपुसाणत्रपलद्धा दक्षयज्ञवेद्ध् सकथ।( मवल-
ञब्यां नीदवरवादिनां मत प्नराङवता स्ताजा भगवतो मदहिमेव स्पष्टी-
इत्यवधेयम् उक्तमपि स्कन्द्९पण- माहश्वर-कोमारिका खण्डे
० २४-च्छो° 'यज्ञादक्श्च य घमा कविना यस्या चनं वृथा
दश्स= + सस्कृतपद्याुवाद् त्
दश्चो यजमानरूपो,-ऽप्य ्रीइवरो
क्रिया ~ त्वदस्य द्हेश्य अआअदष्च |
पजापति दबगणा रसद स्याच् , ₹ङर्वात्वज्ञ
प्र ___------
छत
न्तम क 10
- (र) दानवामरगण्यो' इति पाट; ।
क
१०२ शिवमटिन्लस्तोत्रम् ।
त्वत्तः क्रतुभ्ररा मवाप यज्ञ-फरपरदानव्यसनातुसा त्सः ।
द्धावि(विश्वास, हीना हि मखा भवन्ति,कतं विनाशार्थं मवदय मेव २६
< भाषा टीका +
( शरणद ! ) दे शारणागतरक्चक ८ क्रियादश्चः ) समस्त क्रिया.
आक अभिज्ञः तथा ( तचुश्तां अधारः ) चारीरधारियोंके अधिनः-
यक, अथोत् कमे-प्रवीण एव सामथ्येवान् अधिकारी ( दक्चः ) दश्च
नामा प्रज।पति ( क्रतुपति, ) स्वयं यज्ञकतां, अथवा यजमान हप,
तथा ( ऋषीणां आत्विज्य ) [ न्रिकाठ्दररीभ्रगु -इत्यादि ] ऋषिलो-
ग जहां पर कत्विक्-अथांत् होम करानेबाके थ, ओर ( सदस्याः
खुरगणाः ) सवी देवताखोग सभासद थ, [ पसा भारी यज्ञ ] (क्र
तषु फरदानव्यसनिनः ) यज्ञो फटदेनके व्यसनी [ आदती ] ( व्व
तः ) आपदी दाया (कतुभ्रः ) यज्लकाविध्वस हुआ । ( दि ) कयौ-
करि ( श्रद्धाविधुरं ) अ्रद्धाक्ले रहित ( यज्ञाः ) समस्त यज्ञ ( कतः )
यज्ञकर्ताके { अभिचाराय) उल्टे फठ अथात् विनाशदीके `
लिपट होते ( वं ) यद वात निशित हे। भाव यह कि
जव स्वय यजमान का इश्वर पर श्रद्धा नही होती तो उसके यज्ञा
दिकं कमोके अनुष्ठान करनेस्े उलट विपरीत ] दी फट मिरुत
दे, जसे स्वयं बड़ कमेनिष्ठ तथा प्रजामाजके स्वाभी दक्षध्रजापति
वड़े बड़े महाियोको ऋत्वि ओर खमस्त देवताओं को सभासद
बनाकर यज्ञ करने खगे पर आपकी भाकतिसे वचित होनेके कारण
समस्त यज्ञकर. फ्दाता अपदीके द्वारा उनका यज्ञ विध्वस्त हो
गया जक्लस आपका कतुद्खस्' नाम दी पड़ गया-यह कथा ध्रायः
सभी पुराणोमिं पादे जाती है तथापि काशीखंडके ८७। ~<, ८९
अध्याया म धिशदरूपसे ब्णित हे ओर तुखसी छत रामायण स्च जी
मिती हे जिसके अन्तमें खा डला ३ । |
"समाचार जब सकर पाये,
वीरभद्र करि कोप पठाये।
यज्ञ विरस जाई तिन की,
सकल सरह विधिवत फर दहना । ।
भद जग विदित दच्छ गति सोह, +
जस कद्ध सभु-षिमुख कर हादे ।
संस्कृ्त-माषाीकाभ्यां संवखितम् । १०३
यह इतिदास सकर जग जानां
| तति ते संकेप बखाना ॥'
` ॐ मषरापयाचुवादः
दीच्छित द्च्छ प्रजापती, क्रया-कांडमे दच्छ।
ऋषी रोग ऋविज (ग)जर्हा, सभ्य देव परतच्छ ॥
क्रतु फल दाता तुमहिसो, जज्ञ भयो सो अ्रष्ट।
विच खद्धाके जज्ञ सवः कतहि कराह विनष्ट ॥ २१॥
ई ॐ भाषानिम्बम्
क्रिया-ज्ञाता दच्छे परभु सवाक दीच्छित वने,
ऋषी छोगे ऋविक् खुरगन समै सभ्यजर्हमे।
भयो अन्ने सो विहत, फल्दानी (ता ) तमदिसे,
विना खद्धा कीहि ठहत मखकतो नहि फ(भ)खो ॥ २१॥
प्रजानाथं नाथ प्रसभ मभिकं स्वां दुहितरं
गतं रोहिद् भूतां रिरमयिषु मृष्यस्य वपुषा ।
धनुःपाणे यातं दिव मपि सपत्राकुत ममुं
त्रसन्तं तेऽयापि त्यजति न मृगव्याधरभसः ॥२२॥
। @ मधुतूदनी दीका + |
अथ ब्रह्ममारीचयोश्चगरूपयोवंधं द्ययन्हार्दिसौ स्तोति--
#प्रजानाथमिति# । हे नाथ नियामक, तव परमेदवरस्य धुः
पाणेः धतपिनाकस्य स्गव्याधरभसः शगान्विध्यतीति श्गव्याघो
दटंग्धकः तस्येव रभस उत्साहातिरेको मरगव्याधरभसः शार एवं
तथा आर पितः स चाद्रानक्षज्ररूपेण परिणत इति पुराणप्राकतद्धः |
असुं प्रजानाथ बरह्माण दिव स्वभे यातं प्राप्तमपि नक्षत्रमध्ये सरग.
शियोरूपेण परिणतमपि तथा सपतराङूतं सह पत्रेण रार शशरे
प्रवेदयातिव्यथां नीतः खपचाक्तसुताद्ाभिवात्मानं मन्यमानं । रूप-
कमेतत । शरस्याद्वानक्षतररूपेण सनिधानमा्नं नतु ताडनमिति
द्टन्वम् । अवा _ चर्ण ताडित पव ब्रह्मा सद्रस्य क्रोधोत्साहवि-
ल्य ष पवाद्रानक्षत्ररूपरेण परिणत इति पुराणान्तरप्रसिद्धया द्र्टभ्यम्।
भ
१०४ शिवमहिस्नस्तात्रम् ।
अत एव चसस्ते चिभ्यन्तमद्यापि न त्यजति । इदानीमपि धचुष्पा-
णिमेव त्वां सवेदा दशेयतीव्यथैः। तस्थेतादरादण्डाहतामाह । स्वा-
मात्मीया दुहितर पुचा र।हिद्भूतां क्ज़या ब्बृगीभ्रूतां ऋष्यस्य
स्रगस्य वपुषा शसयरेण एरेरमयिषु रमधयेतुमिच््ुम् । इयं चेज्या
खग।भ्रूता तद्यदमापे खगरूपणेनां भजिष्यामीति वुश्धचा स्गरूपण
पसम हठेनानिच्छन्तीमपि तां गतं रत्यथ घाक्षम् । तस्य परमवालि-
ऽपि स्वम्रयादातिक्रमे कारणं वदन्विरिनष्टि । अभिकं कामु
कम् । कामेनाभिभूतत्वारस्वमयादोह्छद्गिनमित्यथेः । पवदहि पुरा
णषु प्रासद्धम्- बह्या स्वदुहितर सध्यामतिरूपिणीमालोक्य काम-
वदो भूत्वा ताखुपगन्तुसुचतः । सा चायं पिता भूत्वा मासुपगच्छ-
तात लज्जया खगीरूप। वभूव . ततस्तां तथा दष्टा ब्रह्मापि खगरूपं
दघारः । तच्च दष्टा त्िजगच्नियन्ता श्रीमदादेवेनायं परजानाथो धर्म
न्वत! भ्रूत्वाप्यतादखयं जुगुव्सतमाचरताति महतापराघधन दण्डः
नाया मयात्ं (वनाकमाङकृष्य खरः प्रष्चिप्तः तत स ब्रह्मा बाडतः
पीडतश्च सन् सछगरदिरोनक्चचरूपो बभ्रूव । तत; श्रीरुद्रस्य दचारो-
ऽप्याद्रानक्चच्ररूपो भूत्वा तस्य पश्चाद्रागे स्थित
रसाः सवेदा ख।नहितत्वाददयापि न त्यज्ति इत्युक्तम् । हरिपक्चे त ।
ह नाथ, राहद्भूता गत प्रजानाथं दिवं यातमापे धनुष्पाणेस्तव
उगव्याधरमसल्यापिन त्यजति । रोहिता हरिण्याः; सका
वतत साह दुभृदार्णशावकः तस्य भावो साहद्भूता तां गतम् ।
हरिणशावकत्वं पाक्षमित्यथैः । प्रजाः भागिने नायात उपताप्रयतीति
प्रजानाथा सक्षसः स॒ च भरकृते मारीचाख्यस्तम्। किम त्य्
गरूपनारणमल्यत अहि । प्रसभमभिकं रिरमयिषु पक्षा शयी -
द्युक्ता सभा य॒स्य स भ्रसभस्तं तादशो, अभितः कानि रिरांस्ि
यस्य लाजभक्रा दसान्नररस्तम् । सखातापदहरणोपायन कोडयितु
मिच्छुम् । तथा स्वा दुहतरमयानजां कन्यां साता ऋष्यस्य
वपुषा वाचच्रन्नृगरारस्ण दर्रमायचु नम! दायतुमच्छुम् । [विचिन्न
गरूप मा द्वा साता खस्विमावाद्त्तमुग्धा मच्चमेग्रहणाश्च अ
राम प्ररयिभ्याति । ततो रामे बहूदरं मयाऽपसारिते क्ष्मणे च
तदुदह््शाथे. गत एकाकना सीतां रावणः सुखेन दरिष्यतीत्यभिः
प्रायेण श्तविचिध्रश्गशरीरामिव्यथेः । अत पव बानेन सपना
। तथा च द्वोस्गादा-
संस्कृत-माषादीकाभ्यां सवङितम्- ` १०५
कृ तत्वादिव परलोकं यातम् । खतमित्यथेः । असुं खतमपि भरसन्त
न 4 -- 9 त्युत्पे [ च ;
मद्यापि तव खगन्याश्र्भला न त्यजंतीत्युसधरश्ारूपो ध्वनिः । माष
पूववत् ॥ २२॥ |
> संस्कृत, टाका + |
(नाथ ) हे स्वामिन् ? नाथतीति अच्प्रत्ययः। ( धदुष्पाणिः )
पिनाकः पाणेः महाघचुधरस्य ( ते ) तव ( खगव्याधरमसः ›) खग-
उचाचयोः रभसो वेगः । अथवा खगान् विध्यतीति खगव्याधः- “इयाः
द्यधासु"-३। ९ । १४१-दइत्यादेना णः । लुन्धकः । तस्येव रभसं ॐ.
ल्वादातिरेक इव्यथः । “रभसो वेग ॒हषेयो-रिति विद्वभ्रकाराः 1
भ्त्यविचमितमि"-३ । ११७-उणा० इत्यादिना असच् । आखेटो-
च्छाद इति यावत् । श्रगाचंसरणतर्परग्याघखीखायु करं णदषे इः य-
मिघ्रायः। ( अचप्ि ) अद्यतनादिवसावधि ( धजानाथं ) बरह्माणं ,“ख-
शा प्रजापति वधाः०-ङत्यमरः । ( नं वयजति ) नैव विजहाति । शदा-
नी-मपि भवन्तं धचुः पाणि मेवावखोकयतीति भाचः। अन्यत् सवं
-विक्ञेषण मेव-कथ भूतं वरजानाथ मिति सर्बैत्न योजनीयं ( रोहिदभू-
ताँ स्वां दुहितर ऋष्यस्य वपु रिरिमयिषुं ) कुज्ञावरा दधंमीचरः
णमया द्वा सोेद्भूतां शगभूतां स्वा मत्मीयां दुहितरं पुजी ऋष्य
लय खगस्यैव वपुषा शरीरेण रिरमयिषु रमथेतु मिच्छुभ्। शवं खगा
ज्ञाता चे दह मपि खगो भूत्व नां मजिष्यामी ति ड्या सगरूपेण
-( श्रसभं ) बक पूवेकं दडः अनिच्छन्ती मपी्यर्थः। ( गते ) रत्यथं
देव चयतप । तस्यापि मय्यौदातिक्रमणे कारणं विदन । ( अ
{मिकं ) काकः, “अदुकाभिका्मीकः कमिता -५ । २। ७४-इति
साधुः + पुनः । दिव यातमपि ) स्वगेपय्यन्तं पलायत मपि, अथौ
न्श्रग्िरो नक्ष्ररूपतां गत॒ मपि ( सपनत्रारत ) सह पचैण शर
नारे प्रवदया तिव्यथितमिबा व्मान मन्यमान ( अमरु ) ब्रत्यक्चङूपेण
वर्तमाने । अत पव ( सन्तं ) अल्यन्तभयग्रस्त भित्यथेः । अत्र कु-
वि विदवचजोऽपि परमनियामको भगवान वि्ेदवर पे
तिं तस्य मिमाति तिशायः प्व द्योतितः स्तोत्रक विनेति ॥ २२॥
| `. ॐ सस्कतपयानुवाद्ः र
थ | स्त्रु हरिणीत्व मेता, सगस्वरूपेण विदतं मिच्छु!
दा सजनाथ मसु पुराणः वाणाभिघातव्यथितान्तयलम् ॥ .
९४
१०६ ¦ शिवमटिञ्नस्तोत्रम् ।
[| [9० [क छ ‡
कामातुरं देव ! दिवं प्रयात, जसन्त मयापि पिनाकिन स्ते।
जहाति नेवा तिधनुधैरस्य, आखटकोत्साह उभाविदहारिन् ॥ २२॥ `
ऋः भाषाटीका +
( नाथः! ) दे, सवैनियामक ! ( घुष्पाणेः ते ) पिनाक :नामक
महाघञुषको हाथ धारण करने बाले. आपका. ( खगव्याधस्भसः )
खगाके अहेशीका उत्साह अथोत् स्गोकी खगया [ शिकार ] करनं
मं खमे इए व्याघका. उत्साह [ दौसिखा | । (अद्यापि ) आजतक
भी (अमु प्रजानाथ ) इस वतमानः समस्तजगतक खष्िकर्ताक्तो
(न त्यजति ) नदीं छोडता हे । ओर सव विशोषण हे अथात् केसा
हं भरजानाथ [क~ (रोदेद्भूतां स्वां दुदितर ऋष्यस्य वपुषा रिरम
प्यघु ) जम पड़करः अथवा पापके ` डरसे हरिणीवनीहुई . अपनी
कन्याकं साथ हदारणक्रा शरीर घरकर रमण करनेकी च्छा
करन वाखा 1 फिर केसा हे-( रसभ गतं ). उसक्री . इच्छा नदी
दात परम्म चखपूनक गमन करने वाला । श्गी जव नरह चाहतीथी
तो बर पृवेक [ जबरदस्ती | गमन करनम कारण दिखाते ह कि
( अभिक ) कामातुर । फिर-( दिवं यातत मपि सपन्नारुत ) स्वगे
पय्यन्त भागकर जान परभा अपनको बाणसि वधाद समञ्चन
नाखा-अतषल ? व्रल्न्तः) भयसे स्नस्तः;। येसवः प्रजानाथं ) के
वयषण हं । आग्राय यह हं किं जव प्रजापतिभी कामातुर होकर
<पपन। कल्याक रूप पर.माहत `हो गये तो वह अपने रूपके कारण
पिताको कमातुर समञ्च तुरत म्म | रोहिणी
नक्ष | हो गई
जिसम पञ्युका रूप देखकर पिताका काम वेग रान्त हो जवि-~पर
उस, 7 हत्त ह भ्रजापात्त भी खगका शरीर धरकार वख पृर्वैक
उसके साथ स्मण करनको उद्यत हो गये-यह देखकर भगवान्
दाकरजीने धलुष दाथ लेकर उनके पीठे धावा किया जिसपर
चह स्वगे तक दं) ड पर आजतक उनका पिंड नक छटा-कयोकि
सभ्या त ^ उरगा अश्या ` पाहा नन्त ह, आर उसके पीडे पीके
चख्न_ वाला प्रजापति गिरा नक्षत्र है-फिर उसका आखर
करनको प्रतिक्षण उद्यत रहने वाखा श्रीमहादेवजीका बाण [ रौद्र]
आद्रानक्षत्न बनकर उलकं पाड खगा रहता हे-भाव यह कि स्गोके
~
संस्कृत-भाषासीकाभ्यां ` सवङितिम्- १०७
सिये जब पजापति सग वने तो आप भी तुरत खगयु [ शिकारी ]
वन॒ कर उनके पीर पड जिस भयस वह अपनेको तीरसे विधा
आ खमञ्चकर नक्षत्ररूपसे स्वगे मे भागते फरत हं-दस ्छोककीं
कथा स्कन्द पुराणादिकोमें विस्तृतरूप से वणित हे-इसका भाव
यह दे कि आंराको कोन कदे जब स्वय प्रजापतिमी कामके वराम
वडक्र कुपथ पर आ!रूढ् गये तो आपदहीने उनकाभी चासन किया
अत एव आपकी महिमा स्बथ। अतुलनोय ओर अचिन्तनीय)हे \
` “स्युभ अर अखुभ कम अचुहाय, "नष 5 नीक
श्या देद फल दद्य विचाथे । ( तुर रा) ॥
= माषा पयानुवादः + |
निज तजा आभिखाषते, कामुक परजानाथ ।
हरिन रूप धरि जात भे, विहरन हदारेनां साथ ॥ ` }
कर छे धु वेभ्यो तिह गयं स्वगखा भाग । नुग
तज्ञत सिकारि अजह नहि, च्छ पेखि कारे छागः ॥ २२ ॥
~ भाषा निम्बम् + |
अपानी कन्याते रमन करिवेका खगवने,
व्रजास्वामी कामी सरग तरख दोरत थक ।
तचे आपौ व्याधा बनि तिहि टखेद्यां रत सा,
स्यि दथ चापो फरड् अजह नाहि तजतो॥ २२॥
स्वखावण्यारंस धुतधनुष मह्वाय दणच- ॥
तपरः प्ल दृष्ट्रा पुरमथन पुष्पायुध मपि । ` , =:
यदि खैणं देवी यमनिरत देहाधधटना-
द्ैति त्वा मद्धा बत वरद् मुग्धा युवतयः ॥ २३ ॥
-& मधुपूदनी टीका =+
-परमविनां वरावपि श्चरीराममदषद्वा खक्ष्मापाचत्यञ्ुकम्पया
देणाभिवात्मान दश्षैयेव इति भतिपादयन्स्ताति--
# स्वरु वण्ये ति# । दे पुरमथन, दे यमनिरत, यमनियमासनाद्य-
छङ्गियागपसयण । पतन् जितान्द्रयत्वमुक्तम् \ पुष्पायुध कामःत्वयषए
॥
| ॥
॥
॥
(
९०८ ` , ` शिवमहिन्नस्तोत्रम् ।
तृणवन्तृणमिव ` अहाय ` शीघ्र ष्टुत दग्ध पुरः साक्षाद वाञ्यवधानेन
दष्टा चा्चुषज्ञानविषयीङकृत्य । कीटा पुष्पायुधम् । स्लाचण्याशसा-
धतघयुषं स्वस्याः पार्वत्याः यद्कावण्यं सोन्द्या तिक्ायस्तद्धिषया आः
शंसा परमयोगिनमपि श्रीरद्रमस्याः सौन्द्यौतिशयेन वडीकरिष्या.
क ९
मीति या भ्रत्याद्ा तया निमित्तभूतया धतं घञयनेति तथा तम्।
पतेन स्वखावण्यातिरायस्यापि श्रीरुद्राविषयेऽकिचित्करत्वमुक्तम् ।
तथा चेव स्वङावण्यवेयथ्य पुष्पायुधस्य तृणवदादं च स्वयं साक्षा-
चृत्वापि देवी पावैती इयं चिरकाल मामुदिदय तपः कृतवती चिर-
दुःखं मा-धराभ्नोति करुणामात्रेण देदाधेघटनात् त्वया स्वशरीराधं$व-
स्थापनाद्धेता्॑मबीजात् यदि त्वां सवेयोगिनां वरं खणं ग्रययं मद्-
धीनो न भवेत्कथं मां स्वहाशरार्घं स्थापयेदिति आान्त्या सख्ीसक्तं
यद्वेति विश्ञेषाददोनात्कल्पयति तर्हिं: तदद्धा युक्तमेव तस्याः ।
अयुक्तस्य पि युक्तस्वे हेतुमाह । बतेत्यादि । दे वरद, अतिदुलंभमपि
स्वदेदाध-दन्तमिति वरदेति योग्यं संबोधनम् वत. अदो, युवतयस्त-
रुण्यः मुग्धा अतरवज्ञाः । स्वभावत पवेति दोषः । तथा च सहजान
युवतिविभूषणानां परधानं मोर्यमनुकु्वन्त्याः स्वरूपतश्ितिरूपाया
अपि देव्या मिथ्याज्ञानं युक्तमिव्यर्थः ॥ हरिपक्षे तु । हे अधघटना-
दव, घटनाया अधेमित्यधेघटना अर्धपिप्पलीवत्। तस्या दवो वन.
बहिः । दाहक इति यावत् । सीतारूपाया लक्ष्म्याः रामरूपेणोचिता-
त्संयोगार्स्वेच्छयाऽधसभागं दत्वाऽधविप्रखम्भं दत्तवानसीव्यर्थः।
सा पूवेछोकोक्ता देवी सीतारूपा रक्ष्मीः । कीदशी । यमनिस्तदेहो
अत्यन्तपतिवता | तथा -पुरमथनपुष्पा पुरस्य शरीरस्य मथनानि
पीडकानि पुष्पाणि यस्याः सा तथा । पुष्पाणामपि (९)स्पराासहा।
अतिञु्कमाराङ्गी इत्यथैः त्वां श्रीरामरूपं यदि ख णमवै(२ )व्यवगच्छति
तदृद्धेत्यादि पूववत् । व्वां कीटशराम् स्वकीयं खावण्यम्ररो्यादिरुण-
छृतं सौन्दयं तस्मिन्नादा यस्य स स्वलावण्याशस्तम् । सीताया
अनुद्धरणारस्वस्य रौयौदिप्रसिद्धिग॑च्छेदिति स्वकीतिरक्षार्थैनमिः
त्यथः । अत पव धतधयुषं सज्जीकतकोदण्डम् । ददमेकं मयीः
मुक्तम् । ्रमवीजान्तरमाह । अह्नाय तृणवत्पुरः प्लुष दष्टा शीघ्रमेवं
¦ (4) लक्ौलीडोलनेरतियु०' इति पाठ; । (९) "मेति येति, इति वाः । ` `
संस्कृत --भाषारीकाभ्यां संवकितिम्- १०९
तृणस्येब पुरो लङ्कायाः ष्छष्टं दाहम । मावे क्तः । तथायुधं युद्धमपि
दष्टा । आयुधश्चब्दस्य राखे युद्धे चायुशासनात्। तथा च स्वकीं-
तिरक्ार्थमत्यथमत्यन्तपतिवतायाश्च देव्याः कारुण्येन करविमोच-
नाथं सजीरूतकोदण्डं त्वामधंघरनादेवमप्ययं यदि मदधीनो न भवेन्त-
दा कथमेतादश्दुष्करकमाणि मामुदिदय कुयादिति मेण स्ीसक्त-
मिव कर्पयतीतव्यथेः । शेष पूववत् ॥ २२ ॥ । |
+ सस्कृत टीका
। ( पुरमथन ! ) हे च्रिपुरान्तक | ( स्वक ।वण्याङसाध्रतधञचष )
स्वस्याः पावेव्याः पव यल्कावण्य सोन्दय्यातिश्यो रूपश्ोभाविश्ेष
स्तद्टक्चषणं-
यथा- | |
“'नुक्ताफठेषु छायाया, स्तरलत्व मिवा न्तरा । `
प्रतिभाति यदङ्गेषु तछाबण्य भिदो च्यते ॥
इत्युज्ज्वलनीरुमणिः।
तस्य आशंसा भत्याशा-अथौ जितेन्द्रिय मपि शिव मेतस्या
लावण्येनैव जञष्याभ्ये ताडशी धारणा, तथा चोक्त मपि कुमारसम्भवे
““कूय्या हरस्यापि पिनाकपाणे, वैय्यच्युति के मम धन्विनो ऽन्ये।”
प्व रुपया धारणया -निमित्तरूपया धरत धञचुं रयन त । “स्वलाव-
ण्या दांसे"ति पद् वृथक्रूतचेत् देवी-पदस्यापि विशेषणत्वं प्रयाति
तत्रा त्मसोन्दय्यैकीतनशीलका, रुपगरविंते व्यथेः। ( पुष्पायुधं ) कामं
( अहाय ) ्टिति-अन्ययपद् मेतत् । ( पुरः ) अग्रे ( तृणवत् ) श
्कतृण सदश ( प्ठुष्ट ) दग्ध, वुषु-ष्ट्धषु-दाहे-इत्यस्मां दातोः कथ
त्ययः,-तथाच, धयस्य विभावा-७ । २। ९५-इत्यत इट् न! ( दष्टा
अपि) साक्षा दवलोक््यापि (देबी) पावती (यमनिरतदेदाद्धेघरना-
त् ) यमनियमा-सनादयष्टाङ्गयोगतत्परशारीराद्धेयोजनकारणात्, कि-
वा देयमनिरतेति खम्बुद्धिपदं, तद्रे स्वशारीराद्धे ऽवस्थापना देव
८ स्वां ) परमनितेन्द्रियं ( यदि ) कदाचित् ( खेणं ) खीसक्तं स्वा-
धीनं कस्पटमित्ि वा ( अवैति )। तर्हिं तत् ( अद्धा ) ` युक्तमेव -““ल
ग न्मः
११० ` ` शिवमहिन्नस्तोत्नम् ।
च्वे त्वद्धाञ्ञसा दय'-मित्यमरः 1 हे ( वरद !.) देव्या अच्युल्कष्टतपो
वीक्ष्य स्वदेदाद्धेरूपवसर्दातः ! परमयोग्य मिद् सम्बोधनम् ( वत.)
अहो ! खेदे वा ( युवतयः) तरूण्यः ( मुग्धाः ) मूढा अतच्वज्ञा
इत्यथैः (मुग्धः खुन्दरस्रढयो'-रजाप्यमरः । भवन्तीति चोषः 1 अत्रा
व्यथाँन्तर न्यास पव । अद्धंनारीदवररूपवणंनन्तु स्कन्दपुराणस्य माः
हेद्वरखण्डारुणाचरमादास्म्ये २९१अ = शरऋ्छोकादारभ्य रछपर्य्यन्तंः
तथा शिवपुराणस्थवायुसहितापूवंभागे १३अध्याये चाद्धनारी
इवरस्तोत्रं॒ब्रह्मणोक्तं प्रेश्षणीयमेवेति विस्तरभया न्नह लिखितं
अस्मिन् पये कामदाहको भूत्वाऽपि स्वय मद्धनारीदवररूपधसये योग-
तच्वज्ञो भगवा नवेति परमाद्सुतमदहिमप्रकाशानं स्पष्टीकत मिति ॥२३॥
& सस्कृतपयानुवादः ई
धेर वीक्ष्य पुरः प्रदग्ध, पुष्पायुधं त॒च्छतृणोपमानम् ।
भ ० ५ 4 ॐ ^ + (2 +~
देहाद्धसयोजनकारणा =चे,-दवेति देवी (गोरी) तेपुरान्तक ! त्वाम् ॥
खीरुम्परं स्वीयवरावद् वा, स्वकीय सोन्द्यं मिवो द्विरन्ती ।
-@ सषाटीका श्रू न
तीं श ! मुग्धा वत सम्भवन्ति, खियो विद.धा अपि निश्चयेन ॥ २३॥
` पूबेःकथितः छोकमे कामुक परजापतिकेः शासनकीं वात करीं
ग-इससे एक राका यह दोती हे कि महादेवजीने दृसरेको तो अः
पराघ देखकर दंड दिया पर स्वयं तो पार्वती देवीकेो अपने अधि
अगमं लिये रुदते है-अतप्व वेभी तो कामुक हे !-इस ` सन्देहकी
निवत्त इसीश्छोकम करते है-( पुरमथन ) दे. चिपुराखुरदादकः !
-इस विशोषणक्रा भाव यह है किअकेखे काभको कोन कहे आपने-
तो तीनञो पूरे पूरे पुरो [ नगो ] हीको ` जलाकर भस्म कर डाखा
है- यह बहतः दी योग्य विशेषण है । ` ( स्वलावण्याशंसाध्रतघयुषं )
अपनी दनादकी आ्ासे अथात् पाबेती देवीकी खुन्दरताके भरोसे
धारण किया हे धजुष जिसने येखे-( पुष्पायुधं ) फूठदी दँ आयुध
जिखक-गथोत् कामदेवको ( अहाय ) टपर, उसीघङ्ये ( पुरः )
५4
सक्रस्त~-भाषार्दीकाभ्यां सवलितम्- १११
अपने सामने ( तृणवत् ) [ सूखे | तिनगोके समान ( ष्ठु )
जरूकर राख १ >॥ (दृष्ट्रा अपि ) देखकर भीः( देवी ) स्वय भग-
वती पार्वती जी ( यमानिरतदेदाद्धंघरनात् ) यम-नियम-आसन--
इव्यादिमे तत्पर रहनेवारे शारीरम आधा. मिरालेनसे ( त्वां ) आष
देसे परम जितेन्द्रिय पुरूषको ( यदि )-जे( कि;'( खरेण ) स्ोजत,
अथवा खीमे आसक्त ( अवेति ) समद्यती है तलो (अद्धा ) खीक दी
हे । ( वरद ! ) दे पावतीजीके. बड़ कटार. तपाका दंखकर अपनी
आघीशसर् देदेने वाङ {( वत | ) बड़ खेद्की चातहं । किं, ( युव
) जुवतीलोग ( मुग्धाः.) खख्य . तत््वका नहा सूमङ्चता-अतः
मदृदी दोती हं । भाव यह हं [कि चाह पाबेती देवान जपुरासखुरका
देखा दो पर कामदेवको-जसन उह्लीके भरासं आपका
जीतटेनेकी. इच्छासे धनुष. उठाया था अपना सामने जख भुनकर
राख इआ देखकरभी अरर समाघलगानवाखं आपका अपनी
अधी शचशेरके देडालनेसे यदि खीभक्त समन्चत। हतो यह बड़े
लददी वात हे, कि तरुणीरोग मूढौ वनी रहती हं ॥. चतनस्वरू
पा भगवती का मायारूपा दानहोस सुग्धा हाना पल ह ।
यथा-“सत्य कहहिं कवि नारि खुभाउः
सब बिधि अगम अगाध दुराॐ ।
निज प्रतिर्विव मुकुर गाहे जाई ४
जानि न जाई नारे गति माई) ( तु° रा० )
र देडाख्नेकी बातमी दूसरे
दाह न
परः)
{दी पावैतीजीको आधा यर
धरक्रास्ते रामायणम कटीगदई हे जस कि-
'हुरखे हेत हेरि दर हाक,
: किय भूषन तय-भूषन तक्र ।* ( तुऽ रा०)
किवा- ` ।
'“जजा अनादि शक्ति अविनासाने,
सदा संभु-अरधंग-निवासान । इत्यादि ( तु° रा० )
; नि । ॐ भाषापदयोनुवादः +
` ज्ञास दुनार आस वस, परम घनुधर मार ।
देलत देवी समुहे, तृन-सम भो जारे छार ॥
११२ ~ ;.:: : ज्िवमहिन्नस्तोत्रम् ।
` अधे देहके घटनं ( दान ) ते, ख्ीजित समुद्चहि तोहि ।
अहह | जाोगिवरः| वरद | ध्रुव, जवती सुगधा हदि ॥ २३॥ `:
॑ द्धः भाषाविम्बम् +
` स्वसोदज्ं भाषी धचुषधर चुष्पा-युध सज्यो,
भयो छरि देखी तृन-सरिस आगे मद्नको ।
` भवानी जो खजित् अरध-तज पाके समुश्चती,
प्रमो !भोटी भाी निपट मति होती जुवतिकी ॥ २३ ॥
+... स्मशानेष्वा-कीडा स्मरहर पिशाचाः सहचरा :
` ` श्रिताभस्माख्पः स्रगपि चृकरोर्टीपरिकरः
: + +; अमङ्गल्य शीरं तव भवतु नामेव मखिलं
` तथापि स्मरणां बरद परमं मङ्गलमसि ॥ २४॥
अथ स्वयममङ्गलशीखतया क्रीडन्नपि भक्तानां मङ्गखमेव ददा-
सि, स्वयममङ्गलशीलानामपि भक्तानां त्वमेव मङ्गरमसीति च वद्-
न् शकरनारायणां स्तोति-
` -# स्मरानेति। # हे स्मरहर, हे वरद्, तवाखिलमपि हीट स-
वेमपि चरितं पवप्रकारेणामङ्गल्यं मङ्गर्विपशतं भवतु नाम । कि
नस्तेन निरूपितनत्यथेः। तथापि स्वयममङ्गटन्लीलोऽपि स्मतणां त
वस्मरणकतृणा त्वे परम मङ्गर्मेवासि निरतिच्यं कल्याणमेव भ-
बसि तेनामङ्गटशीरका भय रुद्रोन मज्गलकामेः सेवनीय इति मंप
रिहत्य मनोवाक्नायप्रणिधानेः सवेदा सर्वैः सेवनीयोऽसीत्यर्थः ।
पवेपद सूचितममङ्गट्यं री खमेव दशयति । स्मरानेष्वि व्यादि । स्म
छ्ानेषु शवरायनेष्वासमन्तात्केछिः, पिदाचाः प्रेताः सहायाः, चिता-
भस्म दावदाहस्थ भस्माङ्गरागसाधनम्, उकराटी मनुष्यश्िरोस्थ-
सभरदस्रङ्वाखा । अपिशन्दादन्यदष्याद्र॑चमादि॥ # दरिपक्चे तु । #
‰& मधुसूदन टीका ५२ ५८
सस्ृत-भाषारीकाभ्यां सवकितम्- ११३
हे वरद, तवः स्मतृणाममङ्गल्य शीं भवतं चाम्र; तथापि तषां स्व-
मेव परमं मङ्लमसीव्यर्थः 1 तथाच गीतासखु-'अपि चत्सुदुराचारां
भजतते मामनन्यभाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्ञ्यवासतो इहेसः
दति 1 अथवा तव नाम समते गामिति योञ्यम्। नाममात्र स्मरताःपर्म
मङ्धलमास्ि त्वां स्मरतां त॒ किमु बाच्यमित्यथेः) कीटदा नाम। अखिखंन
खिर फलरहितमांखरु खदा सवे सफटामसयथः। अत्यन्तपा(पल्वन
ग्रसिद्धानामजामिखादीनांमपि त्वन्नाममाचस्य पु्रनःमत्वन ;मरणन्य
धया रिधिखकरणत्वनः चः मन्दमुच्चारणेऽाप सव पापक्चयद्धारा प
-रमरपुदषाथेघ्रा, श्रवणात् । अमङ्गल्य दाख्मच द् चेयति । स्मराने-
च्व्रिलयादि रूपकेण । `अव्यन्तातिरस्छृतिवाच्या ध्वनिरय लक्षणाम्रुखः;
न्नावरायनतय्येषु स्वेदा रोदनप्रधानग्रहेष्वा-इषत् कडा । अस्पका-
ट वेबायेकतुच्छखखध्रा)ारत्यथः । तथाच स्मरहरापशाचाः सह-
चराः स्मरणे स्मरः रास्रीयो विवेक्रस्त हरन्तीति स्मरहरः पिश
चतुख्याः, पुचरभायपद्यः पिद्याचाः, स्मरहराश्च ते :पिशाचाश्च स्मरः
ह र{पराच्ाः । यथा पिल्ाचाः स्वावङ्न ज्ञानटखाप रत्वा पुरुषमनथं
योजयन्ति तथा पु्भायादयाजषप । तादचाश्च ` बर्तुगत्या चारणा
ऽपि सहेव चरन्ति न क्षणमापि त्यजन्तीति सहचराः । तथा चता.
भस्मतद्य आख्पः। द्हस्व ्रण्मूजपूयादि प णत्वेनातिञ्धगुण्सत
त्वात्तद्ाडेपनस्याप्यातज्ुगुाप्लतत्वम् । तथा मुष्यदिरोस्थिसम्
हतट्या माला पिशाचवुख्य भावाद् विनोदहे वत्वात् । अपिशब्द
दन्यद्पि सर्वै चरित विषयसङ्गिनाममज्ञलमेव । पतादरा अपि च-
सवां त्वन्नाम वा स्मरन्ति तद् त्वमेव तेषां मङ्गट्यरूपेणापिभवसी-
व्यद ऽतिभक्तवात्सस्यामत्य थ । #हरपक्षप्येव योजनीयम्# ॥ २४ ॥
= संस्कृत टीका +
( स्मरहर ! ) देकामनाराक | ( इ्म्ानेषु ) रावददनस्थलेषु
( आक्रीडा ) समन्ताद्वहरणः तथा ( पिशाचाः) भरतवेताखादयः
( खचरा ) खदहारिणः सखदहाया वा (च नामस्म ) शतदेहदाहा
--त्वितदग्धकराष्ठक्चार-'“चित चन निषु चिता चिलयायां सहतौ
नि
यम् । "° ( आपः ) समन्ताद्धिलपनमङ्गराग इत्यथः । अथ च
(के
( युक्षसोर्कीपरिकरः ) दृणा मचुष्यार्णा कसोख्य रिणऽस्थीनि-“शि
२५
| ११४ शिषमदिञ्नस्तात्रम् ।
| रोस्थीनि कयोरिः ख्ी-लयमरः । गौरादित्वात् ङीष् । तासां परि-
| करः समूहः “भवेत्परिकरो चाते?-इति विडवश्रकारः । अशान्नर-
| कपालच्न्द् ( अपि खक् ) माला (एव ) अनेन भ्रकारेण ( तव)
भवतः ( अखि ) ` समस्तं ( रीं ) ` स्वभावः-“शीखं स्वमावे
खदुत्त-"इत्यमरः 1 ( अमङ्खयस्य ) कस्याणरदित अभव्यमितिया-
चत्- तत्र साधुः" -४ 1 8 । २.८ इति यत् प्रत्ययः । ( भवतु ) तिष्ठतु
(तथापि ) देतनिर्दैश्यदचनं । दे ( वरद ! ) शेष्लितकामनापूरकः।
( नाम ) तवाभिधानमपि ` अथवा नामेति सम्बुद्धिखुचकं ( स्मत
णां ) चिन्तकानां ( परमं ) सर्वोत्छृषठं ( मज्गखं ) मङ्गल-स्वरूपं भद्र
चा ( आसि ) भवसि 1 अत्र स्वयममङ्गखमयस्वरूपण विहरन्नपि
स्वचिन्तकेभ्यो भवान् परम्र मङ्गर ददातीति महद्धक्तवात्सस्यं
विशदीकृत्य स्मश्ानाद्यपकरणवणनया च महामदिमा पदरित इति ।
यथां चोक्तं दिचपुराणस्थ-ज्ञानसदितायाश्चतदच्ाध्याये-
| ““वृद्यप्य प्रङ्खखानोह सेवते दाङ्करः सद्ा ।
तथापि मङ्ख तस्य स्मरणादेव जायते ॥५६ ॥
दिवेति सङ्कटं नाम मुखे यस्य निरन्तरम् ।
तस्येव दशनादन्ये पवित्राः सन्ति निव्यश्चः ॥ ९७ ॥"
| =: संस्कृतानुवादः
प्रभा ! रमद्ानेषु सदा निवासः,
प्रतेः पिशहाचेंश्च सम विदारः।
तथा चिताभस्मविरेपन त,
विभूषण मानवसुण्डमाखा ॥
पएवविधो भवतु यद्यपि त स्वभावो,
निस्य खमस्तश्चुभकमवि्चसिितो वा ।
काम्मो ! वथापि नितरां निजचिन्तकाना.
: मुल्छष्टमज्गरमयोऽसि दिवस्वरूपः ॥ २४ ॥
+ भाषा टीका ५
( स्मरहर { ) दे कामनाशक ! [ इससे पूवेदलोकमे कामदे वके दह
नको चचा हानेसे यहां घर यह सवाधन बहुतही उचितरीतिस्त भ
यवग क्रिया गया दहे ] ( इमदानषु आक्रीडा ) मरघट वा मसान प
संस्कृत-भाषारीकाभ्यां सवकितम्- ११०.
र चासो ओर खलवाड करना, तथा ( पिशाचाः सहचराः ) भूत
पिदाचोको अपना सहचर ( साथी ) बनाना। णव ( चिताभस्मा-
छेषः ) चिताकी राखको अपने शशेरम ठेपन करना । ओर फिर-
( अपि खकराटीखरक् ) मचष्याकी सूडी [ खोपडी ] दीकी मारा
भी पदिरना ( परिकरः ) आपको यदः पूजी अथवा शछगारकी सा-
म्रग्री डै।( वं ) इस प्रकारसरे (तव) आपका (अखिक शी )
खमरचा स्वभाव [ सारा बाना ] ( अमङ्गख्य ) मगसर रदित ( भ-
चतु ) होवे, ( तथापि ) तोभी (नाम स्मक्णां ) केव नामी को
स्मरण करनवाखोके खयि ( परम ) बहत भारी ( मङ्गलं असि ) मः
्क-स्वरूप आप होते है। भाव यह कि-आप मरघटापर विहार,
प्रेतो का संग, चिताकीं रखका अगराग, ओर मलुप्याके मु-
की भाला--इत्यादि समस्तं अद्यु पदा्थौदीसखे खजे रहते देः
तर जो छोग केवरु आपका नाम स्मरण करत ह, उनको मगरदीः
देते ै-यह अद्भुत महिमा हे (यहां पर आप-स्मरह्र ह ओर आ-
पका अमङ्गर री दै-यह कहकर फिर स्मरण करन वाटाक ~ प
यही परम मगल दाता है-पेखी उक्तिके कारण : विरोधारकारके
सहित विचित्ाखकारभी-अ शीन्तरन्यासमे मिला १ हे। नामके
स्मरणक्रा फक समस्त पुराणादिकोमे. सविस्तर वात॒ दे, ओर
वसकृत रामायणम नाममहिमाका पक प्रकरणा हं अत एव
उसे वद्य देखना चाहिपए-ओंर पक. म्रथभी-'नामायनः' नामका
छवा हैः जिसमे केवल नामहीकी मदिमाका -सङ्खह: कियागयादे।
क्िरभी इतना कदेना आवश्यक द कि, ॑
"मव अग भूति मसनको -
\ 8 खमिरत. खुदावनि पावनी 1 ( तु° स )
उ्ारमी यथा--“माय कुमाय अनख आसह
| नाम जपत मगर दिसि दखह ।' ( व° रा° )
= भषापदयाचुवादः +
खड आप मसान पै, साथी भूत पिसाच ।
केपि चिता.राखी धरहु-मुडमाङ करि नाच ॥
जदपि अमङ्गल खीर तुय, पै खुमिरे जो कोय ।
ताहि सुमगल मजत (देत) हौ, वरदायक ! रिव होय २४॥
११६ ` : . ` शिवमहिन्नस्तो्नमे ।
ऋ भाषाविम्बम्
-मसानो पे लीला सहचर पिस सगं कसे,
चिता-राखीा ङेपो नर-सिरनि मखा परिरता 0
„ तिहरे कमा (साखा ` म जदपि नहि पकौ सुभ अह्,
„ -तवो नामि लेके खुमिरत जने मगर खं ॥ २४॥
+ मनः प्रयक्रिवत्ते सविध मव्रधायां तमस्तंः
7 ` ्रहषयदरामाणेः प्रमदलारलात्सङ्ितह श
+, य दालक्या. ह्वादं हृद् इव. निमञ्ञ्या म्रतमये `
द्ध न्तस्तत्रं के मपि यभिन स्त स्कर भवान् २ ५॥
113 ॐ ॐ] ॐ मधुसूदनी दीका ॐ ; ऊ
` अतीतः पन्थानमित्य्न हि दायज्रयसमुपन्यस्त, कतिविधगुणं
इयनन सगुणमेहव्थै, कस्य विषय इत्यनना द्वितीय ब्रह्मस्वरूपं, पः
द् त्ववात्रान इत्यनन ख खाविग्रहविहारादि। तजर अजन्मानो खो
क इत्यत्र सामान्यत परमश्वरसद्धावं द्द कृत्य, तवेडवर्यं यललाद्य-
दुपात्यादिना सगुणमेशवर्य टीलाविग्रहविदारादिकं = वर्णितम् ।
सनत्रत्याद्धताय ब्रह्मस्वरूप वक्तव्यमवदिष्यते । तदे नसिधाने चों
कस्य सवस्यापि कवरकण्डनकत्वश्रस ानिगणब्रह्यस्वरूपस्येव स्वी:
श्रुतिस्मरतितात्प्विषयत्वनं सत्यत्वात् , स्वस्यापि प्रपञ्चस्य स्व-
प्रवर्न्मथ्यात्वात् । तस्मान्नयुणब्रह्मनिरूपणायोत्तरग्रन्थारम्भः । तः
चर पृचरलाक्र त्व परमं मङ्गलमसीव्युक्तम् । तजवमाराङ्खयते । मङ्गलं
हि सुखम् । न चदवरस्य सखुखस्वरूपत्व सस्मवति सुखस्य लच्च
त्वाहणत्वाशच, श्दवरस्य नित्यत्वाद् द्रव्यत्वाच्च । नित्यज्ञानेचछाधय-
लञवानीरवरो न खुखरूप नापि सुखाश्रय इति ताकिंकाः। शाक
(क
विपाकारयैरपरागर्टः पुरुषविरोष दंश्वरथितिरूपो ने सुखरूप इति
` पातञ्जला: । तद्व नाद्धताय इश्वर नापि सुखस्वरूप दइ स्याशराङ्य
तस्यदेतायपरमानन्द्रूपत्वे विद्धदचुभवरूषं प्रत्यक्ष प्रमाणं षद्
न्स्तोति-
संस्कृत भाषागीकाभ्यां संवलितम्- ११७
#मन इति 1 देः वरद, यत्किमपि ` तत्वं इदं तया वक्तुमशक्यः
सत्यज्ञानानन्तानन्दात्मक वस्त्व।टोकय ` वदान्तवाक्यजन्ययाऽखः |
ण्डाकारवच्याऽ्परोक्षीङत्य यमिनः दामादिसाघनसप्रन्नाः परमहंसाः |
अन्तरां बाह्यखु लाविलक्चणं निरतिशयसुखं दधति पूव विद्यमान
मेव धारयन्ति न तूत्पादयन्ति नित्यत्वात् 1 तत्त्वं किक भवानिति
किटेप्ति धिद्धो । ' सत्यज्ञानानन्तानन्द्ान्मकत्वनेव श्रुतिषु प्रखिः
द्धो भवान्न ताकिंकाद्यक्तप्रकारः । अतस्त्वं कथं परम मङ्गं न भवः
सीति वाक्ष्य्चेषः 1 तत्राहादस्य निरतिशयत्वं दशषितु द्टान्दमा-
ह ` अश्वं तमयेः हदे निमञ्ज्येव यस्य खल्दुं ठेदामाजमपि स्पृष्टा सकः
टछंसखतापोपच्लमेन सुखिनो भवन्ति, किस्त वक्तञ्य्रं तस्य निमज्जनरूः
वक्चवद्धसयोगेनेति कारणातिशायात्कायस्याप्यति्ययः सचितः । य-
शपि ब्रह्मानन्दस्य सवातिंङायिनो न कोऽपि श्टन्तोऽस्ति तथापी-
वत्छाभ्यनापि लोकानां बुद्धिद्ाद्यंयेचमुक्तम्। पतादरब्रह्मानन्दाल-
अवस्यासाधारण कारणमाह मन ` इत्यादिना । चित्ते-हदयम्वबुजे'
ग्नः सक पविकदटपात्मकमवधाय-निरुष्य । चत्तिङुन्य कत्वेत्ययेः ।
कीरा मनः 1 प्रत्यक् . चक्षुरदीन्द्ियाद्वारा ` बहिविंषयप्रखत्तिप्रतिः
करूखतया अन्तभ्रुखतयैवाञ्चतीति प्रस्यक्् । कीडडा यमिनः । सविः
धं~-सप्रकारं यथा स्यात्तथा अत्तमरुतः, त्रासो पादि एटमागेणेव छ
तत्राणायाता इत्यथः । अंज सविधमित्यनन ` यमनियमादिसाधनानिः
सखख्रन्ते 1 आत्तमरूतः इत्यनेन चतुथः कुम्भकः 1 विषयेभ्य इन्द्रियाः
नां निवसनरूपः घत्याहारः ` ख्यकपदेन ` स्टचितः 1 चित्त श््यनेनः |
हदयाम्बु जाख्यदेश्षखं( ९)बन्धार्समरुदावरम्बनाख्या धारणोक्ता । अं |
वघायेव्यनन -ध्यानखमाधी । तदुक्त भगवता पतञ्जलिना -द्राखभ्बः
नध्रश्िच्तस्य धारणा । तत्र ्रत्यथकतानता । गानम् । तत थनः
निर्मासं | स्वरूपदाल्यमिव समाधेः" इति । । चित्तस्य वरीकरणाथेः
भराभारस्वाधिष्ठानमणिूरकानाहतविचच्ाजञाख्यचकराणामिन्यतमे |
देरोऽवस्थापनं धारणत्युच्यत (पकविषयम् # |
वणता(२) विवयः ्रवाहः । स च दवय, विच्छियविच्छिद जा |
म ्रानः संतत्येति । ताबुभो क्रमेण भ्यानसमाधी मवतः । प्तेना-
# ८ (१) "न 1 त 1 कामुक न्र धारणोक्ता' इति पाठः|
(२) "हकत ननैकविषयः इति पादः ।
११८ ` शछिवमाहि्स्तोत्रम् ।
छाङ्गयोगपार्पाको ब्रह्मसा्चात्कारदे तर्न दिध्यासनरूपत्वे नोक्तः । ` एवं
प्रह्मानन्दाचुमवस्य कारणसुक्ता कायेमाह । प्रहृष्यद्रोमाणः सकर्षण `
धुककिंताङ्गाः । तथा प्रमदसखिखोत्सङ्गितद्रः हषोश्चुपूणनेत्राः । पत
दुभयं च यमिनामानन्दायुसवाचमान लिङ्गमुक्तम्। अचर प्रशब्देनोत्स-
द्धितश्च्देन च खोक्रिकसुखापेकश्चयाऽतिरायविरेषो ` व्यज्यते । यस्य
च तच्वस्याखाकनमात्रेणाप्यन्ये ` पस्माहाद् बिभ्रति, त्स्वयं परमा-
ादरूपं भवतीति किसु वक्तव्यमित्युक्तम् । विज्ञानमानन्दं ब्रह्मः 'आ-
0१६ [कु ~ ९
नन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्! (पष एव परम आनन्दः" योते भूमा तत्सुखं"
[सि ~
(कोष्यवान्यात् कः प्राण्याद्यदेष: आकारा आनन्दो न स्यात् " त्या-
[र = ~. [न प १५ +
द्याश्रुतयश्चास्मिन्नथं श्रमाणत्वन दष्टव्याः॥ # हारपक्षऽप्यवम्#॥२५॥
५ ६5 ध ` ॐ संस्कत टीका + |
` दे श्रमो ! (त्यक्) चश्चुदश्रो्ादीन्द्रियद्वारा पत्यञ्चतीति परलयकन्
~ ५
( मनः ) सङ्कट्पविकस्पात्मकं ` ध्रधनेन्द्रियं ( चित्ते ) इदयाकासो
( सविध ) सभ्रकारं यथा स्यात्तथा ( अवधाय ) सस्थाप्य निस
खत्थेति चाचत् ( आत्तमरुतः ) गरहीतचायवः, योगदरास्नोक्तविधिना
रुतघ्राणायाम्रा इत्यथः । अत एव ( प्रहृष्यद्रोमाणः ) भकवेण पुल-
किततनूख्हाः । तथाच ( प्रमदसछिरोत्सङ्गितदशः ) ` द षीश्युपूरित-
रोचनाः । अथोत् दतादरी दशामापन्नाः (व्यमिनः ) यम~नियन~
शम-दमान्विता योगिनः ( यत् ) इयत्तया वक्तुमराक्यं सच्चिद्ा-
नन्द्मयं ( किमपि ) अविज्ञातविषय वस्तु ( अन्तः.) अन्तःकरण.
मध्ये; स्वीयान्तरात्मनि इति बा ( आरोक्य ) लानचक्चुषा समीक्ष्य
( अश्तमये ) परानन्दपूर्णे, अथवा जलप्रपूरिते-'“पयः
मष्छत- मित्यमरः । ( हदे ) अगाधजलाशये ( निमज्येव गत
गाहनं कृत्वेव ( आह।दं ) अनिर्वचनीयं खुख ( दधति ) धारयन्ति
( तत् ) तदेव प्रसिद्ध . ( तच्छ ) पर्मात्मा-“तच्चं परात्मनि +
वायभेदे स्वरूपे च-इति हेमचन्द्रः । ( भवान् ) त्वमेव ( किल )
इति निश्चयेन । अस्तीति रोषः। अन्न भ्यानधारणस्िमाधिनिचचै-
योगिभि यत्तत्वं इदयाकारोऽवरोक्षयते तत्स्वरूप एव भवानिति.
परमात्म रू पवणेन पुणे परममदहिमानं विशदीकुषैता कविना स्वस्या
पि योगाचाय्येत्वं स्फुटीकृत म्रितिज्ञेयम् ॥ २५॥
कीटालः
संस्कत~-माषार्दक्राभ्यां सवलितम्- ११९ |
-=&ः संस्कृतपयाचुवादः: ॐ 7 15 |
यत्नाल्निदत्ते विषयेभ्य आत्मनि, ` ।
` चित्तं समाधाय विधानपू्ैकम्। ` ` |
रोमाञ्चिता र्व ग्ररीतवायवोः ,0# 0. |
हर्बाश्रु सम्पूरितमार्तिश्चणाः ॥ `
यद्योगिनो वीश््य खधामये हदे,
सुखे निमज्येव भवन्ति मोदिताः ।
` त स्सज्िदानन्द घनस्वरूपकः, ` | |
` ¦ त स्वं किमप्यस्ति मवान् किल प्रभो | ॥ २५॥
ॐ भाषाटीका शू , ` -
श्रमो! ( पत्यक मनः.) नेत्रादिक इन्द्रियोसि, बाद्यविषयोकी श्र
व्र्तिकी भ्विक्रूकनासरे भीतरकी ओर खीीचने वादा, सकस्प विकः
ल्पाव्मक इन्द्रियम प्रधान मनको ( चित्ते ) हदया-कारामे ( स-
विं ) बिधिपूतैक (अवधाय ) रुगाक््र अथवा रोककर ( आन्तम्
ङतः ) योग शाकी रीति इवासखको रोकरखने वा, अथात् कुः
क नामकःप्राणायामकी विधिसे इवासको रोके रहने वाङ (प्रहृष्य:
रोमाणः ) इसी कारणस विद्चिष रोमांचित हए । ओर ( ्रमदसर्िः
लोर्खाङ्गितद शः ) बड़ षके मरे अश्चुजलसे परिपृणे दै नेच जिनके
देत (यमिनः). यमनियम -शम-दम इत्यादिसे युक्त योगीखोग ( यत् )
जख, अथात् इतनादी-भर कदनेको अशक्य सचिद््ानन्द मय (कि-
मति) कोई भीः अवि्ञाताविधय वस्तुको (नलः) अपने अन्तः करणम |
अथवा अपने अन्तरात्मा (आकछकय) ज्ञानचश्चुखे देखकर (अ्तमये)
परमानन्दवे पणेः. किव जङसे भरे इम (ह) अगाध जखाशये
( निमञ्य श्व ) मानों गता लगाकर दबकरर ( भल्दाद् ). अनिवोच्य
सखको ( दधति ) धारण करते अथवा घ्रात (तत् तत्व) बह
क अथीत् परममा (सवान्) जात (कि ) न
श्य करके । आभ्य यह द कि बाद्य वेपयसि मनको मोडकर
अर विविगूर्वक अपने हृद्यरूपी अकामं बेटाकर योगखाग जिस
अक्थनीय व्रस्तुको देखकर प्राणायामके द्वारा इवासवायुको रोके हषः
५ ५ क ~ 9 - ¢ ध्र क ५ ~ के क 9 रभ, ० ्
वरमानन्दसे नेमे हपाश्ुको भरे पुलकित होते है जल को उष्ण-
२.२० ¦ 1 शिवमदहिन्नस्तात्रम् । `
तासे तापित होकर निरभख-जखसे परिपूर्णः अगाध सरोवरमे गति
खगाकर वडा अल्दादित हो तादे- वही परमतच्व आप द अर्थात्
यागालागजं। अरर समाधि ख्गाकर परमानन्दका अनुभव कर-
तदहे वह आपी हं--इस कथन सर यह सिद्ध होताहै क्रि आपको
कड् मी किसी प्रकारसे बता नर्हौ सकता क्थोक्ि आप ज्ञानगम्य
ह अत पव वाणी द्धाय आपका प्रतिपादन करना सर्वथा असभव
दै--जेसा कि “अती तः-पन्थःनं (२) म कह.अधे ई-उस दलोक
म तीन वात कदी गरं हें । अथीत् “कतिविधगुणः इस वाक्यसे
सगुणः पड्वय्थे जनाया हे । “कस्य विषयः''शसख पदसे अद्वितीय बष्म
स्वरूपका प्रतिपादन क्रिया हे । ओर “पदे त्ववाचीन'-- इस कथन-
स ङा वभ्रद् तथा 1वहमसाद्कक{ बाधन क्यार । इनम पाहटे
जजन्माना खाक“ ( ६ )--यदां पर सामान्यरूपे परमरवरकेा
सत्ताका खद करक “महोक्षः खट्वाह्ग ( < )* तथा--तवेश्वय्यंय-
त्न।यदुपार ( १० ) इत्यादि पद्येसि सगुणरूपकी महेमा ओर लीरा
खर तथा वहारादेकं(का वणन किया ह । अव आद्धतीय ब्रह्मस्व
रूपका वणन करना अवशिष्र ( वाकी
पर नगुण ब्रह्मका निरूपण आरम्भ
निरूपण किये विना पहिटेकां कहा हज। सव कुछ भूसीं कूटनेके
सलमान न्यथह। हुआ जाता है- कारणं यह कि समस्त वेद ओर
राखाका तात्पय्य एकमात्र निगुण ब्रह्म स्वरूपरीके निरूवण करने
सत्य वषय हाता हे--क्योंकि जितने प्रपञ्च है वे सच स्वपथके समान
मिथ्या हे ) दसी चि यहाँ पर निगोण ब्ह्मका निद्पण करद्ना आ
दयक समञ्चकर रथकार उत्तरत्रंथका आरभ करते ह । यहांपर यह
शका हाती है कि पूषैदेलोकम कह आये है कि आपही परम मंगलं
स्वरूष ह--ता मगलका अथे खुख है- इसलिये इईदवर खुखका
स्वरूप नह हा. सक्ता, कथा छख तो जन्य वस्त॒ हे अथोत् उत्वं
नदहातादहै ओआर नष हाता ६, फर संख गुणत्वभी चतमान रहता
हे, ओर ईंदवर नित्य है, फि८ वह कोड द्रव्यभी नहा हे। नित्य ज्ञा
न दच्छा-अ(र प्रयत्न वाखा इद्वर खुखेरुप नहींहे ओरन खुखा
) रहा जाता ह, अजत पव यहां
करत ह, काकि निगुण ब्रह्मके
का अश्रयदी हैः यह तारकिकरोगो कामतहे । “क्ेश-कभे-
विपाक-आशाय त्यादि 'दुर रहनेवाला चेतन्यमय पुरुष -विं
संस्छृत--भाषारीकास्या सबलितिम्- १२९
दचिषदी शदवर है जोकि. खुखरूप नदीं - दोता-'"यह् पातंजरू मत देँ ।
अत प्व अद्वैत ह्वर कदापि खुखमय नहीं दो सकता-इसी शका. |
का समाधानकरते हुए दङ्वरकं अद्विताय-परमानन्द्-रूपताम विद्धा - |
नाके अनुमच सिद्ध पत्यक भ्रमाणको पदेखलाया , ह-भाव यद कि
यद्धि योगी कोको कोई आनन्दही नरी मिखता तो इतनो बड़ ब्य
माधि कगाकर बेखाग कैसे पड़ रहत { क्या{क आनन्द्क। छक्षण
नन्मे अश्रुका भरजाना तथा शरारका पुकाकेत होना स्पष्ट
हि-इखसे उन योगियोकों ` जो _परम आनन्द मास, हयता है वदी
तः ब्रह्म का सत्-चित्-अ।नन्दमय होना प्रत्यक्ष सिद्ध
अप 2,
> | जखाप्क-- आनन्दा ब्रह्मत ठयज्ानाच्-'” इत्यादि श्रुति वा-
कये सि भरमराणित है । अतएव नण. = आनन्दमय है यह
बात सर्वथा सिद्ध हं । क्याक !जलक लिये प्रव्यक्च प्रमाण मिख
हा है उलपर किसी प्रकारका तके नदीं चर सकता । |
समायणमंमी नारदसुनिकं व्यामाह प्रकरणे यो कहा गया है--
“साभिरत हरिहि स्वांख गति बाघी, |
सहज विमरु मन खाग समाधी ।
नीर योगियको जो तस्व दिखल।ई पड़ता द उस मी आमाः
हल सीतास्वयरमं द्ककाया टे, यथा-
'“ज्ञो गिन परम तच्वमय भासा |
सन्त खुद्ध मन सहज धरकासा । इत्यादि ( तु° रा )
इ भाषापबादुवादः च
ख मन, भ्रान वायुको खीच।
पुखकित तु हरषाखते, नयन-कमरु छग लाच ॥
चूड अश्ुतमय तालम पावहि जिमि सुखरास्त।
टद जोगिगन तच्च जा, ला ठम अतस-भागसि ॥ २५ ॥
न
। -& माषाविम्बम्
छगाके अत्मामे सविध मनको रोके पवने,
रे सोमचौख हरष~-जख-पूर नयन हं ।
छै जोगी जाको अश्रेत सरमे स्नान करिधो
द जा आनेदै अकथ चिव! सो तत्व तुमो ॥ २५
॥ `
इदय-कमख मह सा
१९
१२२ `; क्लिवमहिन्नस्तात्रम् |
` त्व मकंस्ते सोम स्व मसि पवनं स्तं ह्ुतव्रह- `
„+ स्त मषस्तंव्योमलम् धरणि रात्मात्व मितच।
` परिज्छच्ना मेवं व्वयि परणता विभ्रत भिरं |
.. -नाविद्मस्त त्त वयमिह त॒ य खं न मवति ॥२६॥
शः मधुसूदनो यका +
एवम्राद्वताये ब्रह्माण परमानन्द रूप सवान्मक वद्वद् चुभवरूप प्रत्य
क्ष प्रमाणसुक्तम्। अधुना तस्यवाद्वितीयत्वं तकेणापि साधयन्स्तीति-
व्वमकं इति । दे वरद, परिणताः परिपक्रबुद्ध यस्त्वयि विषये एवं
परिचिदिन्नामेवप्रक्रारेण. परिच्छिन्नत्वेन त्वां प्रतिपादयन्ती गिरं वाचं
व्रतु धारयन्तु नाम । केन रूपेण परिच्छिन्ाभित्यत आद-त्वमके
इत्यादिना । अत्र सवत्र त्वशब्दा वाक्यालेकाराथेः। उदाब्दोऽवधार-
ण त्वामनत्यनन् सखमस्बच्यत । चऋड्ड्ः समुच्चय । इतेराब्दः समाप्ता ।.
अकोदयः प्रसिद्धाः. । आत्मा क्षिघज्ञो यजमानरूपः । पते चाषो
श्रख्द्रमरूतत्वनागमग्रसद्धा - वक्ष्यवाणभवादिनामाकसाहिताश्च-
तुथ्येन्ता नमोन्ता अश्रौ मन्वा भवान्तिते गुरूपदेशेन ज्ञातव्याः ॥
एतदष्टमुतत्व चान्यत्राप्युक्तम्--स्षितिहतवदक्चचज्ञाम्भः प्रभञ्जन
चन्द्रमस्तपनावयदाददेयाष्ट सरर्तींनमो भव चिभरत' इति । तन सवौ
त्मकमपि त्वा मकाद्यष्टमात्रमरतिं बद्न्तील्यथैः। अत्रापरिणता इ.
ब्यस्मिन्नर्थं परिणता इति सोपदटासं विभ्रन्विति खोटाननुमता-
वप्यजुमतिध्रकारनात् 1 तेन सचथाजुचितमेवैतदिव्यथैः । तर्हि
कसुचत ज्ञात्वा त्वयद्मजुचितमुच्यत इत्यत आह- नेत्यादिना ।
हि यस्मात् इद जगति तत्तच्वं वस्तु वयं न जानीमो यद्वस्तु त्वंन
भवास । त्व्कनामात यवत् । अच स्वस्य माणक दाटेनात्क
ख्यापयेतु विद्य इति वहुवचनम् । व्य तु त्वदभिन्नत्वमेव युक्त्या स
वै जानम इत्यथः । एवं च तव सवोत्मकरत्वाद्का दिविदोषरूपाभि
धान व्यथमव् । तथा च श्रुतिः-‰इन्द्रं मेन्न वरुणमश्चिमाहुरथो दि.
व्यः सर सुप्रणा गरुत्मान् । पक सद्धिप्रा बहुवावदर्त्यश्चि यमं भा-
तारेश्वानमाहुः ष उ ह्यव सवं देवाः" इति च सयैदेवभेद् वारय.
सस्कृत-भाषारीक्राभ्यां सवटितम्- १२३
ति । नहि सद तिरिक्तं किचिदुषरभ्यते सद्भूपश्चात्मा त्वमेवेति तक-
णापि सिद्धमद्वेतम् । नच सवस्य ब्रह्मरूपत्वे घरादेज्ञानस्यापि जह्य
्ञानस्वरूपत्वात्ततोऽपि मोक्चप्रसङ्ग इति वाच्यम् । अन्य चपरक्तचे
तन्यभावस्येव मोश्चदे तुत्वात् । घरायाकारज्ञानस्य चाविद्यापारेक
दिप्रतान्योपर्तचैतन्याकेषयत्वात् । अन्यापरक्तचतन्यस्य च सद
वेण चश्च यादितिषयत्वेऽप्यन्याजुपरक्तस्यतस्य न वेदान्तवाक््यमाज-
विषयत्वर्याघातः। नलु सवस्य सन्मात्रत्वेऽपि नादेतखिद्धेः। भि
श्रानामाप सत्ताजातयागन सदाकारक्ाद्धावत्रयत्वसम्भवात् । अ.
न्यथा द्रव्यगुणकमदिभदभ्यवहारोऽपि न स्यादिति चेन्न। दव्य स-
सन्नित्यादिग्रतीतेदेव्यत्वादिवमविशिश्कसन्मात्रविषयत्यमव
न त दव्यादिधर्मिषु भिन्नषु खत्ताख्यधमावश्यत्तम्, धमिंकल्पनातो
भर्वरकल्पनाया कघुत्वात् । प्कस्मिन्नलाति च सवाभिन्न मायेकना-
नात्वध्रतीच्युपपत्तः। द्वो चन्द्रवत्यज्रव न पारमाथिकमदकस्पनाव
तदाः तथा चायं ध्रयोगः । अय द्ब्यशुणादेभद्*्यवहारः सर्वभदाच
गंतजा्यात्मकेकवस्तुमात्रावङम्बनः । मेदउ्यवहारत्वाहि चन्द्रभदन्य-
वादिति । तस्मान्नाचेतन सचतन वा ।कचद्प परमात्मनो
भिश्नमुपपद्यत । स एष दह प्रविष्टः" "अननः जावनात्मनायन्राच्रय
नामरूपे व्याकवाणि' इत्वादिश्ुत्या परवेष्टुरविशृतस्येव जीवरूपेण
भरवेराध्रतिपादनात् । तथा इद सच यदयमात्मा इत्यादे श्रुत्या ब्रह्य
तनोद्धवत्ववरह्मखामान्यत्रह्मैकम्रकयत्वादिर्ेलुिरूपना पा १ ~
कादादिध्रपञ्चस्य वरह्यात्वकत्वप्रतिपादनात् "सदेव सौम्यद्मच्र आ-
सदिकमेवाद्धितायम् इति च कण्ठत एवाद्धितीयत्वाकतेः। एव च खदा-
कार व्यक्चमभदव्यवहारत्वाखज्ग सावात्म्यश्रुत्यन्यथाचपप्तश्चात भ्र
ब्राणजरयसुक्तम् । वस्तरण चात्र युक्तयो वदान्तकस्परातेकायामनु
संयेयाः । तस्मान्न च्च इत्यादिना सध्वेवांक्तमद्धितायत्वम् ॥ हारः
चश्च त॒! अकीदिशब्देन तत्तदवाच्छक्ा द्वताट्मान उच्यन्ते। य प्.
नखादिव्ये पुख्ब पत देवाह ब्रह्मो पासे" इत्यादिनाऽज(तशचव दप्त
वालाकिनोपदिष्टा जहद्ारण्यके कौषीतकित्राह्यण च प्रासद्धाः। पः
-उद्मत्वादिदोषेणाब्रह्मस्व चेषां तञ्रेवाजातकचुणा प्रतिपादितम् ।
लदोवाचाजातश्ुरेताबन्न्यून दत्य ताचदूत्िनतावता तावद्धिदेत भ.
ति' शत्यादविना । अन्यरस्वं समानम् ॥ २६ ॥
वहार
९द् शिवमहिश्नस्तोत्रम् । `
ॐ संस्कृते ठका च
हे विमो! (त्वं अकः) भवनिव सुर््पः (त्वं सोमः) त्वमेव
चन्द्रोऽसि ( त्वमसि पवनः ) त्वमेव वायुरसि (त्वं हुतवहः)
त्वमेव अ.भ्ररप्यासि (त्वे आपः ) भवानेव जरं (त्वं व्योम)
आकाल्मपि भवनव (त्वडउ धरणिः) उ~इति वितर्क त्वमेव
पूयव्यासे (आत्मा त्वे ) त्वमेव परमात्मा, क्षिचज्ञो, यजमानरूपो
षासि । (इति च ) हइति-पदं समक्तौ, चकार समुच्चये ( परिः
| णताः ,) पारेपक्रबुद्धवः ( त्वयि ) भवतो विषये ( एवं ) अनेन पका-
रण ( परिच्छन्नां ) इयत्ताकलितां (गिर) बाच ( व्रतु ) धार
यन्तु, वदान्त्व त्यथः । अननुमतावपि अचुमति-पकाहने लोर ।
काचत् खद्लक!रस्यापि प्रयोगो कथ्यते तत्रापि न काच स्चातरिति।
वस्तुतस्तु सवंथेतद् ुाचतमेवेत भावः । तरि
बत्लात्याराङ्कयाह-( वय } अस्मत्समानवुद्धयो ऽर
नम् (तु ) इति हेत्ववधारण ( दह् ) विश्वस्मिन्
मन्यत् ( तरव ) किचिदपि वस्तु ( न विद्यः ) नैव
तत्त्व ( त्व ) भवान् ( न भवसि ) नात्ति ।
भचमरू[तरूपणव स्तुवन्तु, पर वय भवन्तं
सस्माक मते त्वद्धिन्नमन्यत्किश्िदपि नार
अष्टम्रुत्युदखनञ्च रघुवंशरीकायां कृतं
मा किङ्करमष्टमूत्ते-“'रित्य्र, तद्यथा-- `
त्व किमुचित-
येऽपीतिबहुवच
( तत् ) त्वद्धिन्न
जानामः ( यत् )
वरपक्रबुद्धमन्तस्तु त्वा
सवात्मकरूपणेव विद्य.)
तात भावः स्पष्ट पव।
-मालनाथखारिणा-'“अवहि
““पृथिवी सङिरुं तेजो, वायुराकाशमेवच ।
षयाचन्दमसो सोमयाजी चत्य्टमू्तयः-हति यादवः । "
अत्राटमरत्तिवणेनध्रसङ्गन भगवतः उवस्वरूपत्व-सवोत्मकत्वा
| दिविदहिष्टगुणानां बणेनयेच तत्तदरूपगतमहामाहेमसूचनं
| रिष्टादवेतरूपता मापादितवन्त आचाय्या इति । पव
महेदवरखण्डारुणाचर्माहास्म्येप्युक्तं २०अग्यथः
| 'जवायुरनखावारभूः सूयरारानां चुमान् ।
| हति मन्मूर्तिमि विद्व मासत सचराचरम्” ॥ २६॥
सापे बि-
मवे र कन्द्पुराणे
|
सस्कृत-भाषारीकाभ्यां सवलितम- १२
5 [कि (8 : ` ऋ संस्कृतपयचुवादः #§ ` `
= प) सि छी त्व त्वर + त > 7
त्वमेवसूर्यो ऽसि शरी त्वमेव, त्वमेव लायुहेतञुक् त्वम ।
न्वमेव पानीयमथासि भूमि-रात्मा त्वमेवासि न कोऽपि चान्यः॥
धताभियत्ताकचितां शिरं स्वयि, वदन्तु सवं परिपक्वुद्धयः। `
ब ~ 4 [ (क र [ ऋ ५ ह ०९ १ १.९. व ३ + +~
चरन्न विद्यो वयमस्ति तत्कचि, तस्व भवे त्वध्या तारेक्तमच्र यत् ॥२९॥
प | | |
क भाषाटीका श
(3 | भवगन् । ( त्व अकं ) आपी सूये | (१ (श्व ` सोमः ) । अपी
चन्द्रमा है (त्वं असि पवनः ) आपदी वायु ह (त्व इतवदः ) आप-
ही! अग्नि दै ( त्वं आपः) आपी जल हँ ( त्वं व्योम ) आपदी आः
कादा ह ( स्वं ड घराणिः ) आपद पृथिवी ह (च त्वं आत्मा ) ओर
पदी आत्मा अथोत् क्षिचन्न परमात्मा अथवा यजमान रूप ह ( इति)
यदह अव्यय पद् समानत सूचक हे-अर्थात् इतनांहि भर (परिणताः)
पक्की बुद्धिवःखे ( त्वयि ) आपकर विषयमे ( पवं ) इस भकारसे ( प-
रिच्छन्नां ) संकुचित अथवा द पीड ( गिरं ). बािकों ( बिच्रत् )
भारणकर, अर्थात् कदाकर परंतु ( वयं त॒ । हमल चा तो ( इह )
दख सचराचर ससारम ( तत् तच्व ) उस ततवको 4 न॒ विदः )
नहीं जानते है (यत् त्वन भवासि जो तख आप नही हे। भवाथ
यह हे किं, जिनकी बुद्धि बडी पकी ह ब खोग . भायको . अमति
रवसे कहते ह पर हम खोगोके णेखे कच्चा बुद्धिवार्छकी सममे
तो आपसे भिन्न कड दखर। दीखताही नदी हे सब कुछ आपी
हु-जसाक दुगा स्वहातीमे कहाभा द क ॥
""य च्च किंञ्चित्कविद्वस्त, सद सद्वाखिलात्मिक |
तस्य सर्वस्य या शक्ति, सा स्वं कि स्तूयसे सदा ।
अथीत् कीं परभी जो कुछ सच्चा अथवा बूटा. बस्त हे उन
सबकी जाक्ति वद्मी दो अत पव तुमारो स्तपति कसक जास कती
हे १ यदी अभिधाय यहां पर भी दै कि हमरागाकं समञ्चमे वो ख-
केर
च कुक आपी है, आपसे भिन्न तो कुछ हई नरी दे ।
''करि विचार देखहु मन माही ।
तुमते विलग कतहु फु नादी ॥""(तु०° रा०)
#
१२६ ` शिवमहिन्नस्तोत्रम् ।
पूवन्छाकर्मं विद्वानोके अलुभव सिद्ध ग्रवयक्ष प्रमाणसे च्यक
उद्वेतलिद्धे ओर परमानन्दरूपता प्रतिपादन छी गई है-अत एव
इस -छोकमं तकद्वारा भी उसी बह्मकी सर्वात्मकता ओर अद्धेतता
सिद्ध को ह-यदहा पर यह शाका होती है -कि यदि-“स्च खल्विदं
बह्म" यह वेदवाक्य सही हे तो फिर-घड् खोया छता कपडा-
इत्यादि क ज्ञान दा जानेसि भो ब्रह्मज्ञान हो जावेगा ओर इस ब्रह्म
ज्ञान हाजाने परभां सुक्ति का पाना सिद्ध होना चादिण-तो उसका
समाध्रान यह हं के, जव तक इन सखव अचेतन अथवा सचेतन
तमक भद् द।खता रहेगा तव तक तुम निर्वाण पद्के अधिकारी
नहा हासकन-हा जव तुमार हदयस भदद्ुद्धि निकर जावेगी ओर
तमको “सवे ब्रह्ममयं जगत्-” दिखाने लगेगा तों तम॒ घड़(-क
पडा उस नहा कहाग-वरन ब्रह्मा समद्यन टखगागे-तव तुम केवल
खक्तिक अधिकारी ही नही तुरत जीवन्मुक्त हो जावोगे । वस ॥२६॥
@ भाषापयानुवाद २
रवि ससि वायू अगिनि जल, धरनि आतमा व्योम ।
अष्ट शरूति धरि तुमहि हो, व्यापक जग धरति रोम ॥
बाद्धेमन्त इमि कहत द, लुमको सबदि बुद्धाय ।
मो जानत ( हम जनै ) असर तत्व नाह, जा तुमसो बिरखुगाय ॥२६ ॥
+ भाषाविम्बम्
वद्या सूज सोमो पवन लुमही आगि ( अग्नि ) तमहो
तह्य पानां भूमी गगन त॒म आत्मा त॒महि दो।
` यहा भाष पक्रं चतुर मतिवाटे तुमहिको,
हमार जनम असर कदु नहा जा तमनदहा॥ २६ ॥
.
#ै
संस्कत-भाषारीकाभ्यां स्बखितम् । १२७
` च्रषीं तिस ठत्ती खिभुवन मथो त्रीनपि सुरा-
_ नकाराय वेण ह्लभि रमिदधत्ताणव्र्कति ।
` तुरीयं ते धाम ध्वानिनि रवरन्धान मणु;
समस्त व्यस्तं त्वां शरणद गुणाय मिति पदम्॥२७॥
& मधुसूदनी टाका ५
पव प्रत्यश्चाचमानाथौ पत्तिभिरद्धितीयत्व परमेश्वरस्य सवात्म-
कल्वेन धसाध्य तदूवागमेनापि साधयन्स्तोति-अथवा, क्रमेण पवे-
टे।कद्यये त्वंपदार्थं तत्पदा च परिशोध्यानेन इलाकनाल "ड ज
कुथा चदन्स्तोति--
जयमिति । हे शरणद आतोमयप्रद्, जआमत्त पर् त्वा सवां
त्मानमद्ितीयं गृणाति अवयवराक्त्या समुदायशक्त्या च प्रातपाद्-
यति। अत प्वाकारस्यावयकचशत्य वाक्येऽपि सखमुदायराक्त्या
ङूःजादेरिव पदत्वसुपपन्न य गरूदहिस्वीकारात् । तदस्वीकारेऽपि
खस्तिडन्तं पदम्! इति मरेयाकर्णपरिभाष्या पदत्व कत्ताद्धतसमा
साश्चः इत्यनेन समासस्यापि प्रातिपादिकसंक्ञाविधानात्छुवन्तत्वसुप्
पन्नमव। कीर रमोमिति पदम्। खमस्त अक्रारयोकारमकारसाख्यपद्जयः-
कमेध्ारयसमास निष्पन्नम् । प्यतन समुदाया क्त रक्ता | तथा व्यस्त
सिन्नम् । सार मकायाख्यस्वलन्तरपद् जयात्मकमिसपथे । प्-
तनावयवश्ाक्किखुकता । ६९ च पदद्धयमभिधयेऽप्पि याज्यम् । त्ता की-
म् । समस्तं सवात्मकः, तचा उयस्तमध्यात्माधिदेवादिमेदेन भि
ततया भरतीयमानम् । तथाच व्यस्तमोमिति पदे व्यस्तं त्वां गृणाति
समस्तमोमिात प समस्त त्वां गरणातीच्युक्तं भवति । पतद्व द्-
द्ा्यति-जयीमिस्याद्न । र्यी दव्य, तिखा त्तया जाच्रत्स्वन्सु
चुप्त्याख्या अन्त करणस्यावस्थाः । पतच्च विहवतेजसपरा्ञानाम-
णम् । चिभ्ुवनं भूखवःस्वः । एतदपि विराङ्दिरण्यगभौव्या-
दतानासुपलक्षणम्। चव खराः ब्रह्मविष्णुमहेदवगाः ।. एतच्च ख-
स्थितिश्रखयानामप्युपलक्षणम । पतच्च सवमकारादयाखरानवणः-
मिदधदमिघाच्ररया ्रातपादयदृल्यस्तमत्यथः । एवमन्र भ्रकारः ।
१२८ „ (ष
चम्वेदो जाश्रद वस्था भूल के रह्मा देति चलुष्टयमकाराथैः तथा
यज्तुबदः स्वप्नावस्था मुवर।क( वण्यर चलुष्टयसुकाराथः । त-
था सामवदः सुषुप्त्यवस्था स्त. महइवरश्चाति चतु एय मकारा-
थः। इदं माण्डूक्य द्रलिद तपना चन( र् लाद्वन्यद्प्युक्त ` गुरूपदे-
शााजज्ञातन्यम् । अतिरहस्यत्वान्नह् खाच यषमुच्यते । तस्मादध्यात्मा-
धिदेवाधेचदाधियज्ञादियावदन्यचराक्तम।स्त तत्सव मच्रोपसहतैव्यं
न्यूनतापरिदाय । तथाच खवेभ्रपञ्चाकारेण व्यस्तं त्वां अकारोकार-
मकारेन्यस्तमोमिति पदमभिद धत्वं रणातीति सम्बन्धः । तथा ती.
णविकृति सर्वैविकारातीतं तरीय अवस्थात्रयाभिमानिविटक्षणं तव
घाम स्वरूपं असण्डचैतन्यात्मकम् । तवेति राहोः शिर इतिञद्धदोपः
चारेण षष्ठी । अणुभमिष्वैनिभिरवरन्धानं स्वत उच्चारयितुमराक्ये-
रध॑म्रा्ायाः ष्ृतोच्चारणवरोन निष्पायमनेः सृक्मदन्दैरववोधं कू-
वैत््ापयत् । समुदाय शक्त्या बोधयित यावत्। अधमाजाया पएक-
त्वेऽपि ध्यनिभिरिति वहुवचनं ष्ठुतोच्चारणे चिरकारमलङत्ताया-
स्तस्या अनेकध्वनिरूपत्वान्न ष्खुद्धम् । ध्वनीनां चाणुत्वाणुतरत्वा-
णतमत्वादिकं युरूपदेशादाविगन्तन्यम् । तथाचाधमात्रारूयेण सथः
स्तमोमिति पदं समुदायशक्त्या सचेविकारातीतं तुरीयं खरूपम-
भिदधत् समस्तं त्वं शणातीति सम्बन्धः । एवं च पदाथौभिधानः
सुखेनाखण्डवाक्याथासिद्धरथादुक्ता । तथाहि स्थरुधपञ्चोपाहि तचे-
तन्यमकारयथः, तत्र स्थूटग्रपञ्चांदाच्यागेन केवल्चतन्य मवण =
कष्यते । तथा सृक्ष्मप्रपञ्चोपहितचेतन्यञुकाराथैः, त अपम
त्यागेनोकारेणोपङक्ष्यत । तथा स्थृकसक्ममपञ्चंदयकारणीभूतमायो-
पहितचेतन्यं मकाराथैः, तादरामायांश परित्यागेन मकारेण शचैतन्य-
मान्न रक्ष्यते । प्व लरी्त्वसवाचुगतत्वोपदितचेतन्यमर्धमाजासः
तदु पाधेयारत्यागेनधंमा्रया चेतन्यमात्ं कस्यते । प्तं चतु द
मानाधिकरण्यादभेदबोधे परिपू्णमद्वितीयचेतन्यमाघ्रमेव सरवद्ैतोयः
मदेन स्तिद्धं भवति । छक्षणया परित्यक्तानां चोपाधीनां मायातत्का-
यस्वेन मिथ्यात्वात् , स्वर्ूपवोधेन च स्वरूपाज्ञानात्मकमायातत्कार्य-
निडत्तेन पृथगवस्थानभसङ्गः । ` नह्यधिषछठानसाक्षात्कारानन्तरमापतत-
दध्यस्तमुपल$यते चय्यादीनां वाक्याथबोधानुपयागिप्युपासनायामू- ‹
पगा थ गमिधान द्रष्टन्यम् । तस्मास्सव द्वितीयदयल्यं प्रत्यगमिनं
/
[ऋ ,
संस्छृत-भापाटीकाभ्यां सवङितम्- १९९
धष प्रणववाक्षया्थ इति लिद्धम् । एतच्च सर्वेषां तच्वमस्यादिमहा-
चाकयानासुषलक्षणम् । तेषामपि प्रत्यगभिन्नपरिपूणादवितीयन्रह्यप्रति-
पादकस्वात्. । यथा च शब्दाद परोक्षनिविकल्पकवोधोत्पत्तिश्तशथा
भ्रपश्चितमस्ममिवेवान्तकद्पखातिकायामित्युपरम्यत्ते ॥ ` #हसिपक्षे-
भ्येवम्# ॥ २७ ॥ 4. की.)
+ रत गा ~ 9
(तीणीविकृति) सवेवि धाविकारातीत्तं निर्विंकारभितियावत् । (तुः
शयं ) अवस्थानरितयपरं चकतथ ( तव धाम ) भवतौ ऽखण्डचतन्या-
त्मरद उयोतिः स्वरूपं । भेदोपचरेणात्र ष्ठी । ( अणुभिः ) परमदह्येः
( ध्वनिभिः ) शब्दः ( अव रन्धानं ) व्याप्नुवत् । अ्थीत् स्वत उच्चः
रयितमराक्यतया अद्धैमाज्ायाः प्डुलोच्चारणतां गतिः सृक्मध्वनिः
-निरवबोधं क्वत् । ( समस्तं ) सवत्सकतया समुदायशक्त्या वा
समासयक्तं । तथा च ( व्यस्त ) भिन्नतया अवयवशक्त्या चा धती-
यञ्चानं ( ओमिति पदं ) ओङ्करः प्रणवो वा ( त्वां ) भवन्तमेव । अः
-च्रापि समस्तं व्यस्तञ्चति योजनीयं ८ गरणाति ): कथयति, प्रतिपा
देयतील्यथः । अत्र सर्चवेदाद्वितस्वस्योङ्कारस्यापि वाच्यो भवनेवेति
महिमसचनं भकितमिति । माद्कयोपातिषदि च ओकारमाहात्म्यं
ष्टव्यमिलि। हिवपुराणस्य व्रायवीयसहितोन्तरभागस्थसक्षमाध्यामे-
२३ ६1० ३१ स्पण्मुक्तं ॥ २७ ॥ | ~
& संस्छृतपयालुवादः च
वेदत्रयी बिश्रुबनं त्रितयं खराणां.
छुचीख्दात्त-शयनध्रयुलच् तिलः 1
बैखिभिः-भःड म-रूपधरः सतार,
कर्णप्रिय रमचदधन््डड ¡ निर्विकारम् ॥
०" यन्ते ध्वैनिमिः समस्तेऽयद्व्याप्ुयद्धाम तुरीयसंजम् ।
तदहथापकं सर्वेत पव खण्ड, रूपण य द््वास्यमपि प्रसिद्धम् ।
-नायन्तदीनं ( शल्य ) स्वयमेव जात मरोषवाग्जालावधानचजम् ॥
ह अवन्त, स्तोातीश्च ! नित्यं प्रणतार्तिहारिन् ॥ २७॥
चो +
१७
१३६. त 1...
माषा टीका श
आतलोर्गोको अभय देनेवाखे ! ( अकारायैः )
व्रकार नामक ( तिभिः) तीन ( वर्णः) अक्षरौसे
(क्रयं) वार्नो वेद अथोत् ऋग्वेद, यजुवेदः ओर सामवेदक, तथा -
( तिख्नोचत्तीः ) जाघ्रदवस्था, > ओर खउुषुपत-अवस्था
भको, अथवा उदात्त, अद्", ओर स्वरि्तोको, पवं ( चरिुवन )
तीनौदी छोक-भूखोक, भुवल।क आर स्वलोक, अथवा स्वग-मत्यै
भर पाताल को ( अथो ) तदनन्तर ( चन् खुरान् अपि ) सीने दै.
घतोंको अथीत् ब्रह्मा, विष्णु ओर महेदवरको ( अभिदधत् ) कहता-
हआ ( तीणेविकृति ) सव प्रकारक विकारासे रहित, अथात् निर्वि
कार ( तुशयं ) तीनों अवस्थाओ{सख परे रहनेकङा-चे।था (तव धाम)
आपका अखंड तेज्ञ ( अणुभिः ) ` अल्यतछोरी ‹ ध्वनिभिः ) ध्वनि-
योखे.( अवखन्धाने ) व्याह ( समस्तं ) सवीत्मक दोनेसे थो-
डावा कोटा । तथा ( व्यस्तं ) भिन्नभिन्नहोनेसेः विस्तार युक्त अथ-
वाबडा ( सा इति पदं ) आकार ( त्वां ) आपदहीको ( गृणाति )
कहता हे अथोत प्रतिपादन करत। दे । अभिप्राय यह किमा
भे अकार, उकार ओर मकार तीन अक्षर मिले ह येही तीनो अक्ष. `
र संसारके समस्त तीन वस्तु्ओके कारण हे-यथा( |
( शेरणद |) हे
अकार, उकार. मका
क, #
» दैव ब्रह्म चष्णु, महेद् । ~
दाक्ति सरस्वती, लक्ष्मी, --
» खाक स्वगे, मत्ये, पाताङ।
)» षेव चक्) यजुर् , साम ।
दिज बराह्मण, क्रिय, वैद्य ।
, अवस्था जाभ्रत् , स्वप्र, सखुषुसि ।
न्यं ६.६१
„ वयः क्रम बाट्य, योषन, वाधक्य ।
9१ श्रेणी | उनत्तम; ) मध्यम १ अधम }
» परमत्मा विराट्, दिरण्यगभे, अव्याकृत वेदां
३१ जीवात्मा [वररवः जस, प्राज्ञ | | ल
+ प्रकरण सुबन्त, तिङन्त, कृदन्त । ।
[वयाकरणमे |
93 5
9१9
सस्कृत-भाषासीकाभ्यां सवङितम्-
वेदिकस्वर
वायु
ऋतुकाख
वेदिककाड
पुण्यनदी
ऋण
ताप
वगे
राज शाक्ते
घ्र्मरूप
नाड़ी `
धातु
उदात्त)
हीतरः,
रीत,
ज्ञान,
गगा,
द् व्ण, |
आध्यात्मिक,
धमे,
प्रभावः,
सत्;
हडा $
कफः)
नरल्य
स्वकया,
नेष धचरित १
मेघद्लः
खष्टि,
कारी,
कुस्मक
दिन,
सी,
कायिक
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प्रह्मन्ञान,
सूयं,
अचुदात्त)
मद,
उष्ण,
कमे,
यमुना,
ष्णः `
आधिदैविकः,
अथ,
उत्साह,
चित्,
पगला
वात,
गान,
स्वरित ।
सुगघ । `
घषो ।
उपासना । .:
सरस्वती ।'
पितृच्छण । .
आधिभोतिष्ठ)।
काम। -
4-1-11 61448
[ मीतिशाख 1]
आनद ।
सुषुम्णा!
[ योगज्ञा ]
पित्त।
[ वेयकखाख }
बाद्य।
[गांध्वेदशाख]
परकीया,
दिश्ुपाङ्वधः,
कुमारसम्भव,
स्थितिः
प्रयाग,
पुरक,
रानि,
पुरुष,
वाचिक,
ज्ञान,
योगाभ्यास,
न्द्र,
सामन्या।
[साहित्यन्ाख्)
किराताञ्ञुनीय ।
रघुवश्च ।
विनाश \
गया
रेचक 1
सच्या ।
नपुसक् ।
मानसिक ।
वैराग्य ।
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११ अश्र
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), उच्चारण हस्व,
9 कद्ध भरत,
, ¦ वचन . ` पकवचन,
9) ¦ छुरुष प्रथमपुखष, |
9» : भ्रस्यान समाष्यगीता,
+
सवीदिसिद्धशब्द ~
` शिषमहिन्नस्तोत्रम् ।
व्यजन,
दीधे, :
भविष्य
द्विवचन,
मप्यमयु ©
पचदश्ी,
सयुक्त ।
प्त ।
षतेमान ।
बहुवचन ।
उततम्रघु० ॥
ब्रह्मसूत्र । .:
[ वदान्तश्चान्ने ]
जमू्। तत् । सत् ईतनिदैशोघ्रह्मणस्िविधो मतः । गीता ।
स्कन्द् यणनागरखड-दाटरकेद्वरमादहात्म्य अ० १९९ ।
तान श्च
१ अरण्य त
39 चुरी ।
-9 घन
+}, प्राम 7
५ तीथेः `
„ पवेत `
४: नदी 9)
जिफखा
तिकडुक
क र्क्षज
पुष्क रारण्य,
उाराणसी,
चन्द्ावन
कल्पग्राम
` अग्नितीर्थं
अवरा
११
तीन प्रधानमत्त हिन्दू
तानसग
दीवानी
39 दा वानीकेवहदे सद्र,
› कोजदारिके , मजिस्दे>
१ 9 भमाटखक्र
$ प्रचानभाषा
कटखकृटर
हिन्दी,
दारकेदवर,
नैमिषारण्य,
दारका,
खाडव वन,
रालिग्राम,
शङ्ख तीथ
अब्दं (आबु)
नमेदा
हयं
११
गान्धचतेद्,
सृखसरुमान,
फौोजदारी,
अंज,
जज्ञ,
कामेदनर,
पारसी,
प्रमास।
धमोरण्य ।
अवन्तीं ।
( उ्ञेन )।
चेतवन ।
नंदिश्राम ।
पितृतीथे ।
रेवतक _ ।
सरस्वत। ।
( द्पक्षोद्धवा ) ।
बटर ( ।
११
आयुवव,
छस्तानः .
माठ
गवन्धैटकोरं )
दाष्कोटेकं
संस्कृत-भाषारीकाभ्यां संवकितम्- १३३
„, परमपूज्य माता, पित, गुरू ।
,; तर्पणीय ` पिता, पितामह, प्रपितामद
`: माता, पितामहीः प्रपितामही,
245 मातामह, प्रमातामहः - बद्धन्रमतिमह
१ मासम गर्म जाडा वरसात
» परीक्षा भथम, मध्यमः आचय
परीक्षा दन्टुनछ, इन्टर ( ० फ ) व्याच्ुखर ( बी ० ए० )
„» प्रेमास्पद पुज, मिज, 5 - 1:
„, महावीरः हमान; ओआष्म, अजेन ।
¢ मभि. 1: गादैपत्यः ` आहवनीय, दक्षिण ।
तनिदेह स्थूल, सुक्ष्म; कारणः ~:
मुनि्रय पाणिनि, ` कत्यायन, पततजि ` `
( व्याकरणाचोयं )
„> वाक्ष्ययोजकः, कता, कमे, क्रिया ।
+ वृत्ति ` अभिधा, रक्षणा व्यञ्जना `
क ट ( साहिव्यक्ाञ् }
„ धघंराकतो सूये, चन्द उअग्निं।. ^):
१.9 ( क्चत्नियवंशाकारक )
+ राम परद्युरामः रामचन्द्रः बररामः।
„, भवलसुरारि दिरण्यकरिषु रावण रिद्यपारू ।
; चमत्कार सूये, अग्निः विज्चरी ।
,, जप. ` मानसिक ` उ्पाद्यु, ज्ादिक । `
,; दानपान्न केन (दरिद्र) अनायः विचाथीं।
> महादान अज्ञ, जक, विद्या । `
-;; मावाक्यके राब्द्, अहं ब्रह्म अस्मि,
अथवा तत् त्वं अशि `
,अवभ््यकतेव्य यज्ञ, दान, तप, ।
५9 कमफ द्श्छ, अनिष्ट, मिभ, [ !
,समस्तविषय ज्ञान, षेय, कष(ता ।
% कमे, करण, कती ।
„ समस्तविषय धरमाणः, प्रमेय, प्रमाता ।
१३४ शिवमहिस्नस्तोत्रम् ।
५ दैरोन, दद्य, द्रा । (हइत्यादि)
१, मवुष्यभेद परमार्थ, स्वार्थी, राश्चस (व्यर्थाः)
५; -उपदेक्ः नाम, ` लक्षण, परीक्षा
| षा); । ( न्यायरासख्र )
» प्रधान-आश्चम ब्रह्मचयै, -गदस्थ, सन्यास
» प्राणिञ्यवस्था जलचर, .; स्थरुखर, नभश्चरः ।
, अग्निकेशुण, रूप, . स्पशे, शष्ट ।
9 भुख्यसस्कार यज्ञोपवीत विवाह; ` ` अरण
शाख्राथ वाद्; जस्प, वितण्डा .:
»» प्रधानपूञ्य : ऋत्विक्; ` पुरोहित, ; आचार्य । -
,, प्रचाङेतपृज्य जलः अग्नि, पथिवी (खत्तिका)
११ दिन्दुधमेचिन्द शिखा, > सूज, : . {तखक ।
,\ भ्ानसश्राम् देवासुर रामराण महाभारत।
वे्यक. ¦, निघण्डु : ; निदान चिङ्घित्ता। -
सी भाति यदि विचार पूवक देखाजवि तो सथ कु अयान्तशेतदी
1सद्ध् इष्ता इ-अत पव समम्र तान अकार उकार मक्रारात्मक पक
सकारहौके रुप ष्टि-गाोचर होते ई -इन समस्त तीनोसि परे तरी
य॒ (चाथा } धामही प्ररमेदवरका दे-। खृषटिकं आदिमे जब पर ज्यो-
ति प्रकट इद तो उसीकी महाध्वनिका नाम ओंकार पडा दै-यष्
कथा काराखडके ७३। ७४ व अध्यायः
याम् आकारद्वरकं घ णनम
विस्तर प्क पायी जाती. है । भाव यह् है
ह् क-आकार पदक वा
च्य आपा ह-कयाकं वहा आकार समासयुक्त होकर आपको स.
९ कदट्ता ह, आर व्यासयुक्तं इन पर आपरीको व्यस्त बतला.
त।ह्~-अत पव आपका सबात्मकता अर आद्धितीयतां प्रत्यक्ष~-अनु
मान ओर अथोपात्ति-इत्यादिसखरे सिद रहने परी आगमद्धासा घ-
कट हे ॥ २७ ॥ |
ॐ भषपययनुवाद् + ५९
तीन वेद् अर चत्तित्रयः धिभुवन तीनहु देव । क
अकारादि अच्छर कहत, तर्हिं विकार नहि सेव ॥
^ अयु ध्वानिते अवख्द्ध हे, चाथा धाम तुया
मस्त नित, सरनद् $ |
भाषत न्यस्त समरः । तुहि ओकार ॥ २७.॥.
4
संकृस्त-भाषारीकाभ्यां संवङितम्- ९३५
& भाषाविम्बम् ॐ `
-विघेर्दोके गाये जिभुवन परे तीन सुरसो ।
अकारादी यन कहत विकवीहीन जिहिकेो ॥
अहै चोधा धात रहत अति सृच्छम ( क्षपे) ध्वनि भये,
` सद्ा गि तोरी स्तति गिरिश ! ओकारपदं सो ॥ २७॥ `
~~~ ~~
भवः र्वो रुद्रः वद्युपति रथो म्रः सहमहां
स्तथामीमे शाना व्रिति यद भिधानाष्टकमिदम् ।
` अमुक न्प्रलेकं प्रविचरति देव श्रुति रपि ५.4
प्रियाया स्मै घान्ने प्रवरिदितनमस्यो ऽस्मि भवते २८
1... | & मधुसूदनी रीका # - (गरि । #
; धवं तावद दवितीयब्रह्मवाचकत्वेन प्रणव उपन्यस्तः एतस्य ` चा-
थाचखधानं जपश्च समाधिसाघनत्वेन पतञ्जखिना सुत्रितः समाधि.
सिद्धिरीदवरभ्रणिधानात्" इति । ्दवरप्रणिधानाद्वा' इति खत्ान्तरं
"तस्य वाचकः प्रणवश्च! 'तज्ञपस्तदथे भावनम्" इति सूत्राभ्यां प्रणव. |
जपस्य प्रणिधानशाब्दा रथत्वेन व्याख्यानात् । श्तौ च 'पतदालम्बन
्रष्ठमेतदाखस्बने परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा यो यदिच्छति. तस्य
तत् ॥' इत्यदिना तस्य सर्वपुम थद वत्वसुक्तम् । पतस्य चातिदुरूहा-
सत्वेन खरीदा य नदेत्वेन चासाधारणत्वात्लर्वसाधारणानि परसिद्धाः
नि अगवद्धाचकानि पदानि जपाथत्वेन वदन् स्तोति-- ¡= °|
+#भव इत्यादि # । हे शरणद, हे देव, श्दं यदभिधानाष्टक नामा-
णकः अमुष्मिक्नमिधाना्टके विषये भरत्येकमेकेकरः । भतिनामेतिःया-
वच् ।श्ुतिरवैदः प्रविचराति पकर्वेण ` बोधकतया चराति । वतेत इत्य.
भः | अपिशब्दात्स्रतिपुणागमादिकमपि । अथवा पणव इवास
पि श्रुतिः राक्चरतीति योज्यम् । यद्यप्यष्ध्यायाथेकाण्डे व-
द्विना त्वेन तानि समाम्नातानि तथापि वहभेगवद्धिभूतित्वात्तन्नाम-
त्वेऽपि न भगवन्ञामत्वग्याघातः। यद्वा अस्नासिन्नामाष्टके देवानां
ब्रह्मादीनामपि श्चुतिः भवणेन्द्रियं प्रविचरति सावधानतया घतते ।
|
१३६ शिवमटहिञ्नस्तोत्रम् ।
देवा अपि त्वन्नामश्रवणोत्छुकाः किं पुनरन्य शत्य थैः। कि तन्नामा.
कमित आद -भव इत्यादि । महता मदच्छब्देन सह चतत इति
सहमहान्महादेवः तथेवागसभ्रसिद्धः । इतिच्ब्दः समाप्त्यथैः.। यस्य
च नाममाज्मपि सवेपुरुषाथप्रद ख पुनः स्वयं कीश इति भक्त्यु-
॑ दक्ण परणमात । स्यासत्यादना। अस्म स्वप्रकारचतन्यरूपत्वन
सवेदा परोक्चाय भवते महेदवराय । कीर शाय । धाघ्चे सचंषां शारण-
भूताय चिद्रूपायेति वा । योग्यमुपचारं किमपि कतुमदाकयुवश्नहं
केवरं प्रविहितनमस्योऽसिमि प्रकषण वाङ्मनःकायव्यापारातिद्ायेन
विहिता नमस्या नमस्क्रिया येन स तथां ( केवर तुभ्यं कतनम-
स्कारो भवामीत्यथैः । ) प्रणिहेतेति पठेऽप्येवमेवाथैः ॥ #दरिप
क्षस्प्येवम्# । भवादीनां च हरिनामत्वं योगवरच्या संभवत्येव सहस
नामस्तुतिपाटेवत्वाच्चेति द्रष्टव्यम् । अथवा यदिद्रमाभिधानाष्टक
असुष्मित्परत्येक देवश्रुतिरपि देवराब्दाभ्पि प्रविचरति सबद्धो भव-
ति। तथा च भवदेव श्व्यादिरूपं तव रहस्यनामाएरकमित्यथेः । त-
थाच भवस्य ख्द्रस्याप द्च आराध्य इत्यथः। पवमन्येभ्वपि -नाममु
व्रशट्यम् ॥ २८ ॥
छ संसृत टका भ , ~ ॐत
( देव | )कषिव्यतीति देवः-“पनाद्यच् "१ । १ । १३७ । देखी.
खाविग्रहधारिन्| ( भवः ) भवतीति भवः । भवते वाल, भू-प्ाघो
[ चु ° आ० स° ] अत्रापि “पचाचयच' । ( शषः ) शणातीतिः; द्वाव
| कथा० प० स ० ]--“'छृयृश्डभ्यो वः? ९ । ११५ उ६। ( रुदः)
क्यताति शद्रः । ^“रोदेर्णिदुक्च --* २1 १९ उ०--शति रक्प्रत्ययः
णश्चलापः । ( पद्युपतिः ) पञ्चूनां स्थावरजङ्गमानां पतिः । अथवा--
बह्माचाः परावः ब्राक्तास्तेष्रां पतिर्खो स्तः +` ( अथः) ततः परं
( उश्रः ) उच्यति छा खम्बध्यते इति उः । उच--समचाये [ दि
पऽ स | “ऋञ्च--' २। २८३० शत्याद्विना रन् गह्रान्तादे च्ञ
( सहमहान् ) महता शाढ्देन सह वतते इति सहमहान्, अथीन्प्र
हिवः । महान् द्रैवो नरनादिक खलनं यस्य सख महादेवः । अथवो
-शिबुखणोक्तवास्य व्युप्रचिः, काया~यथा,-
पूज्यते य रखुरेस्सं मा श्चैव प्रमाणतः
वाहु महति वृज्या, महद्बस्ततः स्मरतः)?
क
संस्कृत-भाषारीकाभ्यां सवैकितम् - १३७
देवरब्डस्तु सम्बु'द्धपद् एवः व्याख्यातः । (तथा ). तद्त् ( भी-
म्रेदानो ) बिभेयस्मात् ¦ भीमः-“भीमादयो ऽपा्दाने-” ३ । 8 ७४।
पुनः-“भियः षुक्वा-* १। १४८उ०-इति मक् । ““ओीमोऽस्षवेतसे
घोरे शम्भो मध्यमपाण्डवे-*इति च कोशः । एवं -दषटे-इति इंरानः-
"ताच्छीद्यवयोवचनशक्तिषु चानश्-” ३।२। १२९ इति चान-
ज्रव्ययः 1 ( इति )- समाति खेचनायां ( इदं ) कथ्यमानं ( यत् ) भ्र
सिद्धं ( अभिधानष्टकं ) नामाष्टक, अष्टौ नामानि सन्तीति बा।
( अमुष्मिन् ) अभिध्ानाष्ठके ( श्रुतिरपि ) वेद पुरुषो ऽपि ८ प्रत्ये
क ) चक पके नाम प्रति { प्रविचरति ) प्रकर्षेण बोधकतया वि-
रति वर्तते इत्यथैः । अत एव: ( प्रियाय ) स्वमनोयुक्ृलाय ( अ-
स्मर ) वृर्वोक्तप्रणवप्रतिपाद्याय तरीयतेजसे ( धान्ने ) ज्योतीरूपा
वं ( भवते ). लभ्यं ( प्रणिद्ितनमस्यः ) उचितोपचारं कतमा
कलुवन्नदं विहितनमस्कारः ( अस्मि ) भवामि । कचित् प्रणिहितेत्य-
= श्रविदहितेति चाठो ऽपि दयते तत्राप्यथेः स्पष्ट पच । अचोक्त-
ऋोकत्रितयान्तगीत्रकारविरोषो द्र्व्यः--श्चितिमूतिः वैः ९ ज
छमुर्िंमैवः २ अभ्निमर्ती रद्रः३ वायुमूक्तिरु्रः 8 आकारामूति-
नमः ५ यजमानमूर्तिः पश्चुपतिः ६ चन्द्रमूर्तिभेहादेवः ७ सयेमूतिं-
<-पवं प्रणवाद्या नमोन्ता अष्टौ मूतेयो मन्बरूपेण जव्या
| दति विज्ञापितं-“^त्वमकेः“~““जयौी ` ~ मिति पूर्वोक्त पद्यद्धयेन सदामु-
> -ऋछोकेनेति सखुधीभिरवधघेयम् । अत्र , यस्य नाममा्रमपि परमपु-
रचातरदं वेद प्रतिपादितं च चरीवत्ति स स्वयः कीटग् ? श्तिम-
| दामदिमाऽववोधरितः दतच्च स्पष्टसुक्त 1रचपुराण वायवीयसंहितो-
तादे चतं थोध्याये श्रीकृष्णं प्रव्युपमन्युमह।षणेत ॥२८॥
रीङ्ानः
~ संस्कृतपयाचुवादः ` भ
लवौ सवः पद्युपतिः पुन ख्घ्ररूप
इथानभीमयुतरुदमहावि देवाः ।
नामाष्टकं प्राथितमेतद तीव शम्भो ।
देवा €भुत्तिघरः ! शङ्कर ! दीनबन्धो ! ॥
प्रत्येक मस्मि न्तव नाम विस्तय-
द क्त्या परिस्तौ त्यपि बेदपूरूषः ।
१८
१३८ `: ८ शिवमहिन्नस्तोत्रम् ।
५, 9.
` धाभ्नेऽथ तस्मे भवतेः भवे व!
' नित्यं नमस्याः शतशो हि मत्ताः ॥२८॥
| ३ -- --; ।-ाषा-यक्ाः भ: १1८;
(देव | ) हे देवाधिदेव ! ( भवः- शावः रुद्रः पश्चुपतिः रथो -उ्रः
सहमहान् तथा भीमेशानो इति ) भव, ` शावै, ण्ट; पश्चुपति, -उ्
महादेव, भीम, ओर ईंशान-( यत् इदं अभिधांनाष्टकं ) यदह ज आपके
आड नाम ह (अञभ्मिन्) इनः आठ नामोमें ( प्रव्येकं ) प्रत्येक नाम,
-को (शरुतिः अपि ) स्वयं वेदभी- यहां पर “अपिः कहनेसे यह बोध
होता दै क्रिःजव वेददी कहता दहे तो पुराण इतिहास इत्यादि की
कोन गनती हे । ( विचरति ) बहुत बड़ी बोधक्रतासे चरता दहै
अथोत्. विशेष भचार करता हे । ( अस्म प्रियाय धास्चे भवते परणि-
दहितनमस्यः ` आस्मि ) अत एव ~इस अपने परम इष्ट तेजो रूप आपके
केवल शरणाम् करे वाका ह ।--अभिप्राय यी हैः {कि-ऊपर जो आढ
नाम कदे-गये द--इनमे यत्येक नामाकोः लेकर वेद् पुरुषभ आपका
। स्तुति गान करता अथात् ये आटा नाम वेद--प्रतिपार्दित हें
आर आप हमारे इदेव ज्योतिरूप ह
इारा भं कवर आपक्रा प्रणाम करताह क्योंकि जर कड पजा अथवा
सेवा युद्चसे नदीं दो सकती हे । नकि श ध ८ पूवं
क्छोकमे ओंकार करा निरूपण क्या तै ओर लङ्क पूयै ^त्वमकैः"
[२६] इत्यादि च्छोकमें मगवानकी अश
0 अ [क =
त ' *. अष्टसरातियाका निरूपण इआ हं-
अथात् प। अषटमूतका वणेन करकेतव ओकार पद्के वाच्य वाचक
स क द्र्लाया ट तदनन्तर परमेदवरके नांमाष्टकको कीरसन करक
भरणाम किया हे इससे यह वात पाई जाती हेकिअ्रमरतिके कथित एक
शक रूपके साथ जकारके सहित आठ नामके एक पक नामो
चतुथ्यैन्त नमः प्रयोग 9 ल म्न वन जाते है-उनम जो ङोग
ओंकारके अधिकारी नहीं हं उन टोगौको ङ्घ कके कटे हप
आठ नामकि मंत्रोको जो जिसके भल्ल जक
जप करना चादहिए-अत्यन्त र्ह्स्य विषयं रोनेसे भन्जका प्रकार
जना दिया गया ह--विन्ञ भावुक लोग स्वयं उनका उद्धार घना
सकते द । ये दी आटो नाम~मत्रकहलति ह| |
ट+अत एव इन आटे नामोके मत्र
५ 1.4 1“
संस्कृत~-माषाीकाभ्यां सवेडितम्- ९३९
४५
४7 ॐ भाषापदय।नुवादः
५ ष ती ४३ (4
छवे रुद्र॒ भव पस्ुपती; मदादेव इसान । .
उप्र भीस-ये विदितः तुव आठहु अभिधान ॥ ` `
इनमे नित प्रति एकको, वरनत वद महान । 4.
परम ज्योति चतन्य तुरि करहु प्रनाम वखाम ॥ २८ ॥
ं & भाषा बिम्बम् १ ।
४९ तमो र [® ६. & +~ +~:
भवां भीमो रुद्रो पस्ुपाति महादव सरव,
इसानो उथ्रो है कहत सब नामा-ष्टक यदी ।
# र क | क~ ` भ अ ~ (व
हीमे प्रयेकं स्तुति करत वेदो तुमि को,
नमस्या हे माश नित परम-ज्योती तज खगी ॥ २८॥
नमो नेदिष्ठाय प्रियदव दविष्ठाय च नमो
नमः क्षोदिष्ठाय स्मरहर महिष्ठाय च नमः ।
नमो वषिष्ठाय त्रिनयन यविष्ठाय च नना
नमः सर्वस्मै ते तदिदमिति सवाय च नमः २९
| ` ` # मघसूदनी टीका ` ` च,
पव जातभक्टयुद्धेको नमस्कारमेवाचवतेयन्दुरूदमदिमत्वन भगः
वन्तं स्तोति- ` ` ८ | ऊ - फः
नम दति # । हे प्रियदव अभीष्टनिजेनवनविहार, ते -तु्य
नेदिष्ठायाव्यन्तनिकर वर्तिने, द्विष्ठायात्यन्तदूरवर्तिने च नमानमः ॥
हे स्मरहर कामोान्तक, क्षोदिष्ठय श्वद्रतयाच, . महिष्ठाय महन्तराय
ल तथ्यं नमोनम । तथा हे त्रिनयन ज्रिनेब, बधिषठाय अतिष्डधाय
घृद्धतरायेति उा यविष्ठाय युवतमाय = भ्यं नमोनमः । एवमत्य-
न्तवि रद्ध स्वभावस्याट्पबुद्धिभिः कथमपि स्वरूपनिणेयासभवात्सवे-
दा नमस्कार प्व. करणीय इति प्रदशेनाय नमस्का रशब्दाद्ततिः ।
तथाच शतिः-“ईरात्खुदरे तदिहान्तिकं च' 'अणोरणीयान्महतो
हीयान त्वं खी त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी। त्व जीर्णां
ण्डनाश्चसि त्वं जातो भव्रक्षि विदवतोमुखः' इत्यदि । तथा किह.
ना सर्वसमे सवैरूपाय तुभ्यं नमः दं सवे यदय मारमा'इति ुतेः।
१४० : 7 ` शिवमहिन्नस्तोत्रम् } `
ननु तर्हिं सवेविकाराभिन्नत्वा्धिनाशित्ववसङ्ग श्व्याराङ्ख, सवस्य
` ४यस्तत्वेन वास्तवमेदाभावास्सर्ववाधाधिच्ठानत्वेन च श्रुतिषु सामा
नाधिकरण्येन ` व्यपदेदाद द्वितीयस्य घरह्मणो न विकारेगन्धोऽपि
सभाव्यत इत्यभिप्रायेण नमस्कुवेन्नाद--तदिदमितिसर्वाय च नम
इति । तर्परोश्चामिद्रमपरोश्चमित्यनेनं ` भकारेणा निवौच्यं सवे यत्स
तदिद्मितिसषैस्तस्पर। बहुवीहावन्यपदाथध्रधानत्वान्न स्बनामता ।
तेन खवीधिष्ठानभूताय तुभ्य नम इत्यथः ॥%हरिपक्षप्येवम्%#। केवलं
` सबोधनव्रयमन्यथा व्याख्येयम् । भियामि वेपथिकसुलानि वैराण्योः
दोधेन दुनोति नाशयतीति भरयद्वः । तथा च समरो वासना तं
हरतीति स्वभकतयुदरंकेणेति स्मरहरः । तथा याणां लोकानां नयनः
वह्सबाथोवभासकसखिनयन इति प्रागपि. व्याख्यातम् ॥ २९ ॥
१. स ह दः संस्कृत टाका भ ` ।
„५. [क ० 9 1411; की
_ ( प्रियदव |) हे 'जनवनविहारिन् ! ( नेदिष्ठाय ) अतिङहायेना
न्तकः नदष्ठः-“अतिरा। ५ = ¦
` इत्यमरः (क्षोदिष्ठाय) उद्रतराय-“स्थुलदुरयुवहस्वक्िग्श्च.
५. यणादिपरं पूर्वर च शुणः,-६ | ¢ १५६-इत्यत पवोभः
यञि शा~ डा सि | १५ +
च यणादिखोपगुणौ । ते ( नमः ) एवं ( मादिष्ठाय च नमः) अ
व दाय ५.५ मः ( भिनयन १) हे त्रिलोचन !( उवाय )
सतव वृद्धाय । जन प्रियस्थिर” द । १५१-इत्यादिना चद.
वादेः ~. (नमः) अथ (यविष्ठाय चनः
| -अ्रापि पूर्वोक्त “सथुः
„ य द्विच | @ भ, ( ४५ "द 8. (3? |
5. शत्यारेनव यणादिलोपगुणौ । ( सर्वस्मै ते नमः ) किम्बहुन
५५१ ४. ॥ ५,
ननस्वरूपाय सवात्मकाय वा भवते नमः ( इति ) अनेन 1
¢ तते.) मर्तं ( इदं ) क्रियमाणं सवं ( नमः ) नमस्कारः ( दाव
य ) सिवाय भववििति शोषः । कचिदन्त्यादिरपि लभ्यते यथा
वाथेति, तत्र 4 गती" अथवा^्वरय हिसायां [ भ्वार पर सं
संस्कृत ~माषाटीकाभ्यां सवलितम्- १४१
्स्येताभ्यां धातुभ्यां ' बवयोरमेदात् “पचाद्यचि"--३1 ९1 १३४
त्यतः सर्वोऽपि भवति। तथा चाघ्रं शिवपय्यांयत्वान्न सवनामताः ।
यथां चोक्तमपि नामनिधानकोशे- “सवेस्त् शवो भगवान दाम्भुः
ज्वरः : दिवः । » ` कचित् ` अतिसचयेत्यपिः ` पाठः ॥ पः
रन्तुं तत-परोश्चमिद-मपयोश्चमिति-अनेन शकारेण ¦ अनिवोच्चं
स्च यतर स-तदिदाभिति सवैः तस्मै- तदिदमितिसवीयेत्येक , पदं ।
अत्र बहुवीदावन्यपदाथेवधानत्वान्न सर्वनामतेति सवै विवेचनीयं
विचश्चणेरेवमेवोक्तं ` भगवद्धीतायामपि-- ` ` ` `. र
-५नमः पुरस्तादथ पृष्ठत स्ते न॑मोटस्त ते सर्वत एव सवै । `
अनन्तयी्यो भितं विक्रमस्तव, संवे समाप्नोषि ततोऽस स्वैः"
(४०्अ ०१९) अमुत्र~ 'ञ्जणोरणीयान् महतो; मरीयान्-''ह्यादिरूपां
शरुतिंमवस्न्यैव भगवतः संवीत्मकत्वं संवौपिष्ठानभूतत्वावि च
सम्यक् प्रतिपाद्य ल्विधमादिमशालिन ऽमूर्तयेऽषटवा नमः प्रयोगो
<तिदयभक्तिमत्तामेव द्रढयति कवरिति 8२/1४ 2 11 ^^
२ क संख्ृतपयालुवादः
नमोः निकटवर्तिनि भरियवनाय लभ्यं नमाः
नमः परमदुस्तराय च शिवाय देवायते.
नमो छघुतराय ते मदनमानविद्धलिन,
` अहामहिमशालिनि महिनतेजसे त तमः ॥
नमोऽस्त त चरद्धतराय त्ास्मवच, |
युवस्वरूपाय | वाखकय वा। | `~ (1
वीयं सवविदायाय सन्तः, ~ , 1.
सर्वैस्वरूपाय भवेन्नमेो नमः॥२९॥ =
|
‡ मापा थका 6
। ` (तरियदव)दे आनन्दकाननविहारिन | (नेदिष्ठाय नमः ) अत्यत
निकरं रहनेधाके अ। पको नमस्कार दै, तथा-( दविष्ठाय च नमः )
बहती दूरवत्ती आपको नमस्कार ठ । ( स्मरहर ) हे कामनाहक !
वा स्मरण करते माज दुःखके हरण करने बाले ! ( क्षोदिष्ठाय
नमः ) अत्यन्त छोटे रूप आपको नमस्कार हे ( मिषठाय च नमः )
ओर वहुतदी बडे रूप आपको नमस्कार है, (निनयन |) हे ्रिरोचन !-
(~ ॐ ॐ ~. त
तूभथा चन्द्र-सूुय-अश्ि है नेत्र जिसके-जेसाकि कहाभी है- “वन्दे
~ भ्ण क = च "5 9 १ - क _ ` वि क =
लल्लः ५ ०्गमोरासषरः ॥ - 0, 9 र [क 9 . | | १
--- य
वहिशशाङ्कसूयेनयनं'--मथघा तीनो ही खोको मे है नयन [ नीति ]
जिसका” वर्षिष्ठाय नमः ) अतिशय -ष्द्ध आपको नमस्कार हे,तथा
चः( यविष्ठाय च नमः ) परमः तरुण आप्रको नमस्कार है, पवं च
( सवस्मै ते नमः ) सवे स्वरूप-आपको नमस्कार है ८ तत् इदं नमः
शवाय च इति ) यह खच मेरा किया हुआ नमस्कार शधस्वरूप
अपकरो निवेदित दै--अथवा सवक्िसीके -अतिक्रमण करनेवाले शा-
वे भगवानक्रो नमस्कार -हे। अभिप्राय स्पष्टहे कि आपी सव
कख हे ओर आपदा सखवकिसीके रूप हैँ अतपव आपदीको मे भ.
णाम करता द--कंयांकि आप अत्यतविसरद्ध स्वभाव होनेसे कदापि
निणीत नदीं दोसकते-अथौत् हमलोग जसे श्चद्रवुद्धिवार्खोकः कि-
या हआ यद निणय न्दी होसकता- कि आप क्या है ? किंवा कैसे
= अः ३ भ
१ तव ओर कया करसकत हे केवल . वारंवार श्रणामभर करत
ह-विरोषता यद हे कि पूवम
रोषः ¦ अष्टमात्तं ओर अष्टन।मोंको कहकर
इल छाकम आठ वार् ` नमस्कार करनेसे -खाष्टांग दृण्डवत्पणाम
५ ~ वा (१खखाद् ह--हसमे राड वार “नमः” पदृके
याग होने गरहापुनलक्तं दोष -आपङ्नेकी आशका नही करनी
चाहिप- क्योकि परमेदवरकी डरूह मेहिमाको सोचकर क विने अ
[4 1 र > {जि ४ ।
पना परम भाक्तके उद्रेकको प्रकट किया है-अतः यह दोष नही है
९ त माया युण--जथवाः अङकार दगया ह दंदवरके सवेश -
पै न दानसं उसके विश्दध स्वभाव का रामायणम भ इस प्रका.
रस कटा ह- । 4
८५-ा> + द । ॥ ं
जाड 191 जासु न पातवा; मति अजुमान निगम अस गि
१९ चु चरे खन विज काना, कर वियु कम करै विधिनाना ।
आनन रहित सकर रख भोगी, विन्त ~ ॑
न रि ~ - भागा, विज वानी वक्ता बड़ जामी ।
०९ तख परस नयन (चु दखा, गहे न्रान विच वास असषा ।
भस खबर माति मलकिक करनी, महिमा जासु जाह नहि वरमी।”
त्यादि ( तु° रा०)
` ~+ भाषापदानुवादः + `
नमो नगीची देव जो, द्रवति पुनि होय ।
` नमो कामरिषु ! दुद्र ह, रहत ( वनत ) बहत बड जोय॥
संस्कृत -भाषाटीकाभ्यां संवक्तिम् । . १४३
नमो बृदढेते वृद जो, तिनयन ! महाज्ञुभान । `
नमो सब-मयं सवेत, ऊपर सवे महान ॥ २९ ॥
| = भाषाविम्बम् 9.
नमो पासे-वासी प्रियवन ! महादूरवसह, =
नमा छाररूपी वहुत-वड-भार) तुमर्हिको ।
नमो बृढे बावा ज्ञुबक-तनु-धारी गिरिराज,
सरै रूपे धारं तिनि प्रथु सवै नमतदहौं॥२९॥
; 7
` बहलरजसे विदवोत्पत्तो भवाय नमोनमः ` `
प्रचरुतमसे तत्संहारे हराय नमोनमः। _ `
जनसुखकृते सत्वोद्धिक्तो भडाय नमोनम
प्रमहसि पदे" निखेैगण्ये शिवाय नमोनमः. ॥२०॥
+ मधुतूदनी टीका ं
अधुना पूर्वोक्त वौ थसंक्षेपेण नमस्कुवेन्स्ततिञुपखहरात-- `
#वहरेति # । विदवोत्पत्ता विद्बोत्पात्तनामत्त बहर तमःसत्ना-
भ्यामधिकं रजे यस्य तस्मे उद्विक्तरजसे भवत्यस्माज्जगादात भवा
ब्रह्ममूरतिस्तस्मे तभ्य नमोनमः। तथा तस्संहार तस्य ॥चर्वस्य सहा
रनिगमित्त भ्रवलं सत्वरज्ोभ्यामनभिमरूतसुद्रिक्तं तमो यस्य तस्मे
दरतीति हये श्द्रमूरतिस्तस्मै नमोनमः। तथा जनानां ुखश्ृते
स खनिमित्तम् । रतशब्दोऽभ्ययो निमेत्तवाच । सत्वस्यााद्क्तावु
देके रजस्तमोभ्यामाधिक्ये स्थितायत्यथाद्छभ्यत । 'सत्वाद्रके' इति
वा पाठः । अथवा सत्वोद्धिक्तौ सत्यां जनानां सुख करोतीति
जनघखकृत्तस्मे । यद्वा सुखस्य छृतं करणम् । भाषे क्तः । तस्मिन्
तान्नामत्तम् । पव व्याख्यान प्रक्रमभङ्दोषो न भवति पूवेपयोय-
द्वये उत्तरपय्रौये च ` सक्तम्यन्तनि(मत्तनर् सात् खडयात सुखयति
श्रड विष्णुस्तस्मै । पःकनस्येवोदेरयत्वात् कमभङ्गन पञ्चाज्ञिदेशः
गुणन्नरयापाघ।न्वान्नयुण प्रणमत । प्रमहासपद् निखेगुण्ये शि.
नमोनमः इति निमत अगुण्यं यस्मात्तन्नखेगुण्यं तारेमन्पद् पद्-
नीये तत्यद्परा्तिनिमित्तम् । कीदरे । प्रमहसि प्रकृष्टं माययानमिभूतं
९४४ :> ८ डिवमहिञ्लस्तोत्रम् ।
महो ज्योतिर्यस्मिस्तत्तथा ` सवोत्तमप्रकाद्ारुपत्रिगुणदान्यमोश्चनि-
मेत्तमित्यथैः.।. शिवाय निखेगुण्यमङ्गलस्वरूप्राय 'रिषमद्वेतं च
चथ मन्यन्ते' हाते श्रुतेः । प्रमहसिं पदे स्थितायेति वा । #द्रिपक्च.
त्यवम्#* ॥२०॥
दः सस्कृत रीका 4 ।
ट भगवन् ! ( विदवोत्पत्तौ ) ससारखृजनकरममाण ( वह खरजसे )
आतरायरजागुणपृूणाय ( मवाय ) भवमूर्तये,विदवखङ्रूपाय ( नमो-
नमः ) बाप्लायां द्वित्वं । ( तत्संहारे) सर्वेषां भुवनानां प्रख्यकाखे ,
( भ्रवखतमसे ) चररषतरतमागुणाख्ङ्कतायः ( दराय ) हरतीति
हरः । -“पच। यच --*३। १। १३४ “हरा -नाश्करुद्रयो- ` राते
मादना । रुद्ररूपायल्यर्थः। ( नमोनमः ) बहुरो नमस्छृतयः। ( स-
र्वात्वत्ता ) सत्वगुण जायमाने सति ( जनखखकृते ) समस्तभ्राणि-
सुखकर यद्वा जनसुखस्य छत करणं तारस्मन्-भाव त्तः । अथाज
जनखुखकरणानमत्तमेति । अथवा छते इति तादर््यऽव्ययं तन
जनस्खाचामत्यथः स्पष्टः । ( खडाय ) ग्ङ्तीति खडः-खड सुखने,
| त॒° प से° ]- < पवज्ञा्राक्रः'*-३। १ १३५-इत्यतः कप्रत्ययः
तस्भ सुखप्रदाय सर्वजगत्परिपालकायं विदवम्भरमूतेये ( नमोनमः)
नमस्काण सन्तु । ( निखेगुण्ये ) निगतं नेगुण्य यस्मात् तत्,
नसख्रगयुण्य-गुणज्रयातीत तास्मन् ( प्रमहसि ) प्रकृष्ट माययाऽनमि-
“इत महः तजा यस्मिन् तत्तथा, अत्युज्वङञ्योतिभेये-इत्य्थः (पदे)
परमपद् । वतमानायेति याजनायम् । ( सिवाय ) परमानन्दस्वरूपाय
मङ्गकसृत्तये वां (नमो नमः ) अत्राप्य्टधा नमः पयोगपरमाणादणश्ा-
ङ्गप्रणामवेधदे दितो यतः स्तुत्युपसहारो ऽत्र विवक्षित इति.
काचत्- सत्वोत्पत्तो" -इत्यत्र उत्व न्तिराद्धस्य पुनरक्तिदोषत्वात्-सत्वो
षद्वक्ता अथवा सत्ताद्भक इत्यादिरूपः पाठो ऽपि छभ्यते, एवश्च काच
चृतायपद्स्य द्ताचपद्त्वमषाच्छन्ति, परन्तु भव-लययोाः स्वरप-
कारकत्वात् स्थतश्च तद्पक्षयातिस्थिरत्वा्यथेःक्तमेव समीची
नमामात । तद्धाद्वपय्वका ऽपिन साम्प्रदायिक इति विवेचनी
चम् ! श्रन्यसमात्ता न्द्; पारवतंनस्याचारत्वादेवा्-“हरिणीचरत्तम्'
तद्छक्षणच्च, उत्तरलाकरे वमुक्त-^रसयुगहये न्तो प्रौस्छौगो
यद् हरिणी तदा'-दइति ॥ ३० ॥ ` ॑
संस्कृत-माषारीकोभ्यां सवकितम्- १४५
+ सस्कृतपयानुवादः
विदवोत्पत्तो बहुलरजसे स्यान्ञमो मे भवाय,
तत्सहारे प्रबरुतमसे श्रीहराय प्रणामः
सत्वोद्विक्तो जनसुखकृते तन्नमस्ते सखडाय -
निखेगाण्ये प्रमहसि पदेः ्रीरिवायोन्नमो ऽस्तु ॥३०॥
हे देव ! ( विदबोत्पत्तौ ) संसारकीखष्टिमे ( बहलरजसे ) बहुत
विरोष रजोगुणी ( भवाय ) भवस्वरूप आपको ( नमोनमः ) बार-
बार नमस्कार है । (तत्संहारे) फिर उसी संसारके प्रलय समय (प्रब-
तमसे ) विशेषं तर तमोगुणी ( दराय ) हरस्वरूप आपको ( नमो.
नमः ) अनेक प्रणाम है । ( स्वोत्पत्तौ ) स्वगुण के भरकट दने
पर ( जनसुखरूते ) खोगेकि खुखकारी ( खडाय ) शबुडस्वरूप आ-
पको ( नमोनमः ) पुनः पुनः नमस्कार है। पव ( निल्ञेगुण्ये भ्रम
हसि पदे ) तीनो गुणोंसे परे स्वयं प्रकाशरूप परम पद पर वत्तमान
रहनेवाले ( रिवायनमोनमः ) शिव स्वरूप. आपको विशेष रूपसे
प्रणाम हे ॥ अभिप्राय यद कि--खृषटि करने के छ्य जापी रज)-
मूत्तिं [ बह्मा ] होते. मौर धरलयके निमित्त तामस खद 1 बनते ह
एवं संसारके पालनार्थं आपी सात्विकधिदवस्भर | [ विष्णु ] हो
ति इ-अतपव इनं सीन यर्णौ-के धारणः करने वा होन परभो
"11.
(स्तं आपको वारव प्रणम हैली भावस कछ कुछ मिरता हअ
याणामद्कत-काक्म्बसिका श्यन् 0111.
यथा (“रजोजुषे जन्मनि; संच्वदृत्तये- `
स्थितो अजानां प्रये तमःस्छय ।
अजाय सर्म-स्थिंति-नारा-ह्तच, = . `
` त्रयीमय तरिशुणादमने नमः । अथ स्पष्टे] ` |
, इस सुरु चछोक मं भी आठ वार , “नमः पद्के प्रयोग स अ-
छांग ध्रणामकीविधि दिल दे यदा पर यदह शङ्का होती हे किं,
जो सनुण होगया वड निगुण केसे रह सकता दहे ?. सका उत्तर
यत्वणःकी चोपा देती - ›
१९.
९४६ 7; : रिवमहिन्नस्तीत्रम् ।
“जो गुन रदित सगुन सो कै ?
जर हिम~उपलर विग नदिः जेसे'
योहीं दृदवर के स्वयं प्रकारा, होनेकी वातौ भी उसी रन्यत्र
मिरुती है । |
"सहज प्रकाश रूप भगवान, |
नहि तदह पुने विज्ञान विहाना” शइ्त्यादि ( तु० रा०)
क + भाषापधाचुवादः ॑
५ जगत द्रुग ब्त रज, धरतनमा भव जाय |
तिहि सदारत नमह अति-तमोग॒नी हर सोय (होय) ॥ ~ `
; > ) जनन पान हित सत्व गुन, लहत नमह ड रूप । ~ 1
; उपरम ज्योति न्रय गुन. पर, प्रनवडु सिवद अनूप ॥३०॥
४ | छ भाषाविम्बम् + |
¬ ¦ ` नमह भवको खृष्टी कतं रजोगुन-रर्पतें
` भनवडु खड रच्छा-लागी खतो-गुन ङे रद ।
` नमतु हरे सहारे जो तमो-गुनते भर
भरयशुन-पुर तेजोरूपे शिवाय नमो नमे.॥ २० ॥
छृरापरिणति चेतः द्ेदावशयं क चेदं `
के च तव गुणसीमोष्टद्किनी रारवदाद्ः ।
इति चकित ममन्दीद्कत्य मां भक्ति राधा-
दरद् चरणयो स्ते वाक्यपुष्पोपहारम् ॥३२१॥
ॐ सधुतूदनी टीका % ` `
एवमस्तुस्यरूपेणेव ।भगवन्तं . स्तुत्वा स्वस्यौद्धस्यपरिदारं नम
त्वेतां वाणीम्! शत्यजोपक्रान्तमुपसंदरन्नाह-- `
#हे षरद्# सवमीषटदेव्यु पसंहार योग्यं सबोधनम्। तव पाव्-
यमद्यक्यपुष्पापहदार भाक्तराधात् त्वाद्कषया रातरपिंतवती । यथा
1
+
उष्पाण मश्चुकरभ्यः स्वमकरन्द् प्रयच्छनत्यन्येषामपि दूरात् गन्ध
मराज्रण , अरमाद्माद्धति .तथेतानि स्तुतिरूपाणि वाक्यानि भ-
क्तिरसिकेभ्यो भगवन्माहार्म्यव्णेनाश्तरसं प्रबच्छुन्त्वन्वेषाम
संस्कृत-भाषार्सकाभ्यां सवरितम्- १७७
पिः श्रवणमानेणापि वस्तुस्वाभाव्यार्खंखविश्चेषमादधतीति -च्वन-
गितं क्षपयितुं वाक्पुष्पत्वेन निरूपितम् । तथा च वाक्या-
नवेव : पुष्पाणि तेरुपहारः पूजाथमञ्जलिस्तमित्यथः । किं ङत्वा
आधादित्यनेनः हेतुना चकित ` भोतं स्ततेनिवतेमान माममन्दीः
छ्रत्य न मन्दममन्द कृत्वा । बखार्स्तुता प्रवत्यत्यथेः। तथा ` चन्य-
मस्या परचत्तस्य मम स्खलितेऽपि क्चन्तञ्यमित्यभिप्रायः । इतिशब्देन
सूचितं भयक्रारणमाद-ङक्षेत्यादिना । कशा अल्पा परिणतिः परि-
पाको यस्य -त्तथा । अट्परविषयमित्यथैः। तादृश मम चेतञ्धित्तं
ज्ञान वा। तथा कंठेरानामरवियास्मितार(गद्धेषाभिनिवेशानां वदयमाय-
तम्। सवैद्ा रागद्धेबादिदोषसहखकषितमित्यथेः । छरेनातिभरयजे-
क्न वदयमिति वा तेन त्वहुणवणेनेऽत्यन्तायोग्यमित्यथैः । गुणानां सीमा
सख्यापरिमाणयोरियत्ता तामुच्छङ्यिषः शीर चस्याः सा गुणसीमो-
लद्किनी श्षदवशद्धिः नित्या विभूतिः । तेनैतादशदुवांखनासदसख्रकलु-
परित मिष्यदेपविषयं मम मनः क, अनन्ता नित्या तव परमा विभूतिवो
क्र इस्यत्यन्तासंभावना मम भयहेतरित्यथैः । एतद्वधारणे च तच
तफर्दानेऽपि सामथ्यं
: [सि
4 क
त्वया त्वद्धिषया भक्तिरेव ममेहीपनीयेति वाक्यतात्पयाथैः ॥ ३९॥ ~
( वरद ! ) दे वरदायक! ( छडशपरिणति ) अव्यसपपरिपाकशीक
( क राव्यं ) डुःखाधीनं, अथा . पातञ्जकदरोनोक्ताः पञ्चङ्गेशाः य-
था-“ अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः केशाः । | साधनपाव्रस्-
त्रम् ] तत्र अविधा-विद्याविरोधिनीः विपरातज्ञानमितियावत् १।अ-
स्मिता--कताहं, मोक्तादमिदयादभिमानः, २ । रागः. खलसाधनेड
वुष्णारूप इच्छाविदाषः ३। देषः-दुःखलसाधनयु निन्दात्मकः क्रोधो
घेरभाव इव्यथः ७। भिनिवेशः-अलुभवसिद्धेरपि मरणादिभिभ-
यखश्ारः ५। तथा चोक्तमपि करूमेपुराणे प्राह्मी सिताय उन्तरभागे
लतम ऽध्याये--यथा ~ ` र“ लि |
“अविद्यामस्मितां यागं देषश्चाभिनिवेश्नम् 1.
्ेराख्यं स्तान् स्वयं श्राह, पाशानात्मनिबल्थनात् ` ॥२९॥ इतिः
१४८ , , सिवमदहिन्नस्तोतरम् ।
--पतेषां पेञ्चङ्केरानामायत्त ८ इदं ) मदीयं; ( चतः ) अन्तः करणं
(चक) पुनः कुध्रास्ति अतिश्चीणविषयमित्यथः। एवश्च ( गुणसी-
माल्छाङ्ना ) गुणमय्यादापारगामिनी ( शदवत् ) अविनारिनी निः
त्येत्तिवा । ( तंव ) भवतः ( ऊद्धिः ) :विभूति्महिमा चा (क्.चः)
तथाच कुत्रास्त । अथाद्धवन्माहेमाः तु ' नित्यत्वानन्तत्वादिगुणावः
च्छिन्नः; मदन्तः करणश्च बहुविधदुवोसनादिकटछषितं क्रा रीभूतः
` मिति कथमुभयोस्तारतम्य भवेत् £ (इति ) अनेनैव हेतुना ८ चः
कितं ) अतीव भरन्त, भीतामदयथेः. ( मां, अमन्दीङ्कत्य ) न मन्दम-
मन्द् कृत्या; प्रास विहीनं क्धिाय; ` बर देवः स्तवनकर्मोणिं नियोज्ये
त्यभिप्रायः ( ते चरणयोः ) भवतः पादयोः ( भक्ति; ) सेवा यथोक्तं
गरूडपुराणस्य २२९ अध्यशय-- ` “` +
1 ^सज्ञ इव्येष वे धातुः; सेवायां परिकीर्तितः ।`
तस्मात्सेवा बुधेः प्रोक्ता; भक्तिः साधनभूयसी
प्वञ्छ पूज्येषु अजरागातिखय, पव मक्तिरर्थात्-“नदीष्टदे वात्पः
र्मारेत 1कञ्चित्-' इति बुद्धिव्याप्ता चित्तव त्तिरेव पराभाक्तिः। य
थोाक्तमस्मद्रोप्रवत्तकेस्तव्रभवद्धिमदर्षेशाण्डिल्याचार्ययै,- “भक्तिः
सून्ा- ख्य प्रस्थ अदावेव" अथातो भक्तेनजिक्ञासा१९। सा पराः
खर क्ति रोश्वरे ₹-''शति। भक्तेमाहा्भ्यवर्णनादिकं श्रीमद्धगवद्री-
ता-- भागवतादिषु तथान्येष्वपि पुराणादिषु सर्वत्रैव यथावदूद
नीयं विस्तरभथाक्षदोछिख्यते। सा भाक्तेरेव ( वाक्यपुष्पो पहार )
` वाक्यान्यव काथेतस्तुतिषद्यान्येव पुष्पाणि तेषासुपहारः पूजोपा-
यन तं ( आधात् ) प्रत्यपेयदित्यथे; । तेनेतदवधारणे भवतो भक्ति-
रव कारणमित्याख्यातम् । अत्र भाक्तेमदिम्नेव स्तोतृत्वमुररीश्त्य
भक्तेरेव सवेथाऽसम्भावितफरुदावत्वसामर्थ्यमस्तीति प्रकटितम् ।
तथाच मद्ायापराधपुज्मविगणस्य स्वौीयपाद्भक्तिरव मद थेमु-
हीपनीयेति च ध्वनयति वाक््यतात्पय्यांथेः तस्मात्-
धया भीतिरविवेक्ानां, विषयेष्वनपायिनी ।
त्वामनुस्मरतः सा मे; हदयात्मापसपतुःः
[ षिष्णुषुराणे-अ० १ अ० २० दरो० १८ उक्ता ] इतिरूपा भक्तिः
धराथना च स्फुरङूता स्तोत्रोपसंहार इति । मालिनीचुत्तमेवेव्यतः
कचतु पयय्यन्त-तट्क्षणन्तु--“न-न-म-~य~य-युतेये ` मालिनी
संस्कत--भाषादीकाभ्यां सवलितम्- १४९
मोगि-खोकै-''रिति चृत्तरल्लाकरोक्तमेवेति ॥ २१॥
3 = सस्कृतपद्यालुवादः +
क्त मे चत्तः शम्भो ! रङापारेणति ङरवरागः, (
सञ्द्धिस्ते नित्या कचन गुणसीमान्तकरणी ।¡. ~ , 5
हतीदा ! चस्तं मां-तव चरणयोभेक्कि रकरो-- 7 `
::; -दमन्दीकृत्येव वचनकखमाभ्यचनविधिम्॥ ३९ ॥7 ` 7:
"ॐ नाषायीका- ०
( वरद {-) हेवरदायक !; ( केशवदय-)- नानापभरकारके राक
धीन (च). मौर ( रशपरिणति ) अति.क्षीण. परिणास ` वादा अ:
थौ त् स्वट्पविषयक ( इद् ) यद मयाः ( चेतः क {)-चित्त--कदां
अर ( गणखीमोरुङ्किनी ) गुणों के, सिवानाको- नाघजनवाी
( शश्वत् ) सदा वतेमान रहन वाखा, अथात्. अविनायी ( तव
ऋद्धिः च क १)-आपक माहमा -क्वा विभूति. का? ( इति.)
इसी कारण से ( चकित ) घवबरायं इष् अथवा: उरते इट (मा) सु
को (-अमन्दीृत्य ) ढीठा बनाकर ( तं चरणाचा; भाक्त ) आप
क्रे चर्णोकी भक्ति ने ( वाक्यपुष्यापहयर ) वचन रूपा -पुष्पास्र पू,
जनका उपद्ार ( आधात् ) रक्ला, वा समपण कराया । ` अभिप्राय
ह किं आपकी अलुलनाय महमा को देखता.इअआ अनेक प्रकारक
दुरवासनाञओसखे कषित अर समय मेरा, चित्त भापके गुणगान
करने बहुत डरता था पर आपदीके, चरणा की भक्तिने टदादट्स
देकर यह वाक्यङूपा पुष्पका ; उपहार [ नजर } आपके चरणो पर
रखवाया दै.अथात्. कवक आपकी. भक्तक भसोसे "यह मदिन्न-
स्तोत्र रचा .गया दै--वास्तवम् ९ स्तो कं भरत्येक ` पदमे भाक्ति
रसकी धारा वह रहा हे-क्याके जस फू भवरा-को. अपना रस
खलति ओर दुसरे रागाकाा दुरदीसे अपन खगन्धसे -आनाद्दित
कस्ते, वेखेदी इस स्तो के: वाक्या मा्तिःरसिक भक्त, जनको
तो मयवान की महिमाके वणेन रूप अशत रसको पिरुतेदी दं
यर दृखरेभी खुननेवाङे रोगा का कविताके. ्रसाद-माथुयौदिशणों
तथा अर्थोकी ग्मीरता-ओर विेषतः. श्वतिमश्चुरतान्ते परम सा-
हृहादित कर देते है--अथवा अजालेम लेन से जेस एल दोनो हाथों
१५० - शिवमहिभ्नस्तीत्रष् ।
को पक समान सुगन्धित करदेता है जेलाकि कहा है “अंजलि गत
सुभ सुमन जिमि सम सुगन्ध कर दोय । ( तु० रा०) वैसे ्स
स्तो के वाक्य भी पाठकरने वाके मुखः ओर हृदयको शुद्ध
करदेते ह-यहां रूपकालकार हे । भाव यह. कि-भक्तिदीने आप
के चरणो पर वाक्य पुष्पोपहार चद्ाया दै-ओर आपं वरदायक हैँ
अत पव वर देकर उस भक्तिहीफो अचला : बनादीजिये । भक्तिके
विषयमे प्रधान श्रन्थ भगवान् शांडिस्याचायंका बनाया इुआ “भाक्त
सूत्र” है-दसके अतिरिक्तं भगवद्धीता भागवत रामायण अथवा
अटारहौ पुराण ओर उपवुराणादिकों मे केवर भक्तिदीकी मिमां
भरी हुदै है अधिक उदाहरण इस ऊरी. खी पुस्तिकामें नहीं लिखे
जा खकते कयाकि विस्तार ( वदृजाने ) का भय है तथापि दिग्दशौन
मात्र करादिया जता है-यथा~
“जाते बेगि द्रवो म भाद्र, सो मम भक्ति भक्त खखद्ाई।
. सो स्वतत्र अवरंब न आना, जेदि आधीन क्षान विक्ञाना-
_ ~ इत्यादि (ठ०.रा९)
इसके नवाभेदभी स्वयं रामचन्द्रे शवसीसे कटे ह यथा -
नवधा भक्ते कह तोहि पादी, सावधान खनु धर मन मादी ।
प्रथम भाक्तं सतन कर सगा, दुसरि शति मम कथा प्रसंगा। `
गुरु-पद पकज सेवा, तीसरि भक्ति असमान ।
चोंथि भक्ति मम गुनकथन, करे कपट तानि गान ॥
मजजापं मम दद् विस्वासाः पंचम भजन सो वेद् प्रकासा ।
षर दम खीर विरत बहु कमी, निरत निरतर सज्ञन धमी ।
सत खव सुह मरय जग देखे, मोत संत अधिक करि छेते ।
अठ यथा खाम् खंतोषा,-सपनेह् नदि देस पर दोषा ।
नवम सर संबसां खरदीना, मम भरोस हिय हरख न दीना । `
नव महं पक जिन्हके होदे, नारि पुरुष सचराचर कोई ।
सोद अतिखय श्रिय भामिनि मोरे, सकर प्रकार भक्ति दृढ तोरे ॥*
"1 _ त्यादि ( वन्य०)॥
1. + भवषापयनुवादः #& ` ` |
प~-विषय यह चित्त क, महाङ्केस आधीन । `
कहे गुन-सीमा काघती, तुव महिमा अति पीन ॥
सङृस्त~माषारीकाञ्या सवङितम्- ` १५१
इमि सोचत रखि (अति ) चकित सुह, करि भ्रचुत्त तुष भक्ति!
वाक्य पुष्प उपहार द्य, चरन. चद विन सक्ति ॥३९ ॥ .
> ज “ दै भाषानिम्बम् 49. ¦
रबर पारिनामा है करदा चित्तदुन्ली,
कर्द तुष गुन-सीमा नोघंती है सचद्धी। ` `
दहि विधि डर खाते भक्ति दीन्दी सदारा, `
धरु चरन तोरे बेन-पू्लोकि माला ॥ ३१॥
असितगिरिसमं स्या त्कञ्जलं सिन्धुपात्रे
५ ` [9
सुरतरुवरशाखा रेखनी , पत्र मुवीं । `
= हि + 1: गृही }त © र
लिखति यदि ग्रहीत्वा शारदा सवका _ `
तदपि तव गुणाना मी पारं न याति ॥३२॥ ` ¦ -
क संसतटीकाश्रूः ~.
( हृदा ! ) हे सर्वसमं ! भवतो गुण किखनाथ (चिन्धुधाज) स
भुद्ररूपायां मलिधान्यां ( असितगिरिखम ) नीखचख्लुस्व ( कज-
टं ) मसी ( स्यात् ) भवेत् । तथाच ( खरतख्वरशाखा / कर्प
चस्य महती राख ( टेखनी.) कर्मः स्यात्-लिलधाता ट्यु्, त-
तश्च ङिष् । पवं ( उव्वीं ) पृथिवी ( पत्र ) छख्यपन _ भवत् । प्तः
दृक्तरूपं सर्वमुपकरणं ८ शदीत्वा ) धत्वा खुसजीकृत्येत्यथः (रा-
गी देवी- उ्यरपत्तिस्त “तिथ्यां दितच्वो” ˆ क्तैव
रदा ) सरस्वती देवी-अस्या व्युरपात्तस्वु ` ः
क्षया, य | (४4 + अद 2
“शरत्काले चुरा यस्मान्नवम्यां बाधिता खुरः । |
. क्षारदा सा समाख्याता, रोके वेदे च नामतः ॥ * इति ॥
( यदि ) चेत् ( सवेकाल ) अयुक्चषण ( चिखति )-“लोडथलक्ष-
त. च” ३। ३। <-इत्यतो कट् । ( तदपि ) तथापि ( तव ) भवतः
( गणानां ) ुणगणगणनानां ( पारं ) अन्तं सी मानमिति यावत् नेव
आच्छतीति । अत्र सिन्धुरूपमसिधान्यां नीरुगिरिं कञनरं कृत्वा क
दपन्रश्चक्लाखया टेखन्या समस्तभूमण्डलरूपे पत्रे स्वय भगवती वा-
देधी यदि प्रतिक्षणमपि भवतो गणगणनाङिखनप्रसङ्खे समुद्युक्ताः
= ५२ 1 हशिवमहिन्नस्तोत्रम् । ;
पयरखमथ्व भवात चत्ताह का कथास्माष्टशां पामरपुङ्गवानामिति
स्तात्रपरात्तरूपादेष्ठा.1. एतावदेव महिम्नस्तो्रमेतदग्रे च स्तोत्रस्य
कठृनाम-फखाद्क निगद्यते, बृत्तवातो तु पूर्वाक्तेवेति ॥ ३२ ॥
छ सस्छृतपदयानुवादः + ॑
शम्भो ! भवदणव पव पाचनं, मसी भवेनाठमिरिः समस्तः ।
स्याट्टेखनो कल्पतरोश्च शास्म, पन्न प्रकीर्णा प्राथती समन्तात् ॥
विहाय वौणारटनादिकृत्य, मचुक्चषण स्याह्ठिखने प्रब्रत्ता 1
नायस्दा नति तथापि पारं, भवङ्गुणानां करूणाम्बुरासे ! ॥ ३२॥
०
ध भाषा टीका
(इर ! ) हे सप्रसमथ। [ आपके गु्णाके लिखने के स्यि ¦
( सिन्घुपाञ ) सखुद्ररूप मसादानी [ दावात] में ( असितगिरि-
तम कञजल स्यात् ) नीरुगिरिके समान कारिख [ रोरानाई ] दो
च । जर् ( खुरतरुवर शाखा ). कल्पवृक्षकषी भारी डर ( लेखनी )
(ग द, चाही ( उवौ पते ) शथिवी मेडल पत [ कागद् ] देत
(यदि ) जो [अगर इन सबको ( खात्वा ) लेकर ( शारदा )
५ सरस्वती वेवी (सैकां ) हरघडी ,( छिरति › खलती
रद ( तदपि ) तोभी (तव गुणाना ) जपके गुणोके [ महिमके 1
जासकता- भाव स्पष्टे कि खमुद्रको
खपत्रतकां करञ्ज ` वनाव, . ओर कस्प-
कर शस भूमडल रुप- पञ्च पर स्वय
क. गुणका गणना छि तोभी- पार नः
छद्ररागांके साधारण साम्नी ठेकरः
इश्लक्ाःशाखराको कलम. व
6 द्वा पातिश्चण आप
दा पासकती-तव हम पेते
[ @द >~.
कह आये दै-ष्नक
यहां पर शारदका
मे इतना भीखिल
€ हदे-यथा-~
भक्तं हेतु. विधि भवन विहार, खामरत सार द् आवत धई । `
रह भात जन गुन गाना, कलिर् धुनि गिरा खगति प्रिताना ।
प ~ थ 0 9 क
ह्रः "~ ~
^-^ ~,
संस्छृत-भाषारीकाभ्यां सवर्तिम्- -१५३
-हृदय सिधु मति सीपःसमाना, स्वाती सारद कहां खजाना
-- ञ्ची घरे चर वारि विचारू होहि कवित सुकता मनि चारू 1! ¡ `
५ इत्यादि ( त° रार)
+ भाषाप्रयानुवादः +
मसिद्रानी अनव वने, मसी नीक-गिरि होय 1
कर्पनरच्छकी साखके, वन ठेखनी जोय ॥ ¦ 1: ; ¡ त
.- छिन अमित पञ थे,.लुमरो युन. दिन -रात॥ ~ : नकः
~ पावति पार न सारदा, ईश | अत रहि जात ॥.३२॥ ` `:
10039 29 +
=+ भाषाविम्बम्
` जलनिधि मसिद्ानी नीट सकमसाष्ी
` ' कठप दुरम ( विरि ) साखा लखनौ प भूमी । `
` लिखि लद्पि खकं सारदा नत्व तासाः.
तदपि तव गुनोके नाथ ! पारे न.जातीं ॥ ३९॥
<=
॥ असरसरमनीन्् रचितस्य न्दुमोटे- ` `
` अ्यितगुणमहिघनो निर्गुणस्य खरस्य । ` = ` '
, ` सकलगणवरिष्ठः पष्यदन्तामिधानो = `
रुचिर मख्घवत्तंः स्तात मेत च्चकार ॥ ३३ ॥
। छ सस्छृत धका & ` `
( अखरखरयुनीन्द ):; दानवदवसुनिश्चषठ पाताङस्वगभस्येखो
कनिवाक्षिभि श्सवरबरल्यथः ( अर्चितस्य ) पूजितस्य । भगवतः
( दन्दुमोटेः ) चन्द्रदखर्दवस्य ( श्रथ॒ततयुणमाहम्नः ) - प्रथिता
गुर्फिता गुणाना मे्वय्यादीनां सादेमाना यस्य सख भ्राथतगुणमाह
मा--तस्य ( निगणस्य ) निुणस्वरूपस्यैव ( इद्वरस्य ) विद्व
हवरदेवस्य .( पतत् ) कथ्यमान कथितं वा परम्रमनाहर ` रस्य वा
( स्तोन्नं ) नाम्ना माहेर्नस्तान ( सकटशगुणवार्ठः ) अरोषशुणक्रः
लाभः श्रेष्ठताङ्गतः। काचत्-सकरुगणवास्छ दत्यापे पाडा दश्यते
( पुष्पदन्ताभिधानः ) पुंष्पद्न्तनामा काचः ( अलघुबृत्तेः ) अन-
ट्पाक्षरेः शिखरिणी-हरिणी--मालनोछन्दामिः ( चकार )
२५
१५४ ` 1 शिवमाष््नस्तोत्रम् | ~
अकार्षीदिति । अन्नादो स्तुत्यनामोह्खनयपुरस्सरं स्तोत॒नामादि छि-
खनं शिष्टाचाराचुमतं खवप्र्िद्धमेव । इत आरभ्य स्ताचसमासिपय्यै-
[ क
न्तं रिवरदस्योक्ता फल स्तुतिरेवति विज्ञेयम् ॥ ३३ ॥
। . ॐ रंतययाचुवदः श्र
न [1 [#५ *
समस्तदेवांखुरयेगिच्रन्दे, रभ्य्चितस्ये न्दुकलाधरस्य।
महामहिम्ना गुणगुभ्फितस्य, गुणे विंक्ानस्य मेहश्वरस्य ॥
पतत्छृतं स्तोत्र मनस्पहृत्ते, मनोहरं चुण्यवचः प्रत्तैः ( युक्तैः ) ।
गुणः प्ररे चंहुशस्स्त॒तेन, धीपुष्पदन्ताभेधकोेदेने ॥ ३३ ॥
| - > <+ माषा-रका ई | |
( असुर खुर सुनीन्देः अचितस्य ) अखुरदैव्यराश्चसादि जसे
घाणाखुर रावण पश्चि, खुर-ब्रह्मा विष्णु इत्यादि, एवं सुनीन्द्र-शि-
वतस्वके ज्ञाता दधीचि वसिष्ठ इत्यादिक मद्यो से पूजित ( इन्दु-
मोः ) भगवान् चन्द्रमोलि ( ग्रथितशुणमदिद्लः ) गुथी गद हैँ
गर्णोकी महिमायं जिखसकी-पेसे ( निशणस्य इदवरस्य ) नियण~स्व-
रूप परमेदवरका ( पतत् सुचिरं स्तोञे ) यह बहुतही सखुल्द्र वा
मनाहर स्त (६ ( सक्रूगुणवरिषः ) समस्तगुणोसे [ गणो ] श्रषठ
( पुष्पदेन्ताभधानः ) पुष्पन्दन्त नामक ` कवचिने (अरघुृत्तैः )
बड बड छन्द्। द्वारा ( चकार ) निमाण किया । इस ऋछोकभे पदिले
ही अखुरशब्दकं रखनेखे यह् सूचित किया कि उरलोरमोकी अपेश्ता
अघुरगण विरोषरूपसे महादेवके सेवक पह क्योकि विचार पूवक
देखनेसे विभीषणादि दो पकको छोडकर खभी दैव्यराक्षसखादिक
कट्टर शैव जान पडते ह । इसमें अशुर खुर सुनीन्द्र-द्न तीनों पदौसे
पाता -स्वगे ओर मव्यखोकके रहनेवाखोका अभिधाय प्रक है
अथात् बेखाक्यमामे भगवान चन्द्रखरः पलित द-इसीसे लिङ्ग
पुराणम यह भी कदा हं कि पाताखमें चरण, मस्थलोकमं जिङ्् ओर
स्वगं मस्तक श्रीरिवजीका पूजाजाता है-सी लिये मेरे पूज्य
पूवे पुष पाण्डत रामानन्द्चिपाटीजीने एक स्थल पर यदह
चिता दे कि- |
"न चक्राङ्का न पदूमाङ्का, न वच्राङ्का यतः भरजा।
लिङ्गाङ़। च भगाडूम च, तस्मान मादेदवरी प्रजा ॥"
संस्कृत-भाषारीकाभ्यां सवखितम्- १७५५
अथात् हस खष्टिमै चक्र पद्म अथवा वञ्ञका कोर ` चिन्ह नकौ
पायाः जाता अत्व विष्णुं बह्मा किवा इन्द्रकी यह खषटि न्दी हे,
इसमे लिज्ञ ओर भगहीके चिन्ह विमान होने से यह महिदवरी
खष्टि हे- इससे यह सिद्धः है किः खष्ठिमाच्रके कारण होनेसे ` भग
वान विदवदवर सखी खाकवाखियोसरे एजित है उस भी मत्येखोक
निवास्तिर्योके तो पकमाच्र आराध्य देव है, दखोकका-ओर सब भाव
अच्यन्त स्पष्ट हे । | + अनार्य) ।
` भाषा पद्याचुवादः + {६
देव अस्वर सुनि~पूञ्य पद, चन्द्र मौलि विस्वेस ।
गुन मिमाति म्रथित पे, निगुन दैस्वर वेस ॥
खेष्ठ सकर गूनं भयो, पुष्पदन्त अस नाम ।
अलघु छन्दस खचर यद, वश्च्वा स्ता खटाम ॥ २३ ॥
क भाषाबिम्बम्
अखुर-खुर-मुनीके पूज्य जो ( ह ) चन्द्रमोली, .
शुथि शुन महिमाके निन देदवरे की । |
सव-गुन -गन-पूर पुप्पदन्ते कातो
खंचिर अलघु छन्दौ-मे स्तुती कों बनाया ॥ ३२ ॥
[गिरिं
` अहरह रनवदयं धूजटेः स्तोत्र मेत ;
: .त्पहति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमा न्यः ।
` स. मवति. शिवलोके. शद तुल्य स्तथा नः (सदात्मा)
परचरतरधेनायुः पुत्रवा न्कीतिमां अ ॥ ३४ ॥
+ संस्छृत का +
(यः) कशचित् ( पुमान्.) नरः ॥ तन नारीणामन धिकारो महि
-नस्तोच्रपष्ठिः लोकसिद्ध .( शद्धाचत ). सन् पएक्राम्रमानसो भू
त्वा (पतत् ) पुष्पदन्तकथित ( अनवद्य ) उत्तम नद्ावामरदयथः
( धूजटेः ) महादेवस्य-धूभारभत) जाटेजरखा यस्य, तस्य । जट
ह्चट सघाते [ भ्वा-प-स° । ^सवधातुभ्यः''-8 । ११८ उणा०-इतो-
नप्रत्ययः । “धूजेटि नी खकोषहितः'' हत्यमरः । ( स्तात्र ) दतत ( अ.
१,५९६ 7 ` शिवमहिन्चस्तोत्रम् |
रषः ) प्रेति `: दिनं ` नित्यानियमानुसारमित्यथेः ( पठति ) पा.
ठ कराति ( सः ) षाठकत्ता ( सदात्मा ) सव्यात्मा सहात्मेति या-
बरत्। अथवा सदिति उपलक्षणमेतत् तेन सच्िदानन्दमयत्व सहनीयं
( शिवलोके ) ख्द्रावासे ( श्द्रत्रस्यः ) रिवकगणसमानः (भवति )
तथात्र इत्येव पाड पव प्राक्तनैः स्वीकृतः; सदात्मेत्य्र । तद्धदर्सिम-
छ्छोकरे ऽपि ( प्रचुरतरधनायुः ) अव्यन्तघनश्ाङी पव परमायुष्परान्
तथा ( पुत्रवान् , कातमश्च ) वकता, दढकातश्च जायते। अ
था देह सांसारिक मि :धनायुःपुन्नका्यादिसुख मचुभूयान्ते ख
द्ररूपण शिवलोके निवसतीति स्तोजपाठस्य फलमेव याथाथ्येन स्प-
शा तामेति । चृत्तमुक्तमेव ॥ ३४॥
+ संस्कृत पदानुवादः च
पटे त्परम्रभक्तिमान् य षह शुद्धचित्तः पुमान् , .
महेशागुणशुग्फितं स्तवन सुत्तमं प्रत्यहम् ।
भव त्स.रदवपत्तन ( सान्नधा ) प्रमथसख्द्रतस्य स्तथा
यद्याघनस्तायुषवा प्रज्खुरता कमता षना॥ ३४ ॥
+ भाषाटीका ॐ _ _ |
( यः शुद्धचित्तः पुमान) जा कोई - मनुष्य शुद्ध हदय होकर
( एतत् ) इस (अनवय) दोषराहित ( धूजरेः स्तो ) महादेवके स्तो
धका ( परमभक्त्या अहरहः पठति ) चडी भक्तिकं साथ प्रतिदिन
पडता ह (स, -सदात्मा) बह महात्मा (-हदिवलाके ) मदादेवकं
खक अथवा कैटासपर ( खद्रतुट्यः ) रुद्रनामक मुख्य गर्णोके
समान .( मवति ) हाता हे, तथा च दस लोकम ( रचुरतरधनायु
नवान् क्ातमराच् च ) बड़ा धनी चिरजीवी एवं पुत्रवान् तथा की -
तश्ारा होता ह्-इस "क्का भाव परक हे-्समें अचपाठका
जा फट छिखा हं अनुभव करने बहुत डौख उतरतां हे-उसमेभी
चरा चलनक ख इस स्तात्रका पार विक्ञेष फटदायक सम्या
जाता दे-दस ऋछाकमे 'सदात्मा कं स्थान चर 'तथान्ञ पदका पार
ग्रा्चीन है
| (ह छ भाषापयानुवादः +
प्रतिदिन पडत महेसको, जो असतो अनूप ।
खुडाचत्त हे भक्तिज्त, सो न परत भव-कूप ॥
सस्कृत-भाषारीकाभ्यां सवङितम्- १५७
होत सशथरुके खोक्रम, सो नर रुद्र समान ।
रहत विपुर घन आयुःजस-पुवादिक सुख मानः॥ ३४ ॥
=+. भाषाविम्बम् +
` + प्रतिदिनं नर जोई धञजरी स्तोचदही (याः) को
पदत धरि खुभक्ती-खद्ध अन्तः-करन्-सो) 7, 1
वह वपुर माही रुद्रके ठ्य हाव 11
जग बह धन.आय॒ पुत्र कीत्यादि पवि ॥ २४.॥
महेरा न्नापरो देवो महिश्नो नपरा स्तुतिः ।
अघोरा नापरो मन्त्रो नास्ति तच्च गुरोः परम् ॥३५॥
= संस्कृत टीका ` ५
( महेशात् ) महदेवातं ( अपरः ) एभन्नः कश्चित् (देवः) खुरः
(नः ) नास्त । तथच ( महहम्नोऽपसा ) माहेस्नस्ता्ायन्ना अन्या
(-स्तति;) आपि( न) नास्ति । पव (अधोरात् ) अघारमागात्~
यथाः चोक्तमपि वेदे रुद्रपाठे-यात रुद्र | शिचा तनृरधारा पापः
ना्निनी-'' इति तथाचाघोरपूजाप्युक्ता काचर्स्खत्याद् डया.
'"भाद्धे मास्यसिततेः पक्षे, अधोराख्या चतुद या ।
तस्यामाराधितः स्थाणुःनेयेच्छिवपुर चवम् ॥
अध्ोरमन्मस्तुः“ॐमघरेभ्योऽथघार भ्या घोरधघारतरभ्यः। सवभ्यः
स्चरार्यभ्यो नमस्तेऽअस्वु रुद्ररू्पश्यः। "अस्य मन्स्य माहाटम्यम्
विल्चिषरूपण टङज्गमहाषुराण द्रष्टव्यमिति ॥ (अपरः) -पथकर् अन्यावषा
( मन्बः,).जपा र्क्षप्रलिद्धिमदः (न ) पवमव श्री (गुरोः पर) अ-
किञ्चित् ( तस्व नास्त ) तथाचाक्तम्। , ~ _
, ¦ ' . (जरुर बह्या गुर विष्णु गुर दवा महइवरः (> -
~~! शुरूःसाश्चा त्पर ब्रह्मःःतस्मि श्चायुरतर नमः > 2-1:::
स्पष्टोऽज सवाय इति ॥ ३५॥ . +:
काः ॐ रर्कृतपदानुवादः ध
महे दवा न्नास्त्य परो हि देवः, ; : ` `: व
स्ति मेदिम्नोऽप्य पया न कावित् । क
#
|
१५८ 1 ` शिवमंहिन्स्तोधम् ।
अधोरकट्पा (-मन्त्रा ) दपरो न मन्बो, ( मयुर्नो )
शुरोः पर तत्व मिहास्ति नान्यत् ॥ २५ ॥
॥ २
छ भाषा टीका %& `
( महेरात् अपरः देवः न ) महादेवे भिन्न को दुसरा दवेता
नहा ह-अथात् सभा उन्हकं अदा--रूप है अतः उनसे टकर द:
सरा का३ नहा ह । ( महिम्नः अपरा स्तुतिः न ) महिम्नसे बढी चढा
दसरी काद स्ततिभी नदीं हे । ( अधोरंत् अपरः मन्बः न ) अधो
रस बङ्ा काद मन्रनहा द-इसो अघोर मतम सावर भन्वभी दै-
यथा
काढ वतखाक जग हत हर गारेजा,
सावर मन्ध जार जिन सिरिरिजा ।
अनभि आखर असथन जा
पुराणाक्ष्कमिं पाया जाता हे।
` भाषाप् यानुवाद्
सिवसम अपर न देव कु
हसनसी स्तुति नोहि ।
;¶1 धरसामन्न जग
९ १ १ सो पत्ति न गुर पर जंदि ॥ ३५ ॥
> 9०/51 । & भाषा निम्बम् व
महार्दवसा दवता, नहि माहम्नसो स्तो)
ना अधोर्सो मेन हे, गुरू तत्व सम कोत्र ॥ ३५ ॥
[भ
दक्षा दानं तप स्तीर नान यागादिकाः क्रियाः ।
महिन स्तवपाठस्य कलां नार्हन्ति षोडशम् ॥३६॥
दः मदुसूदर्नीटीका +
रभः स्तोचान्तगेताः सुगम श्चेति सवै भद्र
भचतु श्वुद्रधियामपीति यन्ञात्।
खष्चः साधुतयेब : रोधथन्तं ॥ १ ॥
एमे (२२-३६) छो
हरिदकरयारभेदबोधोा
इभयाथतया मयेदञुक्तं
म्॥
सस्कृत-भाषारीकाभ्यां सवलितम् । १५९
यल्लतो षक्रया रीत्या कलत हक्यं विधान्तरम्। `
यद्पीहः तथाप्येष ऋञचुरध्वा प्रदर्ितः ॥ २॥. ` 7८.
छो काचुपात्तमसिह न परसङ्गात्किचिदीरितम्ः।:. ¡ ` =
` ` : श्छोकोपान्तमपि स्तोकेरक्चरेः प्रतिपादितम् ॥.२॥
महिख्न ख्यस्तुतेव्योख्या प्रतिवाक्यं मनोहरा ।
ष्यं श्रीमहयोः पाद्पद्ययोरपिता मया ॥४॥
टौकान्तरं कश्चन मन्दधीरितः सारं समुद्धत्य करोति चत्तद्ा ।
रिवस्य विष्णोर्दजगोखपरणामपि द्विषद्धावमसौ भपद्यते ॥५॥
भ्रूतभरूषितददाय दिजराजन राजते।
एकात्मने नमो नित्य हरये च हराय च ॥.६॥
हति श्रीमत्परमदसश्रीमद्विखेखरसस्स्वतीचरणारविन्दमधुपश्रीमधुसूदन- ..
सरस्वतीविरचिता मरिश्नस्तातेव्याख्या सपूणो
= ~
+ संस्कृत दीका. ` | `:
( दोक्षा ) गुरुमुखादेव स्वेष्ठदेवतामन्ञग्रहण-यथाक्त- योगि-
नातन्न ~ ५1 | | 1:24
'“द्ायते ज्ञान मत्यन्त, श्चीयते पापसञ्चयः । ं
तस्मा हश्च ति सा प्रोक्ता, मुनिभि स्तस्वद्ाशाभेः- इत ॥
( दानं ) स्वस्वत्वपरित्याग-पूबक वितरण वनि, तदुक्त युः
द्धितच्वे' यथा- | |
०'अथौना मुदिते पाते, श्रद्धया प्रतपाद्नम् । |
दान मित्य भिनिदिष्ठ, व्याख्यान तस्य वक्ष्यते ॥ ईति-
(श्मीमद्भगवद्धीता्यां” तु साचिक-राजखस--तामसमदाच्रिविध
दानमाभिहित तद्यथा --९७ अध्याच-- शः र
[साच्विकं यथा-] “दातव्य मिति दानं, दयते ऽजपकारिणे।
देरो काठे च पा च, तदानं साच्िकं स्मरतम्॥**२०॥
(राजस -यथा-] “"यन्तु प्रव्युपकायथ, फक सुद्श्यवा पुनः
दीयते ख परिङ्किषठ, तदन राजसं स्म्रतम् ॥२९॥
[तामसं-यथा-] “अदेशेकारे यद्ान मपात्नभ्यश्च दीयते ।
असच्छत मचनज्ञात, त त्तामसख मुदाहतम् ॥ ` २२॥
१६? | ए! शिवमहिञ्स्तो्म् |
पवमव ूमपुराण'' त चवुचिघ दानं कथितं तदपि स्मर्तव्यम्
“नेत्य नेमित्तिकं काम्य, चिविधं द नसुच्यते ।
चतुथ चमक भर्त, सन्वदानोत्तमोत्तमम्'"-
कि `: इति + उत्तराधे-अ० २६।४॥
द्तषा लक्षणान तंजव दर ्टञ्यानि विस्तरतो नेह लिख्यन्ते । दानधमैवि
षय-दानकमलखाकर, नचान्द्रकाद्यो ग्रन्था द्रष्रव्या इति (तपः )-
रखा क्तावाधपरूवकङ्कराजनक कम तप दति कथ्यते। तपामाहास्म्यस
?अचपुयाणादिषु दयते, विशेषतस्तु “मट्स्यपुराणो क्त शेयं -यथा
तपामः.्राप्यते ऽभोष्, नासाध्यं हि तपस्यतः) |
ङभगत्व चथा खाक, वहते सति साधने-"इति। `
वमव _ ध्ामद्भगवद्भीतायां” अपि-रारीर-वाचिक-मानसिकमेदा-
वघ तपः काथतं तद्यथा ९७ अध्याये दरोनीयम्।
[शारं यथा) “देवद्धिजगुरमाज्ञ पूजनं शौच माजेवम् ॥ ५
नल्मचय्यं माहसा च, चाशरं तप उच्यत ॥१४१॥
चदधगक्रर चाक्यं, सत्ये भिय-हितश्च यत् ।
1 ^, स्वान्यायाभ्यसने चेव, वाङ्मयं तपं उच्यते॥१५॥ |
[मानसे, यथा] “मनःसा सौम्यत्वं, मोन मात्मविनिग्रहः। |
भातसशाद्ध रित्येत तपो मानस मुच्यते ॥१६॥
तद् त्वक-राजस-तामसमेदात्रिविधमेतदथ पव स्पष्ठीङतमत्र
प्वज्यतऽतस्तत्रैव द्रष्टव्यमिति च त्राथ्यत । (तीथ) -तरति पापादिक
वस्मात्तत्तीये तृ-ष्ुवनतरणयोः-- पातृतुदिवचरिचिसिचिश्यस्थः
९। ७ उणा० इति थक् प्रलयः । पुण्यस्थ(नादिकः।
तीथं शाखाध्वरक्ष्नोपायोपाध्यायमन्तिषु । `
अवतारषजचष्टाम्म स्रजः च चश्चुतम्॥ -कासुद्युद्धूतविदवकोशा ॥
प्व चं तौथमाहात्म्यं सलवपुराणत्रासद्धमपि काशीखण्डस्य षष्ठ.
भ्यायं विरोषरूपण द्रष्टव्य तथाच तनत्यमवद् पद्य यथा-
नावा द्द्भुताद्भूमेः, सछिठस्य च तजसा ।
परिग्रहा न्सुमीनाञ्च, तीर्थानां पुण्यता स्मृता” ॥ ७४ ॥ इति ।
( शानयागादिकाः ) तथादौ ल्ान- "मोक्ष धीज्ञानमन्यच्रं विक्ञानं
शिच्यश्याखयोः -दत्यमरः। "श्रीमगादरीता्याः तु पवसक्त--
अमानित्व मदम्मितव म्हिसा क्षान्ति राज्लबम् । |
आाचाय्यापासनं होचं, स्थेच्ध मत्मविनिष्रहः ॥ ७॥ |
[वाचिक-यथा] ^
संरृत-भाषादीकाभ्यां संवलितिम्- १६१ |
टृन्द्रिया्थषु वैराग्य मनहङ्ार एब.च । |
जन्मस्रव्युजराग्याधिदुःखदोषादुदशेनम् ॥ ८ ॥ ह |
असाक्त रनाअव्वङ्खः पुजदारगरहादिषु 1 :; ` |
नित्यश्च समचित्तत्व-मिशनेष्टोपपत्तिषु ॥ २. ॥ प
मयि चानन्ययोगेन भक्ति रव्खथिचरणी । ११
वि विक्तदेशसेवित्व मरति जेनससखदि ॥ २० ॥
अध्यात्मनज्ञाननिच्यत्वं, वच्वन्ञान।थदरनम् ।
एत उ्ञान भिति भोक्त मज्ञानं यदतो न्यथा॥**११॥ (१३ अऽ)
गरा त “मोश्चधस्म' एव वरू'वत तचथा--
(“एकत्वं बुद्धि-मनसो रिन्द्रियाणश्च सन्वेशः ~
आत्यनो व्यापिन. स्तातं ! ज्ञान मेतद चुत्तमम्'* शति ।
ततो यागो-यक्ञः, यथादामरः-“्यज्ञः सवो ऽध्वरो याग-"इति ।
स यागो बहुविधो भवतिः तच श्रौ ताभ्कृलहवियज्ञा अरन्याघानादय
स्त, स्मातान्निकृत्यपाक्षयन्ञा ओपासनार्दयः सक्तः #।ता्चसतल
स्थाः सोपयागादय, एवमुततरक्रतवस्तु महावर ताल यजत
य-पौण्डसीक-अभिलिद्-विद्वजिद्-अश्वमेधाद्या हव, च (तिना
दिमि ज्गीतव्याः। एवञ्च “श्रमगवद्वातायाः च चतुथं ऽध्यायऽप
यहयो यज्ञविधिवणनं तथाच सत्तर ध्याये साच्विकादेमेदच्रय
छग्यम् । पञ्चयज्ञाश्च भगवता मुना कता एव [ मचुस्खतो चतुथा
ध्याये २९१ चछाकः ।--
` (क्रपियज्ञं देवयज्ञ, भूतयक्ञ च सवदा ।
जयक्ञं पिवृयज्ञ ख, यथादाक्ति न हापयत्
धवमेव-दिवषुराण वायुसंदिताया खुत्तरभागे अ० १८ ° <
४"कर््यज्ञ स्तपोयन्ञा, जपयन्ञ स्तदुत्तरः।
१ 0
ध्यानयज्ञो ज्ञानयज्ञः, पञ्चयज्ञाः प्रकातताः' ॥
यक्षव्णनादिकं च मत्स्यदुखणस्व ११८ । ११९. अध्याययोः। प
क्रवुराणस्व-खृष्टिखण्डे ३१ अध्या तथाच कालिकापुखणस्या-
प्वे २० अध्याये, विस्तरशो द्रष्टव्यमिति । यज्ञस्यावदयकत्वन्तु मनु
स्मतिथगवदी ताभ्यां सस्मत सुप्रालतद्धमव-यथा--
“अभो प्रास्ताहुतिः सम्य गादिव्य मुपतिष्ठते।
११-४
आदिव्याज्ञायते ब्र्टि धृ्रन्नं ततः प्रजाः॥'इति॥
९१
१६२ शिवमदिन्नस्तोत्रम् 1
ज्ञानञ्च यागश्च आदिर्यासां ताः-ज्ञानयागादिकाः, अत्र आदिः
शाब्देन अन्यान्यपि वेदाध्ययनपरोपकारदेवमन्दिरनिम णसे तुबन्धो`
षधाङयस्थापनादीनि घमीचरण्णन्युद्धानि । ताः क्रियाः कमौणि (म
दिम्नः स्तवपाठस्य षोडरीं कलां नादन्ति ) अथौत् महिम्नस्तोच्-
स्य पाठन् यत्फर छसञ्यत तस्य षाडङखारत्वमपि एवांक्त-दीक्षादाना-
दकमाभिनव प्राप्यत इति ॥ ३६ ॥
@ सस्रत पदानुवादः +&
स्डुमन्चदाक्षा बहुरास्तु दानं, तपः कडार श्रु चितीथस्रवा।
लानाजन 1चश्रुतयज्ञकम्म-प्रधरत्यरष विहितं विधानम् ॥
वछस्म( मारस्नः स्तवपाठभू(ज {)ता, न षाड यतिकर कदाचित्
अता माहस्नः स्तवपार एव, काय्यः प्रयल्ला दप्वछराभक्तेः ॥ २६॥
छ भाषाटीका +
( देषा) ङ्सुलस अपने दष्ट देवका मचापदेदा म्रहण कर
ना-दोश्षा कदातीदे। यथा
सशुमन्न एदजवर मोहि दीहा,
खम उपद्रा वविधविधि कीह्ला । ( तु° रा०)
( दान ) अपना स्वत्व उठाकर दना दान कह
पकर चारि पद धर्मक {2 महं एक प्रधान।
यन केन विधे दीह, दान करै कल्यान । (त° रा०)
, ( तपः} शाखके कथन।नुलार कदा जनक क् तप कदे जति
द-यथा-
1 जाता ह, यथाः
करां दार साक फर कदा, सुभिरहि व्रह्म सच्चिदानन्दा ।
एनि हरि हेत् करन तप छागे, वारि अदार पृक फल त्याने ।
&।हाबाध बातें वषे षटर-सखरस वारि आदार ।
सवत सत्त सहस पुनि, रहे खीर अधार ॥ |
च सहस दस त्यागे सङः, ठाद रहे प दौड '” ( तु स
च क
तपक कदा ` जनक होनिले उसका करभी कच्मय दोगा ? भ
क नह! करना चादहिपे क्योंकि करा उरनेका कल खख मिन
"स्वन्षालद्ध हं ओर समस्त तपौका कर मनो ऽभिङषित वस्तुक
खभ हा कहा गया हे--यथा
दा
संस्छृत-भाषार्टाकाभ्यां संवकितिम्- १६३ -
“दुराराध्य पे अदादि मेख, आखतोष पुनि किये कटेषु ।
जौ तप कराह तद्यारि कमा, भाविदुः भरि सक पुरारी ।*
८ | ( त° रा० )
तपका माहात्म्य ओर फर्भी यो कहा गया है-यथा
“जनि आचये करहु मन माही, खुत ! तपत्त कछु दुखेभ नांदी ।
तपबलते जग खृज्ञ विधाता, तपवक विष्णु सकट जग जाता ।
तपवर संभु करहि सहारा, तपबल सेव धराहे महिभारा। . `
तप अधार सब शृष्टि रजरा, तपत अगम न कद्यु ससारा।**(तुऽरा०)
( तीं ) तीर्थं स्थान प्रसिद्ध ईं, कारी-प्रयाग इत्यादि तीर्था |
का माहात्म्य बहुत विस्तृत रूपसे पुराणादिर्कोमें पाया जाता है- |
अत एव इख धिषयको दंढलना चाहिए ्रथके विस्तार-भयसे विशे.
घ नरौ छिखा जाता।
"तीरथ वर नैमिष विख्याता, अति पुनीत साधक सिधि दाता।'
( ठर रा०)
. ( ज्ञानं ). शंदवरके ` समञ्चलनहीका नाम क्ञान हे-इस ज्ञानो-
त्पादनके छिये वेदांत श््यादि समस्त शाख जाल हे).गीतामें ज्ञान
निरूपण उत्तमरीतिसे किया हे । ग
“कहि खत सुनि वेद पुराना, नहि कु दुभ ज्ञान सखमाना।*"(तुऽसा०)
` ( यागादिकाः क्रियाः ) यज्ञ इत्यादि पविन्न कम यथा-
"व्रातं कहा मुनिसन रक्रा, निभय यज्ञ करड तम जाद् ।
होमं करन कनि सुनि श्चास, अपु रहे मलकीःरवाया ! (तग रा०)) ,
(महिम्नः स्तवपाठस्य षाडता कला न अहन्ति ) ये सव | पूबा-
क्त कम असन स्तोत्रके पाठको सोक! कलागमा यार्वता।
नही स्खते भाव यह कद्व महिम्नस्ते शक पाञसे जो फल मिः
टा हे इन पु्बोक्त दीक्षा-दत्याद्स उसका सकहन भागना फः
ट न्दी मिटसकता-अथोवत् रूपय पक जन भा नह। हासकतं ॥
& भाषापय्यानुवादः
दीच्छा दान सतीथै तप, ज्ञान मखा-दिक कम ।
छहदि न महिमन पाठक, करा सोखदही भमे॥ ३६॥
१६४ रिवमदहिन्नस्तोत्रम् ।
2 कलः + माषाविम्बम् श
द्र्च्छा दान तपा तीथे, ज्ञान जक्षादि कममी ।
[क्ख ५. एद् य ४ > [९
परहिभ्न पाठके आगे, करा दै सोर नदीं ॥ २६ ॥
(१)कुसुमदद्ननामा सवेगन्धवेराजः
रिरारारिधरमोे रदवदेवस्य दासः ।
स खट निजसदिख्रो भ्र एवा स्य रोषा-
` त्स्तवन मिद मकार दिष्यदिव्यं महिम्नः ॥३७
छ संस्कृत टीका +ई
( शच्िधरवरम्रोेः ) चन्द्रमौलेः क्ाचच्छिशुरादिधरमौलेरि-
त्यि पाठः स्पच्ाथ पव । ( देवदेवस्य ) महादेवस्य ( दासः ) सच-
कः) श्वेत्य दास्यद्ासरदाखगोप्यक्चेटका-"'इत्यमरः ( सवगन्य-
व्वेराज्ः ) ख्वैवां गन्धर्वीणां राजा-"राजाहः सखिभ्य छच'*-५ ।
8 । ९१-इति टच्प्रत्ययः । गन्धञ्चस्तु देवयोनिविशेषो देवेषु गायको
वा-"“विद्याधशेऽप्लरो यक्षरक्षोगन्धवेकिश्चरः । पिशाचो ग्यकः
सिद्धां मूताऽमा देवयानय- इसयत्राप्यमर पव । ( कुखुमदशानन-
मा) नामोपरक्चषणतमरत चेन चुष्पद्न्ताचाय्यं हव्येवनैप्रायः ( अ-
न भ > न भ € कत् न
स्यव ›) मरहादवस्य, एव -इत्यनन नान्यस्यव्यथः। ( रषात् कोपात्
( निजमदिम्नः ) सखमहत्वात्। अपादाने पञ्चमी । ( भरष्टः) पतेतः
सन् ( दिव्यदिव्यं )} दिवि भवा दिव्या स्तष्वपि दिव्य परमात्तमं (इ-
द्) पृर्वाभिहिते ( महिम्नः स्तवनं ) महिम्नः स्तो ( सः )उक्ताच
य्येः ( अकारीत् ) विरचितवान् ( खलु ) इति निश्चयेन । अत्न महे-
प्वररोषद्दिव परिश्रटेन पुष्पदन्ताचाय्यण शिवतोष्ाथमेचदं महिम्नः
स्तो व्यभ्वायीति स्पष्ठोऽथौ भ।वश्चेति ॥ २७ ॥
[ ५ अ य कच 1.4 [र > € म
( \ ) महिन्नपतुतेसक्िशच्छकाका एव श्रीमधुसदनसरस्वत्याख्ययतिवरभ्या ख्याताः । तते
हजरिशदादि षट् तंशसर्थन्तं छोकान्संगरद्य्रे व्याख्योफसंहारे (इमे शोकाः स्तोत्रान्तगेताः सुगमा.
ति संव भद्र इति लिखितमस्ति नाम्रेतनाने पव्यानि, तथापि, लोकप ठमसुमत्यास्माभिरत्र एेग-
होतानीति राम् ॥
सस्कृत-भाषारीकाभ्यां सवछितम्- १६५
सस्कृतपयाजुवादः +
गन्ध्वैराजः स हि ( कवि ) पुष्पदन्तः,
श्रीचन्द्रमोट्यङ्प्रिसरोजभरज्ञः ( दासः )।
यर एठाऽस्य शापा र्स्वमहतोयः ( त्स्वमाहिम्न एव )
स्तोत्रं माहेस्नो विधिवच्यघत्ते ॥ २७ ॥
+ भाषा रीका +
( शाशिधरवरमोटेः ) चन्द्रकलाको मस्तकमे धारण करने बाले
( देवदेवस्य ) भगवान मदादेवका ( दासः ) स्वक, एवं ( सवगधर्व-
राजः ) समस्त गध्रवे।क् राजञा ( कुसुमदशननामा ) पुष्पदत नामक
क विने ( अस्यैव रोषात् ) इन्दी महादवजीक कोपसरे ( निजमदिम्नः
भ्रष्टः) अपन महत्वसर पतित होकर ( इद दिव्यदिव्यं मदिश्नः स्तवनं )
हस परमात्म मदिल्न स्तोच्रकरो( सः अक्राष।त् खलु) निश्चय करके
बनाया |
+ भाषापरयायुवादः +
राजा सव गघवंके, पुप्पदत विख्यात ।
वाङ चन्द्रधर-मोिक, जो सेवक करहिजात ॥
महादे कके रोषते, निज महिमा विनसाय ।
चिच महिमाकी स्ति रची; अतिसय दिव्य बनाय ॥ ३७॥
< भाषा विम्नम्
कुःखमदसनगाजा सबे-गन्धवै राजा,
ससिधर-प्रसुकेरा भक्ति संखक्त चर। ।
निज-पद मिमाते अष्ट ह्वे रोष धाते
स्तुति शिव महिमाकी दिष्य दिञ्ये रची (यदै) कौ (वनयी )॥३७॥
सरवरसनिपञ्यं स्वग॑मोक्षेकहेतं
पटति यदि मनष्यः प्राञ्जलि नान्यचेताः ।
व्रजति रिवसमीपं किन्नरैः स्तूयमानः
स्तवन मिद् ममोघं पुष्पदन्तप्रणीतम् ॥ ३८ ॥
छ सस्त टीका
( यष्दे ) कदाचत् ( प्रार्जालः ) प्रवद्धकरणक्तम्पुटः ८ नान्ये
१६६ शिवमंहिश्चस्तोत्रम् ।
ताः ) अनन्यमनस्कः ( मचुष्यः ) सामान्यसुपलक्षणमेतत् । ( इद )
पूचावा्हेत ( खुरतररम्रानपृज्य ) खुरवरा इन्द्रादयो दवाः मुनया वाद
छादयस्तेः पूजनीयं, अथादेद् स्तात न केवरुमचुष्येरव पूजत
मस्ति परन्तु देवा मुनयश्चेतन स्तुचन्तीति भावः। अत पव (स्व
गमोश्चकहत् ) स्वगापचगयारेकमाज्रं साधनभूत ( पुष्पदन्तप्रणः
त ) पुष्पद्न्ताभसिघानकविना विरचित (-अमोघं ) अव्यथ, सचद्-
व फ़खद्ानोनमुल-तनास्य पाठस्तु कदाचेदापि व्यथतां न प्रयाति
सचथेव यथाक्तमाखलमापे फ़टमवइयमव ददाति; इति सखाचतम
( स्तवन ) माह्नः स्तात्र (पठति ) अध्याते, पाठमात्रं करतात
वा । तिं (किन्नरः ) देवावेरोषैः ( स्तूयमानः ) स्तुव्यः सन् (सः
घरखमोप ) विभोः पाश्वं ( बजति ) गच्छति । अथोदादोा गणत्च-
मबाप्यान्त सामप्खाख्यनकचाणपद् पाप्नाताात भावः पुचपद्येऽ्राप
ख माखिनीवृत्तमव ॥ ३८ ॥
द्धः सस्छरृेत पदयानुवादः #&
सवुराचच्न्द् वान्द्त स्वरादेमोश्चसाधनं ( दायक ),
पटत्यसु स्तव नरः भवद्धहस्तसम्पु
अनन्यमानसा यदि प्रयाति शमभ्भुसखन्निधि
समरस्ताकनर स्स्तुतः सुपुष्पदन्तनिभ्मितम् ॥ ३८ ॥
@ भाषा टीका
( प्रज्जलिः ) दोना हाथोको जोडकरः ( न(न्यचेताः ) एकाग्रचित्त
# ९ € ^^
हा ( मनुष्यः ) कभी मचुष्य ( सुरवर सुनि पूज्यं ) .इन्द्रादिकदेव त!
,
| शि वश्घछाद्किक मह्।षयास पूजनीय ( स्व गमाक्चेकडेतु ) स्वग अर
मोक्षकर एकमात्र साधन ( पुष्पदन्तप्रणात ) पुष्पदन्ताचायेक बनाय
हण ( अमाघ ) कमा व्यथ नही होने वाङे अथीत सदा फरदायक
( षदं स्तवन ) इस मदहिन्नस्तो्रको ( यदि पर्ति ) जो पदे ता (कि
न्रे स्तयमनः [ सन् | छन्नर् ख{गासख स्तुत हाता इभ ( । 18
समीपं ) महाद्वके पास ( बजति ) जाता है-अथांत् यह स्तोत्र अध्य
नामक पर पद भाई्ससप्रप्तदहदाजाता हे-आौर किन्नर खोग उसका
बडाई गाया करत हे ।
संक्ृस्त-भाषारीकाभ्यां संवछितम्- १६७
+ म।षापद्यानुवादः + |
घूजाह.सखुर ओन जह सव, दत स्वम अस मुक्ति । |
„ प्क चित्त ह जार कर, जा पटं नर ताज अुक्ति॥
कन्नर गावाह् ताह्का सा जच स्व पास ।
पुष्पदन्त प्रनात यह, अस्तुति पुरवात आसर ॥ २८॥
& भाषा बिम्बम् श्र 5
सुर मुनि सम पृज्ये स्वगे ओ। मोच्छ मूके, ¦
र स्वति यहदि अमोघे पुष्पदन्त रची है । न
पद्धि नर कर जारे चित्त रकाभ्रतासे,
पर्टुचत रिव पासं किन्नर ताहि गति ॥ ३८॥
आसमाप्त मिदं स्तोत्र, पुण्य गन्धवेभाषितम् ।
अनोपर्यं मनोहारि, शिव मीरवरवणेनम् ॥ ३९ ॥
द सस्कृत रका +
( गन्धर्व मापितं ) गन्धवेराजपुष्पदन्ताचाय्यकथित ( पुण्यं )
पुण्यभ्रदं पविघ्नमिव्यथंः “पुण्य धमं मनोज्ञे च पावन च प्रयुज्यते
इति मेदिनी । ( अनोपस्य ) उपमा्खहितमद्धितीयत्वात् ( मनोहारि )
पठता चण्वताश्च जनानां चित्तापहारकं ( सवै ) अखिटमेव ( श्व
वर्णनं ) परमेदवरमाह्मवर्णनापूणे ( इदं › पूर्वोक्तं ` ( स्तोत्र ) म-
हिस्नः स्तात ( आसमाक्तम् ) आ समन्तात्समाक्त गतामाते ॥२९॥
-& सस्कृतपयानुवादः
` श्रखिद्धमतेच्छर"्याम्भोद्धपत्रलच्छ्सखोकसम्मितम्र् ।
खमस्तमीसश्वंरस्यंव, वणनन समापितम् ॥
असमानमनिदं स्तो, मभिज्ञानां मनोहरम् ।
गन्धन्भीतं गीतेव, पविन्न पुण्यवेद्धनम् ॥ ३९.॥
द भाषो टकरा
. ` ` ( पुण्यं ) चरमं पवित्र ( गन्धवेमाषितं ) गन्धवंराज-पुष्पदन्ता
चयक कदा हमा ( अनूपम ) उपमारदित ( मनोहारि ) पटने खु
लने वाखका मन छ्ुमानेवाखा ( सवं इंदवरवणनम् ) सै प्रकार
हृदवरदीकिं वणनसे भरा हुआ ( इदं स्तोन्न ) यह महिभ्न स्तोत्र
( आसमाघम् ) समाप्त हुआ । ४
|
|
|
१६८ शिवमदिप्नस्तोत्रम् ।
दः भाप्रापयानुवादः
है समाक्च असतो यह, र॑स्वर बनेन सर्वं ।
अतुपमर पुन्य मनोहरे, जिदहि भाष्यो गधर्व ॥ ३९ ॥
ॐ माषा विम्बम्
+ है समात्त यदी स्तोत्र, सवे ईश्वर वर्निकै।
५५
य [क ~
वे जोड चित्त-हारी है, पुन्य-गधवे-भादित ॥ ३९ ॥
श्रपुष्पदन्तमुखपङ्जानिर्गतेन
स्तोत्रेण किल्बिषहरेण हरपियेण ।
कण्ठस्थितेन पठितेन समाहितेन ` `
सुम्ीणितो भवति मूतपतिहेशः ॥ ४० ॥
~ 4
इति श्चीपुष्पदन्तविरचितं रिवमदहिन्नस्तोन्नं ख पूर्णम् ।
६५६ `" श सस्कृतटीका +
( श्रीपुप्पदन्तस्ुलपङ्जनिगतेन ) भीपत्पुष्पदन्ताचार्य्यस्येव मुः
कै © 9 क, ऋ 9 प [ष
सकमटादहहिगंतन । पतेनेयं भरभ।रना।देस्तुतिरित्ति सूचित (क्रिः
® न; [ > क [ क + =
[स्वबहरण ) पापरपुञ्ञविदारकेण ( दर ्रियेण ) रास्भोः गरेरस्पदत्व
क ं ~क ~ ५
मथातिन ( कण्ठस्थितेन ) कण्ठस्थनेवास्थ पाठमाहाम्यमिति . ध्व:
# ~ ॐ ॥ प । च ^ 4
नित, तन पुस्तकस।हायेन पठे कृतेन तादा; फरलान अवतीति
च [वज्ञा।पतम् | ( पठितन ) जधीतन, पठ्यतां गतेन ( खमादितेन ).
अङ्गीकृतेन? निर्विवादीकूतेन अथव। धरतिन्ञातेनेति यावत् ।--“सङ्ग-
ण--विदित-सखंश्त--लमााटेत-उपश्चुत-उपगतप् ' - इत्यमरः ।
समाहिते नेत्यत्र ""निषठाः-- ३ । २। १०२ इत्यनेन कतः,
ततश्च--'द धात हिः ७।४। ९२-इत्यतोहित्वमपि । केन्िदज्
समादितनेत्यस्यर समादहितचित्तेन जनेन परितिनति योजयन्ति, तज्ञ
समीचीनं नान्यचेता इत्येव पूव।कतत्वात् । ( स्तोत्रेण ) मदिम्न-
स्तोत्रपाठेन ( भूतपतिः) भूतानां प्रथेञ्यादीनां देवतिक्चोषा(णां बा
पतिः स्वामी ( महश्ः ) मदश्चासो रईराश्च महेशः ( प्रीणित; )
अत्यन्तप्रसन्नः ( भवति )। अस्व स्ञा्नस्य करठस्थपडटनमेव महे
दवर्रलक्नताहतुः हरम्रियत्वादिति तात्पय्याथैः स्प एव सिद्धः ।
संस्कृत -भाषाटीकाभ्यां सवङितंम्- १६९
वसन्तातिखकाचत्तम्-“उकता वसन्ततिलका तभजाजगौगः-'इतिन्न-
सतरतन।करे ॥७०॥ ।
द सस्कृतपदयानुवादः +,
श्रीखश्चीपुष्पदन्ताननसरासिजतो निगतेन स्तवेन,
पापौ घश्राचमेदपवितताभिदुरेणेदवरातित्रियण।
कण्ठस्थानस्थितन प्रणिहितमनसोच्चारितेनेव भक्तया, ` #
देवानामादिदेब्ो भवति(पद्यु) भवपतिः ्रीणितोऽ तीव शधिम्॥४०॥
मदहिम्नस्तोतरेऽस्मिन्परमभगवन् ! प्लविता) `
द्विधा टीक। नारायणपतिमहीदेवरचिता । |
मुदे तेऽस्तान्मागौ-सितदरुद शम्यां कुजदिनेऽ-
पिता भक्त्या वचं ऋतु-रस-निधि-क्षाणि-गणिते ॥ # ॥
4 1; , क -माषाथका 3 |
(श्रीपुष्पदन्त मुलपङ्कजनिगेतन ) श्रीपुष्पदन्ताचायेके सुख कमङ
हते निकले हुए ( किल्विषहरेण ) पापौके हरण करने बारे ( हरपिये-
ण ) महादेवके बड प्यारे (समाहितेन ) भ्रतिज्ञा किये हुए (कण्ठस्थि-
तेन ) कण्ठ।श्रही( परितन ) पदे गये क्याकि पुस्तक देखकर पाठ
कर्ने से मन अक्षरो पर कग जाता दहै जससे स्तोत्राथ का भाव-
कभी कभी नष्ट प्राय हो पडता है ( स्तोत्रेण ) इस मदिश्नस्तोभसे
( भूतपतिः महेशः ) समस्तभूतोके अधिपति मदेदवरदेव (खभीणितः
भवति ) अव्यन्त भरसन्न होते है-अथीत् इस स्तात्रकं कंठस्थ पाठ
करनेसे महादेवजी बडही प्रसन्न हाते ह।
+ भाषा पयाचुवादः +
पुष्पदत-खुखकमलते, निखरी अस्तुति जोय ।
पाप हरे ष्यारी गे, महदेव को सोय ॥
याहि पे कस्डथ जो, भके समाहित जानि ॥
तापि परम प्रसन्नाचित्त, हावहि संथु-भवानि ॥ ७०॥
+ भाषा निम्बम्
ध्रीपुष्पदन्त सुखपंकजते कल्यो जो,
स्तोत्र अधे हरत है हरको पियारो । ।
कंटस्थ याहि पडि्है, स्थिर चित्त है जो
तापि प्रसन्न रहि है निद महेशो ॥ ४०॥
ति ्ीः.।. 4
2२।
१७० ;: रिवमदिस्स्तात्रम् ।
+ ` विप्र रमापतिको तनय, नारायन पति नाम। । |
सघत श्री विदवेश् पद, बसत बनारस धाम ॥ १॥ "
सवत रस ऋतु अक माह, माघ अमाचस पवे।
अपैत यह अनुवादं सवः बविनवत “स्वीकुरु शवे |” ॥ २ ॥
इत्येषा वाङ्मयी पूजा श्रीमच्छकरपादयोः ।
अपिता तेन देवेशः प्रीयतां मे सदाशिवः ॥ ४१ ॥
तव. तच न जानामि कीटशोऽसि महेश्वर ।
यादृशोऽसि महादेवं तादृशाय नमो नमः ॥ ४२ ॥
एककारं दिकारं वा चरिकार यः पठेन्नरः । `
सवेपापविनिमक्तः रिवरोके महीयते ॥ ४३ ॥
१९ ।
(न ।
4 ति
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क (र ॥
नि व ॥ ३ । ॥ शैः + = = # ‰ सगक्-> 9" ४ ५ ना
५ र | ^ क ~ ।
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